Friday, August 23, 2019

मध्यमा प्रतिपद

मध्यमा प्रतिपद : मध्य-मार्ग में बुध्द का हमेशा जोर था. कर्म में भी वह अति का रास्ता छोड़कर मध्य का रास्ता स्वीकार करते थे. (तपश्चर्या) से शरीर के अत्यंत सुखाने को भी वह अच्छा नहीं समझते, और न शरीर को ही सब कुछ समझकर उसकी पूजा में रत रहने को पसन्द करते थे. जिस तरह यहां बुध्द मध्य-मार्ग को स्वीकार करने की बात कहते हैं, वैसे ही दर्शन में भी वह मध्यमा-प्रतिपद् को मानते हैं. एक तरफ जड़वादी विचारधारा के लोग उनके समय भारत में थे, जिनके सामने जड़ वस्तुओं या महाभूतों से भिन्न कोई दूसरी वास्तविक वस्तु नहीं थी. जड़ वस्तुओं में ही चेतना उत्पन्न हो जाति हैं, जैसे गुड़ या दूसरी चीजों में मद्यरस, ऐसी उनकी विचारधारा थी. दूसरी तरफ ब्रह्मवादी लोग थे, जो जड़ की सत्ता को चेतन से उद्भूत मानते थे. एक आत्मवाद और दूसरा जड़वाद का रास्ता था. बुध्द ने दोनों का साफ़ इनकार किया. रुप और विज्ञान भिन्न हैं, और उनकी तीन स्थितियाँ (संज्ञा+वेदना+संस्कार) भी उसी तरह भेद रखती हैं. पांचो स्कन्ध (रुप+संज्ञा+वेदना+विज्ञान) मिलकर वह विश्व की व्याख्या करते हैं. जिसे नाम-रुप भी कहा जाता हैं. कार्य से कारण को बिल्कुल भिन्न मानने पर उनके सिध्दान्तो के अनुसार रुप से भी विलक्षण विज्ञान उत्पन्न हो सकता हैं; पर इस बात को कहीं स्पष्ट नहीं किया गया, इसलिए हमें भी खीचातानी नहीं करनी चाहिए.

वह उच्छेदवाद अर्थात् शरीर के साथ जीवन की समाप्ति को नहीं मानते, उन्हें यह मानने में उजुर नहीं की जीवन प्रतिक्षण उत्पन्न होकर सर्वथा नष्ट हो जाता हैं. उच्छेद (नष्टता) से उनका अभिप्राय जीवन-प्रवाह या सन्तान उच्छेद हैं. जीवन एक अविच्छिन्न-रेखा नहीं हैं, बल्की करोडो़ बिन्दुओं का समूह हैं. हर एक बिन्दु हर एक क्षण के जीवन का प्रतिनिधि हैं. यद्यपि जीवन का हर एक बिंदु हर क्षण नष्ट हो रहा हैं, लेकिन उससे प्रवाह उच्छिन्न नहीं होता. एक की जगह दूसरा आता हैं, दूसरे की जगह तिसरा. इस तरह वह प्रवाह जारी रहता हैं. इस शरीर में भी जीवन-बिंदु-प्रवाह जारी रहते उनके एक दूसरे के अतिसमिप रहने के कारण जीवन की एकता का भान होता हैं, जैसे बिंदुओ द्वारा बनी रेखा का भान होता हैं. इसी जीवन-प्रवाह को इस शरीर के बाद भी अच्छे-बुरे कर्मों के अनुसार बनते वह मानते हैं. कर्म का फलदाता कोई दूसरा नहीं हैं. हरेक आदमी जैसा करता हैं, उसी के अनुसार उसका जीवन बन जाता हैं, और यही तद्नुकुल फल हैं. बुध्द के सिध्दान्त के अनुसार हरेक मानव हर क्षण अपने अनंत काल के अर्जित सुगुणों-दूर्गुणों का मिश्रित समूह हैं. यहा भी मध्यमा प्रतिपद को ही बुध्द ने स्वीकार किया. आत्मवादी आत्मा को मान कर उसके चोले को बदलते रहने की बात करते थे, और जड़वादी मृत्यु के साथ जीवन की समाप्ति मानते थे. आत्मवाद को न मानते हुए बुध्द ने जन्मान्तर की संगति के लिए जीवन-बिंदु-प्रवाह को मान लिया, और उच्छेद को भी मानने से इनकार कर दिया.

महामानव बुध्द
लेखक- भदन्त राहुल सांकृत्यायन

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