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Sunday, October 13, 2019

पूर्व-कालीन सन्त

सन्त जयदेव:

हम देखते हैं की भक्ति साधना के वैष्णव सम्प्रदाय ने भी जयदेव के समय तक भगवान बुध्द को अवतार मान लिया था और वैष्णव सन्तो के भी बुध्द 'हरि' बन गये थे. इसीलिए सन्त जयदेव ने अपने 'गीतगोविन्द' में बड़े ही प्रेम से बुध्द-स्तुति की हैं -- 'हे केशव, अपने जिन यज्ञों में पशूहिंसा हैं, उनकी निन्दा की, अत: हे बुध्द-रुपधारीन् , जगदीश, अपकी जय हो."

(निन्दसि यज्ञविधेरहहश्रुतिजातम। सदयह्रदय-दर्शित पशू-धातम् । केशव धृतबुध्दशरीर जय जगदीश हरे। (गीतगोविन्द, प्रथम सर्ग, श्लोक ९)

इससे ज्ञात होता हैं की जयदेव 'हरि' के रुप में बुध्द को मानते थे. गीतगोविन्द में इसके अतिरिक्त 'तन्त्र' शब्द भी आया हैं. (जितमनसिजतंत्रविचारम्- गीतगोविन्द, द्वितीय सर्ग: श्लोक ५), जो वज्रायन के तंत्र-मंत्र का स्मरण दिलाता हैं. कुछ विद्वानों का मत हैं की इस ग्रन्थ में निर्गुण पंथियों के अनुसार जयदेव ने अन्योक्ति के रुप में ज्ञान कहा हैं और भाव यह हैं की गोपियाँ पाँच इन्द्रियां हैं और राधा दिव्य ज्ञान. गोपियों को छोड़कर कृष्ण का राधा से प्रेम करना यही जीव की मुक्ति हैं. (हिन्दी काव्य में निर्गुण सम्प्रदाय, पृष्ठ ३३) यह व्याख्या यथार्थ हैं, क्योंकि प्रत्येक सर्ग के अन्त में 'हरि' को कल्याण के रुप में स्मरण किया गया हैं और जयदेव के लिए हरि का जप प्रधान था. योग, यज्ञ, दान, तप आदि भक्त के लिए व्यर्थ हैं, इसीलिए कबीर ने जयदेव को केवल भक्त कहा हैं, ज्ञानी नहीं. आदिग्रन्थ में जयदेव के जो दो पद संकलित हैं उनसे भी यही बात सिध्द होति हैं की हरि-स्मरण सच्चे मन से करना ही भक्त का कर्तव्य हैं, उसे कर्मकांड, तप आदि के प्रपंचों से क्या तात्पर्य? यह भक्ति भी मन, वचन और कर्म से ही सर्वांश रुप से पूर्ण हो जाति हैं--- हरिभगत निज निहकेवला, रिद करमणा वचसा। जोगेन कीं जगेन किं, दानेन कीं तपसा।। (सन्तकाव्य पृष्ठ १३५)

भगवान बुध्द ने यज्ञ, हवन, तप आदि को महागुणकारी नहीं कहा हैं, इनसे निर्वाण का साक्षात्कार नहीं हो सकता, निर्वाण के साक्षात्कार के लिए चित्त-शुध्दी परम आवश्यक हैं और उसे मध्यम मार्ग पर चलकर ही प्राप्त किया जा सकता हैं. यही बात सिध्दों और नाथों ने भी कही हैं. सिध्द दारिकपा कहते हैं -- किन्तो मन्तो किन्तो तन्तो किन्तो झाण बखाणे। (चर्यापद, ३४)

सिध्द कण्हपा ने भी यही बात कही हैं --
ऐसो जप होमे मण्डल कम्मे, अणुदीन अच्छसि काहिउ धम्मे। (दोहाकोष, पृष्ठ २९)

सिध्द तिलोपा का भी कथन हैं की तीर्थ और तप व्यर्थ हैं, इनसे शरीर पापो से शुध्द नहीं होता और न तो देव-पूजा से ही शुध्दता प्राप्त होति हैं, शान्त मन से बुध्द की आराधना करो--

तित्थ तपोवण ण करहु सेवा, देह सुचीहि ण सन्ति पावा। ब्रह्मा विह्णू महेसुर देवा, बोहिसत्व मा करहु सेवा। देव ण पूजहु तित्थ ण जावा देवपूजाही मोक्ख ण पावा। बुध्द अराहहु अविकल चित्ते, भव निब्बाणे म करहु थित्तें। (हिन्दी काव्यधारा, पृष्ठ १७४)

यही बुध्द जयदेव के 'हरि' बन गये हैं, जो स्वयं बुध्दशरीर ही हैं. यज्ञ, तप आदि को छोड़कर सिध्दी-पद स्वरुप, सर्वत्र व्याप्त हरि की आराधना ही अपेक्ष्य हैं. हम कह आये हैं कि बुध्द वज्रयान में निरन्तर विद्यमान, सर्वत्र विराजमान और निरंजन स्वरुप हो गये थे. (हँउ जग हँउ बुध्द हँउ णिरंजण--सिध्द तिलोपा, दोहाकोष १६)

सन्त जयदेव ने सिध्दों एवं नाथो के हठयोग को नहीं छोड़ा, उन्होने योग को तो बुरा कहा, किन्तु हठयोग को नहीं. हठ़योग कि साधना में नाद से ही निर्वाण को प्राप्त किया जा सकता हैं और जब नाद की प्राप्ति होती हैं तभी ब्रह्म-निर्वाण में लवलीन होने की अवस्था होती हैं ---
चंदसत भेदिआ, नादसत पुरिआ,
सूरसद षोडसादतु कीआ,
ब्रह्मु निरबाणु लिवलिणु पाइआ।
(सन्तकाव्य, पृष्ठ १३६)

सिध्द गोरखनाथ ने भी यही बात कही हैं ----

नाद ही ते आछे बाबू सब कछू निधाणा।
नाद ही ते पाइये परम निरवाणा।
(गोरखबाणी, पृष्ठ ६६)

इस प्रकार सन्त जयदेव पर बौध्द प्रभाव स्पष्ट हैं. उनकी वाणी में बुध्द, तंत्र, निर्वाण आदि बौध्दधर्म के शब्द विद्यमान हैं और उनके 'हरि' राम, केशव, गोविन्द आदि-पुरुष हैं, जो अनुपम, सत्य, सिध्दपद तथा ब्रह्म-निर्वाण स्वरुप हैं. ('परमादि पुरुष मनोपिम'--सन्तकाव्य, पृष्ठ १३५), और वे ही बुध्दशरीर भी हैं. उनके अनुस्मरण से ही जल में जल के प्रवेश करने की भाँति निर्वाण का लाभ हो सकता हैं. (सललिकउ सललि समानि आइया-- सन्तकाव्य, पृष्ठ १३६)

ऐतिहासिक दृष्टिकोण से भी यह माना जाता हैं की जयदेव पर सहजयान का प्रभाव पड़ा था, क्योंकि की उनके समय में उड़िसा तथा बंगाल प्रदेशों में सहजयान बौध्दधर्म का प्रभाव बना हुआ था और पुरी के जगन्नाथ बुध्दस्वरुप माने जाते थे. (सुइ बउध्द रुप हइ कलियुगरे थिवु रही... दर्शन तथा साहित्य, पृष्ठ २०४)

हिंदी सन्त साहित्य पर बौध्द धर्म का प्रभाव,
लेखिका - डॉ. विद्यावती मालविका
एम ए पि एच डी, साहित्यरत्न.....

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