इनके अतिरिक्त ई. पू. ३२६ में भारत पर आक्रमण करने वाले सिकन्दर के एक सेनापती निआर्क्स ने भी लिखा हैं की 'यहा के लोग रुई को कूट कर लिखने के लिए कागज बनाते हैं.' मेगस्थनीज ने भी लिखा हैं की 'यहा पर दस-दस स्टडिआ (एक स्टडिआ=६०६ फिट ९ इंच) के अंतर पर पत्थर लगे हैं, जिनसे धर्मशालाओ का तथा दूरी का पता चलता हैं. नववर्ष के दिन भावी फल (पंचांग) सुनाया जाता हैं. जन्मपत्र बनाने के लिए जन्म समय लिखा जाता हैं और न्याय स्मृति के अनूसार होता हैं.' इन दोनो यूनानीयों के वक्तव्य से स्पष्ट है कि ई. सन की चौथी शताब्दी में यहा के लोग कागज बनाना जानते थे. ये बाते लेखन कला के प्राचीनता को प्रकट करती हैं.
Wednesday, April 29, 2020
लेखनकला
भारत में लिखने के प्रचार की प्राचीनता : भारत में लिखने की प्रथा अति प्राचीन काल से चली आ रही हैं. यहाँ प्रकृति की कृपा से भोज-पत्र और ताड़-पत्र प्राप्त थे. अत: उन पर लिखाई का काम होता था. लेकिन यहॉ की जलवायू ऐसी हैं की भोज-पत्र, ताड़-पत्र और कागज़ पर लिखे ग्रंथ हजारों वर्ष तक नहीं ठहर सकते. फिर भी भोज-पत्र पर लिखा हुआ सब से पुराणा संस्कृत ग्रंथ 'संयुक्तागम' बौध्द सूत्र हैं. वह डॉ. स्टाइन को खेतान प्रदेश के खड़लिक स्थान में मिला था. उसकी लिपि ई. सन की चौथी शताब्दी की मानी जाती हैं. ताड़-पत्रों पर सबसे पुराणा ग्रंथ तुरफान मध्य एशिया में अश्वघोष के तीन नाटको का ब्राह्मी लिपि में लिखित त्रुटित अंश के रुप मे मिला हैं. वह ई. सन की दूसरी शताब्दी के आस-पास लिखा माना जाता हैं. कागज पर लिखे चार संस्कृत के ग्रन्थ मध्य एशिया में यारकन्द नगर से ६० मील दक्षिण में 'कुगिअर' स्थान से श्री वेबर महोदय को प्राप्त हुए जिनका समय डॉ. हर्नलि ने ई. सन की पाँचवी शताब्दी का अनुमान किया गया हैं. प्राचीन शिलालेख मौर्यवंशी राजा अशोक के समय ई. सन की तीसरी शताब्दी के हैं जो पत्थर के विशाल स्तम्भो पर और चट्टानों पर प्राय: सारे भारत-वर्ष में पाये जाते हैं. अशोक के पूर्व के भी दो छोटे शिलालेख अजमेर जिले के बडली गॉव से तथा नेपाल की तराई के पिप्रवा नामक स्थान के एक स्तूप के भीतर से पात्र पर मिले हैं. इसकी लिपि अशोककालिन लिपि से पुराणी हैं और सम्भवतः ई. पू. ४४३ की हैं. इन शिलालेखों से ऐसा मालूम होता हैं कि ई. सन के पूर्व पाँचवी शताब्दी में लिखने का प्रचार इस में साधारण बात थी.
भारत में बौध्दधर्म का उत्थान और पतन १
गौतम बुद्ध का निर्वाण विक्रम पूर्व ४२६ में हुआ था. उन्होने अपने सारे उपदेश मौखिक किये थे; तो भी उनके शिष्य उनके जीवनकाल में ही उसे कंठस्थ कर लिया करते थे. यह उपदेश दो प्रकार के थे--एक साधारण, धर्म और दर्शन के विषय में, और दूसरे भिक्षु भिक्षुणीयों के नियम. पहले को पालि भाषा में "धम्म" (धर्म) कहा गया हैं और दूसरे को "विनय" कहा गया. बुध्द के निर्वाण के बाद उनके प्रधान शिष्यों ने (भविष्य में मतभेद न हो जाये, इसलिए) उसी वर्ष में राजगृह (जिला पटना) की सातपर्णी गुहा में एकत्र हो, "धर्म" और "विनय" का संगायन किया. इसी को प्रथम-संगिती कहा जाता हैं. इस में महाकाश्यप भिक्षु-संघ के प्रधान (संघ-स्थविर) की हैसियत से धर्म के विषय में बुध्द के चिर-अनुत्तर 'आनन्द' से और बुध्द-प्रशंसित 'उपालि' से प्रश्न पुछते थे. अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, अमद्य सुकर्मो को पालि में 'शील' कहते हैं, और स्कंध (रुप,वेदना,संज्ञा,संस्कार,विज्ञान), आयतन (रुप, चक्षु, चक्षु-विज्ञान आदि), धातु (पृथ्वी, जल आदि) के सूक्ष्म दार्शनिक विचार को प्रज्ञा, दृष्टि, दर्शन या विपश्यना कहते हैं. बुध्द के उपदेशो में शील और प्रज्ञा दोनों पर ही पूरा जोर दिया गया हैं. "धर्म" के लिए पालि में दूसरा शब्द "सुत्त" (सुक्त/सुत्र) या "सुतन्त" भी आया हैं. प्रथम संगिती के स्थविर भिक्षुओं ने "धर्म" और "विनय" का इस प्रकार संग्रह किया. पीछे भीन्न-भीन्न भिक्षुओं ने उनको पृथक पृथक कंठस्थ कर, अध्ययन-अध्यापन का भार आपने ऊपर लिया. उनमे उन्होने "धम्म" या "सुत्त" की रक्षा का भार लिया, वह "धम्मधर", "सुत्तधर" या "सुत्तंतिक" (सौत्रांतिक) कहलाये. जिन्होंने "विनय" की रक्षा का भार लिया, वह "विनयधर" कहलाये. इनके अतिरिक्त सुत्तो में दर्शन-संबंधी अंश कहीं-कहीं बड़े ही संक्षिप्त रूप में थे. इन्हें "मातिका" (मात्रिका) कहते थे. इन मातिकाओं के रक्षक "मातिकाधर" कहलाये. पीछे मातिकाओं को समझाने के लिए जब उनका विस्तार किया गया, तब इसी का नाम "अभिधम्म" (अभिधर्म--धर्म में से) हुआ, और इसके रक्षक "अभिधम्मिक" (अभिधर्मिक) हुये.
प्रथम-संगिति के सौ साल बाद वैशाली के भिक्षुओं ने विनय के कुछ नियमों की अवहेलना शुरु की. इस पर विवाद आरम्भ हुआ, और अन्त में फिर भिक्षु-संघ ने एक हो, उन विवाद-ग्रस्त विनयों पर अपनी राय दी; एवं "धर्म" और "विनय" का संगायन किया. इसी का नाम द्वितीय संगिती हुआ. कितने भिक्षु इस संगीती से सहमत न हुए और उन्होने अपने महासंघ का कौशाम्बी में पृथक सम्मेलन किया, तथा अपने मतानुसार धर्म और विनय का संग्रह किया. स्थविरों (वृध्द-भिक्षुओं) का अनुगमन करने वाला होने से, पहला समुदाय (निकाय) आर्यस्थविर या स्थविरवाद के नाम से प्रसिद्ध हुआ, और दूसरा महासांघिक के नाम से. इन्हीं दो समुदायों से अगले सवा सौ वर्षों में स्थविरवाद से --- वज्जिपुत्तक, महिशासक, धर्मगुप्तिक, सौत्रांतिक, सर्वास्तिवाद, काश्यपीय, संक्रांतिक, सम्मीतीय, पण्णागरिक, भद्रयानिक, धर्मोत्तरिय इ. और महासांघिक से -- गोकुलिक, एकव्यहारीक, प्रज्ञप्तिवाद (लोकोत्तरवाद), बाहुलिक, चैत्यवादी; यह १८ निकाय हुए. इनका मतभेद विनय और अभिधम्म की बातो को लेकर था. कोई कोई निकाय आर्यस्थविरों की तरह बुध्द को मनुष्य न मानकर उन्हें लोकोत्तर मानने लगे. वह बुध्द में अद्भुत और दिव्य-शक्तियों का होना मानते थे. कोई कोई बुध्द के जन्म और निर्वाण को दिखावा मात्र समझते थे. इन्ही भिन्न-भिन्न मान्यताओं के अनुसार उनके सुत्र और विनय में भी फर्क पडने लगा. बुध्द की अमानुषिक लिलाओं के समर्थन में नये-नये सुत्तो की रचना हुई. बुध्द के निर्वाण के प्राय: सवा दो सौ वर्ष बाद, सम्राट अशोक ने बौध्दधर्म ग्रहण किया. उनके गुरु मोग्गलिपुत्त तिस्स उस समय आर्यस्थविरों के संघ-स्थविर थे. उन्होने मतभेद दूर करने के लिए पटना में अशोक के बनाये गये "अशोकाराम" नामक मठ में भिक्षु-संघ के द्वारा चुने गये हजार भिक्षुओं का सम्मेलन किया. यही सम्मेलन तृतीय संगिति के नाम से प्रसिद्ध हुआ. इसी समय आर्यस्थविरों से निकाले सर्वास्तिवाद आदि ग्यारह निकायों ने नालन्दा में अपनी पृथक संगीति की. नालन्दा जो समय-समय पर बुध्द का निवासस्थान होने से पुनीत स्थानों में गिनी जाती थी, इसी समय सर्वास्तिवादीयों का मुख्य स्थान बन गयी.
तृतीय संगिति समाप्त कर मोग्गलिपुत्त तिस्स ने सम्राट अशोक की सहायता से भिन्न-भिन्न देशो में धर्मप्रचारक भेजे. यह पहला मौका था जो एक भारतीय धर्म संगठित रुप में भारत की सिमा के बाहर प्रचारित होने लगा. यह प्रचारक जहां पश्चिम में यवन राजाओं के राज्यों (ग्रीस, मिस्र, सीरिया आदि देशों) में गये, वहां उत्तर में मध्य-एशिया तथा दक्षिण में ताम्रपर्णी (लंका) और सुवर्ण देश (बर्मा) में भी पहुँचें. लंका में अशोक के पुत्र तथा मोग्गलिपुत्त तिस्स के शिष्य महेन्द्र (महिंद) और उनकी सहोदरा संघमित्रा गयी. लंका के राजा देवानंपिय तिस्स बौध्दधर्म में दीक्षित हुए. कुछ ही दिनों में वहां की सारी जनता बौध्द हो गयी. आर्यस्थविरवाद का आरम्भ से ही यहा प्रचार रहा. बीच में, बारहवी तेरहवी शताब्दीयों में जब बर्मा और श्याम (थाईलैंड) का महायान बौध्दधर्म विकृत तथा जर्जरित हो, लुप्त होने लगा तब आर्यस्थविरवाद वहा भी सर्वव्याप्त हो गया. लंका में ही ईसा की प्रथम शताब्दी में सुत्र, विनय और अभिधर्म --- त्रिपिटक जो अब तक कंठस्थ चले आते थे, लेखनबध्द किये गये, और यही आज कल का पालि त्रिपिटक (तीन पिटक) हैं.
त्रिपिटकाचार्य
राहुल सांकृत्यायन
Tuesday, April 28, 2020
भारत में बौध्दधर्म का उत्थान और पतन २
भारत में बौध्दधर्म का उत्थान और पतन :
मौर्य-सम्राट बौध्दधर्म पर अधिक अनुरक्त थे; इसलिए उनके समय में, अनेक पवित्र स्थानों में राजाओं और धनिको ने बड़े-बड़े स्तूप और संघाराम (मठ) बनवाये, जिन में भिक्षु सुख पूर्वक रहकर धर्मप्रचार किया करते थे. ईसा के पूर्व दूसरी शताब्दी में, मौर्यों के सेनापती पुष्यमित्र ने अन्तिम मौर्य सम्राट को मारकर अपने शुंगवंश का राज्य स्थापित किया. यह नया राजवंश राजनीतिक उपयोगिता के विचार से ब्राह्मण धर्म का पक्का अनुयायी और अब्राह्मण धर्म का द्वेषी हुआ. शताब्दीयों से परित्यक्त पशू-बलीमय अश्वमेध आदि यज्ञ, महाभाष्यकार पतंजलि के पौरोहित्य में फिर से होने लगे. ब्राह्मणो के महात्म्य से भरे मनुस्मृती जैसे ग्रंथो की रचना का सूत्रपात हुआ. इसी समय महाभारत का प्रथम संस्करण हुआ तथा मृत संस्कृत-भाषा के पुनरुध्दार की चेष्टा की गयी. परिस्थिति के अनुकूल न होने से धीरे-धीरे बौध्द लोग बौध्दधर्म के केन्द्रों को मगध और कोशल से दूसरे देशों में हटाने पर मजबूर होने लगे. आर्यस्थविरवाद मगध से हटकर विदिशा के समीप चैत्यपर्वत (सांची) पर चला गया; सर्वास्तिवाद मथुरा के उरुमुण्ड-पर्वत (गोवर्धन पर्वत) चला गया. इसी तरह और निकायों (समूहो) ने भी अपने-अपने केन्द्रों को अन्यत्र हटा दिया.
आर्यस्थविरवाद सब से पुराणा निकाय हैं, और इसने सभी पुराणी बातो को बड़ी कड़ाई से सुरक्षित रखा. दूसरे निकायों ने देश, काल, व्यक्ति आदि के अनुसार अनेक परिवर्तन किये. अब तक त्रिपिटक मागधी भाषा में ही था, जो की, पूर्वी युक्तप्रान्त तथा बिहार की साधारण भाषा थी. सर्वास्तिवादीयों ने मथुरा पहुँच कर अपने त्रिपिटक को ब्राह्मणों की प्रशंसित संस्कृत भाषा में कर दिया. इसी तरह महासांघिक, लोकोत्तरवाद आदि कितने ही और निकायों ने भी अपने पिटको को संस्कृत में कर दिया. यह संस्कृत पाणिनिय संस्कृत नहीं थी, आजकल इसे गाथासंस्कृत कहते हैं.
मौर्य साम्राज्य के विनष्ट हो जाने पर पश्चिम भारत पर यवन राजा 'मिनान्दर' ने कब्जा कर लिया. मिनान्दर ने अपनी राजधानी शाक्ला (वर्तमान पाकिस्तान का स्यालकोट) बनायी. उसके तथा उसके वंशजो के क्षत्रप (व्हायसराय) मथुरा और उज्जैन में रहकर शासन करने लगे. यवन-राजा अधिकांश में बौध्द थे, इसलिए उनके उज्जैन के क्षत्रप सांची के स्थविरवादीयों पर तथा मथुरा के क्षत्रप सर्वास्तिवादीयों पर बहुत स्नेह और श्रध्दा रखते थे. मथुरा उस समय एक क्षत्रप की राजधानी ही नहीं थी, बल्कि पूर्व और पश्चिम से तक्षशिला के वणीक-पथ पर व्यापार का एक सुसमृध्द प्रधान केन्द्र थी, इसलिए सर्वास्तिवाद के प्रचार में बडी सहायक हुयी. मगध के सर्वास्तिवाद से इसमे कुछ अन्तर हो चुका था, इसलिए यहा का सर्वास्तिवाद आर्य-सर्वास्तिवाद के नाम से प्रसिद्ध हुआ.
