Showing posts with label बुध्दचर्या. Show all posts
Showing posts with label बुध्दचर्या. Show all posts

Wednesday, April 29, 2020

भारत में बौध्दधर्म का उत्थान और पतन १

गौतम बुद्ध का निर्वाण विक्रम पूर्व ४२६ में हुआ था. उन्होने अपने सारे उपदेश मौखिक किये थे; तो भी उनके शिष्य उनके जीवनकाल में ही उसे कंठस्थ कर लिया करते थे. यह उपदेश दो प्रकार के थे--एक साधारण, धर्म और दर्शन के विषय में, और दूसरे भिक्षु भिक्षुणीयों के नियम. पहले को पालि भाषा में "धम्म" (धर्म) कहा गया हैं और दूसरे को "विनय" कहा गया. बुध्द के निर्वाण के बाद उनके प्रधान शिष्यों ने (भविष्य में मतभेद न हो जाये, इसलिए) उसी वर्ष में राजगृह (जिला पटना) की सातपर्णी गुहा में एकत्र हो, "धर्म" और "विनय" का संगायन किया. इसी को प्रथम-संगिती कहा जाता हैं. इस में महाकाश्यप भिक्षु-संघ के प्रधान (संघ-स्थविर) की हैसियत से धर्म के विषय में बुध्द के चिर-अनुत्तर 'आनन्द' से और बुध्द-प्रशंसित 'उपालि' से प्रश्न पुछते थे. अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, अमद्य सुकर्मो को पालि में 'शील' कहते हैं, और स्कंध (रुप,वेदना,संज्ञा,संस्कार,विज्ञान), आयतन (रुप, चक्षु, चक्षु-विज्ञान आदि), धातु (पृथ्वी, जल आदि) के सूक्ष्म दार्शनिक विचार को प्रज्ञा, दृष्टि, दर्शन या विपश्यना कहते हैं. बुध्द के उपदेशो में शील और प्रज्ञा दोनों पर ही पूरा जोर दिया गया हैं. "धर्म" के लिए पालि में दूसरा शब्द "सुत्त" (सुक्त/सुत्र) या "सुतन्त" भी आया हैं. प्रथम संगिती के स्थविर भिक्षुओं ने "धर्म" और "विनय" का इस प्रकार संग्रह किया. पीछे भीन्न-भीन्न भिक्षुओं ने उनको पृथक पृथक कंठस्थ कर, अध्ययन-अध्यापन का भार आपने ऊपर लिया. उनमे उन्होने "धम्म" या "सुत्त" की रक्षा का भार लिया, वह "धम्मधर", "सुत्तधर" या "सुत्तंतिक" (सौत्रांतिक) कहलाये. जिन्होंने "विनय" की रक्षा का भार लिया, वह "विनयधर" कहलाये. इनके अतिरिक्त सुत्तो में दर्शन-संबंधी अंश कहीं-कहीं बड़े ही संक्षिप्त रूप में थे. इन्हें "मातिका" (मात्रिका) कहते थे. इन मातिकाओं के रक्षक "मातिकाधर" कहलाये. पीछे मातिकाओं को समझाने के लिए जब उनका विस्तार किया गया, तब इसी का नाम "अभिधम्म" (अभिधर्म--धर्म में से) हुआ, और इसके रक्षक "अभिधम्मिक" (अभिधर्मिक) हुये.


