सन्त कबीर के समसामयिक सन्तो की वाणियों में बौध्द-विचारों का अद्भुत समन्वय पाया जाता हैं. इन सन्तो पर बौध्दधर्म का प्रभाव किसी न किसी रुप से अवश्य पड़ा था. ये बौध्दधर्म से अपरिचित होते हुए भी बौध्द-विचारो के अनेक अंशो के अनुगामी, प्रचारक तथा प्रवक्ता थे.
सन्त सेन नाई : सन्त सेन नाई निरन्जन ब्रह्म को मानते थे और निरन्जन ब्रह्म सिध्दों तथा नाथो की देन थी. "वेदहि झूठा, शास्रही झूठा" कहकर उन्होने ग्रन्थ-प्रमाण का निषेध किया हैं. बौध्दधर्म ग्रन्थों की प्रामाणिकता पर विश्वास नहीं करता. (अंगुत्तरनिकाय - कालामसुत्त) सेन नाई वेद-शास्र को नहीं मानते थे. ग्रन्थ-प्रमाण तथा ब्रह्मा, विष्णु, महेश को कबीर की भाँति ही अस्वीकार कर निर्गुण ब्रह्म के उपासक थे. इन्होने कबीर और रैदास को सच्चा भक्त माना हैं और उन्हीं के सिध्दान्तो के अनुसार अनुसर करने का प्रयत्न किया हैं ----
वेदहि झूठा शास्रहि झूठा, भक्त कहा से पछानी।
ज्या ज्या ब्रह्मा तू ही झूठा, झूठी साकी न मानी।।
गरुड़ चढे़ जब विष्णु आया, साच भक्त मेरे दो ही।
धन्य कबीरा धन्य रविदास, गावे सेना न्हावी।।
(मराठी का भक्ति साहित्य, पृष्ठ ९८)
स्वामी रामानन्द : स्वामी रामानन्द सिध्दों के ''सर्वत्र निरन्तर व्याप्त बोधि" की विचारधारा से प्रभावित होकर "हरि को सर्वत्र व्याप्त" मानते थे. ग्रन्थ-प्रमाण का निषेध, गुरु-सेवा से ज्ञान प्राप्ति, सद्गुरू को मार्गोपदेष्टा मानना आदि सिध्दों के प्रभाव का द्योतक हैं. धुतांगधारी बौध्द-योगियो की प्रवृत्ति का भी प्रभाव रामानन्द पर पड़ा था और उसी प्रभाव से उन्होने अवधूत वेष धारण किया था.
सन्त पीपा : सन्त पीपा इस शरीर में ही ज्ञान की प्राप्ति मानते थे और बौध्दधर्म की यह भावना सिध्दों से उन्हें प्राप्त हुई थी. उनकी वाणी में प्राप्त बौध्दधर्म के अनात्मवाद के प्रभाव से ऐसा विदित होता हैं की सन्त पीपा को अपनी गुजरात-यात्रा में किसी बौध्द-विचारधारा से प्रभावित सन्त या विद्वान से सत्संग करने का अवसर प्राप्त हुआ था. उनका कथन हैं की जब व्यक्ति उत्पन्न होता हैं तब इस शरीर में बाहर से कुछ आता नहीं हैं और मरते समय न तो यहाँ से बाहर कुछ जाता ही हैं --- "ना कछु आइबो, ना कछु जाइबो" (सन्तबानी संग्रह, भाग २, पृष्ठ २७) यही बात बौध्दधर्म के प्रसिद्ध ग्रन्थ विशुध्दीमार्ग में कही गई हैं ---
'दु:ख ही उत्पन्न होता हैं, दु:ख ही रहता हैं और दुःख ही नाश होता हैं. दु:ख के अतिरिक्त दूसरा नहीं उत्पन्न होता और न दु:ख के अतिरिक्त दूसरा निरुद्ध होता हैं. (विशुध्दीमार्ग, भाग, २ पृष्ठ १९८) भाव यह हैं की यह शरीर दु:खमय हैं. उत्पन्न होते समय दु:ख मात्र ही उत्पन्न होता हैं और मरते समय दु:ख ही शान्त होता हैं, अन्य कोई जीव या सत्व आता या जाता नहीं हैं. और भी वही कहा हैं ----
"न चित्तो गच्छति किञ्चि,
पटिसन्धि च जायति."
(विशुध्दीमार्ग, भाग, २, पृष्ठ २०७)
अर्थात् मरते समय इस शरीर से निकलकर कोई आत्मा या जीव जाता नहीं हैं, किन्तु बिना कुछ गये ही पुनर्जन्म होता हैं.
पीपा की इस विचारधारा का बौध्द-विचार होना स्पष्ट रुप से प्रकट हैं. पीपा इस काया में ही सब कुछ मानते थे. भगवान बुध्द ने कहा था ----
"मैं इसी व्याम (चार हाथ) मात्र संज्ञा-विज्ञान सहित वाले शरीर में लोक को भी प्रज्ञप्त करता हूँ, लोक (नाम-रुप का क्षेत्र) के समुदय (उत्पत्ति), लोक के निरोध और लोक के निरोध की ओर जाने वाली प्रतिपदा (मार्ग) को भी." (विशुध्दीमार्ग, भाग १, पृष्ठ १८२) उसी प्रकार पीपा भी इस शरीर में ही इष्टदेव, देवालय, धूप दीप, नैवेद्य आदि पूज्य एवं पूजा-सामग्र को विद्यमान मानते थे.