यवनो को परास्त कर यूचीयो ने पश्चिमी भारत पर कब्जा किया. इन्हीं की शाखा कुशाण थी, जिस में प्रतापी सम्राट कनिष्क हुये. कनिष्क की राजधानी पुरुषपुर (पेशावर, पाकिस्तान) थी. उस समय सर्वास्तिवाद गंधार में पहुँच चुका था. कनिष्क स्वयं सर्वास्तिवादीयों का अनुयायी था. इसी के समय में महाकवि अश्वघोष और आचार्य वसुमित्र आदि पैदा हुए. उस समय गन्धार के सर्वास्तिवादीयों में --- जो मूल सर्वास्तिवाद कहा जाता था --- कश्मीर और गन्धार के आचार्यों का मतभेद हो गया था. देवपुत्र कनिष्क की सहायता से वसुमित्र, अश्वघोष आदि आचार्यों ने सर्वास्तिवादि बौध्द भिक्षुओं की एक बड़ी सभा बुलाई. इस सभा में आपस के मतभेदों को दूर करने के लिए उन्होने अपने त्रिपिटक पर "विभाषा" नाम की टीकायें लिखी. विभाषा के अनुयायी होने से मूल-सर्वास्तिवादियों का दूसरा नाम 'वैभाषिक' पड़ा. बौध्दधर्म में दु:खो से मुक्ति यानी निर्वाण के तीन रास्ते माने गये हैं. १) जो सिर्फ स्वयं दु:खविमुक्त होना चाहता हैं, वह आर्य अष्टांगिक मार्ग पर आरुढ़ हो, जीवनमुक्त हो, अर्हत कहा जाता हैं. २) जो उस से कुछ अधिक परिश्रम के लिए तैयार रहता हैं, वह जीवनमुक्त हो, प्रत्येक बुध्द कहा जाता हैं. ३) जो असंख्य जीवों का मार्गदर्शक बनने के लिए अपनी मुक्ति की फिक्र न कर, बहुत परिश्रम और बहुत समय बाद, उस मार्ग से स्वयंप्राप्य निर्वाण को प्राप्त होता है, उसे 'बुध्द' कहा जाता हैं. यह तीनों ही रास्ते क्रमश: अर्हत (श्रावक) यान, प्रत्येक-बुध्द यान और बुध्द-यान कहे जाते हैं. आचार्य अश्वघोष ने बाकी दोनों यानो की अपेक्षा बुध्द-यान पर बडा जोर दिया और इसे महायान कहा. इस तरह पीछे कुछ लोग दूसरे यानो को स्वार्थपूर्ण कह, केवल बुध्दयान या महायान की प्रशंसा करने लगे. यह स्मरण रहे की, १८ निकाय तीनों यानो को मानते थे. उनका कहना था कि, किसी यान का चुनना मुमुक्षु की अपनी स्वभाविक रुचि पर निर्भर हैं.
इसा की प्रथम शताब्दी में, जिस समय वैभाषिक संप्रदाय उत्तर में बढ़ता जा रहा था, दक्षिण के विदर्भ (बरार) देश में आचार्य नागार्जुन पैदा हुए. उन्होने माध्यमिक या शून्यवाद दर्शन पर ग्रन्थ लिखे. कालान्तर में महायान और माध्यमिक दर्शन के योग से शून्यवादी महायान-संप्रदाय चला, जिसके त्रिपिटक की अवश्यकता समय-समय पर बने हुए अष्टसहस्रिका प्रज्ञापारमिता आदि ग्रन्थों ने पूरी की. चौथी शताब्दी में पेशावर के आचार्य वसुबन्धू ने वैभाषिको से कुछ मतभेद करके सौतांत्रिकवाद का "अभिधर्मकोश" ग्रन्थ लिखा और उनके बड़े भाई असंग विज्ञानवाद या योगाचार सम्प्रदाय के प्रवर्तक हुये. इस प्रकार चौथी शताब्दी तक बौध्दों के वैभाषिक, सौतांत्रिक, योगाचार और माध्यमिक, चार दार्शनिक सम्प्रदाय बन चूके थे. इन में पहले दोनों को मानने वाले उपरी तीनों यानों को मानते थे; इसलिए उन्हें महायानीयों ने हीनयान के अनुयायी कहा; और, बाकी दो सिर्फ बुध्दयान को ही मानते थे, इसलिए उन्होने अपने को महायान का अनुयायी कहा.
महायानी बुध्दयान के एकान्त-भक्त थे. इतना ही नहीं, बल्कि अपने उत्साह में वे बाकी दो यानों को बुरा-भला कहने से बाज़ न आते थे. बुध्द के अलौकिक चरित्र उन्हें बहुत उपयुक्त मालूम हुए, इसलिए उन्होने महासांघिको और लोकोत्तरवादियों की बहुत सी बाते ले ली. बुध्दयान पर अच्छी प्रकार आरुढ़, बुध्दत्व के अधिकारीक प्राणी को बोधिसत्व कहा जाता हैं. महायान के सूत्रों में हर एक को बोधिसत्व के मार्ग पर ही चलने के लिए जोर दिया गया हैं; वह यही की हर एक अपनी मुक्ति की परवाह छोड़ कर संसार की सभी प्राणियों की मुक्ति के लिए प्रयत्न करे. बोधीसत्वों की महत्ता दरसाने के लिए जहाँ अवलोकितेश्वर, मंजुश्री, आकाशगर्भ आदि सैकड़ों बोधीसत्वों की कल्पना की गयी, वहाँ सारिपुत्र, मोग्गलान आदि अर्हत् (मुक्त) शिष्यों को अ-मुक्त और बोधिसत्व बना दिया गया. सारांश: यह की, जिस प्राचीन सूत्र आदि परम्परा को १८ निकाय मानते आ रहे थे, महायानीयों ने उन सभी को बोधिसत्व और बुध्द बनने की धून में एकदम उलट-पलट करने में कोई कसर न रखी.
कनिष्क के समय में पहले पहल बुध्दप्रतिमा (मुर्ति) बनायी गयी. महायान के प्रचार के साथ जहाँ बुध्द प्रतिमाओं की पूजा-अर्चा बड़े ठाट-बाट से होने लगी, वहाँ सैकड़ों बोधीसत्वों की प्रतिमाएँ बनने लगी. इन बोधीसत्वों को उन्होने ने ब्राह्मणों के देवी-देवताओं का काम सौंपा. उन्होने तारा, प्रज्ञापारमिता, विजया आदि अनेक देवीओं की भी कल्पना की. जगह-जगह इन देवीयों और बोधीसत्वों के लिए बडे़ बडे़ विशाल मंदिर बन गये. उनके बहुत से स्तोत्र आदि भी बनने लगे. इस बाड में इन लोगों ने यह ख्याल न किया कि, हमारे इस काम से किसी प्राचीन परम्परा या किसी भिक्षु-नियम का उल्लंघन होता हैं. जब किसी ने दलिल पेश की, तो कह दिया---विनय-नियम तुच्छ स्वार्थ के पीछे मरने वाले हीनयानीयों के लिए हैं; सारी दुनिया के मुक्ति के लिए मरने-जीने वाले बोधीसत्वों को इसकी वैसी पाबन्दी नहीं हो सकती. उन्होने हीनयान के सूत्रों से अधिक महत्ववाले अपने सूत्र बनाये. सैकड़ों पृष्ठों के सूत्रों का पाठ जल्दी नहीं हो सकता था; इसलिए उन्होने हर एक सूत्र की दो-तीन पंक्तियों में छोटी-छोटी धारणी, वैसे ही बनाई जैसे भागवत का चतु:श्लोकी भागवत; गीता की सप्तश्लोकी गीता. इन्ही धारणीयों को और संक्षिप्त कर के मन्त्रो की सृष्टि हुई. इस प्रकार धारणीयों, बोधीसत्वों, उनकी अनेक दीव्य शक्तियों तथा प्राचीन परम्परा और पिटक की----नि:संकोच की जाती-- उलट पलट से उत्साहित हो, गुप्त-साम्राज्य के आरम्भिक काल से हर्षवर्धन के समय तक मंजुश्रीमूलकल्प, गुह्यसमाज और चक्रसंवर आदि कितने ही तंत्रों की सृष्टि की गयी. पुराने निकायों ने अपेक्षा-कृत सफलता से अपनी मुक्ति के लिए अर्हत् यान और प्रत्येक-बुध्द यान का रास्ता खुला रखा था. महायान ने सब के लिए सुदुश्वर बुध्द-यान का ही एक मात्र रास्ता रखा. आगे चल कर इस कठ़िनाई को दूर करने के लिए ही उन्होने धारणीयों, बोधीसत्वों की पूजाओं का आविष्कार किया. इस प्रकार जब आसान दिशाओं का मार्ग खुलने लगा, तब उसके आविष्कारो की भी संख्या बढने लगी. मंजुश्रीमूलकल्प ने तंत्रों के लिए रास्ता खोल दिया. गुह्यसमाज ने अपने भैरवीचक्र के शराब, स्रीसंभोग तथा मंत्रोच्चारण से उसे और भी आसान कर दिया. यह मत महायान के भीतर ही से उत्पन्न हुआ; किन्तु पहले इसका प्रचार भीतर-ही-भीतर होता रहा. भैरवीचक्र की सभी कार्रवाइयाँ गुप्त रखी जाती थी. प्रवेशाकांक्षी को कितने ही समय तक उमेद्वारी करनी पड़ती थी. पीछे अनेक अभिषको और परिक्षावों के बाद वह समाज में मिलाया जाता था. यह मंत्रयान (तंत्रयान, वज्रयान) संप्रदाय इस प्रकार सातवी शताब्दी तक गुप्त रितिसे चलता रहा. इसके अनुयायी बाहर से अपने को महायानी ही कहते थे. महायानी भी अपना पृथक विनय-पिटक नहीं बना सके थे; इसीलिए उनके भिक्षु लोग सर्वास्तिवाद आदि निकायों में दीक्षा लेते थे. आठ़वी शताब्दी में भी, जब की नालन्दा महायान का गड़ थी, वहाँ के भिक्षु सर्वास्तिवाद-विनय के अनुयायी थे. तंत्र के प्रचुर प्रचार से भिक्षुओं को विनय में सर्वास्तिवाद की, बोधीसत्वचर्या में महायान की और भैरवीचक्र में वज्रयान की दीक्षा लेनी पड़ती थी.
आठ़वी शताब्दी में एक प्रकार से भारत के सभी बौध्द सम्प्रदाय वज्रयान-गर्भीत महायान के अनुयायी हो गये थे. बुध्द की सिधी-सादी शिक्षाओं से उनका विश्वास उठ़ चूका था, और वे मनगढ़ंत हजारो लोकोत्तर कथाओं पर विश्वास करते थे. बाहर से भिक्षु के कपड़े पहनने पर भी भीतर से वे गुह्यसमाजी (गुढ़वादी) थे. बड़े-बड़े विद्वान और प्रतिभाशाली कवि आधे पागल हो, चौरासी सिध्दों में दाखिल हो, संध्या-भाषा में निर्गुण गाण करते थे. सातवीं शताब्दी में उड़िसा के राजा इंद्रभूती और उसके गुरु सिध्द अनंगवज्र तथा दूसरे पण्डित सिध्द, स्रियों को ही मुक्तिदात्री "प्रज्ञा" और पुरुष को ही मुक्ति का "उपाय" तथा शराब को ही "अमृत" सिध्द करने में अपनी पण्डिताई और सिध्दाई खर्च कर रहे थे. आठ़वी शताब्दी से बारहवीं शताब्दी तक का बौध्दधर्म वस्तुतः वज्रयान या भैरवीचक्र का धर्म था. महायान ने ही धारणीयों और पूजाओं से निर्वाण को सुगम कर दिया था; वज्रयान ने तो उसे एकदम सहज कर दिया; इसीलिए आगे चल कर वज्रयान 'सहजयान' भी कहा जाने लगा.
वज्रयान के विद्वान प्रतिभाशाली कवि चौरासी सिध्द विलक्षण प्रकार से रहा करते थे. कोई पनहीं बनाया करता था; इसलिए उसे पनहींपा कहते थे. कोई कम्बल ओढा रहता था इसलिए उसे कमरिपा कहा करते थे. कोई डमरु रखने से डमरुपा कहा जाता था. कोई ओखल रखने से ओखरीपा. ये लोग शराब में मस्त, खोपड़ी का प्याला लिये, स्मशान या विकट जंगलों में रहा करते थे. जनसाधारण को जितना ये फटकारते थे, उतना ही लोग इनके पीछे दौडते थे. लोग बोधीसत्व-प्रतिमाओं तथा दूसरे देवताओं के भाँति इन सिध्दो को अद्भुत, चमत्कारी और दिव्य शक्तियों के धनी समजते थे. ये लोग खुल्लमखुल्ला स्रियों और शराब का उपभोग करते थे. राजा अपनी कन्याओं तक को इन्हें प्रदान करते थे. यह लोग त्राटक या हेप्नाटिज्म की कुछ प्रक्रियाओं से वाकिफ थे. इसी बल पर अपने भोले-भाले अनुयायी को कभी-कभी कोई चमत्कार दिखा देते थे. कभी-कभी हाथ की सफाई तथा श्लेष-युक्त अस्पष्ट वाक्यों से जनता पर अपनी धाक जमाते थे. इन पाँच शताब्दीयों में धीरे-धीरे एक तरह से सारी भारतीय जनता इनके चक्कर में पड़कर काम-व्यसनी, मद्यप और मूढ़-विश्वासी बन गयी थी. राजा लोग जहा राज-रक्षा के लिए पल्टने रखते थे, वहाँ उसके लिए किसी सिध्दाचार्य तथा उसके सैकड़ों तांत्रिक अनुयायीयों की भी एक बहु-व्यय-साध्य पलटन रखा करते थे. देवमंदिरों में बलिपूजा चढ़ती रहती थी. लाभ-सत्कार का द्वार उन्मुक्त होने से ब्राह्मणों और दूसरे धर्मानुयायीयों ने भी बहुत अंश में इनका अनुकरण किया.
भारतीय जनता जब इस प्रकार दुराचार और मूढ़ विश्वास के पंक में कंठ तक डुबी हूई थी. ब्राह्मण भी जातिभेद के विष-बिज को शताब्दीयों तक बोकर जाति को टुकड़े टुकड़े में बाँटकर घोर गृह-कलह पैदा कर चूके थे. जिस समय शताब्दीयों से श्रध्दालु , राजाओं और धनिको ने चढ़ावाँ चढ़ाकर, मठ़ो और मंदिरो में अपार धनराशी जमा कर दी थी, उसी समय पश्चिम से तुर्कों ने हमला किया. तुर्कोने मंदिर की अपार संपत्ति को ही नहीं लूटा, बल्कि अगणित दिव्य-शक्तिओं के मालिक देव-मूर्तियों को भी चकनाचूर कर दिया. तांत्रिक लोग मंत्र, बलि और पुरश्वरण का प्रयोग करते ही रह गये, किन्तु उससे तुर्को का कुछ नहीं बिगड़ा. तेरहवीं शताब्दी का आरम्भ होते-होते तुर्को ने समस्त उत्तरी भारत को अपने हाथ में कर लिया. जिस विहार के पालवंशी राजाने राज्य रक्षा के लिए उदंतपुरी का तांत्रिक विहार बनवाया था, उसे मुहम्मद बीन् बख्तियार ने सिर्फ दो सौ घुडस्वारो से जित लिया. नालंदा की अद्भुत शक्तिवाली तारा टुकड़े टुकड़े करके फेंक दी गयी. नालंदा और विक्रमशिला के सैकड़ों तांत्रिक भिक्षु तलवार के घाट उतार दिये गये. यद्यपि इस युध्द में अपार जनधन की हानि हुई, अपार ग्रन्थ-राशी भस्मसात हो गयी. सैकड़ों कला कौशल के उत्कृष्ट नमूने नष्ट कर दिये गये; तो भी इससे एक फायदा हुआ---वह यह की, लोगो का जादू का स्वप्न टुट गया.