प्रथम-संगिति के सौ साल बाद वैशाली के भिक्षुओं ने  विनय के कुछ नियमों की अवहेलना शुरु की. इस पर विवाद आरम्भ हुआ, और अन्त में फिर भिक्षु-संघ ने एक हो, उन विवाद-ग्रस्त विनयों पर अपनी राय दी; एवं "धर्म" और "विनय" का संगायन किया. इसी का नाम द्वितीय संगिती हुआ. कितने भिक्षु इस संगीती से सहमत न हुए और उन्होने अपने महासंघ का कौशाम्बी में पृथक सम्मेलन किया, तथा अपने मतानुसार धर्म और विनय का संग्रह किया. स्थविरों (वृध्द-भिक्षुओं) का अनुगमन करने वाला होने से, पहला समुदाय (निकाय) आर्यस्थविर या स्थविरवाद के नाम से प्रसिद्ध हुआ, और दूसरा महासांघिक के नाम से. इन्हीं दो समुदायों से अगले सवा सौ वर्षों में स्थविरवाद से --- वज्जिपुत्तक, महिशासक, धर्मगुप्तिक, सौत्रांतिक, सर्वास्तिवाद, काश्यपीय, संक्रांतिक, सम्मीतीय, पण्णागरिक, भद्रयानिक, धर्मोत्तरिय इ. और महासांघिक से -- गोकुलिक, एकव्यहारीक, प्रज्ञप्तिवाद (लोकोत्तरवाद), बाहुलिक, चैत्यवादी; यह १८ निकाय हुए. इनका मतभेद विनय और अभिधम्म की बातो को लेकर था. कोई कोई निकाय आर्यस्थविरों की तरह बुध्द को मनुष्य न मानकर उन्हें लोकोत्तर मानने लगे. वह बुध्द में अद्भुत और दिव्य-शक्तियों का होना मानते थे. कोई कोई बुध्द के जन्म और निर्वाण को दिखावा मात्र समझते थे. इन्ही भिन्न-भिन्न मान्यताओं के अनुसार उनके सुत्र और विनय में भी फर्क पडने लगा. बुध्द की अमानुषिक लिलाओं के समर्थन में नये-नये सुत्तो की रचना हुई. बुध्द के निर्वाण के प्राय: सवा दो सौ वर्ष बाद, सम्राट अशोक ने बौध्दधर्म ग्रहण किया. उनके गुरु मोग्गलिपुत्त तिस्स उस समय आर्यस्थविरों के संघ-स्थविर थे. उन्होने मतभेद दूर करने के लिए पटना में अशोक के बनाये गये "अशोकाराम" नामक मठ में भिक्षु-संघ के द्वारा चुने गये हजार भिक्षुओं का सम्मेलन किया. यही सम्मेलन तृतीय संगिति के नाम से प्रसिद्ध हुआ. इसी समय आर्यस्थविरों से निकाले सर्वास्तिवाद आदि ग्यारह निकायों ने नालन्दा में अपनी पृथक संगीति की. नालन्दा जो समय-समय पर बुध्द का  निवासस्थान होने से पुनीत स्थानों में गिनी जाती थी,  इसी समय सर्वास्तिवादीयों का मुख्य स्थान बन गयी. 

तृतीय संगिति समाप्त कर मोग्गलिपुत्त तिस्स ने सम्राट अशोक की सहायता से भिन्न-भिन्न देशो में धर्मप्रचारक भेजे. यह पहला मौका था जो एक भारतीय धर्म संगठित रुप में भारत की सिमा के बाहर प्रचारित होने लगा. यह प्रचारक जहां पश्चिम में यवन राजाओं के राज्यों (ग्रीस, मिस्र, सीरिया आदि देशों) में गये, वहां उत्तर में मध्य-एशिया तथा दक्षिण में ताम्रपर्णी (लंका) और सुवर्ण देश (बर्मा) में भी पहुँचें. लंका में अशोक के पुत्र तथा मोग्गलिपुत्त तिस्स के शिष्य महेन्द्र (महिंद) और उनकी सहोदरा संघमित्रा गयी. लंका के राजा देवानंपिय तिस्स बौध्दधर्म में दीक्षित हुए. कुछ ही दिनों में वहां की सारी जनता बौध्द हो गयी. आर्यस्थविरवाद का आरम्भ से ही यहा प्रचार रहा. बीच में, बारहवी तेरहवी शताब्दीयों में जब बर्मा और श्याम (थाईलैंड) का महायान बौध्दधर्म विकृत तथा जर्जरित हो, लुप्त होने लगा तब आर्यस्थविरवाद वहा भी सर्वव्याप्त हो गया. लंका में ही ईसा की प्रथम शताब्दी में सुत्र, विनय और अभिधर्म --- त्रिपिटक जो अब तक कंठस्थ चले आते थे, लेखनबध्द किये गये, और यही आज कल का पालि त्रिपिटक (तीन पिटक) हैं. 

