Saturday, October 19, 2019

कबीर जातिभेद विरोध

जाति-विरोधी बुध्द ने कहा था -- 'जाति मा पुच्छ वरणं पुच्छ," (संयुत्तनिकाय, १, ७, १, ९) अर्थात् जाति मत पुछो, आचरण पुछो, कबीर ने भी उन्ही शब्दों में कहा था --

"जाति न पूछो साध की पूछि लिजियें ज्ञान," (कबीर, पृष्ठ ३२३)

"सन्तन जात पूछो निरगुनियाँ" (कबीरग्रन्थावली, पृष्ठ २३१)

इतना ही नहीं, भगवान बुध्द ने जातिभेद का विरोध करते हुए कहा था की सोपाक चाण्डाल भी मातंग नाम से प्रसिद्ध ऋषि हो गया, इसमे जातिभेद या उसकी नीची जाति ने कुछ नहीं बिगाडा ---

न जच्चा वसलो होति न जच्चा होति ब्राह्मणों ।।
कम्मुना वसलो होति कम्मुना होति ब्राह्मणों ।।
तदइमिनापि जानाथ यथा मेदं निदस्सनं।
चण्डालपुत्तो सोपाको मातंगो इति विस्सुतो ।।
सो यसं परमं पत्तो मातंगो यं सुदुल्लभं।
अगञ्छुं तस्मुपट्ठानं खत्तिया ब्राह्मणा बहू ।।
(सुत्तनिपात, वसलसुत्त, गाथा संख्या, २१-२३)

इसी सोपाक को कबीर ने श्वपच ऋषि नाम से स्मरण किया और कहा कि भंगी की जाति (जन्म) होकर भी ऋषि हो गये थे -- "साधनमॉ रैदास सन्त हैं, सुपच ऋषि सो भाँगियॉ" (कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ २३१)

श्वपच और सोपाक में कोई अन्तर नहीं हैं. दोनों का शाब्दिक अर्थ एक ही हैं और दृष्टान्त आदि में भी समानता हैं. अत: श्वपच की कथा पीछे के ग्रन्थों में भले ही कुछ भिन्न दिखाई पड़े, किन्तु इसका मुलस्रोत पालि-साहीत्य में ही उपलब्ध हैं और पूरी कथा जातक (मातंग जातक-४९७), चरियापिटक (मातंगचरिया- २, ७) आदि ग्रंथो में आई हुई हैं.

भगवान बुध्द ने जातिभेद का विरोध करते हुए ही कहा था --- "माता की योनि से उत्पन्न होने के कारण मै ब्राह्मण नहीं कहता," (मज्झिम निकाय, २, ५, ८ तथा धम्मपद 'न चाहं ब्राह्मणं ब्रूमि, योनिजं मत्तिसम्भवं." गाथा ३९६), आश्वलायन! ब्राह्मणों कि ब्राह्मणियाँ ऋतु-मती एवं गर्भिनी होती, प्रसव करती, दूध पीलाती देखी जाती हैं, योनि से उत्पन्न होते हुए भी वे ऐसा कहते हैं - ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न होने के कारण ब्राह्मण ही श्रेष्ठ वर्ण हैं."

इसी को सिध्द सरहपा ने इस प्रकार कहा --- "ब्राह्मण ब्रह्मा के मुख से हुआ था, जब हुआ था, तब हुआ था, अब तो दूसरे होते हैं, ब्राह्मण भी उसी प्रकार होते हैं, तो ब्राह्मणत्व कहा रह गया?" (बौध्दगान वो दोहा, धर्मदूत, वर्ष २६ अंक ११, पृष्ठ २२३) और फिर देखिए, कबीर ने इसे ही किस प्रकार कहा हैं -- तुम कैसे ब्राह्मण हो मैं कैसे शूद्र हूँ रक्त में तो कोई भिन्नता नहीं.

तुम कत बाभन हम कत सूद?
हम कत लोहू तुम कत दूध?

एक ज्योति में ही सब उत्पन्न हैं, इनमे कोई ब्राह्मण कोई शूद्र नहीं हैं, उत्पन्न होते हुए भी सभी माँ के पेट से ही बाहर आते हैं, चाहे ब्राह्मण हो या शूद्र ----
जो तु बांभन बभनीं जाया,
तौ आन बाट ह्वै काहे न आया?"
(कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ १०२)
"अष्ट कमल दोउ पदुमि आया,
छूत कहॉ तै उपजि?"

बौध्दधर्म में जातिभेद के लिए स्थान नहीं हैं. जो भी व्यक्ति प्रव्रजित होकर भिक्खुसंघ में सम्मिलित हो जाता हैं, वह अपनी जाति, गोत्र आदि को छोड़कर शाक्यपुत्रीय श्रमण कहा जाता हैं. उदान ग्रंथ में कहा गया हैं --- भिक्षुओं! जैसे जितनी बड़ी बड़ी नदियाँ हैं, जैसे की गंगा, यमुना, अचिरवती, मही --- सभी समुद्र में गिरकर अपने पहले नाम को छोड़ देती हैं, सभी महासमुद्र के ही नाम से जानी जाती हैं, वैसे ही ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ----- चारो वर्ण के जो लोग इस धर्मविनय (बौध्दधर्म) में घर से बेघर होकर प्रव्रजित होते हैं, अपने पहले नाम और गोत्र को छोड़ सभी शाक्यपुत्रीय श्रमण (बौध्दभिक्षु) इस एक नाम से जाने जाते हैं. (उदान, हिन्दी अनुवाद, पृष्ठ ७५)

ऐसे ही कबीर ने भी कहा हैं कि जिस प्रकार नदी-नाले गंगा से मिलकर गंगा कहलाने लगते हैं, वैसे ही सब एक हैं, जाति और कुल विचार व्यर्थ हैं ----

जाति कुल ना लखै कोई सब भये भृंगी।
नदी नाले मिले गंगै कहलावैं गंगी।
दरियाव दरिया जा समाने संग में संगी।
(कबीर, पृष्ठ ३३९)

हिन्दी सन्त साहित्य पर बौध्दधर्म का प्रभाव,
लेखिका- विद्यावती मालविका
एम ए पी एच डी, साहित्यरत्न....

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