लेखक - राहुल सांकृत्यायन
इरादे से किये कर्म ही फल देते हैं
कर्म कैसे कार्य करता है?
कर्म का सिद्धांत अत्यन्त गहन है इसलिए इसे समझना आसान नहीं होता। कर्म शब्द का अलग-अलग धर्मों में अलग-अलग अर्थ है और यही कारण है कि इस शब्द के इर्द-गिर्द बहुत सी उलझनें हैं। मैं यहां आपको बताऊगां कि बुद्ध ने कर्म के बारे में क्या कहा है। ‘कर्म” शब्द का अर्थ है कार्य, और यह कारण और प्रभाव का सिद्धांत है। कार्य को सही या गलत अर्थात हितकारी और अहितकारी भागों में बांटा जा सकता है किन्तु इसका निर्णय कौन करेगा? इसका निर्णय किसी बाहरी ताकत से नहीं अपितु आपके कार्य करने के पीछे के अभिप्राय तथा इरादे से किया जाता है। यदि आपका उद्देश्य किसी की हत्या का है और आप उसकी हत्या कर देते हैं तो आपने एक गलत या अहितकारी कार्य किया है। वहीं यदि करूणा के कारण आप किसी की जिंदगी बचाते हैं तो आप एक ठीक कार्य करेंगे। इस प्रकार कारण और प्रभाव का सिद्धांत कार्य करता है। यदि आपके द्वारा किया गया कार्य ठीक है तो उसका परिणाम भी ठीक ही होगा। जब आप ठीक कार्य करते हैं तो आप भविष्य के लिए अच्छे बीज रोपित कर देते हैं और यदि आप गलत कार्य करते हैं तो आप बुरे भविष्य के लिए बीज रोपित कर देते हैं। यहाँ सबसे अच्छी बात यह है कि आपका भविष्य आपके हाथ में है। आपके भविष्य का निर्णय किसी बाहरी ताकत जैसे कि भगवान इत्यादि के हाथ में नहीं है।
“सुखवातिव्युह सूत्र"में बुद्ध ने कहा है कि:- कारण और परिणाम एक ऐसा सिद्धांत है जिससे प्रत्येक व्यक्ति अपने बुरे कर्मों को भोगता है इसी प्रकार अपने अच्छे कर्मों का फल भी उसे अवश्य मिलता है। दया और करूणापूर्ण जीवन निश्चित रूप से अच्छा भाग्य और खुशी लेकर आएगा। जिम्मेवारी स्वयं लेनी चाहिए। बुद्ध के अनुसार वह स्वयं भी किसी को उसके बुरे कार्यों के परिणाम से नहीं बचा सकते और न ही भाग्य बताने वाले। “कर्म” के सिद्धांत में इरादा (संकल्प) अत्यन्त महत्वपूर्ण होता है। यदि आप बिना इरादा किए, बिना किसी उद्देश्य या बिना इच्छा किए कुछ करते हैं तो कर्म का बीज पूरी तरह से नहीं बोते हैं। अर्थात यदि किसी भारी सामान को उठाने में किसी की मदद करते हैं और अचानक सामान गिर जाता है और टूट जाता है तो आपका कर्म बुरा नहीं होगा क्योंकि आपका इरादा या उद्देश्य बिल्कुल ठीक था और परिणाम बिना इरादे के हुआ था। दूसरा उदाहरण यह है कि अगर आप अन्धेरे में कहीं जा रहे हैं और अनजाने में किसी कीड़े पर पांव रख देते हैं और वह मर जाता है तो फिर भी आपने बुरा कर्म नहीं किया क्योंकि आपका इरादा कीड़े को मारने का नहीं था। कहने का तात्पर्य यह है कि केवल जानबूझ कर किए गए, सोचे गए, व कहे गए इत्यादि ही कर्म की दृष्टि से महत्वपूर्ण होते हैं। यहां मन से सोचे गए कर्म इसलिए कहे गए हैं क्योंकि इरादे का जन्म मन या विचारों से ही होता है। शरीर द्वारा या वचन द्वारा केवल उस सोचे गए कार्य को किये जाने से ही कर्म बनता है। इसलिए यह आवश्यक है कि हम अपने शरीर, मन व वचन के सम्बन्ध में सजग (जागृत) रहें।
“कर्म” का सिद्धांत बहुत साधारण नहीं होता। यह इतना सरल नहीं कि अच्छे कार्यों से अच्छे कर्म और बुरे कार्यों से बुरे कर्म हों। कई बार कई लोग बहुत करूणापूर्ण कार्य करते प्रतीत होते हैं किन्तु उनका उद्देश्य गलत होता है। कोई व्यक्ति अपने किसी बीमार रिश्तेदार की सेवा व देखभाल करता है, बहुत दया का कृत्य करता हुआ प्रतीत होता है किन्तु उसका उद्देश्य उस बीमार रिश्तेदार की सम्पती पाना हो सकता है। इस तरह का कृत्य एक अच्छे कर्म का पूरा लाभ नहीं देगा। इसी प्रकार आप एक बन्दूक चोरी करते हैं किन्तु यह आप केवल इसलिए करते हैं क्योंकि आपका मित्र उस बन्दूक से किसी की हत्या करना चाहता है। ऐसा करने से आप बुरा कर्म नहीं करेंगे क्योंकि चोरी के कृत्य के पीछे का कारण करूणा व अच्छा इरादा था। "माज्झिम निकाय सूत्त"कहता है कि कर्म से प्रवृत्तियों को बल मिलता है और परिस्थितियों से परिणामों को। कर्म केवल कृत्य पर ही निर्भर नहीं होता बल्कि यह भी महत्वपूर्ण है कि कृत्य करने वाले व्यक्ति का स्वभाव कैसा है तथा उसने किन परिस्थितियों में वह कृत्य किया है।
सुत्तनिपात
सुत्तनिपात. . .
[१२. द्वयतानुपस्सनासुत्त]
असें मीं ऐकलें आहे. एके समयीं भगवान् श्रावस्ती येथें पूर्वारामांत मिगारमातेच्या प्रासादांत राहत होता. त्या वेळीं पौर्णिमेच्या उपोसथाच्या दिवशीं पूर्ण पौर्णिमेच्या रात्रीं भगवान् भिक्षुसंघासह उघड्या जागीं बसला होता. तेव्हां चुपचाप बसलेल्या भिक्षुसंघाकडे पाहून भगवान् भिक्षूंना म्हणाला- भिक्षूंनो, जे ते कुशल, आर्य, निर्यानक व संबोधगामी धर्म आहेत, त्या कुशल, आर्य, निर्यानक व संबोधगामी धर्माच्या श्रवणापासून (शिक्षणापासून) फायदा कोणता असें जर, भिक्षूंनो, तुम्हांस विचारणारे आढळले, तर त्यांना म्हणावें कीं, द्वैत धर्माचें (पदार्थाचें) यथार्थ ज्ञान करून घेणें हा फायदा होय. तें द्वैत कोणतें म्हणतां? हे दु:ख व हा दु:खसमुदय मिळून एक अनुपश्यना, आणि हा दु:खनिरोध व हा दु:खनिरोधगामी मार्ग मिळून दुसरी अनुपश्ययना. भिक्षूंनो, याप्रमाणें द्वैताची सम्यक्-अनुपश्यना करणार्या, अप्रमत्त, उत्साही व दृढचित्त होऊन वागणार्या भिक्षूला याच जन्मीं अर्हत्त्व किंवा, उपादानशेष राहिल्यास, अनागामिता—या दोहोंपैकीं एक फळ मिळण्याची अपेक्षा करतां येईल. असें भगवान् म्हणाला. असें म्हणून तदनंतर तो सुगत शास्ता म्हणाला—
७२४ जे दु:ख आणि दु:खाचा उगम जाणत नाहींत, आणि तें दु:ख जेथें नि:शेष विरोध पावतें तें स्थान (निर्वाण), व त्या दु:खनिरोधाप्रत जाणारा मार्ग जाणत नाहींत, (१)
७२५. त्यांना चित्ताची विमुक्ति आणि प्रज्ञेनें मिळालेली विमुक्ति नाहीं; ते (संसारदु:खाचा) अन्त करूं शकत नाहीत, आणि तेच जन्मजरा पावतात.(२)
७२६ जे दु:ख आणि दु:खाचा उगम जाणतात, आणि तें दु:ख जेथें नि:शेष निरोध पावतें तें स्थान व त्या दु:खनिरोधाप्रत जाणारा मार्ग जाणतात, (३)
७२७ ते चित्तविमुक्तीनें व प्रज्ञेनें मिळविलेल्या विमुक्तीनें संपन्न होत; ते (संसारदु:खाचा) अन्त करण्यास समर्थ होत आणि ते जन्मजरा पावत नाहींत.(४)
दुसर्याही पर्यायानें सम्यक्-द्वैतानुपश्यना असेल काय असें जर, भिक्षूंनो, तुम्हांस कोणी विचारणारे भेटतील तर, अशी असेल, असें त्यांस म्हणावें. ती कशी? जें कांहीं दु:ख उद्भवतें, तें सर्व उपाधींपासून, हीं एक अनुपश्यना, आणि उपाधींचा वैराग्यानें अशेष निरोध केल्यानें दु:खाचा उद्भव होत नाहीं, ही दुसरी अनुपश्यना. भिक्षूंनो, याप्रमाणें द्वैताची...इत्यादी...तो सुगत शास्ता म्हणाला—
७२८ जीं कांहीं जगांत अनेक प्रकारचीं दु:खें आहेत, तीं सारीं उपाधींपासून होतात. जो अविद्वान् उपाधि जोडतो, तो मन्दबुद्धि पुन: पुन: दु:ख भोगतो. म्हणून दु:खाचें उत्पत्तिकारण पाहणार्या जाणत्या मनुष्यानें उपाधि जोडूं नयें.(५)
दुसर्याही पर्यायानें सम्यक्-द्वैतानुपश्यना असेल काय असें जर, भिक्षूंनो, तुम्हांस विचारणारे भेटतील तर, अशी असेल, असें त्यांस म्हणावें. ती कशी? जें कांहीं दु:ख उद्भवतें, तें सर्व अविद्येपासून, हीं एक अनुपश्यना, आणि अविद्येचा वैराग्यानें अशेष निरोध केल्यानें दु:खाचा उद्भव होत नाहीं ही दुसरी अनुपश्यना. भिक्षूंनो, याप्रमाणें द्वैताची...इत्यादी...तो सुगत शास्ता म्हणाला—
७२९ जन्ममरणमय संसारांत जे पुन: पुन: पडतात, व मनुष्यत्व किंवा मनुष्येतरभाव पावतात, ते केवळ अविद्येमुळें ती गति भोगतात. (६)
७३० अविद्या हा महामोह आहे, ज्याच्यामुळें माणूस चिरकाळ संसारांत पडतो. पण जे विद्यालाभी प्राणी आहेत, ते पुनर्जन्म पावत नाहींत.(७)
दुसर्याही पर्यायानें...इत्यादी...ती कशी? जें कांहीं दु:ख उद्भवतें तें सर्व संस्कारापासून, ही एक अनुपश्यना; आणि संस्कारांचा वैराग्यानें अशेष निरोध केल्यानें दु:खाचा उद्भव नाहीं, ही दुसरी अनुपश्यना. भिक्षूंनो, याप्रमाणें द्वैताची...इत्यादि...तो सुगत शास्ता म्हणाला—
७३१ जें काहीं दु:ख उद्भवतें, तें सर्व संस्कारांपासून; संस्कारांच्या निरोधानें दु:ख उद्भवत नाहीं.(८)
७३२ संस्कारांपासून दु:ख उद्भवतें, हा (संस्कारांतील) दोष जाणून सर्व संस्कार नाहींसे करून व संज्ञेचा निरोध करून, आणि याप्रमाणें दु:खनाश होतो हें यथार्थतया जाणून,(९)
७३३ सम्यग्दर्शी, वंदपारग, पण्डित सम्यक्-ज्ञानाच्या योगें भारबन्धन तोडून पुनर्जन्म पावत नाहींत.(१०)
दुसर्याही पर्यायानें.....इत्यादि...ती कशी? जें काहीं दु:ख उद्भवतें, तें सर्व विज्ञानापासून, ही एक अनुपश्यना; आणि विज्ञानाचा वैराग्यानें अशेष निरोध केल्यानें दु:खाचा उद्भव नाहीं, ही दुसरी अनुपश्यना. भिक्षूंनो, याप्रमाणें...इत्यादि...तो सुगत शास्ता म्हणाला—
७३४ जें कांहीं दु:ख उद्भवतें तें सर्व विज्ञानापासून; विज्ञानाच्या निरोधानें दु:ख उद्भवत नाहीं.(११)
७३५ विज्ञानापासून दु:ख उद्भवतें, हा (विज्ञानांतील) दोष जाणून विज्ञानाच्या वीततृष्ण भिक्षु परिनिर्वाण पावतो.(१२)
दुसर्याही पर्यायानें....इत्यादी...ती कशी? जें काहीं दु:ख उद्भवतें तें सर्व स्पर्शापासून, ही एक अनुपश्यना; आणि स्पर्शाचा वैराग्यानें अशेष निरोध केल्यानें दु:खाचा उद्भव नाहीं, ही दुसरी अनुपश्यना. भिक्षूंनो, याप्रमाणें...इत्यादि... तो सुगत शास्ता म्हणाला—
७३६. जे संसारप्रवाहांत वाहत जाणारे, कुमार्गानें चालणारे, स्पर्शपरायण असे प्राणी त्यांजपासून संयोजनाचा क्षय फार दूर आहे(असें समजावें).(१३)
७३७. पण जे स्पर्श जाणून ज्ञानवान् होऊन निर्वाणांत रत होतात, ते वीततृष्ण स्पर्शाच्या निरोधानें परिनिर्वाण पावतात.(१४)
दुसर्याही पर्यायानें....इत्यादि....ती कशी? जें कांहीं दु:ख उद्भवतें तें सर्व वेदनांपासून, ही एक अनुपश्यना; आणि वेदनांचा वैराग्यानें अशेष निरोध केल्यानें दु:खाचा उद्भव नाहीं, ही दुसरी अनुपश्यना. भिक्षूंनो, याप्रमाणें...इत्यादि... तो सुगत शास्ता म्हणाला—
७३८ आध्यात्मिक किंवा बाह्य, सुख, दु:ख किंवा उपेक्षा यांपैकीं कोणतीही वेदना,(१५)
७३९ ती नश्वर, लुप्त होणारी व दु:खद आहे व तिचा अनुभव मिळाल्यानंतर अखेर तिचा व्यय होतो असें जाणून भिक्षु तिच्या विषयीं विरक्त होतो, व वेदनांच्या क्षयानें निस्तृष्ण होऊन परिनिर्वाण पावतो.(१६)
दुसर्याही पर्यायानें....इत्यादी...ती कशी? जें काहीं दु:ख उद्भवतें तें सर्व तृष्णेपासून, ही एक अनुपश्यना; आणि तृष्णेचा वैराग्यानें अशेष निरोध केल्यानें दु:खाचा उद्भव नाहीं, ही दुसरी अनुपश्यना. भिक्षूंनो, याप्रमाणें...इत्यादि... तो सुगत शास्ता म्हणाला—