त्रिपिटकाचार्य
राहुल सांकृत्यायन 



Tuesday, April 28, 2020

भारत में बौध्दधर्म का उत्थान और पतन २

भारत में बौध्दधर्म का उत्थान और पतन :

मौर्य-सम्राट बौध्दधर्म पर अधिक अनुरक्त थे; इसलिए उनके समय में, अनेक पवित्र स्थानों में राजाओं और धनिको ने बड़े-बड़े स्तूप और संघाराम (मठ) बनवाये, जिन में भिक्षु सुख पूर्वक रहकर धर्मप्रचार किया करते थे. ईसा के पूर्व दूसरी शताब्दी में, मौर्यों के सेनापती पुष्यमित्र ने अन्तिम मौर्य सम्राट को मारकर अपने शुंगवंश का राज्य स्थापित किया. यह नया राजवंश राजनीतिक उपयोगिता के विचार से ब्राह्मण धर्म का पक्का अनुयायी और अब्राह्मण धर्म का द्वेषी हुआ. शताब्दीयों से परित्यक्त पशू-बलीमय अश्वमेध आदि यज्ञ, महाभाष्यकार पतंजलि के पौरोहित्य में फिर से होने लगे. ब्राह्मणो के महात्म्य से भरे मनुस्मृती जैसे ग्रंथो की रचना का सूत्रपात हुआ. इसी समय महाभारत का प्रथम संस्करण हुआ तथा मृत संस्कृत-भाषा के पुनरुध्दार की चेष्टा की गयी. परिस्थिति के अनुकूल न होने से धीरे-धीरे बौध्द लोग बौध्दधर्म के केन्द्रों को मगध और कोशल से दूसरे देशों में हटाने पर मजबूर होने लगे. आर्यस्थविरवाद मगध से हटकर विदिशा के समीप चैत्यपर्वत (सांची) पर चला गया; सर्वास्तिवाद मथुरा के उरुमुण्ड-पर्वत (गोवर्धन पर्वत) चला गया. इसी तरह और निकायों (समूहो) ने भी अपने-अपने केन्द्रों को अन्यत्र हटा दिया. 

आर्यस्थविरवाद सब से पुराणा निकाय हैं, और इसने सभी पुराणी बातो को बड़ी कड़ाई से सुरक्षित रखा. दूसरे निकायों ने देश, काल, व्यक्ति आदि के अनुसार अनेक परिवर्तन किये. अब तक त्रिपिटक मागधी भाषा में ही था, जो की, पूर्वी युक्तप्रान्त तथा बिहार की साधारण भाषा थी. सर्वास्तिवादीयों ने मथुरा पहुँच कर अपने त्रिपिटक को ब्राह्मणों की प्रशंसित संस्कृत भाषा में कर दिया. इसी तरह महासांघिक, लोकोत्तरवाद आदि कितने ही और निकायों ने भी अपने पिटको को संस्कृत में कर दिया. यह संस्कृत पाणिनिय संस्कृत नहीं थी, आजकल इसे गाथासंस्कृत कहते हैं. 

मौर्य साम्राज्य के विनष्ट हो जाने पर  पश्चिम भारत पर यवन राजा 'मिनान्दर' ने कब्जा कर लिया. मिनान्दर ने अपनी राजधानी शाक्ला (वर्तमान पाकिस्तान का स्यालकोट) बनायी. उसके तथा उसके वंशजो के क्षत्रप (व्हायसराय) मथुरा और उज्जैन में रहकर शासन करने लगे. यवन-राजा अधिकांश में बौध्द थे, इसलिए उनके उज्जैन के क्षत्रप सांची के स्थविरवादीयों पर तथा मथुरा के क्षत्रप सर्वास्तिवादीयों पर बहुत स्नेह और श्रध्दा रखते थे. मथुरा उस समय एक क्षत्रप की राजधानी ही नहीं थी, बल्कि पूर्व और पश्चिम से तक्षशिला के वणीक-पथ पर व्यापार का एक सुसमृध्द प्रधान केन्द्र थी, इसलिए सर्वास्तिवाद के प्रचार में बडी सहायक हुयी. मगध के सर्वास्तिवाद से इसमे कुछ अन्तर हो चुका था, इसलिए यहा का सर्वास्तिवाद आर्य-सर्वास्तिवाद के नाम से प्रसिद्ध हुआ. 

