Sunday, October 6, 2019

नाथ

प्रचलित नाथ सम्प्रदाय में प्रारम्भ से सहजयान की सारी प्रवृतियां थी, किन्तु गोरखनाथ ने उनका संस्कार किया. उन्होने मैथून और नारी का पूर्ण बहिष्कार किया. (सिध्दसाहित्य, पृष्ठ, ३२०) यह भी अभास मिलता है कि तान्त्रिक प्रवृत्तियों का भी उन्होने विरोध किया था, किन्तु ये प्रवृत्तियां सर्वथा समाप्त नहीं हुई. डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा हैं की गोरखनाथ की साधना का मूलस्वर शील, संयम और सत्यतावादी था और उन्होने तांत्रिक उच्छृंङ्खलताओं का विरोध कर निर्मम हाथोडे से साधू और गृहस्थ दोनों की कुरितियो को चूर्ण कर दिया. (नाथसम्प्रदाय, पृष्ठ १८८) किन्तु हम देखते हैं की गोरखनाथ ने केवल बौध्दों की ही इन प्रवृत्तियों का विरोध नहीं किया, उन्होने शैवो तथा शाक्तो के भी वामाचार का विरोध किया. फिर भी गोरखसिध्दान्त संग्रह में तो नाथो को ही तंत्रो का प्रवर्तक माना गया हैं. (गोरखसिध्दान्त संग्रह, पृष्ठ १९) नाथ सम्प्रदाय के ग्रन्थों में महामुद्रा, वज्रोली, सहजोली आदि साधनाओं का वर्णन हैं. (सिध्दसाहित्य, पृष्ठ ३२५), इससे सिध्द होता हैं की गोरखनाथ ने यद्यपि तांत्रिक प्रवृत्तियों का विरोध किया था, किन्तु वे नाथ सम्प्रदाय से सर्वथा बहिष्कृत नहीं हो पायी, सहजयान प्रभावित नाथो में वे किसी न किसी रुप में बनी रही. हम आगे देखेंगे की सिध्दो का यह प्रभाव केवल सम्प्रदाय तक ही सीमित नहीं रहा, प्रत्युत वैष्णव, सूफि आदि सम्प्रदाय भी इससे प्रभावित हुए.

नाथो ने बौध्द धर्म की परम्परागत साधना, धर्म, चिन्तन, संयम, विरक्ति, प्राणायाम आदि को अपने रुप से अंगीकार किया. उन्होने काया-शोधन, मनोमारण और संयत जीवन पर विशेष जोर दिया. ये सारी प्रवृतियां बौध्द धर्मावलंबी सिध्दों में विद्यमान थी. महायान के जन्म के साथ ही धीरे-धीरे इन प्रवृत्तियों का विकास हो रहा था और कालान्तर में इनका स्वरूप बदलता गया, यद्यपि मूल-भावना बनी रही. नाथो ने आनापान सति-भावना को इस प्रकार से हठयोग का रूप दिया ---- शरीर के नवों द्वारो को बन्द कर के वायु के आने-जाने का मार्ग यदी अवरुद्ध किया जाए तो उसका व्यापार ६४ सन्धियों में होने लगेगा. इससे निश्चय ही कायाकल्प होगा और साधक एक ऐसे सिध्द में परिणत हो जायेगा जिसकी छाया नहीं पड़ती. (अवधू नवघाटी रोकीलै बाट, बाई बणिजै चौसठी हाट। काया पलटे अविचल विध, छाया विवरजीत नीपजै सिध। --- गोरखबाणी, हिंदीसाहीत्य सम्मेलन, पृष्ठ १३)

जब योगी साधना द्वारा ब्रह्मरंध्र तक पहुंच जाता हैं तब उसे अनाहत नाद सुनाई पड़ता हैं, जो समस्त सार तत्वों का सार हैं और गम्भीर से भी गम्भीर हैं. उसी समय उसे ब्रह्म की अनुभूति होति हैं जो वाणी द्वारा अव्यक्त हैं. जब उसकी अनुभूति होति हैं तब जान पड़ता हैं की वही सत्य हैं, सारे विवाद मिथ्या हैं. (सारमसारं गहण गंभीरं गगण उछलिया नादं। मानिक पाया फरी लुकाया झूठा वाद विवाद। ... गोरखबाणी, पृष्ठ ५) आना-पान-सति की भावना में आश्वास-प्रश्वास के मनन द्वारा चित्त को एकाग्र करने का विधान हैं. जब योगी आना-पान (अश्वास-प्रश्वास) की भावना करता हैं तब उसकी चार स्मृतिप्रस्थान, बोध्यंग आदि की भी भावना पूर्ण हो जाति हैं और वह विद्या तथा विमुक्ति को पा लेता हैं. (मज्झिम निकाय, ३, २, ८, पृष्ठ ४९१) इसी को एकायन मार्ग भी कहा गया हैं (मज्झिम निकाय, १, १, १०) आना-पान की यह भावना सिध्दों में और नाथो तक पहुँचते-पहुँचते वह अनाहत नाद का उत्पत्ति-केन्द्र बन गयी. मनो-मारण विधान भी इसी भावना की देन हैं. गोरखनाथ ने कहा है कि अपनी श्वास-क्रिया की धौकनी के सहारे ही रस जमाकर योगी पूर्ण ज्ञान हो जाता हैं. (गोरखबाणी, पृष्ठ ९१/९२) इसी प्रकार शून्य, सहजशून्य, खसम, सहज-समाधी, गुरु, देह, चक्र-नाडी, पवन-निरोध, चंडग्नि, सुरती, मुद्रा, निर्वाण आदी प्राय सभी धर्मतत्व सिध्दो के ही नाथ-सम्प्रदाय में मिलते हैं. यहाँ इनके विस्तार के लिए अवकाश नहीं हैं. नाथो ने मध्यम-मार्ग पर ही चलने का उपदेश दिया हैं--- "मधि निरन्तर किजै वास" (गोरखबाणी, पृष्ठ, २१७) यह मध्यम मार्ग इन्हे सिध्दों से ही मिला था, (और सिध्दों को बुध्दों से)

हिंदी सन्त साहित्य पर बौध्द धर्म का प्रभाव...
लेखक- डॉ. विद्सावती मालविका
एम. ए. पी. एच. डी. साहित्य रत्न...

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