७४० तृष्णेचा साथी होऊन दीर्घ काळ पुनर्जन्म घेत मनुष्य मनुष्यत्व किंवा मनुष्येतरभाव पावून संसार अतिक्रमूं शकत नाहीं.(१७)
७४१ तृष्णेनें दु:खाचा उद्भव होतो, हा (तृष्णेंतील) दोष जाणून, वीततृष्ण, आदानविरहित व स्मृतिमान् होऊन, भिक्षु म्हणून प्रव्रज्या घ्यावी. (१८)
दुसर्याही पर्यायानें....इत्यादी...ती कशी? जें काहीं दु:ख उद्भवतें तें सर्व उपादानांपासून, ही एक अनुपश्यना; आणि उपादानांचा वैराग्यानें अशेष निरोध केल्यानें दु:खाचा उद्भव नाहीं, ही दुसरी अनुपश्यना. भिक्षूंनो, याप्रमाणें...इत्यादि... तो सुगत शास्ता म्हणाला—
७४२ उपादानांपासून भव होतो, उत्पन्न झालेला प्राणी दु:ख भोगतो आणि जन्मलेल्याला मरण येतें, हा दु:खाचा उद्भव होय.(१९)
७४३ म्हणून सम्यकज्ञानानें उपादानक्षय करून व जन्मक्षय जाणून, पंडित पुनर्जन्म पावत नाहींत.(२०)
दुसर्याही पर्यायानें....इत्यादी...ती कशी? जें काहीं दु:ख उद्भवतें तें कर्मांच्या धडपडीपासून, ही एक अनुपश्यना; आणि कर्माच्या धडपडीचा वैराग्यानें अशेष निरोध केल्यानें दु:खाचा उद्भव नाहीं, ही दुसरी अनुपश्यना. भिक्षूंनो, याप्रमाणें...इत्यादि... तो सुगत शास्ता म्हणाला—
७४४. जें कांहीं दु:ख उद्भवतें, तें सर्व कर्माच्या धडपडीपासून; कर्मांच्या धडपडीच्या निरोधानें दु:खाचा उद्भव होत नाहीं.(२१)
७४५ कर्माच्या धडपडी पासून दु:ख होतें, हा (कर्मांच्या धडपडींतील) दोष जाणून सर्व कर्माची धडपड सोडून ज्या ठिकाणी कर्माची धडपड नाहीं अशा (निर्वाणांत) मुक्ति पावणार्या, (२२)
७४६ आणि भवतृष्णेचा उच्छेद करणार्या शांतचित्त भिक्षूची जन्मपरंपरा मागें पडली; त्याला पुनर्जन्म राहिला नाहीं.(२३)
दुसर्याही पर्यायानें....इत्यादी...ती कशी? जें काहीं दु:ख उद्भवतें तें सर्व १आहारांपासून, (१ अन्न, स्पर्श, मन:संचेतना व विज्ञान-असे चार प्रकारचे आहार निरनिराळ्या लोकांतील प्राण्यांकरितां सांगितले आहेत.) ही एक अनुपश्यना; आणि आहारांचा वैराग्यानें अशेष निरोध केल्यानें दु:खाचा उद्भव नाहीं, ही दुसरी अनुपश्यना. भिक्षूंनो, याप्रमाणें...इत्यादि... तो सुगत शास्ता म्हणाला—
७४७. जें कांहीं दु:ख उद्भवतें, तें सर्व आहारांपासून; आहारांच्या निरोधानें दु:खाचा उद्भव होत नाहीं.(२१)
७४८ आहारांपासून दु:ख होतें, हा (आहारांतील) दोष जाणून, व सर्व आहार ओळखून, कोणच्याही आहारांवर अवलंबून न राहतां,(२५)
७४९ सम्यकप्रज्ञेनें आरोग्य पाहून आश्रवांचा नाश करून जो विचारपूर्वक आहारांचा उपयोग करतो, तो धर्मस्थित वेदपारग पुन: नामाभिधान (जन्म) पावत नाहीं.(२६)
दुसर्याही पर्यायानें....इत्यादी...ती कशी? जें काहीं दु:ख उद्भवतें तें सर्व प्रकंपांपासून, ही एक अनुपश्यना; आणि प्रकंपांचा वैराग्यानें अशेष निरोध केल्यानें दु:खाचा उद्भव नाहीं, ही दुसरी अनुपश्यना. भिक्षूंनो, याप्रमाणें...इत्यादि... तो सुगत शास्ता म्हणाला—
७५०. जें कांहीं दु:ख उद्भवतें, तें सर्व प्रकंपांपासून; प्रकंपांच्या निरोधानें दु:खाचा उद्भव होत नाहीं.(२७)
७५१ प्रकंपांपासून दु:ख होतें, हा (प्रकंपांतील) दोष जाणून आणि म्हणून प्रकंप सोडून, व संस्कारांचा निरोध करून अप्रकम्प्य, अनुपादान व स्मृतिमान् होऊन भिक्षु म्हणून प्रव्रज्या घ्यावी.(२८)
दुसर्याही पर्यायानें....इत्यादी...ती कशी? आश्रित हा चलन पावतो, ही एक अनुपश्यना; आणि अनाश्रित हा चलन पावत नाहीं, ही दुसरी अनुपश्यना. भिक्षूंनो, याप्रमाणें...इत्यादि... तो सुगत शास्ता म्हणाला—
७५२ अनाश्रित चलन पावत नाहीं, पण जो आश्रित तो उपादानामुळें मनुष्यत्व व मनुष्येतरभाव यांनीं बनलेला संसार अतिक्रमूं शकत नाहीं.(२९)
७५३ आश्रयांमध्यें हा भयंकर दोष जाणून अनाश्रित, अनुपादान व स्मृतिमान् होऊन भिक्षु म्हणून प्रव्रज्या घ्यावी.(३०)
दुसर्याही पर्यायानें....इत्यादी...ती कशी? भिक्षूंनो, रूपावचर-देवलोकांहून अरूपावचर देवलोक शांततर आहे, ही एक अनुपश्यना; आणि अरूपावचर-देवलोकांहून निरोध (निर्वाण) शांततर, ही दुसरी अनुपश्यना. भिक्षूंनो, याप्रमाणें.....इत्यादी... तो सुगत शास्ता म्हणाला—
७५४ जे रूपावचर-देव व अरूपावचर-देव आहेत, ते निरोध जाणत नाहींत म्हणून पुनर्जन्म पावतात. (३१)
७५५ पण जे रूपावचर-देवलोक जाणून व अरूपावचर-देव-लोकाविषयीं अनासक्त होऊन निरोधांत मुक्ति पावतात, ते जन मृत्यूला सोडून जातात.(३२)
दुसर्याही पर्यायानें....इत्यादी...ती कशी? भिक्षूंनो, सदेवक समारक लोकांत सश्रमण ब्राह्मण आणि सदेवमनुष्य प्रजेंत जें सत्य समजलें जातें तें खोटें आहे असें सम्यक्-प्रज्ञेनें यथार्थतया उत्तम रीतीनें पाहतात, ही एक अनुपश्यना; आणि भिक्षूंनो, सदेवक .....इत्यादी....सदेवमनुष्य प्रजेंत जे खोटें समजलें जातें ते खरें आहे असें आर्य सम्यक्-प्रज्ञेनें यथार्थतया उत्तम रीतीनें पाहतात, ही दुसरी अनुपश्यना. भिक्षूंनो, याप्रमाणें.... इत्यादी....तो सुगत शास्ता म्हणाला—
७५६ अनात्म्यांत आत्मा आहे असें मानणार्या व नामरूपांत बद्ध झालेल्या सदेवक लोकांकडे पहा. ते हेंच सत्य आहे असें समजतात. (३३)
७५७ ज्या ज्या रीतीनें ते कल्पना करतात, त्याहून ती वस्तु निराळीच असते, आणि त्यांचीं कल्पना खोटी ठरते. कारण जें क्षणभंगुर तें नश्वर असतें.(३४)
७५८ पण निर्वाण अनश्वर आहे आणि आर्य ‘तें सत्य आहे’ असें जाणतात आणि त्या सत्याच्या ज्ञानानें निस्तृष्ण होऊन ते निर्वाण पावतात.(३५)
दुसर्याही प्रकारानें सम्यक्-द्वैतानुपश्यना असेल काय असें जर भिक्षूंनो, तुम्हांस कोणी विचारणारे भेटतील, तर अशी असेल असें त्यांस म्हणावें. ती कशी? भिक्षूंनो, सदेवक....इत्यादी...सदेवकमनुष्य प्रजेंत जें सुख समजलें जातें तें दु:ख आहे, असें आर्य सम्यक्-प्रज्ञेनें यथार्थतया उत्तम रीतीनें पाहतात, ही एक अनुपश्यना; आणि भिक्षूंनो, सदेवक....इत्यादी...सदेवकमनुष्य प्रजेंत जें दु:ख समजलें जातें तें सुख आहे, असें आर्य सम्यक्-प्रज्ञेनें यथार्थतया उत्तम रीतीनें पाहतात, ही दुसरी अनुपश्यना; भिक्षूंनो, याप्रमाणें द्वैताची सम्यक्-अनुपश्यना करणार्या, अप्रमत, उत्साही व दृढचित्त होऊन वागणार्या भिक्षूला याच जन्मीं अर्हत्त्व किंवा, उपादानशेष राहिल्यास, अनागामिता-या दोहोंपैकी एक फळ मिळण्याची अपेक्षा करतां येईल. असें भगवान् म्हणाला. असें म्हणून तदनंतर तो सुगत शास्ता म्हणाला—
७५९ रूप, शब्द, रस, गन्ध, स्पर्श आणि १धर्म (१ टिकाकर ह्या शब्दासह सहा आलम्बनांचा निर्देश करतो.) म्हणून जे सगळे आहेत त्यांना इष्ट, कान्त आणि मनोहर समजतात.(३६)
७६० सदेवक लोकांना हे सुखकारक वाटतात, आणि ते जेथ निरोध पावतात तें (स्थान) त्यांना दु:खकारक वाटतें. (३७)
७६१ सत्कायबुद्धीचा१ (१ ‘पंचस्कन्धाचा’ असा अर्थ टीकाकार घेतो. पण गाथा २३१ मध्यें हा ‘सक्काय’ शब्द आलेला आहे, तेथें ह्या शब्दाचा अर्थ ‘देहांत आत्मा आहे असा समज’-असा आहे.) निरोध सुखकारक आहे असें आर्य जाणतात; पण त्या ज्ञात्यांच्या उलट लोकांची समजूत असते.(३८)
७६२ इतर ज्याला सुख समजतात तें दु:ख आहे असें आर्य जाणतात; व जें इतरांना दु:ख वाटतें तें सुख आहे असें आर्य जाणतात. ज्यांत मूर्ख लोक मोहित होतात, तो हा दुर्ज्ञेय लोकस्वभाव पहा!(३९)
७६३ (अविद्येंने) आच्छादिलेल्यांना तम व अज्ञानांना हा अन्धकार वाटतो. पण डोळसांना जसा प्रकाश तसा हा प्रकार सन्तांना स्पष्ट दिसतो. धर्मज्ञानविहीन मूढ आपणांपाशींच असलेला (अमूल्य ठेवाही) जाणत नाहींत.(४०)
७६४ भवासक्तिपरायण, भवनदींत वाहणारे, व माराच्या तडाक्यांत सांपडलेले जे, त्यांना या धर्माचा बोध होणें सोपें नाहीं.(४१)
७६५ लोक सम्यक्-ज्ञानानें जें पद जाणून अनाश्रव होऊन परिनिर्वाण पावतात, त्या पदाचा आर्यांवाचून दुसर्या कोणास बोध होणें शक्य नाहीं.(४२)
असें भगवान् म्हणाला. मुदित मनानें त्या भिक्षूंनीं भगवन्ताच्या भाषणाचें अभिनन्दन केलें. हें व्याख्यान केलें जात असतां साठ भिक्षूंची अन्त:करणें उपादानरहित होऊन आश्रवांपासून मुक्त झालीं.
द्वयतानुपस्सनासुत्त समाप्त. . .
मानवसूत्रे
साम्यवाद :
साम्यवादाच्या (मार्क्सवादाच्या) विजयदुंदुभीने तुम्ही बावरून जाऊ नका, भुलून जाऊ नका किंवा दिपूनही जाऊ नका. तुम्ही बौद्ध विचारसरणीचा व तत्वज्ञानाचा एक दशांश भाग जरी आत्मसात करू शकला तर साम्यवाद जे काही निर्माण करू इच्छितो, ते तुम्ही करूणा, न्याय व सद्भावना यांच्या जोरावर घडवून आणू शकाल यात तिळमात्र शंका नाही.
समाज :
समाज सुदृढ होण्याकरिता संख्याबल, संपत्तिबल आणि मनोबल या शक्ती आवश्यक आहेत. संख्याबल सशक्त आणि संघटितपणामुळे प्राप्त होते. संपत्तिबल व्यापार दिर्घोद्योग व निर्वेसनीपणामुळे प्राप्त होते आणि मनोबल सद्धम्माचरणाने प्राप्त होते.
चातुर्वर्ण्य :
मला चातुर्वण्याची अत्यंत घृणा आहे, आणि माझा समग्र समाज त्याविरुद्ध क्रांती करण्यास उभा ठाकलेला आहे. या चातुर्वर्ण्यप्रणीत समाज रचनेचा सूक्ष्म अभ्यास केला असता ही समाज पद्धती अत्यंत घातक, अव्यवहारी आणि अयशस्वी असल्याची माझी खात्री झाली आहे. भारतात सामाजिक क्रांत्या का झाल्या नाहीत? याचे कारण हिंदू समाजातील कनिष्ट वर्ग चातुर्वण्यांच्या विपन्नावस्थेला नेणा-या पद्धतीमुळे प्रत्यक्ष कृती करण्याच्या दृष्टीने हतबल झाला होेता. चातुर्वर्ण्य या सामाजिक संस्थेसारखी दुसरी कोणतीही संघटना अधिक अध:पात करणारी आढळणारी नाही. या संघटनेमुळे समाज मृतवत होतो, तो विकलांग होतो आणि उपकारक मदत करण्यासारखे कार्य करण्यापासून त्याला परावृत्त केले जाते. चातुर्वर्णाच्या आधाराने हिंदू समाजाची पुनर्घटना अशक्य आहे, नव्हे ते अपायकारक आहे. कारण चातुर्वर्णामुळे सामान्य जनतेचा ज्ञानार्जनाचा अधिकार नाकारला जातो. शस्त्र धारण करण्याचा अधिकार नाकारल्यामुळे सामान्य जनता पौरूषहीन बनते.
जातीसंस्था :
जाती संस्था हे केवळ श्रमविभाजन नव्हे, ते श्रमिकांचे सुद्धा विभाजन आहे. श्रमिकांच्या गटांची जन्मजात प्रतवारी लावून देणारी ही संस्था आहे. दुस-या कोणत्याही देशात श्रमविभाजनाला अशा त-हेचा श्रमिकांचा दर्जा चिकटवून दिलेला नाही. जोपर्यंत जाती जिवंत आहेत तोपर्यंत हिंदूमध्ये संघटनाची आशा नाही आणि जोपर्यंत संघटना नाही तोपर्यंत हिंदू दुर्बल व लाचार राहतील. बहिष्कृत मानव हे जातिव्यवस्थेचे अवांतर उत्पादन आहे. जातिव्यवस्था नष्ट केल्याशिवाय, कोणत्याही उपायाने जातिबहिष्कृतांचा उद्धार होणार नाही. अनेक वचनात शक्य असते. एकवचनात ती अशक्यच.
