बुद्ध ने अंगुत्तर निकाय सुत्त में कर्म का निम्नलिखित विवरण दिया है:-
"भिक्षुओ मैं कहता हूँ कर्म इरादा है, अपनी इच्छाशक्ति द्वारा कोई व्यक्ति, शरीर, मन और वचन से कृत्य करता है। और बुद्ध ने इसी सुत्त में कर्म के विपाक (परिणाम) को ऐसे वर्णित किया है :- जैसे, जो बीज बोया गया है उसका ही फल आप को प्राप्त होगा। जो अच्छा कृत्य करेगा वह अच्छाई एकत्रित करेगा और जो बुरा करता है उसके साथ बुरा ही होगा।
बुद्ध का क्या अर्थ है जब वे कहते हैं कि कोई व्यक्ति अपनी इच्छाशक्ति के कारण शरीर, मन और वचन द्वारा कृत्य करता है, सारे कृत्य कर्मों का बीजारोपण नहीं करते हैं। केवल वे कृत्य जिनकी पहले हम इच्छा करते हैं और फिर उस इच्छा के अनुसार (इरादे के साथ) कार्य करते हैं, तो मनोभूमी में हम बीज बोते हैं। यह जरूरी बिन्दु है क्योंकि बहुत से लोग ऐसा विश्वास करते हैं कि जो भी वे कार्य करेंगे उस का कर्मफल होगा।
एक पल के लिए कल्पना करें कि आप किसी खेत में सैर कर रहे हैं। आपका इरादा केवल खेत के एक सिरे से दूसरे सिरे तक जाने का है आप किसी की हत्या नहीं करना चाहते हैं। परंतु सोचें कि आप इरादा न रखते हुए भी एक स्थान से दूसरे स्थान तक चलते हुए घास पर कितने कीड़ों की हत्या करते हैं। यदि गैर इरादतन हत्याओं के लिए आप ने कमों के बीज बोए हैं तब तो आपको इसका फल कई जन्मों तक भुगतना पड़ेगा। यह सत्य है कि हम अपने दैनिक कार्य करते हुए गैर इरादतन अनेकों जीवों की हत्या करते हैं। इसलिए हमें सावधान होकर, कम से कम नुकसान करने का प्रयास करना चाहिए। हमें याद रखना चाहिए कि केवल इरादतन किए गए कृत्य ही कर्म विपाक (कर्म और फल) निर्मित करते हैं।
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