Wednesday, September 18, 2019

बुध्द के शिष्य

बुध्द के दर्शन (प्रज्ञा) ने अपने समय के बहुत से गंभीर विचारकों को अकृष्ट किया. उनके प्रधान शिष्य सारीपुत्र और मौद्गल्यायन उस समय के गंभीर विचारकों में से एक थे, (दोनों ने) पण्डित ब्राह्मण विचारधारा का पूरी तौर से अवगाहन किया था. इन दोनों शिष्यों के बाद महाकात्यायन और महाकाश्यप उनके प्रमुख शिष्य थे. दोनों ही ब्राह्मण घर में पैदा होकर ब्राह्मणों कि विद्या में निष्णात थे. ऐसी प्रतिभाओं को बुध्द अपने दर्शन द्वारा अकृष्ट करने में सफ़ल हुए. उसके बाद भी अश्वघोष, नागार्जुन, असंग, वसुबंधु, दिग्नाग, धर्मकिर्ती जैसे महान प्रतिभाशाली ब्राह्मणों को बुध्द के विचारों ने संतुष्ट किया, और वह भारतीय दर्शन को आगे ले जाने में सफ़ल हुए. यूरोप में 16 वीं शताब्दी में उत्पन्न हेगेल के दर्शन को सब से अधिक पुष्ट और विकसित माना जाता हैं. हेगेल के दर्शन के उत्पन्न होने से 13 शताब्दी पहले भारतीय हेगेल धर्मकिर्ती हुए थे, जिनको उत्पन्न करने का श्रेय बुध्द की विचारधारा को हैं. धर्मकिर्ती और उनके पूर्वज दिग्नाग ने बुध्द के दर्शन को स्पष्ट करते हुए 'प्रमाणवार्तिक' और 'प्रमाणसमुच्चय' (ग्रंथ) लिखे. 'प्रमाणसमुच्चय' मूल संस्कृत में नहीं मिलता. प्रमाणवार्तिक अपनी कई टिकाओं और भाष्यों के साथ तिब्बत से मिलकर अब मूल संस्कृत में छप चुका हैं. भारतीय दर्शन के चरम विकास को जानने के लिए इनका अध्ययन अनिवार्य हैं. इन विचारधाराओं को बिना पढ़े हुए हम एकांगी निर्णय कर बैठते हैं. कहा जाता हैं, वेदान्त ही एकमात्र भारत की विचारधारा का प्रतिनिधित्व करता हैं, लेकिन यह गलत हैं. वेदान्त के आत्मवाद से बिल्कुल उलटा अनात्मवाद का दर्शन भी भारत में उत्पन्न हुआ. कितने ही समझते हैं ईश्वरवाद-आस्तिकवाद भारत की अपनी चीज़ हैं. अनिश्वरवादी बुध्द, दिग्नाग और धर्मकिर्ती कहा से आये? केवल रूढ़ीवाद का एकाधिपत्य हमारे यहाँ कभी नहीं रहा. रुढ़ीयों के प्रबल विरोधी भी यहा होते रहे. नालन्दा के महान दार्शनिक धर्मकिर्ती (600 ई.) से बढ़कर रुढ़ि का विरोधी कौन हो सकता हैं? जिन्होंने डंके की चोट से कहा था ---

'वेदप्रामाण्यं कस्यचित्कर्तुवादा: स्नाने धर्मेच्छा जातिवादावलेपाह:।
संताप्रारंभा: पापहानाय चेति ध्वस्तप्रज्ञानां पंच लिंगानि जाड्ये:।'

अर्थ- वेद (ग्रन्थ) की प्रमाणता, किसी (ईश्वर) का सृष्टि (कर्तापण, कर्तुत्ववाद), स्नान (करने) में धर्म (होने) की इच्छा रखना, जातिवाद (छोटी-बडी जाति-पांत) का घमंड, और पाप दूर करने के लिए शरीर को संताप देना (उपवास तथा शारीरिक तपस्यायें करना) ये पांच हैं, अकलमारे लोगों की मूर्खता (जड़ता) की निशानियाँ।

महामानव बुध्द
लेखक- महास्थवीर राहुल सांकृत्यायन

सौन्दरनन्द-महाकाव्य, आज्ञा-व्याकरण, सर्ग १८

सौन्दरानन्द महाकाव्य, अष्टादश (१८ वां) सर्ग, आज्ञा-व्याकरण (उपदेश): अथ द्विजो बाल इवाप्तवेदः क्षिप्रं वणिक् प्राप्त इवाप्तलाभः । जित्वा च रा...