बुद्धि :
बुद्धिमत्ता म्हणजे सद्गुण नाही, हे खरे आहे. बुद्धिक्षमता ही एक साधन आहे व तिचा उपयोग कसा करावा हे, बुद्धिमान व्यक्तीच्या अंतिम हेतूवर अवलंबून आहे. बुद्धिमान हा सज्जन असतो, त्याप्रमाणे तो दुर्जनही असू शकतो. तसेच या लोकांत रंजल्यागांजल्यांची सेवा करणारे, पतितांचा उद्धार करणारे महापुरुष जसे सापडतात, तसेच हीन मनोवृत्तीचे, दुष्ट प्रवृत्तीचे लोक देखील यांच्यात असतात. बुद्धिचा उपयोग भाकर, शिक्षण व राज्यसत्ता मिळविण्यासाठी हवा.
भाषा :
सगळ्या देशाला एका भाषेत बोलायला शिकवा मग बघा काय चमत्कार घडतो!
कार्य :
आमचे कार्य एवढे मोठे आहे की, आयुष्यातील एक-एक मिनिट देखील कमी पडतो.
युद्ध :
“युद्धाचा नायनाट केवळ बौद्धिक पातळीवर आव्हान करून होणार नाही तर युद्धप्रवृत्तीला विरोध करणारे मनोविकार व जीवनाकडे पहाण्याची विधायक प्रवृत्ती यांच्या संवर्धनामुळे होईल.” हे रसेलचे म्हणणे यथार्थ आहे. रसेल हे युद्धविरोधी होते. परंतु शांतीपंथवादी नव्हते. क्रियाशीलतेमुळे वाढ होते, निश्चलतेने नाश होतो. शक्ती म्हणजे उत्साह आणि ती विधायक कार्य साधण्याकडे लावली पाहिजे. तिचा वापर संहाराकरिता होता कामा नये.
ज्ञान :
पावलागणिक स्वतःच्या ज्ञानात भर टाकीत जाणे यापेक्षा अधिक सुख दुसरे काय असू शकते. माझा प्रयत्न सर्व क्षेत्रांतील अज्ञानांच्या जागी ज्ञान संवर्धनाचा आहे. करूणेशिवाय विद्या बाळगणा-याला मी कसाई समजतो.
मुक्ती :
एखादी व्यक्ती तुमची मुक्ती करील या भ्रमात तुम्ही राहू नका. तुमची मुक्ती तुमच्या हातात आहे. तुम्ही क्रियावान व्हा. तोच मुक्तीचा मार्ग आहे.
पश्चात्ताप :
माणसाच्या हातून चुका होताच, त्याला पश्चातापही होतो. पण पश्चातापाने त्या चुकीची भरपाई होईलच असे नाही, जीवनातील हेच मोठे दुःख होय.
मन :
मनुष्याला शरीराबरोबर मनही आहे. म्हणून दोन्हीचाही विचार करावयास हवा. शरीर सुदृढ होण्याबरोबर मनही सुसंस्कृत झाले पाहिजे. एरवी मानव जातीचा विकास झाला असे म्हणता येणार नाही. उत्साह निर्माण करण्याचे मूळ मनात आहे. ज्याचं शरीर व मनही धडधाकट असेल, जो हिम्मतबाज असेल. जो कोणत्याही परिस्थितीतून झगडून बाहेर पडेल असा ज्यास विश्वास वाटतो त्याच्या मध्ये उत्साह निर्माण होतो व त्याचा उत्कर्ष होतो.
प्रयत्न :
नुसत्या काळावर भिस्त ठेवून हितावह होणार नाही. कालगतीबरोबर आपल्या हातून होईल तेवढे कार्य करणे आवश्यक आहे. तसे जर आपण केले नाही तर काळ बदलेल पण आपल्या स्थितीत बदल होणार नाही.
बुद्ध धर्म :
हा धर्म सर्वतोपरि परिपूर्ण आहे. त्यास लांछन कोठेच नाही. बुद्ध हेच खरे विचारवंत होते. त्यांच्यासारखा विचारवंत अजूनपर्यंत जगात झालाच नाही.
विठ्ठल रामजी शिंदे
वरवर पाहता अखिल भारतखंडात हिंदूंची वर्णव्यवस्था रूढ झालेली जरी दिसत असली तरी तिचा तपशील आणि जोर निरनिराळया प्रांतांत अगदी निराळा आहे. ह्या भिन्नतेचे कारण ब्राह्मणी आणि बौध्द संस्कृतीची भिन्नभिन्न काळी भिन्नभिन्न कारणांनी झालेली झटापट हे होय. पंजाब आणि वायव्येकडील प्रांतांत जी व्यवस्था आहे; ती बिहार, बंगाल, ओरिसाकडे आढळत नाही आणि खाली द्राविड देशात अगदीच निराळी आहे. बिहार, बंगाल देशांत बौध्द धर्माचा उदय आणि अंमल जारी असल्याने आणि हिंदुस्थानात याच भागात बौध्द धर्म उदय पावून तो येथेच सर्वात अधिक काळ टिकल्याने येथील जातिभेदाची रचना इतर प्रांतांहून अगदी निराळी दिसते. येथे ब्राह्मण आणि क्षत्रिय या दोन उच्च वर्णांची जी तुरळक वस्ती आहे ती बाहेरूनच आलेली आहे. वैद्य, कायस्थ हा जो मोठा मध्यमवर्ग आहे, तो क्षत्रिय आणि वैश्य यांचे मिश्रण आहे; आणि बाकी उरलेला जो मोठा बहुजनसमाज तो निर्भेळ आर्येतर आणि एके काळी पूर्ण बुध्दानुयायी होता. बाराव्या शतकात मुसलमानांची अकस्मात धाड येऊन जी राज्यक्रांती झाली तिचा धक्का जीर्ण झालेल्या बौध्द धर्माला लागून, तो नष्ट झाला. मुसलमानी हल्ल्याची ही लाट ओसरून गेल्यावर बौध्दांच्या ठिकाणी ब्राह्मणांनी तत्कालीन क्षत्रिय राजांच्या साह्याने समाजाची हल्ली रूढ असेलेली पुनर्घटना केली. ह्या घडामोडीत बल्लाळसेन हा राजा प्रमुख होता. त्याने नवीनच स्मृती बनवून केवळ ब्राह्मणांच्या दृष्टीने आचरणीय, अनाचरणी, अस्पृश्य आणि ग्रामबाह्य वगैरे जनसमूहांचे नवीन वर्ग बनविले. अर्थात ह्या उलाढालीत एका मोठया नवीनच अस्पृश्यवर्गाची समाजात भर पडली. ही गोष्ट आधुनिक संशोधनामुळे कशी सिध्द होत आहे, ते पाहू. संशोधनाच्या कामी बंगाली पंडितांनी अलीकडे बरीच आघाडी मारली आहे. हिंदुस्थानातून बौध्द धर्म अजीबात नष्ट झाला आहे, अशी अजून पुष्कळांची समजूत आहे. पण खरा प्रकार तसा नसून बंगालतील काही भागांतून आणि विशेषतः ओरिसातील काही कानाकोपऱ्यात हा धर्म काही अप्रसिध्द आणि मागासलेल्या जातींत अद्यापि प्रचलित आहे; व त्यांची गणना चुकून हिंदू धर्मातच होते, असा शोध प्रसिध्द संशोधक महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री ह्यांनी केला आहे. ओरिसात मयूरभंज म्हणून एक लहानसे संस्थान आहे. तेथील महाराजांच्या साह्याने बाबू नगेंद्रनाथ बसू, बंगाली विश्वकोशाचे संपादक, ह्यांनी १९०८ साली त्या संस्थानच्या जंगलात प्रवास केला, तेव्हा त्यांना जे शोध लागले ते त्यांनी इ.स. १९११ साली Modern Buddhism and its Followers in Orissa ('आधुनिक बौध्द धर्म आणि त्याचे ओरिसातील अनुयायी') ह्या नावाच्या पुस्तकाच्या रूपाने प्रसिध्द केले आहेत. त्या पुस्तकाला सदर हरप्रसाद शास्त्री यांनी आपली विस्तृत आणि अधिकारयुक्त प्रस्तावना जोडिली आहे. पान २४ वर शास्त्रीमहाशय लिहितात : ''इ.स.च्या १२ वे शतकाचे शेवटी मुसलमानांची टोळधाड हिंदुस्थानावर पडली. त्यांनी प्रमुख बौध्द मठांचा आणि विश्वविद्यालयांचा नाश करून त्या ठिकाणी आपल्या लष्कराचे ठाणे केले. हजारो साधूंचा शिरच्छेद करून त्यांची संपत्ती लुटली, पुस्तकालये जाळली,.... ब्राह्मणांनी ह्या संधीचा फायदा घेऊन बौध्द हिंदुस्थानातून समूळ नाहीसा झाला असे भासविण्यास सुरुवात केली. सुशिक्षित आणि बुध्दिवान बौध्द मारले गेले, अथवा दूरदेशी पळून गेले. मागे त्यांचा प्रांत ब्राह्मणांच्या कारवाईला मोकळा झाला. पुष्कळ बौध्दांना जबरीने किंवा फुसलावून मुसलमानी धर्मात कोंबण्यात आले. अशिक्षित, बौध्द बहुजनसमाज कोकरांच्या कळपाप्रमाणे निराश्रित झाला. त्याला मुसलमानी किंवा हिंदू धर्माचा नाइलाजाने आश्रय घ्यावा लागला. अशा निराश्रितांपैकी जे पूर्णपणे आपल्या कह्यात येण्यास कबूल होते, त्यांनाच दुराग्रही ब्राह्मणांनी हिंदू धर्मात घेतले. अशांना 'नवशाखा शूद्र' अशी बंगाली समाजात संज्ञा आहे. ह्याशिवाय इतर बौध्दांचा जो मोठा भाग स्वतंत्रपणे राहू लागला, तो बहिष्कृत होऊन अनाचरणीय ऊर्फ अस्पृश्य ठरला.'' ह्या अनाचरणीय जाती हल्ली जरी अस्पृश्य हिंदू समजण्यात येत आहेत, तरी त्या पूर्वी चांगल्या सन्माननीय बौध्द होत्या. त्यांपैकी हल्ली सर्वच अस्पृश्य नाहीत. नुसत्या अनाचरणीय म्हणजे त्यांचे पाणी ब्राह्मणांस चालत नाही अशा होत. वणिक सोनाराची जात अतिशय श्रीमंत व वजनदार असूनही ती अशीच अनाचरणीय आहे. त्यांची गणना नवशाखा शूद्रांपेक्षाही अधिक खालची गणली जात आहे. ते पूर्वी चांगले बौध्द होते. पण त्यांच्यावर ह्या धांदलीच्या काळात बल्लाळसेन ह्या हिंदू राजाचा काही झनानी कारस्थानामुळे राग होऊन ते असे खाली दडपले गेले. मग इतर सामान्य स्वातंत्र्येच्छू जाती अगदी हीन व अस्पृश्य बनल्या ह्यात काय नवल ! मुसलमानांची पहिली धडाडी संपून त्यांचा जम बसल्यावर आणि बौध्द धर्म दडपून गेल्यावर बंगालमधील हिंदू धर्माची नवी घडी पुनः बसू लागली. ह्यासंबंधी ह्या शास्त्रीपंडिताचे असे मत आहे की, लोकांना आपल्या पूर्वापार खऱ्या संबंधांचा विसर पडला; आणि ब्राह्मण सांगतील त्याप्रमाणे हल्लीचे जातिभेद संकरजन्य अगर बहिष्कारजन्य आहेत असा समज दृढ झाला. ह्या नवीन रचनेच्या शिरोभागी ब्राह्मण विराजमान झाले. इतकेच नव्हे, तर उलटपक्षी कित्येक कुशल कारागीर जाती आणि संपन्न व्यापारीवर्गदेखील जे पूर्वी सन्मान्य बौध्द होते, ते या मनूत हीनत्वाप्रत पोहचले. ज्यांच्या पूर्वजांनी काही शतकांपूर्वी बौध्द धर्माची तत्त्वे तिबेट आणि चीन देशात पसरविली, ज्यांनी जलप्रवास करून हिंदुस्थानचा उद्योग आणि व्यापार वाढविला अशी 'मनसार भाषान' इत्यादी आद्य बंगाली ग्रंथांतून भडक वर्णने आहेत, तेच आज केवळ ब्राह्मणांच्या कटाक्षामुळे अनाचरणीय व तिरस्करणीय बनले आहेत ! (Modern Buddhism प्रस्तावना पान २३ पहा.) पण अशा विपन्नावस्थेमध्येही बौध्द धर्म अगदीच नष्ट झाला नसून तो गुप्तरूपाने हीनदीन समाजाच्या वहिवाटीत अद्यापि असला पाहिजे, अशी बळकट शंका आल्यावरून तो शोधून काढण्याचे काम गेल्या शतकाचे शेवटी व चालू शतकाचे आरंभी धाडसी आणि सहानुभूतिसंपन्न शोधकांनी चालविले होते. अशांपैकी एक संशोधक बाबू नगेंद्रनाथ बसू हे ओरिसा प्रांतातील मयूरभंज संस्थानचे मालक महाराज श्री रामचंद्र भंजदेव ह्यांच्याबरोबर त्या संस्थानातील जंगलात फिरत होते. ते खिचिंग नावाच्या खेडयाजवळ पोहचले असता त्यांना 'पान' नावाच्या अस्पृश्य जातीच्या काही तरुण पोरांनी मनोहर गाणी गाऊन दाखविली. 'धर्मगीता' नावाच्या जुन्या ग्रंथाशी त्यांचा संदर्भ जुळल्याने नगेंद्रबाबूंना साश्चर्य आनंद झाला. त्यानंतर त्यांना काही वृध्द माणसे भेटली. त्यांनी जुन्या बुध्दानुयायी पाल राजांची गाणी गाऊन दाखविली. अशा रीतीने ह्या ओसाड जंगलात विस्मृतिगर्तेत दडपून गेलेल्या बौध्द धर्माचा आकस्मिक सुगावा लागल्यामुळे या बाबूंनी आपला शोध पुढे नेटाने चालविला. बडसाई आणि खिचिंग गावांजवळ त्यांना ओरिया भाषेतील काही हस्तलिखित पोथ्या, एक जुना बौध्द स्तूप, धर्मराज आणि शीतला ह्या महायान बौध्द पंथाच्या मूर्ती व इतर खाणाखुणांचा शोध लागला. पण सर्वात आश्चर्याची गोष्टी ही की ह्या सर्व गत वस्तू आजवर भक्तीने सांभाळून ठेवल्याचे सर्व श्रेय, नगेंद्रबाबू हे बाथुरी अथवा बाउरी या हीन व अस्पृश्य मानिलेल्या जातीलाच देत आहेत ! सोळाव्या शतकातील ओरिसाचा राजा प्रतापरुद्र ह्याच्या कारकिर्दीत बलरामदास नावाचा कवी होऊन गेला. हा प्रतापरुद्राच्या छळाला भिऊन आपला बौध्द धर्म लपवून ठेवून हिंदुधर्मात मिळूनमिसळून राहत होता. त्याने आपल्या 'गणेश विभूति' नावाच्या ओरिया भाषेतील काव्यावर आपणच 'सिध्दांताडंबर' नावाची टीका केली आहे. त्यात त्याने बाथुरी जातीची पूर्वपीठिका अशी सांगितली आहे. खालील उताऱ्यावरून आपल्यास जाता जाता ओरिया भाषेशी मराठीचे किती साम्य आहे हेही दिसेल. निराकार दक्षिणरु विप्र होए जात ॥ उत्तर अङ्गरु जान गोपाल सम्भूत ॥१७॥ वदन अंतरे विश्वामित्र मुनि कहि ॥ ताहांकु अङ्गरे वाउरि जात होई ॥१८॥ तार तहु तेर सुत हइल जनम ॥ ताहार पत्नीर नाम पद्मालया जान ॥२५॥ कनिष्ट पत्नीरे चित्र उर्वशी तार नाम ॥ गंधकेशी वलीण तार दुतिय भार्य्या जान ॥२६॥ वायुरेखा वलिण से चतुर्थक काहि ॥ वार सुत जन्म हेले चारि पत्नी तेहि ॥२७॥ भावार्थ : निराकाराच्या (शून्य ब्रह्माच्या) उजव्या कुशीतून विप्र जन्मले, डावीतून गोपाल, तोंडातून विश्वामित्र, त्याच्यापासून बाउरी जात उद्भवली. पद्मालया, ऊर्वशी, गंधकेशी आणि वायुलेखा अशा चार पत्नींपासून विश्वामित्राला १२ पुत्र झाले. भाष्य : एवे वाउरि वार पुत्र नामक हिवा । पद्मालयापुत्र दुलि वाउरि अटन्ति ब्राह्मणसङगे वेद पढु यान्ति । ब्राह्मण ज्येष्ठ वाउरि कनिष्ठ । ए पढुथिले राजा प्रतापरुद्रङग ठारु गोप्य करि रखि अच्छन्ति ।... पद्मालयापुत्र वायोकांडी परमानन्द भोइ राधी शासमल । Modern Buddhism पान १५-१६ ॠग्वेदाच्या ऐतरेय ब्राह्मणात विश्वामित्राचे पुत्र शंबर असे म्हटले आहे. त्याच्याशी वरील माहितीचा संदर्भ नगेंद्रबाबूंनी जुळविला आहे. पण ह्याशिवाय या बलरामदासाच्या मताला दुसऱ्या कुठल्याही हिंदू अथवा बौध्द पुराणांचा आधार नाही असे नगेंद्रबाबू कबूल करतात. पुढे आणखी 'गणेशविभूती'त म्हटले आहे की, पद्मालया तिन पुत्र जेष्ठ से प्रमाण । विष्णुङ्ग सङ्गते से ऱ्हुयुत्नि सम्भाषणं ॥ सङ्खासुर मारि प्रभु सङ्ख ताङ्कु दिले । पंचजन सङ्ख तुम्म सम्माल वोइले ॥ आउ नव भाइ अश क्कुइ न जुगाइ । विचारि जानिलेटी संशय केला सेहि ॥१२॥ (पान १७) अर्थ : पद्मालयाच्या पाच पुत्रांना विष्णूने आपला शंख दिला, पण इतर तीन बायकांच्या मुलांना मात्र विष्णूने आपणांस स्पर्शही करू दिला नाही. ह्या वाक्यातील सङ्ख ह्या शब्दाचा अर्थ नगेंद्रबाबू बौध्द संघ असा करतात व शून्य पुराणात सङ्ख हे पद संघ ह्या अर्थाने योजिलेले आढळते, असा दाखला देतात. अशिक्षितांमध्ये संघाचा अपभ्रंश संख होणे साहजिक आहे. वरील वाक्याचा लाक्षणिक अर्थ असा होईल की, बाउरी जातीच्या प्रमुख ग्रामणीने आपल्या शत्रूंचा संहार करून संघाचे आधिपत्य मिळविले. म्हणजे बाउरी जातीचाच बौध्द धर्मात शिरकाव होऊन ते मान्यतेला पावले. बाकीच्या शबर जाती बौध्द धर्माचा स्वीकार न करता तशाच जंगली स्थितीत राहिल्या. (Modern Buddhism पान २०) 'गणेशविभूती'त गणेशाला पुढे बाउरी जातीसंबंधी हेही गुह्य सांगण्यात आले आहे : कलियुगे न छुइव । वाउरी छुइले सकल पातक क्षय हव । वोलि विष्णुमाया करि गोप्य कोरि रखि अच्छन्ति । शुन हे गणेश वड गहनए गुप्त करि थुइवु । एथि सकाशरु वाउरिगार काटिले ब्राह्मण निभाइ पारन्ति नहि । मूर्ध्ना पातक क्षय हव वोलि शाप्यकु मानियान्ति ॥ (अध्याय १२) अर्थ : कलियुगात बाउरींना शिवू नये; शिवल्यास सकळ पापांचा क्षय होतो, म्हणून जो तो त्यांना शिवेल यासाठी त्यांना अस्पृश्य ठेवण्यात विष्णूची माया आहे. वर सिध्दांताडंबरामध्ये सांगितल्याप्रमाणे हल्लीच्या बाथुरी ऊर्फ बाउरी ह्या अस्पृश्य जातीचा ब्राह्मणांशी काही संबंध आहे काय ह्या प्रश्नाला नगेंद्रबाबू खालील उत्तर देत आहेत : ''मयूरभंज संस्थानात शोधाअंती आम्हाला जी अनेक प्रकारची सामग्री मिळाली आहे तीवरून हल्लीची बाथुरी ही जात खरोखरी आर्यवंशीय असावी असे आम्हास वाटते. ह्या प्रांतात ही सामग्री भरपूर आहे. मयूरभंज संस्थानातील सिंहलीपाल दुर्गावरील सुंदर इमारतीचे अवशेष, प्राचीन 'आठरा देऊळ' नावाचे दगडी मंदिर, जोशीपूर किंवा दासपूर नावाचा चिरेबंदी किल्ला वगैरे पुराव्यांवरून बाथुरी हे आर्य आहेत, इतकेच नव्हे तर ह्या प्रांती हे लोक पूर्वी पराक्रमी राज्यकर्ते, मंत्री व सेनानी होते, अशी जी थोडयाच दिवसांमागे समजूत होती ती साधार आहे, असे दिसते. अद्यापि हे लोक ब्राह्मणांप्रमाणे जानवी घालतात, दहा दिवसांचे सुतक पाळतात, श्राध्द करितात, आणि ह्यांच्या श्राध्दांचे जेवण ब्राह्मण आणि वैश्यही जेवतात. ह्या जातीच्या प्रमुखाला आजही 'महापात्र' हा किताब आहे. खरा बाउरी ब्राह्मणाच्याही हातचे खात नाही; त्याच्या जातीमध्ये त्याला फारच मान आहे. ह्याच्या पूर्वजांनीच हल्लीच्या भंजराजाला राज्यस्थापनेमध्ये मदत केली. पूर्वी ह्या राजाचे २२ सामंत होते. त्यांत सिंहलीपाल, आदिपूर, दासपूर आणि करुंजा येथील अनुक्रमे चार जमीनदार बाउरी जातीचे होते. ह्यांना भंजांकडून रुप्याच्या छत्रचामराचा मान होता. पण आता ह्या सर्व गत गोष्टी झाल्या. हे सर्व कर्जबाजारी होऊन खायची भ्रांत, अशी कठीण स्थिती झाली आहे. भोवतालच्या कोळी, सांताळ लोकांत मिसळून त्यांच्यात चालीरीती आचरू लागले आहेत.'' (Modern Buddhism पान ३२) जी अवस्था बाउरींची पश्चिम बंगाल व ओरिसामध्ये तीच पोडांची (पौंड्र ?) मध्य बंगालात आणि नामशूद्रांची (चांडाल) पूर्व बंगलात आहे. इ.स. १९०१ च्या खानेसुमारीत ह्या दोन जातींसंबंधाने पुढील उल्लेख आहे : ''नामशूद्र १८,६१,००० आणि पोड ५,००,००० आहेत. पण ह्यांच्यापैकी फार मोठी संख्या मुसलमान झाल्याने ह्यांचा खरा विस्तार दृष्टीआड झाला आहे. पूर्व बंगलात १,०५,००,००० मुसलमान आहेत. पैकी निदान ९,००,००० ह्याच जातीतून गेले असावेत. दंतकथेवरून ह्यांचा संबंध प्राचीन पौड्रवर्धन राजाशी पोहोचतो. ह्याची राजधानी खारातोय नदीवर होती. ह्यांनी आपल्या पूर्वीच्या बौध्द धर्माची अद्यापि आठवण राखिली आहे. धर्मराज व धर्मठाकूर ह्या रूपाने ते अद्यापि बुध्दाचीच पूजा करितात. ह्यांचा वंश बहुशः मोंगली (मांगोलियन) आहे. हे प्रथम ब्रह्मपुत्रा नदीच्या दरीतून ईशान्येकडून उत्तर बंगालात शिरले असावेत. तेथेच त्यांचे राज्य असावे. तेथून मग कोच, राजवंशी इत्यादी लोकांनी त्यांना हुसकून लावल्यामुळे ते खाली समुद्रकिनाऱ्यापर्यंत आले असावेत. गेल्या १० वर्षांत नामशूद्र शेकडा १० व पोड शेकडा ११ ह्या प्रमाणात वाढले आहेत.'' सन १९२३ आणि सन १९२८ ह्या दोन साली मी ब्राह्मसमाजाच्या प्रचारकार्यासाठी पूर्व बंगालातील जेसोर जिल्ह्यात फिरतीवर होतो. दोन्ही वेळा सुमारे महिनाभर ह्या नामशूद्रांच्या खेडयांत त्यांच्याशी अगदी मिळूनमिसळून राहिलो. ह्या लोकांत आमच्या 'डिप्रेस्ड क्लासेस मिशन'च्या शाळा व हायस्कुले-त्यांनी स्वतः चालविलेल्या-बऱ्या चालल्या आहेत. ह्यांच्या धार्मिक उपासना व सामाजिक चालीरीती, ह्यांची नावे व गृह्यसंस्कार वगैरेंचे बारीक निरीक्षण केल्यावरून, ही मोठी जात पूर्वी बौध्द धर्मानुयायी असून ह्यांनी राजवैभव एके काळी चांगले भोगले असावे अशी माझी खात्री झाली. हे हल्ली शेतीचा धंदा यशस्वी रीतीने करितात. विशेषतः ताडीच्या झाडांपासून गूळ करण्याचे कारखाने घरोघरी दिसले. असो. येथवर या उत्तरयुगातील टप्प्यांची लक्षणे सांगितली. ह्या युगात अस्पृश्य समाजात जी भली मोठी भर पडली ती प्राचीन युगातल्या वर्णव्यवस्थेमुळे किंवा मध्ययुगातल्या ग्रामसंस्थेमुळे नसून भलत्याच अवांतर कारणांनी म्हणजे हिंदूंच्या दुष्ट राजनीतीमुळे व आत्मघातकी कोतेपणामुळे किंवा वृत्तिमात्सर्यामुळे पडली आहे. दक्षिण हिंदुस्थानात बौध्द धर्माचा नायनाट इ.स. ८००-९०० या शतकात झाला तसा तो उत्तर हिंदुस्थानात १२००-१५०० च्या दरम्यान झाला. दक्षिणेत हा अत्याचार शैव आणि वैष्णव पंथांनी केला पण उत्तरेस त्या विध्वंसाचे अपश्रेय जे एकटया मुसलमानांच्याच कपाळावर काही बंगाली पंडित व संशोधक चिकटवू पाहतात, त्याची मात्र खात्री पटत नाही. मुसलमानांचे आगमन केवळ निमित्तमात्र होते. दक्षिणेकडे हे निमित्तही कोठे दिसत नाही. त्या अर्थी उत्तरेकडेही ह्या निमित्तावर इतिहाससंशोधकांनी फारसा भर ठेवून चालायचे नाही. मुसलमानंनी फार तर पुष्कळशा बौध्दांची कत्तल केली असेल व पुष्कळांना जबरीने बाटविले असेल. पण बाकी उरलेल्यांना अस्पृश्य करा आणि गावाबाहेर ठेवा, असा काही हिंदू वरिष्ठ वर्गांना त्यांचा आग्रह असणे शक्य नाही. ह्या बाबतीत महामहोपाध्याय हरप्रसार शास्त्री यांचे स्पष्टोद्गार फारच मार्मिक आणि निर्भीड आहेत. ते म्हणतात की, मुसलमान आले तेव्हा पूर्व आणि उत्तर हिंदुस्थानातील बौध्द धर्मीय जातीच समाजाचा वरिष्ठ आणि वजनदार असा वरचा भाग होत्या. म्हणून त्याच मुसलमानांच्या डोळयावर आल्या. त्यांची अशी वाताहत झाल्याबरोबर दुराग्रही ब्राह्मणांनी, तत्कालीन शिल्लक उरलेल्या हिंदू राजवटीतून आपले वर्चस्व वाढविण्याकरिता मुसलमानांच्या छळांतून जिवंत उरलेल्या बौध्द बहुजनसमाजाला बहिष्कृत करून कायमचे दडपून टाकले. सन १९२१ ऑक्टोबरच्या Dacca Review ('डाक्का रिव्ह्य') नावाच्या मासिकाच्या अंकात हरप्रसाद शास्त्री पुनः लिहितात की, ''ज्यांना हल्ली डिप्रेस्ड क्लासेस असे लेखण्यात येते, त्या जाती एकेकाळी बगालात राज्य करीत असलेल्या - नव्हे साम्राज्य भोगीत असलेल्या - बौध्द जातींचेच अवशेष आहेत... नेपाळातल्या दाखल्यावरून असे दिसते की, बंगलातील आजचे तिरस्कृत वर्ग काही शतकांपूर्वी बौध्द धर्मी असून तेव्हा ते हिंदुधर्मीयांशी जोराची स्पर्धा करीत असावेत. मुसलमानी स्वारीचा धक्का ह्यांनाच अधिक जाणवला, ह्याचे कारण बौध्द हे राज्यकर्ते होते आणि ब्राह्मण वाचे ह्याचे कारण त्यांना त्या वेळी कसल्याही प्रकारचे महत्त्व नव्हते.'' शास्त्री महाशय स्वतः ब्राह्मण असूनही ते जोरजोराने आज गेली ३० वर्षे हा आपला सिध्दांत प्रतिपादन करीत आहेत. नेपाळातील त्यांचा दाखला विशेष रीतीने लागू पडतो, तो असा की, ''तेथील बौध्दधर्मीयांचे राज्य गुरखे नावाच्या हिंदू क्षत्रियांनी बळकाविल्यावर तेथील ब्राह्मण आणि क्षत्रिय वृत्तीचे लोक तेवढे सारे हिंदू बनून बाकी उरलेल्या व्यापारी, कारागीर आणि श्रमोपजीवी जाती एकजात जशाच्या तशाच बौध्दधर्मीय उरल्या आहेत. त्याचप्रमाणे बंगालात नेपाळच्याहीवर मजल गेली आहे. म्हणजे वरिष्ठ वर्ग मुसलमान अथवा हिंदू बनून उरलेल्या वैश्य, शूद्र जाती अनाचरणीय, बहिष्कृत आणि तिस्करणीय झाल्या आहेत. ते खरोखरीच हीन नसून केवळ ब्राह्मणांच्या दृष्टीने अंत्यज आहेत.'' शास्त्री महाशयांचा हा सिध्दांत खरा असून ध्यानात घेण्याजोगा आहे. बंगालात जो अत्याचार ब्राह्मणांना मुसलमानांच्या वावटळीत करता आला, तो अत्याचार द्राविड देशात जैन राजांना बाटवून तेथील शैवाचार्यांनी केला, ह्या कर्नल ऑल्कॉट यांच्या म्हणण्याला विजयनगर कॉलेजमधील दोन ब्राह्मण अध्यापकांकडून अर्ध्याअधिक पुराव्याचे पाठबळ मिळत आहे. पूर्वीच्या दोन युगांतील प्रकार घडला असेल तसा असो. पण बुध्दोत्तरकालीन ह्या तिसऱ्या युगात मात्र केवळ दडपशाहीनेच अस्पृश्यतेच्या पेवात आजकालची भली भयंकर भर पडली, हे उघड दिसते. आधुनिक युग डोळयांसमोरच आहे. आता ह्या डोळस युगात मागील पापांचे नुसते संशोधनच नव्हे तर निश्चित गणनाही दर दहा वर्षाला सार्वजनिक खर्चाने चालू आहे. ह्या शिरगणतीच्या रिपोर्टावरून ह्या भरतखंडाचा निव्वळ सहावा हिस्सा अस्पृश्य ठरला हे जगजाहीर झाले आहे. हा सहावा हिस्सा एकदम आणि पूर्वीपासून स्वयंसिध्द नसून तो कोणत्या टप्प्यांनी बनत आला आहे, हे उपलब्ध प्रमाणांनी संक्षेपतः व ढोबळ मानाने निर्दिष्ट करण्याचा वर प्रयत्न करण्यात आला आहे.