यवनो को परास्त कर यूचीयो ने पश्चिमी भारत पर कब्जा किया. इन्हीं की शाखा कुशाण थी, जिस में प्रतापी सम्राट कनिष्क हुये. कनिष्क की राजधानी पुरुषपुर (पेशावर, पाकिस्तान) थी. उस समय सर्वास्तिवाद गंधार में पहुँच चुका था. कनिष्क स्वयं सर्वास्तिवादीयों का अनुयायी था. इसी के समय में महाकवि अश्वघोष और आचार्य वसुमित्र आदि पैदा हुए. उस समय गन्धार के सर्वास्तिवादीयों में --- जो मूल सर्वास्तिवाद कहा जाता था --- कश्मीर और गन्धार के आचार्यों का मतभेद हो गया था. देवपुत्र कनिष्क की सहायता से वसुमित्र, अश्वघोष आदि आचार्यों ने सर्वास्तिवादि बौध्द भिक्षुओं की एक बड़ी सभा बुलाई. इस सभा में आपस के मतभेदों को दूर करने के लिए उन्होने अपने त्रिपिटक पर "विभाषा" नाम की टीकायें लिखी. विभाषा के अनुयायी होने से मूल-सर्वास्तिवादियों का दूसरा नाम 'वैभाषिक' पड़ा. बौध्दधर्म में दु:खो से मुक्ति यानी निर्वाण के तीन रास्ते माने गये हैं. १) जो सिर्फ स्वयं दु:खविमुक्त होना चाहता हैं, वह आर्य अष्टांगिक मार्ग पर आरुढ़ हो, जीवनमुक्त हो, अर्हत कहा जाता हैं. २) जो उस से कुछ अधिक परिश्रम के लिए तैयार रहता हैं, वह जीवनमुक्त हो, प्रत्येक बुध्द कहा जाता हैं. ३) जो असंख्य जीवों का मार्गदर्शक बनने के लिए अपनी मुक्ति की फिक्र न कर, बहुत परिश्रम और बहुत समय बाद, उस मार्ग से स्वयंप्राप्य निर्वाण को प्राप्त होता है, उसे 'बुध्द' कहा जाता हैं. यह तीनों ही रास्ते क्रमश: अर्हत (श्रावक) यान, प्रत्येक-बुध्द यान और बुध्द-यान कहे जाते हैं. आचार्य अश्वघोष ने बाकी दोनों यानो की अपेक्षा बुध्द-यान पर बडा जोर दिया और इसे महायान कहा. इस तरह पीछे कुछ लोग दूसरे यानो को स्वार्थपूर्ण कह, केवल बुध्दयान या महायान की प्रशंसा करने लगे. यह स्मरण रहे की, १८ निकाय  तीनों यानो को मानते थे. उनका कहना था कि, किसी यान का चुनना मुमुक्षु की अपनी स्वभाविक रुचि पर निर्भर हैं. 

इसा की प्रथम शताब्दी में, जिस समय वैभाषिक संप्रदाय उत्तर में बढ़ता जा रहा था, दक्षिण के विदर्भ (बरार) देश में आचार्य नागार्जुन पैदा हुए. उन्होने माध्यमिक या शून्यवाद दर्शन पर ग्रन्थ लिखे. कालान्तर में महायान और माध्यमिक दर्शन के योग से शून्यवादी महायान-संप्रदाय चला, जिसके त्रिपिटक की अवश्यकता समय-समय पर बने हुए अष्टसहस्रिका प्रज्ञापारमिता आदि ग्रन्थों ने पूरी की. चौथी शताब्दी में पेशावर के आचार्य वसुबन्धू ने वैभाषिको से कुछ मतभेद करके सौतांत्रिकवाद का "अभिधर्मकोश" ग्रन्थ लिखा और उनके बड़े भाई असंग विज्ञानवाद या योगाचार सम्प्रदाय के प्रवर्तक हुये. इस प्रकार चौथी शताब्दी तक बौध्दों के वैभाषिक, सौतांत्रिक, योगाचार और माध्यमिक, चार दार्शनिक सम्प्रदाय बन चूके थे. इन में पहले दोनों को मानने वाले उपरी तीनों यानों को मानते थे; इसलिए उन्हें महायानीयों ने हीनयान के अनुयायी कहा; और, बाकी दो सिर्फ बुध्दयान को ही मानते थे, इसलिए उन्होने अपने को महायान का अनुयायी कहा. 

