Wednesday, August 21, 2019

प्रतित्यसमुत्पाद

प्रतित्यसमुत्पाद : प्रतीत्य-समुत्पाद के अर्थ को साफ करते हुए बुध्द ने स्वयं कहा हैं - 'इसके बाद यह होता हैं' (अस्मिन् सति इदं भवति); जो वस्तुतः बिना अपवाद के सभी वस्तुएं अनित्य (परिवर्तनीय) हैं, इसी मौलिक सिध्दान्त की व्याख्या हैं. बुध्द और बौध्द अनित्यवादी हैं. वह किसी चीज़ का वास्तविक होना स्वीकार नहीं कर सकते, जब तक की वह अनित्य न बतलाई जाये. पीछे के आचार्यों ने इसे और साफ करते हुए कहा -- 'यत् सत् तत क्षणिकं ' (जो वास्तविक हैं वह क्षणिक हैं). बाहरी वस्तुओं को सभी अनित्य और क्षणिक मानने को तैयार थे. लेकिन बुध्द ने बाहरी स्थूल जगत को ही क्षणिक नहीं बतलाय, बल्की आन्तरिक सूक्ष्म जगत पर भी इस निरपवाद नियम को लागू बताया. बुध्द से थोड़े ही दिनों पहले उपनिषद के विचारकों का समय बीता था. प्रवाहण, उद्दालक, याज्ञवल्क्य जैसे उपनिषद् के महान ऋषीयों ने बहुत प्रयत्न कर के इस बात को मानने के लिए लोगों को तैयार किया था, की क्षण-क्षण परिवर्तनशील बाह्य जगत के भीतर नित्य, कूटस्थ, अविचलित एक सूक्ष्म वस्तू (तत्व) हैं. इस तत्व को उन्होने आत्मा की संज्ञा दी, और उसी नित्य निर्विकार आत्मा को पाना जीवन का सर्वश्रेष्ठ उद्देश्य माना. उपनिषद् के इस आत्मवाद (ब्रह्मवाद) भक्तों की आज भी देश में कमी नहीं हैं. सचमुच ही यह बड़े परिश्रम और तपस्या का फल था, जीसे बुध्द ने अपने अनित्यतावाद द्वारा एक फूंक में उडा़ देना चाहा. उपनिषद् के आत्मवाद के ऊपर खास तौर से बुध्द प्रहार करना चाहते थे, यह इस से भी मालूम हैं, की उन्होने अपने सिध्दान्तो को अनात्मवाद कहा. वेदान्त ने सत्-चित्-आनन्द की घोषणा की और बुध्द ने असत्, अचित्-अनानन्द की! हा, शब्द-भेद से उन्होने इसके लिए, अनित्य, दु:ख और अनात्म शब्द का व्यवहार किया. सत् यह वेदान्त में नित्य के लिए कहा गया, चित् आत्मा के लिए और आनन्द का अर्थ हैं दु:ख का अभाव. इस से साफ ही हैं, की बुध्द उपनिषद् के मूल सिध्दान्तो के विरोधी थे. यह अश्चर्य की बात है, की आजकल कितने ही लेखक इसके बारे में समन्वय करने की कोशिश करते हुए बुध्द को भी उपनिषद् के सिध्दान्तो का प्रतिपादक बतलाना चाहते हैं.

अनित्यवाद या क्षणिकवाद बुध्द के दर्शन की आधारशिला हैं. उनका यह सिध्दान्त भारत के सब से प्रौढ और प्रगतिशील दर्शन का प्रेरणा-स्रोत भी हैं. इस सिध्दान्त को मान लेने पर एक तरफ आदमी ईश्वर और आत्मा के बन्धन से छुट जाता हैं, दूसरी तरफ़ वह नियति के फन्दे से भी मुक्त हो जाता हैं. संसार में कोई चीज़ दो क्षण भी नहीं रह सकती हैं. पैदा होने के साथ वह अपनी मृत्यु को अपने साथ लाती हैं. इस सत्य को समझाकर एक ओर बुध्द प्रियों के वियोग और अप्रियों के संयोग से होने वाली चिन्ता को भी अस्थायी मानकर छोड़ने के लिए कहते हैं. दूसरी ओर इस परिवर्तनशीलता से मानव के लिए अनुकुल परिवर्तन की सम्भावना हैं, वह उसके लिए उद्योग परायण हो सकता हैं.