साभार, महर्षी विठ्ठल रामजी शिंदे , समग्र वाङ्मय. . . .
महामंगलसुत्त
बहु देवा मनुस्सा च , मङ्गलानि अचिन्तयुं
आकङ्खमाना सोत्थानं , ब्रुहि मङ्गल मुत्तमं
असेवना च बालानं , पंडितानञ्च सेवना
बाहु सच्चं च सिप्पंच च, विनयो च सुसिक्खितो
सुभाषिता च या वाचा , एतं मंगल मुत्तमं
माता- पितु उपट्ठान , पुत्तदारस्स सङ्गहो
अनाकुलाच कम्मन्ता, एतं मंगल मुत्तमं
दानंच धम्म चरिया च , नातकानञ्च सङ्गहो
अनवज्जानि कम्मानि , एतं मङ्गल मुत्तम
आरति विरति पापा , मज्जपाना च संयमो
अप्पमादो च धम्मेसु , एतं मङ्गल मुत्तमं
गारवो च निवातो च, सन्तुट्ठी च कतुञ्ञता
कालेन धम्मसवनं , एतं मंगल मुत्तम
खंती च सोवचस्सता , समणानञ्च दस्सनं
कालेन धम्म साकच्छा , एतं मङ्गल मुत्तमं
तपो च ब्रह्म चरियञ्च , अरिय सच्चान दस्सनं
निब्बान सच्छि किरिया च, एतं मङ्गल मुत्तमं
फुट्ठस्स लोक धम्मेहि , चित्तं यस्स न कम्पति
असोकं विरजं खमं , एतं मंगल मुत्तमं
एतादिसानी कत्वान , सब्बथम पराजिता
सब्बथ सोत्थी गच्छन्ति तं , एतं मंगल मुत्तमं
----------------------------------------
असेवना च बालानं , पंडितानञ्च सेवना
पूजा च पूजनीयानं , एतं मङ्गल मुत्तमं।
पतिरूप देस वासो च, पुब्बे च कत पुञ्ञता
अत्त सम्मा पणिधि च , एतं मङ्गल मुत्तमं
पतिरूप देस वासो च, पुब्बे च कत पुञ्ञता
अत्त सम्मा पणिधि च , एतं मङ्गल मुत्तमं
बाहु सच्चं च सिप्पंच च, विनयो च सुसिक्खितो
माता- पितु उपट्ठान , पुत्तदारस्स सङ्गहो
अनाकुलाच कम्मन्ता, एतं मंगल मुत्तमं
दानंच धम्म चरिया च , नातकानञ्च सङ्गहो
आरति विरति पापा , मज्जपाना च संयमो
अप्पमादो च धम्मेसु , एतं मङ्गल मुत्तमं
गारवो च निवातो च, सन्तुट्ठी च कतुञ्ञता
कालेन धम्मसवनं , एतं मंगल मुत्तम
खंती च सोवचस्सता , समणानञ्च दस्सनं
कालेन धम्म साकच्छा , एतं मङ्गल मुत्तमं
निब्बान सच्छि किरिया च, एतं मङ्गल मुत्तमं
फुट्ठस्स लोक धम्मेहि , चित्तं यस्स न कम्पति
असोकं विरजं खमं , एतं मंगल मुत्तमं
एतादिसानी कत्वान , सब्बथम पराजिता
सब्बथ सोत्थी गच्छन्ति तं , एतं मंगल मुत्तमं
modem Buddhism and its followers
How Vajrayana arose from Mahayana is clearly indicated in the works of Vajrayana literature. The human soul bent upon the attainment of the highest knowledge progresses from the lower region of earth to the higher, till all flesh disappears and it rises above the world of the Kama to the world of rupa or form. The mind bent upon Bodhi passes on through a variety of forms till it reaches the highest of the rupa heavens, still Bodhi is not attained. It goes higher and higher to the region where form doesn't exist. This is called the Arupaloka or the formless world. In its progress higher and higher in this formless world it rises to the top and vanishes in the infinite void. That's the idea of Nirvana of the mahayanists, but the vajrayanists at this stage mystically conceives the existences of Niratma Devi at the top of the formless (Arupa) heaven. She seems to all intents and purposes a metaphor for the infinite void. From the top of the formless world The mind bent on the Bodhi leapes into the embrace of Niratma Devi and enjoys something like the pleasures of the senses, and disappears in her, as Salt disappears in water. Thus Vajrayana is a curious mixture of mysticism, philosophy and sensuality. The sensual part of this doctrine made it exceedingly attractive and soon superseded the dry mantrayana and the difficult Mahayana.
गुण धर्म स्वभाव
त्या महापुरूषाने (भगवान बुद्धाने) मात्र कल्याणकारी आणि हिताचेच शब्द सांगितले. अंतर्मुखी होऊन विश्लेषण करता करता अतिसूक्ष्म कलाप (परमाणु) पर्यंत संवेदना अनुभवली तेव्हा त्याला आपल्या गुण, धर्म, आणि स्वभावासकट चार महाभूताचे दर्शन घडले, ते म्हणजे पृथ्वी, जल, अग्नि आणि वायु होय. पृथ्वी धातू म्हणजे मातीचा कण असेल असे मानू नका. जल म्हटले म्हणून पाण्याचा बिंदू शोधू नका. याप्रमाणेच अग्नि धातू म्हणजे स्फुल्लिंग समजू नका. वायु म्हणजे केवळ हवेची लहर नव्हे. या महाभूताचे नैसर्गिक गुणधर्म, स्वभाव काय आहेत ते पहायचे आहे. पृथ्वी धातू आकाश व्यापतो, आकाशाला घेरुन टाकतो व आकाशाकडून घेरला जातो. याचा अनुभव कसा घ्यायचा? जड आहे, हलकेपण आहे. हलक्यात हलके ते जडात जड असे जे वजनाचे सारे क्षेत्र पृथ्वी धातूचा अनुभव करण्याचे क्षेत्र आहे. तसेच अतिथंड ते अतिउष्ण असे तापमाणाचे संपूर्ण क्षेत्र अग्निधातूचे क्षेत्र आहे. याचप्रमाणे हालचालीचे संपूर्ण क्षेत्र वायुधातूचे क्षेत्र आहे आणि बांधणे, संयोजित करणे, संश्लिष्ट करणे हे जलधातूचे क्षेत्र आहे.
जेव्हा पृथ्वी धातूचे प्राबल्य वाढते तेव्हा कधी जड, तर कधी हलके-हलके वाटू लागते. जेव्हा वायू धातू प्रबल होतो तेव्हा चलन वलन, तरंग, धडधड वाढल्याचा अनुभव येतो. प्रत्येक धातू आपापल्या गुण, धर्म, स्वभावानुसार शरीरांत ती ती अवस्था निर्माण करत असतो. आपल्या देहातील परमाणु समूहात या चारही महाभूतांचे गुणधर्म सामावली आहेत. या चार महाभूतांपैकी एखादे अधिक समर्थ बनते तेव्हा ते आपल्या गुणाचा प्रभाव दाखविते आणि आपल्याला संवेदनांच्या रुपात त्याचा अनुभव मिळतो. अन्य धातू सुप्तावस्थेत असतात. कधी-कधी असे देखील घडते की दोन धातू एकदम प्रबळ होतात तेव्हा दोन्ही गुण, धर्म, स्वभावाचा अनुभव होतो. पण असे कधी घडत नाही की चारही धातू एकाच वेळी प्रबळ बनून अंमल गाजवितात.
बाह्य जगात आपण बर्फ पाहतो, तेव्हा त्याला पृथ्वी-धातू मानतो. बर्फ वितळला, तरल झाला, पाणी होऊन वाहू लागले की ते जल-धातू मानतो. वाफ होऊन, हवेत तरंगू लागली की वायु-धातू प्रकट होतो, आणि या तीनही अवस्थामध्ये त्यात जे तापमान असते त्याला अग्नि-धातू म्हणतो.
याप्रमाणे आपल्या अंतरंगात आपल्याला धातूंची अनुभूती येत असते. त्याकडे तटस्थतेने, साक्षीभावाने, अलिप्तपणे पहायचे असते. हे शरीरातील रसायन आहे, त्यामुळे शरीरात कधी या प्रकारे कलाप (परमाणु) तर कधी त्या प्रकारचे कलाप आपापल्या गुण, धर्म, स्वभावासह उत्पन्न होतात, नष्ट होतात. निसर्गाचा हा नियम, हा प्रपंच समजावून घ्यायला हवा. भोक्ताभाव ठेवला तर राग (लोभ) आणि द्वेषाचे नवीन संस्कार, प्रतिक्रिया बनतील. अज्ञानामुळे भोगवादाची व आत्मवादाची प्रवृत्ती निर्माण होत असते. भोगवादी किंवा आत्मवादी बनतो तेव्हाच बंधनात अडकून बसतो. ज्ञान झाले, जागृती आली, बोधी निर्माण झाली की मुक्तिचा मार्ग मोकळा होतो.
आपण आता हे देखील समजून घेऊ या की भिन्न-भिन्न परमाणु प्रबळ का बनतात? त्याचे कारण काय? कारणावाचून कार्य होत नाही हा जगाचा नियम आहे. याची चार प्रमुख, महत्त्वाची कारणे आहेत. एक महत्त्वाचे कारण असे आहे की या परमाणुपुंजाला म्हणजेच आपल्या शरीराला आपण भौतिक आहार देतो ते भोजन ज्या प्रकारचे देतो त्याच प्रकारचे परमाणु बनतात. एखाद्या दिवशी तिखटमिठाचे मसालेदार भोजन केले तर शरीरात उष्णता वाढल्याचे जाणवते. जळजळू लागते. याला म्हणतात अग्नि धातूचा प्रभाव. एखाद्या दिवशी शिळेपाके खाल्ले किंवा तळलेले पचायला जड असे अन्न खाल्ले तर जडपणा वाटतो. ही झाली पृथ्वी-धातू प्रबळ बनण्याची किमया. एखाद्या दिवशी आपण चांगला चौरस आहार घेतला तर शरीराचा कणन कण उल्लासित होतो. सारे शरीर सक्षम राहते. कार्यप्रवण होते. जर भोजन अव्यवस्थित झाले तर त्याचा परिणाम शरीर स्वास्थ्यावर होतो. स्वास्थ्य बिघडते. जसा आहार, भोजन त्याप्रकारे परमाणुंची निर्मिती होते. अशा प्रकारे आहार हे एक महत्त्वाचे कारण आहे.
शरीरातील परमाणु निर्मितीचे आणखीही एक असेच महत्त्वाचे कारण आहे. भोजनाव्यतिरिक्त आपण आपल्या शरीराच्या प्रत्येक कणाकणाद्वारे निरंतर आहार घेत असतो. हा आहार आपल्याला बाहेरच्या वातावरणातून मिळत असतो. जसे बाहेरचे वातावरण असते, जसे हवामान असते तसाच आहार मिळत असतो व त्याप्रमाणे शरीरात परमाणु निर्माण होत असतात. अशा प्रकारे आपल्या शरीराला दोन प्रकारचे आहार मिळताहेत. ही शरीर-धारा म्हणजे रुप-धारा, हिच्याबरोबर चित्त-धारा किंवा जिला नाम-धारा म्हणतात, ती पण चालू असते. ही चित्त-धारा म्हणजे चेतनेचा विच्छिन्न प्रवाह सुध्दा आहारावाचून पुढे वाहत नाही. या चैतन्य प्रवाहालाहि चेतनेचाच आहार मिळतो. चेतनेचा हा आहार कोणता? ज्या क्षणी आपण जो संस्कार बनवतो, चित्तधारेचा त्या क्षणाचा तोच आहार असतो, तेच भोजन असते. अनुभूतीच्या पातळीवरुन हा सारा खेळ, ही सारी किमया पहायची. संताप आला, क्रोधाग्नि भडकला की पुढच्या क्षणाचे चित्त त्याच क्रोधाचे अपत्य असणार. दुसर्या क्षणी पुन्हा क्रोधाची प्रतिक्रिया -- संस्कार उमटणार. या क्रोधाच्या आहारावर ही चित्त-धारा पुढे सरकत राहते. एखादी वासना प्रबळ झाली तर त्या वासनेच्या आधाराने चैतन्यप्रवाह पुढे वाहत राहतो. प्रत्येक क्षणाला हे घडत असते. चित्तधारेला गतिमान होण्यासाठी प्रत्येक क्षणाला संस्काराचा आहार हवा, भोजन हवे. जर नवीन संस्कार मिळाला नाही तर जुन्या संस्कारांचे भांडार आहे त्यातून आहार मिळतो. जुने संस्कार उफाळून वर येतात. जी जुनी बीजे आहेत त्यांचे कर्मफळ फळाला येते. ते फळ चैतन्याचा आहार बनते, प्रवाह पुढे वाहू लागतो. जेव्हा फळ उफाळून वर येते, त्यात एक प्रकारची संवेदना निर्माण होते. तिला आम्ही प्रिय मानले तर रागाचा (लोभाचा) नवा संस्कार बनविला. अप्रिय मानले तर द्वेषाचा नवा संस्कार बनविला. जुन्या कर्मबीजाचे फळ तयार होऊन वर येते न येते तोच नवीन बीज पेरायला लागलो. याप्रमाणे क्षणाक्षणाला नवीन संस्कार बनवतच असतो. 'सङ्कार पच्चया विञ्ञाणं' या क्षणाच्या संस्कारातूनच दुसर्या क्षणाचे दुसरे विज्ञान, म्हणजे चित्त उत्पन्न होत असते. या क्षणाचे काही संस्कार नसले तर कोणत्या तरी पूर्व-संस्काराचे फळ उफाळून वर येते, तसे नवे विज्ञान म्हणजे नवे चित्त निर्माण होते. ज्या प्रकारचे नवे संस्कार आपण निर्माण करु किंवा जशी जुन्या कर्माची फळे मिळू लागतात तसेच परमाणु निर्माण होतील आणि तशीच संवेदना होऊ लागेल.
