भगवान बुध्द ने निर्वाण की स्थिति का वर्णन करते हुए कहा हैं कि निर्वाण की ऐसी अवस्था हैं, जहा जल, पृथ्वी, अग्नि और वायु नहीं ठहरते, वहा न तो शुक्र और सूर्य ही प्रकाश करते हैं, वहा चन्द्रमा भी नहीं चमकता और वहा अन्धकार भी नहीं होता. जब भिक्षु अपने आप जान लेता हैं, तब रुप, अरुप, सुख और दुख से मुक्त हो जाता हैं. (उदान, हिन्दी अनुवाद, पृष्ठ १४) ......
यत्थ आपो च पठवि तेजो वायो न गाधति।
न तत्थ सुक्का जोतन्ति आदिच्चो नप्पकासति।
न तत्थ चन्दिमा भाति तमो तत्थ न विज्जति।
यदा च अत्तना बेदि मुनि सो तेन ब्राह्मणों।
अथ रुपा अरुपा च सुखदुक्खा पमुच्चति।
(उदान, पालि, पृष्ठ ८-९)
इसी भाव को व्यक्त करते हुए सिध्द सरहपा ने कहा हैं कि ---- हे मन! जहा वायु का सञ्चार नहीं हैं, सूर्य और चन्द्रमा जहा प्रवेश नहीं कर सकते, तू वहा बढ़कर विश्राम करो ------
जहि मण पवन ण संचरइ, रवि ससि णाह पवेस।
तहि बढ चित्त विसाम करु, सरहे कहिअ उएस।
(दोहाकोश, पृष्ठ २०)
कबीर ने भी इसी स्थिति का वर्णन इस प्रकार किया हैं ---
जिहि बन सीही न संचरै, पंषि उड़े नहीं जाइ।
रैनि दिवस का गमि नहीं, तहाँ कबीर रह्या ल्यौ लाइ।
(कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ १८)
इन्हे मिलान करन पर स्पष्ट जान पड़ता हैं की कबीर ने जिस परमपद का वर्णन करते हुए कहा हैं कि "जिस वन में सींह का संचार नहीं हैं, वहा पक्षी नहीं उड़कर जा सकता, रात्रि और दिन की भी वहां पहुँच नही, उसी में कबीर लवलीन हैं." यह बुध्दोक्त निर्वाण का ही वर्णन हैं और न केवल भावो में ही समानता हैं, प्रत्युत शब्द-योजना में भी समानता हैं और सिध्द सरहपा के वचनो का तो परिवर्तन जान पड़ता हैं.
धम्मपद में कहा गया हैं कि बहुत-से ग्रन्थों को पढ़कर भी यदि उसके अनुसार आचरण न करे तो वह व्यक्ति दूसरों की गौवें गिननेवाले ग्वाले की भाँति श्रामण्य का अधिकारी नहीं होता. (धम्मपद, गाथा-१९)
इसी से मिलते-जुलते भाव को सिध्द सरहपा ने इस प्रकार कहा हैं ---
पण्डिअ सअल सत्थ बक्खाणइ।
देहहि बुध्द बसन्त न जाणइ।।
(दोहाकोश, पृष्ठ ३०)
अर्थात् पण्डित केवल शास्रो की ही चर्चा करते हैं, किन्तु वे अपने शरीर में विद्यमान 'बुध्द' को नहीं जानते. कबीर ने तो मानो इसी को अपने शब्दों में कह डाला हैं की पण्डित पढ़-पढ़कर वेद की चर्चा करते हैं, किन्तु अपने ही भीतर रहनेवाले उस परमेश्वर को नहीं जानते ---
पढ़ि पढ़ि पंडित वेद बपांणै, भीतरि हूती बसत न जाणै।
(कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ १०२)
सिध्द शबरपा ने निर्वाण को प्राप्त करने का उपाय बतलाते हुए कहा हैं कि गुरु के उपदेश के अनुसार मन रुपी बाण से निर्वाण को बेध दो अर्थात् अपने मन को निर्वाण की स्थिति में पहुँचा दो ----
गुरुवाक् पुञ्छिआ, विन्ध्य निअमण बाणे।
एके सर सन्धाने बिन्धह बिन्धह पर णिवाणे।।
(चर्यापद, पृष्ठ १३४)
कबीर ने इसी भाव को व्यक्त करते हुए कहा हैं कि वास्तव में सतगुरु शूरवीर हैं. उन्होने जो एक शब्द निकाला, उससे मेरे कलेजे में छेद हो गया और उस शब्द रुपी बाण के लगते ही मुझे सारे भेदो का ज्ञान प्राप्त हो गया ----
सतगुरु सॉचा सूरिवाँ, सबद जु बाह्यो एक।
लागत ही मैं मिलि गया, पड्या कलेजै छेक।।
(कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ १)
इन दोनों के वचनो में कितनी समता हैं. दोनों का तात्पर्य गुरु का माहात्म्य बतलाना हैं. परम गुरु भगवान बुध्द ने यही बात कही थी की मैने जो मार्ग बतला दिया हैं, उस पर आरुढ़ होकर तुम दु:खो का अन्त कर दोगे. शल्य के सदृश दु:ख के निवारण-स्वरुप निर्वाण को जानकर मैने उसका उपदेश किया हैं. (एतं हि तुम्हे पटिपन्ना, दुक्खस्सन्तं करिस्सथ। अक्खातो वे मयो मग्गो।। गाथा २७५)
सिध्द शबरपा और कबीर की वाणी के मुलस्रोत का इस बुध्दवचन से पूर्ण आभास मिलता हैं.
हिन्दी सन्त साहित्य पर बौध्दधर्म का प्रभाव,
लेखिका- विद्यावती मालविका
एम ए पी एच डी, साहित्यरत्न
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