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Tuesday, April 28, 2020

इरादे से किये कर्म ही फल देते हैं

कर्म कैसे कार्य करता है?

कर्म का सिद्धांत अत्यन्त गहन है इसलिए इसे समझना आसान नहीं होता। कर्म शब्द का अलग-अलग धर्मों में अलग-अलग अर्थ है और यही कारण है कि इस शब्द के इर्द-गिर्द बहुत सी उलझनें हैं। मैं यहां आपको बताऊगां कि बुद्ध ने कर्म के बारे में क्या कहा है। ‘कर्म” शब्द का अर्थ है कार्य, और यह कारण और प्रभाव का सिद्धांत है। कार्य को सही या गलत अर्थात हितकारी और अहितकारी भागों में बांटा जा सकता है किन्तु इसका निर्णय कौन करेगा? इसका निर्णय किसी बाहरी ताकत से नहीं अपितु आपके कार्य करने के पीछे के अभिप्राय तथा इरादे से किया जाता है। यदि आपका उद्देश्य किसी की हत्या का है और आप उसकी हत्या कर देते हैं तो आपने एक गलत या अहितकारी कार्य किया है। वहीं यदि करूणा के कारण आप किसी की जिंदगी बचाते हैं तो आप एक ठीक कार्य करेंगे। इस प्रकार कारण और प्रभाव का सिद्धांत कार्य करता है। यदि आपके द्वारा किया गया कार्य ठीक है तो उसका परिणाम भी ठीक ही होगा। जब आप ठीक कार्य करते हैं तो आप भविष्य के लिए अच्छे बीज रोपित कर देते हैं और यदि आप गलत कार्य करते हैं तो आप बुरे भविष्य के लिए बीज रोपित कर देते हैं। यहाँ सबसे अच्छी बात यह है कि आपका भविष्य आपके हाथ में है। आपके भविष्य का निर्णय किसी बाहरी ताकत जैसे कि भगवान इत्यादि के हाथ में नहीं है।

“सुखवातिव्युह सूत्र"में बुद्ध ने कहा है कि:- कारण और परिणाम एक ऐसा सिद्धांत है जिससे प्रत्येक व्यक्ति अपने बुरे कर्मों को भोगता है इसी प्रकार अपने अच्छे कर्मों का फल भी उसे अवश्य मिलता है। दया और करूणापूर्ण जीवन निश्चित रूप से अच्छा भाग्य और खुशी लेकर आएगा। जिम्मेवारी स्वयं लेनी चाहिए। बुद्ध के अनुसार वह स्वयं भी किसी को उसके बुरे कार्यों के परिणाम से नहीं बचा सकते और न ही भाग्य बताने वाले। “कर्म” के सिद्धांत में इरादा (संकल्प) अत्यन्त महत्वपूर्ण होता है। यदि आप बिना इरादा किए, बिना किसी उद्देश्य या बिना इच्छा किए कुछ करते हैं तो कर्म का बीज पूरी तरह से नहीं बोते हैं। अर्थात यदि किसी भारी सामान को उठाने में किसी की मदद करते हैं और अचानक सामान गिर जाता है और टूट जाता है तो आपका कर्म बुरा नहीं होगा क्योंकि आपका इरादा या उद्देश्य बिल्कुल ठीक था और परिणाम बिना इरादे के हुआ था। दूसरा उदाहरण यह है कि अगर आप अन्धेरे में कहीं जा रहे हैं और अनजाने में किसी कीड़े पर पांव रख देते हैं और वह मर जाता है तो फिर भी आपने बुरा कर्म नहीं किया क्योंकि आपका इरादा कीड़े को मारने का नहीं था। कहने का तात्पर्य यह है कि केवल जानबूझ कर किए गए, सोचे गए, व कहे गए इत्यादि ही कर्म की दृष्टि से महत्वपूर्ण होते हैं। यहां मन से सोचे गए कर्म इसलिए कहे गए हैं क्योंकि इरादे का जन्म मन या विचारों से ही होता है। शरीर द्वारा या वचन द्वारा केवल उस सोचे गए कार्य को किये जाने से ही कर्म बनता है। इसलिए यह आवश्यक है कि हम अपने शरीर, मन व वचन के सम्बन्ध में सजग (जागृत) रहें।

“कर्म” का सिद्धांत बहुत साधारण नहीं होता। यह इतना सरल नहीं कि अच्छे कार्यों से अच्छे कर्म और बुरे कार्यों से बुरे कर्म हों। कई बार कई लोग बहुत करूणापूर्ण कार्य करते प्रतीत होते हैं किन्तु उनका उद्देश्य गलत होता है। कोई व्यक्ति अपने किसी बीमार रिश्तेदार की सेवा व देखभाल करता है, बहुत दया का कृत्य करता हुआ प्रतीत होता है किन्तु उसका उद्देश्य उस बीमार रिश्तेदार की सम्पती पाना हो सकता है। इस तरह का कृत्य एक अच्छे कर्म का पूरा लाभ नहीं देगा। इसी प्रकार आप एक बन्दूक चोरी करते हैं किन्तु यह आप केवल इसलिए करते हैं क्योंकि आपका मित्र उस बन्दूक से किसी की हत्या करना चाहता है। ऐसा करने से आप बुरा कर्म नहीं करेंगे क्योंकि चोरी के कृत्य के पीछे का कारण करूणा व अच्छा इरादा था। "माज्झिम निकाय  सूत्त"कहता है कि कर्म से प्रवृत्तियों को बल मिलता है और परिस्थितियों से परिणामों को। कर्म केवल कृत्य पर ही निर्भर नहीं होता बल्कि यह भी महत्वपूर्ण है कि कृत्य करने वाले व्यक्ति का स्वभाव कैसा है तथा उसने किन परिस्थितियों में वह कृत्य किया है।

सौन्दरनन्द-महाकाव्य, आज्ञा-व्याकरण, सर्ग १८

सौन्दरानन्द महाकाव्य, अष्टादश (१८ वां) सर्ग, आज्ञा-व्याकरण (उपदेश): अथ द्विजो बाल इवाप्तवेदः क्षिप्रं वणिक् प्राप्त इवाप्तलाभः । जित्वा च रा...