मनाचा आणि शरीराचा दृढ संबंध आहे. हे जे कलाप (परमाणु) आहेत ते मन आणि शरीर दोहोंमुळे निर्माण होतात. जर मनात संताप जागा झाला तर लगेच शरीरात अग्नितत्व प्रबळ बनते. ज्वलन क्रिया, उष्णता वाढते. भयाची भावना निर्माण झाली तर शरीराला कंप सुटतो. वायुतत्व प्रधान परमाणु निर्माण होतात. चित्तावर जसे संस्कार टाकाल तसेच परमाणु उत्पन्न होतील. क्रोधाचा जुना संस्कार जरी प्रबळ झाला तरी ज्वलन क्रिया प्रज्वलित होते. संतापाची लाट निर्माण होते. सभोवतालच्या वातावरणांत गारवा असला तरी शरीर गरम होते, उष्णता जाणवते.
अशा प्रकारे शरीरात जे परमाणु उत्पन्न होत राहतात ते आहारामुळे असोत, बाह्य वातावरणामुळे असोत किंवा जुन्या संस्कारामुळे असोत या संवेदनांकडे आपण जर अनासक्त भावाने, अलिप्तपणे पाहू लागलो तर नवीन संस्कार निर्माण होणार नाहीत; जुने क्षीण होतील, कमी होतील. अशा प्रकारे गुंता सोडविण्याची युक्ति मिळाली. मार्ग सापडला. अजूनपर्यंत अज्ञानामुळे जे संस्कार निर्माण होत होत त्यांचे रहस्य लक्षात येऊ लागेल. 'अविज्जा पच्चया सङ्कारा' एखादा परमाणु उठला त्याने आपला नैसर्गिक स्वभाव प्रकट केला. संवेदना निर्माण झाली. दु:खदायक संवेदना निर्माण झाली तर प्रतिक्रिया होईल --- नको, नको, नको. द्वेषच द्वेष निर्मिती. सुखद संवेदना निर्माण झाली --- हवी हवीशी वाटली की रागच राग (लोभच लोभ) याप्रमाणे प्रत्येक क्षणाला संस्कार निर्माण होत राहतात.
तुमच्या लक्षात रहस्य आले तर मग कोणतीच प्रतिक्रिया होता कामा नये. धैर्याने, समतेने, साक्षीभावाने, संवेदनेचा स्वभाव पहाल तर नवीन संस्कार निर्माणच होणार नाहीत व जुने संस्कार कमी होत जातील. 'खीणं पुराणं, नवं नत्थि सम्भवं' बस मुद्याची गोष्ट लक्षात आली. बंधनापासून मुक्त होण्याची पध्दत मिळाली. पण बंधनमुक्त होण्याचे हे काम तुम्हाला स्वत:लाच करावे लागेल. जर तुम्ही स्वत: अनुभूतीच्या कसोटीवर घासूनच पाहिले नाही की केव्हा राग (लोभ) निर्माण झाला, आणि केव्हा द्वेष जागला तर राग आणि द्वेषापासून मुक्तता कशी होणार? जेव्हा जेव्हा संवेदना अनुभवाल, ती सुखद असो वा दुखद तिच्याकडे साक्षीभावानेच पाहिलेत तर राग किंवा द्वेष निर्माण होणार नाही. प्रज्ञाच जागृत होईल. 'वेदना पच्चया पञ्ञा' अशा रीतीने प्रज्ञेमध्ये पुष्ट होत होत तुम्ही स्थितप्रज्ञ बनाल. जीवनमुक्त व्हाल. केवळ 'स्थितप्रज्ञा' ची लक्षणे पाठ करुन माणूस स्थितप्रज्ञ होत नाही. स्वत: श्रध्दापूर्वक परिश्रम केले तरच हे होईल. या मार्गात अनंत अडचणी आहेत व येतील; पण त्या अडचणी दूर करुन साधना केली पाहिजे. काही तरी चमत्कार होऊन हे घडणार नाही.
हा अज्ञानी, मूढ, बुध्दि-विलासी स्वभाव कसा बनला? सतत एकाच प्रकारचा व्यवहार करीत राहिल्यामुळे माणसाचा स्वभाव बनत जातो. लोभ करण्याचा स्वभाव, द्वेष करण्याचा स्वभाव. हे स्वभाव बदलायचे म्हणजे थोडासा कालावधी लागणारच. पण स्वभाव बदलता येऊ शकतो एवढी जाणीव झाली, म्हणजे फार मोलाची गोष्ट साध्य झाली. यापुढे मग आपला स्वभाव बदलण्याचा आपण अभ्यास करायचा आहे आणि तेच करीत आहोत. एखादी घटना घडल्यानंतर जर आपण समतादृष्टीने पाहू लागलो तर आपण आंधळा राग, आंधळा द्वेष करणार नाही. समतेत राहिलो तर क्रिया होईल, प्रतिक्रिया नाही. क्रिया नेहमी रचनात्मक, विधायकच असते म्हणून ती कल्याणकारी, मंगलमय, पवित्र असते.
बुध्द को भगवान क्यों कहते हैं
बहुत-से लोग पूछते हैं कि गौतम बुद्ध को भगवान बुद्ध क्यों कहा जाता है?
कुछ लोग उन्हें महात्मा बुद्ध कहते हैं। उनका प्रश्न होता है कि गौतम बुद्ध तो भगवान (ईश्वर) को मानते ही नहीं थे तो फिर उनके नाम के आगे भगवान क्यों लिखा जाता है? इस प्रश्न का निराकरण आवश्यक है।
___ “आज की बोलचाल की भाषा में भगवान का अर्थ होता है-ईश्वर या परमात्मा, इस सृष्टि का निर्माण करने वाला, इसका पालन करने वाला और इसका संहार करने वाला। ईश्वर यानी वह जो संसार का मालिक है, जिसकी पूजा करने से, जिसका भजन गाने से, जिसका नाम जपने से, जिसका ध्यान करने से वह प्रसन्न हो जाता है और भक्तों के पापों को क्षमा कर, उन्हें भवसागर से तार देने का दावा करता है। यदि बुद्ध के लिए प्रयुक्त भगवान शब्द को ऐसे किसी अर्थ में मान लिया गया, तो गलत होगा। बुद्ध और उनकी शिक्षा का अवमूल्यन हो जाएगा, क्योंकि उनकी शिक्षा को भली भांति समझकर ही कहा गया है।
न हेत्थ देवो ब्रह्मा वा, संसारस्सत्थिकारको :
सुद्धधम्मा पवत्तन्ति, हेतुसम्भारपच्चया ।।
(विसुद्धि 2/689. पच्चयपरिगहकथा)
(संसार का निर्माण करने वाला न कोई देव है न ब्रह्मा। हेतु-प्रत्यय यानी कारणों पर आधारित मात्र शुद्ध धर्म प्रवर्तित हो रहे हैं।)
संसार चक्र को इस स्पष्टता से समझने और समझाने वाले महापुरुष को हम संसार का निर्माता ईश्वर मान लेंगे तो वास्तविक 'भगवान' शब्द को दूषित कर लेंगे। परवर्ती पौराणिक काल में भगवान को इस अर्थ में माना जाने लगा कि वह किसी देवलोक का ऐसा समर्थ देवता है जो कि समय-समय पर इस पृथ्वी पर इस या उस रूप में अवतरित होता है यानी जन्म लेता है और साधु-सज्जनों का परित्राण तथा दुष्ट-दुर्जनों का विनाश करता है और जो उसकी शरण ग्रहण कर ले, उसे सारे पापों से मुक्त कर देने का दावा करता है। बुद्ध को ऐसा ईश्वरावतार मान लेना, उनके प्रति तथा उनकी शिक्षा के प्रति नितांत अज्ञानता का प्रदर्शन होगा...
भव-भ्रमण (जन्म-मरन) से स्वयं नितांत विमुक्त हुए तथा भव-भ्रमण में पड़े हुए अन्य लोगों को नितांत भव-विमुक्त हो सकने की शिक्षा देने वाले बुद्ध की सायुज्जता, सारूप्यता और तादात्म्यता बार-बार जन्म लेने वाले भव-भ्रमण में पड़े हुए किसी ईश्वर नामधारी देवता से की जाए तो यह बुद्ध और उनकी शिक्षा के प्रति नितांत अज्ञानता ही मानी जाएगी। और फिर ऐसा ईश्वर जिसकी शरण ग्रहण कर लेने मात्र से वह अपने भक्त को सारे पापों से मुक्त कर देने का दावा करे, ऐसी मान्यता बुद्ध की शिक्षा के विपरीत है। वे तो डंके की चोट पर कहते हैं कि :
'तुम्हेहि किच्चमातप्पं, अक्खातारो तथागता।'
(धम्मपद 276, मग्गवग्ग)
(अर्थ-मैं तो मार्ग आख्यात करता हूं, तुम्हारी मुक्ति के लिए तपना तो तुम्हें ही पड़ेगा।)
ऐसे मार्ग-आख्याता तथागत को तारक-ब्रह्म के अर्थ वाला भगवान मान लें, तो 'भगवान' शब्द के अर्थ का अनर्थ हो जाएगा। इसलिए समझें-किस अर्थ में भगवान? :
'भगवाति, गारवाधिवचनं'-भगवान शब्द गौरव व गरिमा का पर्यायवाची है। गौरव, गरिमायुक्त होने के कारण गौतम बुद्ध 'भगवान' कहलाए।
'भग्गरागोति भगवा'-राग भग्न कर लिया, इस माने में भगवान।
'भग्गदोसोति भगवा'-द्वेष भग्न कर लिया, इस माने में भगवान।
वीतराग और वीतद्वेष तो आठों ध्यान समापत्तियों से संपन्न व्यक्ति भी हो सकता है, जो कि मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा के ब्रह्मविहार का जीवन जीता है। लेकिन इससे अधिक महत्त्वपूर्ण है-वीतमोह होना, क्योंकि वीतराग, वीतद्वेष होते हुए भी किसी काल्पनिक मिथ्या मान्यता में उलझा हुआ, आत्मभाव में लिपटा हुआ, मोहग्रस्त व्यक्ति भवमुक्त नहीं होता। अतः मोह का नष्ट होना नितांत अनिवार्य है। इसलिए कहा:
'भग्गमोहोति भगवा'-मोह भग्न कर लिया, इस माने में भगवान।
'भग्गमानोति भगवा'-अभिमान नष्ट कर लिया, इस माने में भगवान।
'भग्गदिट्ठीति भगवा'-दार्शनिक मान्यताओं को भग्न कर लिया, इस माने में भगवान।
'भग्गकण्डकोति भगवा'-कंटक भग्न कर लिया, इस माने में भगवान।
'भग्गकिलेसोति भगवा'-क्लेश, काषाय भग्न कर लिये, इस माने में भगवान।
'भजि विभजि पविभजि धम्मरतनन्ति भगवा'-'भजि' यानी जिसने धर्म रत्न का भजन किया, यानी सेवन किया, इस माने में भगवान।
आज की हिन्दी में 'भजन' शब्द का अर्थ बदल गया। आज यह कीर्तन का पर्यायवाची बन गया है। उन दिनों की जनभाषा में इसका अर्थ सेवन करना अर्थात संगति करना था। 'भजि' विभाजन करने के अर्थ में भी प्रयुक्त होता था। इस माने में भी कहा गया: भजि, विभजि, पविभजि यानी जिसने एक शोधकर्ता वैज्ञानिक की भांति धर्मरत्न का विभाजन किया, भली प्रकार विभाजन किया, विभक्त किया, विघटन किया और यों विश्लेषण कर-करके उसे भली प्रकार जान लिया, इस माने में भगवान।
'भवानं अन्तकरोति भगवा'-अपने भव-संस्कारों का अंत कर निर्वाण तक पहुंचे, इस माने में भगवान।
_ 'भावितकायो भावितसीलो भावितचित्तो भावितपोति भगवा'-काया, शील, समाधि और प्रज्ञा की साधना भावित कर ली, इस माने में भगवान।
'भागी वा भगवा चतुनं झानानं चतुनं अप्पमज्ञानं चतुनं अरूपसमापत्तीनन्ति भगवा'-चार सामान्य ध्यान, चार अप्रामाण्य (ब्रह्मविहार) ध्यान, चार अरूप ध्यान
समापत्तियों के ऐश्वर्य के भागीदार है, इस माने में भगवाना।
'भागी वा भगवा चतुन्नं सतिपट्ठानानं चतुन्नं सम्मप्पधानानं चतुन्नं इखिपादानं पञ्चनं इन्द्रियानं पञ्छनं बलानं सत्तन्नं बोज्झङ्गानं अरियस्स अट्ठनिकस्स मग्गस्साति भगवा'-चार स्मृति-प्रस्थान, चार सम्यक प्रधान, चार ऋषिपाद, पांच इंद्रिय, पांच बल, सात बोध्यंग और आठ अंग वाला आर्य मार्ग-यों इन संतीस बोधिपक्षीय धर्मो के ऐश्वर्य के भागीदार हैं, इस माने में भगवान।
'भागी वा भगवा दसन्नं तथागतबलानं चतुन्नं वेसारज्जानं चतुम्नं पटिसम्भिदानं छत्रं अभिज्ञानं एवं बुद्धधम्मानन्ति भगवा', (महानि। 149, महावियूहसुत्तनिदेश)-दस तथागत बल, चार वेशारध, चार प्रतिसंभिदा, छ: अभिज्ञान और छ: बुद्ध धर्म, यानी बुद्ध-गुणों के ऐश्वर्य के भागीदार हैं, इस माने में भगवान।
इन-इन विशेषताओं के अर्थ में बुद्ध को भगवान कहा जाता है, न कि ईश्वर या परमात्मा के अर्थ में।
.... 'विमोक्खन्तिकमेतं बुद्धानं भगवन्तानं बोधिया मूले सह सब तआणस्स पटिलाभा सच्छिका पञ्अत्ति यदिदं भगवा' (महानि। 149, महावियूहसुत्तनिदेश)-वोधि वृक्ष के वर्तमान तथा भूत-भविष्य को जाननेवाले हैं, यथावादी तथाकारी, जैसा कहते हैं वैसा करते हैं और जैसा करते है वैसा ही कहते हैं, ऐसे आचरण वाल है, आदमी को लोभ, द्वेष और मोह से छुड़ाने वाले अप्रतिम सारथी हैं, देवता तथा मनुष्यों के शास्ता है, गुरु है, उपदेशक हैं, ऐसे मनुष्यों में अनुपम श्रेष्ठतम भगवान बुद्ध है।)
___ संक्षेप में कहें तो, 'भग्ग रागो, भग्ग द्वेषो, भग्ग मोहोति भगवा' अर्थात् जिसने अपने चित्त को राग-द्वेष और मोह से पूरी तरह मुक्त कर लिया, वह भगवान हो गया।
भगवान वह जिसने भगवत्ता प्राप्त कर ली। यह एक उपलब्धि है जिसे दस पारमिताएं पूरी करके आर्य आष्टांगिक मार्ग पर चलकर, सम्यक् संबोधि प्राप्त कर हासिल किया जा सकता है। इसका अवतारवाद से कुछ लेना-देना नहीं है। बुद्ध ने स्वयं कहा था कि प्रत्येक इंसान के भीतर संबोधि का बीज मौजूद है और प्रत्येक इंसान में बुद्ध होने की संभावना होती है। इसलिए बुद्धत्व एक उपलब्धि है जिसे स्वयं हासिल करना पड़ता है। इसमें किसी की कृपा और अनुकम्पा के लिए कोई स्थान नहीं है।
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