Tuesday, November 19, 2019

पंचशील

पंचशील :

सन्त कबीर ने शील के महात्म्य को बतलाते हुए बौध्दधर्म के पंचशील का भी उपदेश दिया हैं. बौध्दधर्म में पंचशील का बहुत बड़ा महत्व है. बौध्द उसे ही कहते हैं, जो पंचशील का पालन करे. प्रारम्भ में किसी भी व्यक्ति को बौध्दधर्म ग्रहण करते समय त्रिशरण सहित पंचशील ग्रहण करना पड़ता हैं. 'पंचशील' सदा परिपालनीय पाँच तत्वों का नाम हैं, जिन्हें सभी गृहस्थ पालन करने का सदा प्रयत्न करते हैं. पंचशील ये हैं ----
1) जीवहिंसा न करना (पानातिपाता....)
2) चोरी न करना (अदिन्नादाना...)
3) काम-भोगो में मिथ्याचार न करना (कामेसु मिच्छाचारा...)
4) असत्य भाषण न करना (मुसावादा....)
5) मादक-द्रव्यों का सेवन न करना (सुरामेरयमज्ज...)

सन्त कबीर ने भी इन आदर्श तत्वों का पालन करने का उपदेश दिया हैं ----

1) जीवहिंसा न करना

साधो! पाडे निपुन कसाई।
बकरी मारि भेडी को धाये, दिल में दरद न आई।।
आतम मारि पलक में बिनसे, रुधिर की नदी बहाई।
गाय बधै सो तुरक कहावै, यह क्या इनसे छोटे।।
(कबीर, पृष्ठ 318)

जीवहि मारि जीव प्रतिपारै, देखत जनम आपनौ हारै।
(कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ 240)

मुरगी मुल्ला से कहै, जीबह करत हैं मोहिं।
साहिब लेखा मागसी, संकट परिहै तौहि।।
कहता हौ कहि जात हौ, कहा जो मान हमार।
जाका गर तुम काटिहौ, सो फिर काटि तुम्हार।।
हिन्दु के दया नाहि, मिहर तुरुक के नाहिं।
कहै कबीर दोनों गये, लख चौरासी माहिं।।
(सन्तबानी संग्रह, भाग 1, पृष्ठ 61)

हिन्दु की दया मेहर तुरकन की दोनों घर से भागी।
वह करै जिबह वोँ झटका मारै आग दोऊ घर लागी।।
(कबीर, पृष्ठ 327)

2) चोरी न करना

जूआ चोरी मुखबिरी, ब्याज धूस पर नार।
जो चाहै दीदार को, एती वस्तु निवार।।
(सन्तबानी संग्रह, भाग 1, पृष्ठ 64)

3) काम-भोगो में मिथ्याचार न करना

पर नारी राता फिरै, चोरी बिढ़ता खाहिं।
दिवस चारि सरसा रहै, अन्ति समूला जाहिं।।
पर नारी कै राचणै, औगुण हैं गुण नाहिं।
खार समंद मैं मंछला, केता वहि बहि जाहिं।।
पर नारी को राचणौ, जिसी ल्हसण की खानि।
खूणै बैसि रखाइए, परगट होइ दिवानि।।
(कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ 39)

पर नारी पैनी छूरी, मति कोइ लावो अंग।
रावन के दस सिर गए, पर नारी के संग।।
(सन्तबानी संग्रह, भाग 1, पृष्ठ 58)

4) असत्य भाषण न करना

साच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।
जाके हिरदे साच है, ता हिरदे गुरु आप।।
(सन्तबानी संग्रह, भाग 1, पृष्ठ 49)

5) मादक-द्रव्यों का सेवन न करना

औगुन कहौ सराब का, ज्ञानवंत सुनि लिये।
मानुष से पसूआ करै, द्रव्य गाँठि को देय।।
अमल अहारी आतमा, कबहु न पावै पारि।
कहै कबीर पुकारि कै, त्यागौ ताहि विचारि।।
(सन्तबानी संग्रह, भाग 1, पृष्ठ 61)

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