Thursday, October 17, 2019

कबीर

कबीर की वाणियों में बौध्दविचार :

कबीर ने बौध्दधर्म का अध्ययन नहीं किया था और न तो किसी बौध्द विद्वान से उसका सत्संग ही किया था, किन्तु बौध्द विचारों से प्रभावित सन्तो की परम्परा तथा जन-समाज में व्याप्त बुध्दशिक्षा का प्रभाव उन पर पड़ा था. सन्त सत्संग की प्रशंसा करते थे और विशेषकर साधू-सत्संग की... इस भावना के परिणामस्वरूप कबीर ने एक जिज्ञासु रुप में तत्कालीन प्रसिद्ध विद्वानों का सत्संग किया था और उनसे धर्म को सिखा था. स्वामी रामानन्द का विशेष प्रभाव उन पर पड़ा था और सिध्द-नाथ परम्परा से आई हुई विचारधारा का प्रत्यक्ष एवं गहरा प्रभाव रामानन्द तथा उनके पूर्ववर्ती सन्तो पर पड़ा था. साधु-समागम अथवा सत्पुरुष सत्संग बुध्दकाल से ही प्रशंसित था. सत्संग अड़तीस मंगलो में से एक माना जाता था. (कालेन धम्मसाकच्छा एतं मंगलमुत्तमं। महामंगलसुत्त, ९) संयुत्तनिकाय में कहा गया हैं कि व्यक्ति को चाहिए की वह सन्तो के साथ रहे और सन्तो की ही संगति करे, क्योंकि सन्तो का सधर्म जानने से कल्याण होता हैं, अकल्याण नही. (सब्भिसुत्त-१, ४, १)। सन्तो की संगति करने से ज्ञान प्राप्त होता हैं, शोक नहीं होता, अपने लोगो में शोभता हैं, सद्गति (स्वर्ग) की प्राप्ति होती हैं, वह चिरकाल तक सुखी रहता हैं और सब दुखो से मुक्त हो जाता हैं. (सब्भिसुत्त-सब्भिरेव समासेथ, सब्भि कुब्बेथ संथवं। सतं सधम्ममञ्ञाय सब्बदुक्खा पमुच्चति।।) इसी प्रकार कबीर ने भी साधु-संगति की प्रशंसा की हैं --- कबीर संगति साध की बैगि करीजै जाइ। दुरमति दूरी गँवाइसि, देसी सुमति बताइ।। कबीर संगति साध की, कदे न निरफल होइ। चन्दन होसी बाबना, नीव न कहसी कोइ।। मथुरा जावै व्दारिका भावे जावै जगनाथ। साध संगति हरि भगति बिन कछू न आये हाथ।। (कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ ४९)

कबीर ने साधु-संगति को ही वकुैण्ठ माना हैं ----- "साध संगति वैकुण्ठहि आहि" (कबीर- पृष्ठ ३२२) धर्मानन्द कौशाम्बी का मत हैं की कबीर तथा उनके पूर्ववर्ती सन्तो ने बौध्दसाहित्य से ही सत्संगति की कल्पना की होगी. (भारतीय संस्कृति और अहिंसा, पृष्ठ २०६) किन्तु कबीर के लिए तो केवल इतना ही माना जा सकता हैं की उन्होने परम्परागत (परम्परा से आये हुए) बौध्द विचारों को ही ग्रहण किया था, क्योंकि की उन्हें बौध्दसाहित्य का प्रत्यक्ष रुप में ज्ञान नहीं था और उन्होने बुध्द के केवल विष्णु-पुराण के अनुसार असुर-संहारक रुप को ही सुन रखा था---- वे कर्ता नहीं बौध्द कहावै नहीं असुर को मारा। ज्ञानहीन कर्ता भरमे माया जग संहारा।। (बीजक, पृष्ठ ६३) यही नहीं कबीर ने बौध्दो को भी शाक्तो, जैनो, चार्वाको के साथ पाखण्डी कहा हैं, जिससे जान पडता हैं की उन्हें बौध्दों के सम्बन्ध में केवल नाममात्र की जानकारी थी और वह भी श्लाघ्य रुप में नहीं ---- केते बौध भये निकलंकी तिन भी अन्त न पाया। (कबीर, पृष्ठ ३२६) जैन बौध अरु साकम सैना, चारवाक चतुरंग बिहूना। (कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ २४०)

इसी प्रकार सन्त तुकाराम ने तो बुध्द को केवल गूँगा होने की भी कल्पना कर ली थी --- "बौध्य अवतार मझिया अदृष्टा, मौन मुखे निष्ठा धरियेली." (भारतीय संस्कृति और अहिंसा, पृष्ठ २०६) आचार्य धर्मानन्द कौशाम्बी का कथन सर्वथा ही उचित हैं कि साधु-सन्तो के वचनो में बौध्दसाहित्य में मिलनेवाले भूतदया, सब लोगो के साथ समता का व्यवहार तथा सन्त-संगति के गुण-वर्णन के जो उद्गार मिलते हैं, वे आये कहा से? इसका उत्तर यही हैं की जनसाधारण में बुध्दोपदेश के बीज समूल नष्ट नहीं हुए थे, किसी-न-किसी रुप में वे बने हुए थे और इन साधु-सन्तो ने उन्हीं को अनेक प्रकार से बढाया. यद्यापि कबीर भगवान बुध्द के स्थविरवादी स्वरुप से परिचित नहीं थे, किन्तु चौरासी सिध्दों को कबीर जानते थे, अर्थात् उनके समय तक चौरासी सिध्दों का इतिहास भूला नहीं था. राहुल सांकृत्यायन का मत हैं की कबीर ने चौरासी सिध्दों का विरोध किया हैं, किन्तु वास्तव में वे उन्हीं के निर्गुण, योग और विचित्र ढंग को अपनाकर नाथ सम्प्रदाय से भिडे थे. (पुरातत्वनिबंधावली, पृष्ठ १६४) किन्तु इसमे वास्तविकता इतनी ही हैं की कबीर ने अप्रत्यक्ष रूप में ही सिध्दों से ग्रहण किया था, जो कि जनसाधारण द्वारा ही उन्हें प्राप्त हुआ था, इसीलिए उन्होने सिध्दों को भी भ्रम में पड़ा कहा हैं ---- धरनी अरु असमान बिचि, दोइ तूंबडा अबध। पटदरसन संसै पंड्या, अरु चौरासी सिध्द।। (कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ ५४)

No comments:

Post a Comment

सौन्दरनन्द-महाकाव्य, आज्ञा-व्याकरण, सर्ग १८

सौन्दरानन्द महाकाव्य, अष्टादश (१८ वां) सर्ग, आज्ञा-व्याकरण (उपदेश): अथ द्विजो बाल इवाप्तवेदः क्षिप्रं वणिक् प्राप्त इवाप्तलाभः । जित्वा च रा...