महायानी बुध्दयान के एकान्त-भक्त थे. इतना ही नहीं, बल्कि अपने उत्साह में वे बाकी दो यानों को बुरा-भला कहने से बाज़ न आते थे. बुध्द के अलौकिक चरित्र उन्हें बहुत उपयुक्त मालूम हुए, इसलिए उन्होने महासांघिको और लोकोत्तरवादियों की बहुत सी बाते ले ली. बुध्दयान पर अच्छी प्रकार आरुढ़, बुध्दत्व के अधिकारीक प्राणी को बोधिसत्व कहा जाता हैं. महायान के सूत्रों में हर एक को बोधिसत्व के मार्ग पर ही चलने के लिए जोर दिया गया हैं; वह यही की हर एक अपनी मुक्ति की परवाह छोड़ कर संसार की सभी प्राणियों की मुक्ति के लिए प्रयत्न करे. बोधीसत्वों की महत्ता दरसाने के लिए जहाँ अवलोकितेश्वर, मंजुश्री, आकाशगर्भ आदि सैकड़ों  बोधीसत्वों की कल्पना की गयी, वहाँ सारिपुत्र, मोग्गलान आदि अर्हत् (मुक्त) शिष्यों को अ-मुक्त और बोधिसत्व बना दिया गया. सारांश: यह की, जिस प्राचीन सूत्र आदि परम्परा को १८ निकाय मानते आ रहे थे, महायानीयों ने उन सभी को बोधिसत्व और बुध्द बनने की धून में एकदम उलट-पलट करने में कोई कसर न रखी. 

कनिष्क के समय में पहले पहल बुध्दप्रतिमा (मुर्ति) बनायी गयी. महायान के प्रचार के साथ जहाँ बुध्द प्रतिमाओं की पूजा-अर्चा बड़े ठाट-बाट से होने लगी, वहाँ सैकड़ों बोधीसत्वों की प्रतिमाएँ बनने लगी. इन बोधीसत्वों को उन्होने ने ब्राह्मणों के देवी-देवताओं का काम सौंपा. उन्होने तारा, प्रज्ञापारमिता, विजया आदि अनेक देवीओं की भी कल्पना की. जगह-जगह इन देवीयों और बोधीसत्वों के लिए बडे़ बडे़ विशाल मंदिर बन गये. उनके बहुत से स्तोत्र आदि भी बनने लगे. इस बाड में इन लोगों ने यह ख्याल न किया कि, हमारे इस काम से किसी प्राचीन परम्परा या किसी भिक्षु-नियम का उल्लंघन होता हैं. जब किसी ने दलिल पेश की, तो कह दिया---विनय-नियम तुच्छ स्वार्थ के पीछे मरने वाले हीनयानीयों के  लिए हैं; सारी दुनिया के मुक्ति के लिए मरने-जीने वाले बोधीसत्वों को इसकी वैसी पाबन्दी नहीं हो सकती. उन्होने हीनयान के सूत्रों से अधिक महत्ववाले अपने सूत्र बनाये. सैकड़ों पृष्ठों के सूत्रों का पाठ जल्दी नहीं हो सकता था; इसलिए उन्होने हर एक सूत्र की दो-तीन पंक्तियों में छोटी-छोटी धारणी, वैसे ही बनाई जैसे भागवत का चतु:श्लोकी भागवत; गीता की सप्तश्लोकी गीता. इन्ही धारणीयों को और संक्षिप्त कर के मन्त्रो की सृष्टि हुई. इस प्रकार धारणीयों, बोधीसत्वों, उनकी अनेक दीव्य शक्तियों तथा प्राचीन परम्परा और पिटक की----नि:संकोच की जाती-- उलट पलट से उत्साहित हो, गुप्त-साम्राज्य के आरम्भिक काल से हर्षवर्धन के समय तक मंजुश्रीमूलकल्प, गुह्यसमाज और चक्रसंवर आदि कितने ही तंत्रों की सृष्टि की गयी. पुराने निकायों ने अपेक्षा-कृत सफलता से अपनी मुक्ति के लिए अर्हत् यान और प्रत्येक-बुध्द यान का रास्ता खुला रखा था. महायान ने सब के लिए सुदुश्वर बुध्द-यान का ही एक मात्र रास्ता रखा. आगे चल कर इस कठ़िनाई को दूर करने के लिए ही उन्होने धारणीयों, बोधीसत्वों की पूजाओं का आविष्कार किया. इस प्रकार जब आसान दिशाओं का मार्ग खुलने लगा, तब उसके आविष्कारो की भी संख्या बढने लगी. मंजुश्रीमूलकल्प ने तंत्रों के लिए रास्ता खोल दिया. गुह्यसमाज ने अपने भैरवीचक्र के शराब, स्रीसंभोग तथा मंत्रोच्चारण से उसे और भी आसान कर दिया. यह मत महायान के भीतर ही से उत्पन्न हुआ; किन्तु पहले इसका प्रचार भीतर-ही-भीतर होता रहा. भैरवीचक्र की सभी कार्रवाइयाँ गुप्त रखी जाती थी. प्रवेशाकांक्षी को कितने ही समय तक उमेद्वारी करनी पड़ती थी. पीछे अनेक अभिषको और परिक्षावों के बाद वह समाज में मिलाया जाता था. यह मंत्रयान (तंत्रयान, वज्रयान) संप्रदाय इस प्रकार सातवी शताब्दी तक गुप्त रितिसे चलता रहा. इसके अनुयायी बाहर से अपने को महायानी ही कहते थे. महायानी भी अपना पृथक विनय-पिटक नहीं बना सके थे; इसीलिए उनके भिक्षु लोग सर्वास्तिवाद आदि निकायों में दीक्षा लेते थे. आठ़वी शताब्दी में भी, जब की नालन्दा महायान का गड़ थी, वहाँ के भिक्षु सर्वास्तिवाद-विनय के अनुयायी थे. तंत्र के प्रचुर प्रचार से भिक्षुओं को विनय में सर्वास्तिवाद की, बोधीसत्वचर्या में महायान की और भैरवीचक्र में वज्रयान की दीक्षा लेनी पड़ती थी. 