क्षणिकवाद के अनुसार कारण क्षणिक हैं. जिस समय कार्य पैदा होता हैं, उस समय से पहले उसका कारण विलुप्त हो गया रहता है. इस विचार के अनुसार कार्य और कारण का क्या सम्बन्ध हैं, इसी बात को बतलाने के लिए बुध्द ने प्रतीत्य-समुत्पाद के नाम से नई परिभाषा गढी, एक के प्रतीत्य (नष्ट) होने पर दूसरे का उत्पाद (उत्पत्ति) होती हैं. कारण नष्ट हो जाने पर कार्य की उत्पत्ति होती हैं. इन दोनों का सम्बन्ध यही हैं, की 'इसके बाद यह होता हैं' कारण के बाद कार्य उत्पन्न होता हैं. बीज नष्ट होकर वृक्ष उत्पन्न होता हैं, इस बात को मानने में किसी को आपत्ति नहीं हो सकति, लेकिन बुध्द परिवर्तन को इतने स्थूल रुप में नहीं देखते. बाहरी परिवर्तन को हम आंखों से देख लेते हैं, वह बहुत ही स्थूल परिवर्तन हैं. वह इस स्थूल परिवर्तन को भी लाखों सूक्ष्म परिवर्तन का आभास बतलाना चाहते हैं, इस सिध्दान्त के अनुसार मनुष्य हर क्षण मर रहा हैं, और हर क्षण पहली की जगह, एक दूसरा बिल्कुल नया व्यक्ति प्रकट हो रहा हैं. परिवर्तन इतनी तेजी से होता हैं, की उसके काल को हम पकड़ नहीं सकते. पर हरेक परिवर्तन में पहले का सादृश्य प्रवाहरुपेन चलता रहता हैं, जो भ्रम पैदा कर देता हैं की यह वही वस्तु हैं. मनुष्य बाल्य, तारुण्य और वार्धक्य जैसे परिवर्तनों में ही नहीं पड़ता, बल्की हर क्षण वह मरता हैं, और दूसरा उसी के समान उस स्थान पर आता हैं. इस तरह के सिध्दान्त द्वारा बुध्द ने अपने समय के आत्मवादी विचारकों में कितनी खलबली मचाई होंगी, इसे कहने की अवश्यकता नहीं.

बुध्द चेतना को मानते हैं, और चेतना तथा चेतन को एक कहने पर इनकार नहीं करते. उनके दर्शन में इस तरह के गुण-गुणी के भेद के लिए स्थान नहीं हैं. तत्त्वों का वर्गीकरण करते हुए वह उन्हें पाँच स्कन्धो में बाँटते हैं -- रुप, वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान, जिन्हे बौध्द परिभाषा में पंचस्कन्ध कहा जाता हैं. इन पाँचों स्कन्धो में वस्तुतः रुप और विज्ञान मुख्य हैं, बाकी तीन (संज्ञा+वेदना+संस्कार) रुप और विज्ञान के सम्पर्क की भीन्न-भीन्न स्थितियाँ या क्रियायें हैं. स्थिति और क्रिया में बौध्द कोई अन्तर नहीं मानते, क्योंकि कोई ऐसी स्थिति नहीं हो सकती, जिसमे क्रिया न हो. नाश और उत्पत्ति का चक्कर तो किसी क्षण भी नहीं रुकता. रुप हैं भौतिक तत्त्व और विज्ञान हैं चेतना. वास्तविकता के ये दो रुप हैं. यह दोनों क्षण-क्षण परिवर्तनशील हैं. वास्तविकता देश-काल में बहती हुई नदी की धारा हैं. ऐसी नदी हैं, जीस में दो क्षण भी एक ही जगह अवगाहन नहीं किया जा सकता. रुप और विज्ञान दोनों की क्षणिक सत्ता को वास्तविक मानते हुए बुध्द को द्वैतवादी कहा जा सकता हैं. पर वस्तु के अन्तस्तल में जीस रुप में अति सूक्ष्म परिवर्तन को वह मानते हैं, उसके कारण दोनों का भेद नहीं रह जाता. इसी कारण पीछे (गत) बौध्द दर्शन में द्वैत और अद्वैत का भेद हो गया. सर्वास्तिवादी दोनों के अस्तित्त्वों को मानने वाले थे. स्वत्रांतिक बाह्य पदार्थों के अस्तित्त्वों को मुख्य मानते थे. विज्ञानवादी योगाचार अन्तस्तत्व या विज्ञान को ही मुख्य तत्त्व मानते थे, और शून्यवादी माध्यमिक दोनों के अस्तित्व को सापेक्ष मानकर उसकी परमार्थ सत्ता से इनकार करते थे. यह बौध्द धर्म के पीछे का विकास हैं. पर चारों दर्शनो का अंकुर बुध्द के विचारों में मिलता हैं.

महामानव बुध्द
लेखक- भदन्त राहुल सांकृत्यायन

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