इनके अतिरिक्त ई. पू. ३२६ में भारत पर आक्रमण करने वाले सिकन्दर के एक सेनापती निआर्क्स ने भी लिखा हैं की 'यहा के लोग रुई को कूट कर लिखने के लिए कागज बनाते हैं.' मेगस्थनीज ने भी लिखा हैं की 'यहा पर दस-दस स्टडिआ (एक स्टडिआ=६०६ फिट ९ इंच) के अंतर पर पत्थर लगे हैं, जिनसे धर्मशालाओ का तथा दूरी का पता चलता हैं. नववर्ष के दिन भावी फल (पंचांग) सुनाया जाता हैं. जन्मपत्र बनाने के लिए जन्म समय लिखा जाता हैं और न्याय स्मृति के अनूसार होता हैं.' इन दोनो यूनानीयों के वक्तव्य से स्पष्ट है कि ई. सन की चौथी शताब्दी में यहा के लोग कागज बनाना जानते थे. ये बाते लेखन कला के प्राचीनता को प्रकट करती हैं.
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Wednesday, April 29, 2020
लेखनकला
भारत में लिखने के प्रचार की प्राचीनता : भारत में लिखने की प्रथा अति प्राचीन काल से चली आ रही हैं. यहाँ प्रकृति की कृपा से भोज-पत्र और ताड़-पत्र प्राप्त थे. अत: उन पर लिखाई का काम होता था. लेकिन यहॉ की जलवायू ऐसी हैं की भोज-पत्र, ताड़-पत्र और कागज़ पर लिखे ग्रंथ हजारों वर्ष तक नहीं ठहर सकते. फिर भी भोज-पत्र पर लिखा हुआ सब से पुराणा संस्कृत ग्रंथ 'संयुक्तागम' बौध्द सूत्र हैं. वह डॉ. स्टाइन को खेतान प्रदेश के खड़लिक स्थान में मिला था. उसकी लिपि ई. सन की चौथी शताब्दी की मानी जाती हैं. ताड़-पत्रों पर सबसे पुराणा ग्रंथ तुरफान मध्य एशिया में अश्वघोष के तीन नाटको का ब्राह्मी लिपि में लिखित त्रुटित अंश के रुप मे मिला हैं. वह ई. सन की दूसरी शताब्दी के आस-पास लिखा माना जाता हैं. कागज पर लिखे चार संस्कृत के ग्रन्थ मध्य एशिया में यारकन्द नगर से ६० मील दक्षिण में 'कुगिअर' स्थान से श्री वेबर महोदय को प्राप्त हुए जिनका समय डॉ. हर्नलि ने ई. सन की पाँचवी शताब्दी का अनुमान किया गया हैं. प्राचीन शिलालेख मौर्यवंशी राजा अशोक के समय ई. सन की तीसरी शताब्दी के हैं जो पत्थर के विशाल स्तम्भो पर और चट्टानों पर प्राय: सारे भारत-वर्ष में पाये जाते हैं. अशोक के पूर्व के भी दो छोटे शिलालेख अजमेर जिले के बडली गॉव से तथा नेपाल की तराई के पिप्रवा नामक स्थान के एक स्तूप के भीतर से पात्र पर मिले हैं. इसकी लिपि अशोककालिन लिपि से पुराणी हैं और सम्भवतः ई. पू. ४४३ की हैं. इन शिलालेखों से ऐसा मालूम होता हैं कि ई. सन के पूर्व पाँचवी शताब्दी में लिखने का प्रचार इस में साधारण बात थी.
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