आठ़वी शताब्दी में एक प्रकार से भारत के सभी बौध्द सम्प्रदाय वज्रयान-गर्भीत महायान के अनुयायी हो गये थे. बुध्द की सिधी-सादी शिक्षाओं से उनका विश्वास उठ़ चूका था, और वे मनगढ़ंत हजारो लोकोत्तर कथाओं पर विश्वास करते थे. बाहर से भिक्षु के कपड़े पहनने पर भी भीतर से वे गुह्यसमाजी (गुढ़वादी) थे. बड़े-बड़े विद्वान और प्रतिभाशाली कवि आधे पागल हो, चौरासी सिध्दों में दाखिल हो, संध्या-भाषा में निर्गुण गाण करते थे. सातवीं शताब्दी में उड़िसा के राजा इंद्रभूती और उसके गुरु सिध्द अनंगवज्र तथा दूसरे पण्डित सिध्द, स्रियों को ही मुक्तिदात्री "प्रज्ञा" और पुरुष को ही मुक्ति का "उपाय" तथा शराब को ही "अमृत" सिध्द करने में अपनी पण्डिताई और सिध्दाई खर्च कर रहे थे. आठ़वी शताब्दी से बारहवीं शताब्दी तक का बौध्दधर्म वस्तुतः वज्रयान या भैरवीचक्र का धर्म था. महायान ने ही धारणीयों और पूजाओं से निर्वाण को सुगम कर दिया था; वज्रयान ने तो उसे एकदम सहज कर दिया; इसीलिए आगे चल कर वज्रयान 'सहजयान' भी कहा जाने लगा. 

वज्रयान के विद्वान प्रतिभाशाली कवि चौरासी सिध्द विलक्षण प्रकार से रहा करते थे. कोई पनहीं बनाया करता था; इसलिए उसे पनहींपा कहते थे. कोई कम्बल ओढा रहता था इसलिए उसे कमरिपा कहा करते थे. कोई डमरु रखने से डमरुपा कहा जाता था. कोई ओखल रखने से ओखरीपा. ये लोग शराब में मस्त, खोपड़ी का प्याला लिये, स्मशान या विकट जंगलों में रहा करते थे. जनसाधारण को जितना ये फटकारते थे, उतना ही लोग इनके पीछे दौडते थे. लोग बोधीसत्व-प्रतिमाओं तथा दूसरे देवताओं के भाँति इन सिध्दो को अद्भुत, चमत्कारी और दिव्य शक्तियों के धनी समजते थे. ये लोग खुल्लमखुल्ला स्रियों और शराब का उपभोग करते थे. राजा अपनी कन्याओं तक को इन्हें प्रदान करते थे. यह लोग त्राटक या हेप्नाटिज्म की कुछ प्रक्रियाओं से वाकिफ थे. इसी बल पर अपने भोले-भाले अनुयायी को कभी-कभी कोई चमत्कार दिखा देते थे. कभी-कभी हाथ की सफाई तथा श्लेष-युक्त अस्पष्ट वाक्यों से जनता पर अपनी धाक जमाते थे. इन पाँच शताब्दीयों में धीरे-धीरे एक तरह से सारी भारतीय जनता इनके चक्कर में पड़कर काम-व्यसनी, मद्यप और मूढ़-विश्वासी बन गयी थी. राजा लोग जहा राज-रक्षा के लिए पल्टने रखते थे, वहाँ उसके लिए किसी सिध्दाचार्य तथा उसके सैकड़ों तांत्रिक अनुयायीयों की भी एक बहु-व्यय-साध्य पलटन रखा करते थे. देवमंदिरों में बलिपूजा चढ़ती रहती थी. लाभ-सत्कार का द्वार उन्मुक्त होने से ब्राह्मणों और दूसरे धर्मानुयायीयों ने भी बहुत अंश में इनका अनुकरण किया. 

भारतीय जनता जब इस प्रकार दुराचार और मूढ़ विश्वास के पंक में कंठ तक डुबी हूई थी. ब्राह्मण भी जातिभेद के विष-बिज को शताब्दीयों तक बोकर जाति को टुकड़े टुकड़े में बाँटकर घोर गृह-कलह पैदा कर चूके थे. जिस समय शताब्दीयों से श्रध्दालु , राजाओं और धनिको ने चढ़ावाँ चढ़ाकर, मठ़ो और मंदिरो में अपार धनराशी जमा कर दी थी, उसी समय पश्चिम से तुर्कों ने हमला किया. तुर्कोने मंदिर की अपार संपत्ति को ही नहीं लूटा, बल्कि अगणित दिव्य-शक्तिओं के मालिक देव-मूर्तियों को भी चकनाचूर कर दिया. तांत्रिक लोग मंत्र, बलि और पुरश्वरण का प्रयोग करते ही रह गये, किन्तु उससे तुर्को का कुछ नहीं बिगड़ा. तेरहवीं शताब्दी का आरम्भ होते-होते तुर्को ने समस्त उत्तरी भारत को अपने हाथ में कर लिया. जिस विहार के पालवंशी राजाने राज्य रक्षा के लिए उदंतपुरी का तांत्रिक विहार बनवाया था, उसे मुहम्मद बीन् बख्तियार ने सिर्फ दो सौ घुडस्वारो से जित लिया. नालंदा की अद्भुत शक्तिवाली तारा टुकड़े टुकड़े करके फेंक दी गयी. नालंदा और विक्रमशिला के सैकड़ों तांत्रिक भिक्षु तलवार के घाट उतार दिये गये. यद्यपि इस युध्द में अपार जनधन की हानि हुई, अपार ग्रन्थ-राशी भस्मसात हो गयी. सैकड़ों कला कौशल के उत्कृष्ट नमूने नष्ट कर दिये गये; तो भी इससे एक फायदा हुआ---वह यह की, लोगो का जादू का स्वप्न टुट गया. 

लेखक - राहुल सांकृत्यायन 

सौन्दरनन्द-महाकाव्य, आज्ञा-व्याकरण, सर्ग १८

सौन्दरानन्द महाकाव्य, अष्टादश (१८ वां) सर्ग, आज्ञा-व्याकरण (उपदेश): अथ द्विजो बाल इवाप्तवेदः क्षिप्रं वणिक् प्राप्त इवाप्तलाभः । जित्वा च रा...