Tuesday, April 28, 2020

बुध्द को भगवान क्यों कहते हैं

बहुत-से लोग पूछते हैं कि गौतम बुद्ध को भगवान बुद्ध क्यों कहा जाता है?

कुछ लोग उन्हें महात्मा बुद्ध कहते हैं। उनका प्रश्न होता है कि गौतम बुद्ध तो भगवान (ईश्वर) को मानते ही नहीं थे तो फिर उनके नाम के आगे भगवान क्यों लिखा जाता है? इस प्रश्न का निराकरण आवश्यक है।

___ “आज की बोलचाल की भाषा में भगवान का अर्थ होता है-ईश्वर या परमात्मा, इस सृष्टि का निर्माण करने वाला, इसका पालन करने वाला और इसका संहार करने वाला। ईश्वर यानी वह जो संसार का मालिक है, जिसकी पूजा करने से, जिसका भजन गाने से, जिसका नाम जपने से, जिसका ध्यान करने से वह प्रसन्न हो जाता है और भक्तों के पापों को क्षमा कर, उन्हें भवसागर से तार देने का दावा करता है। यदि बुद्ध के लिए प्रयुक्त भगवान शब्द को ऐसे किसी अर्थ में मान लिया गया, तो गलत होगा। बुद्ध और उनकी शिक्षा का अवमूल्यन हो जाएगा, क्योंकि उनकी शिक्षा को भली भांति समझकर ही कहा गया है।

न हेत्थ देवो ब्रह्मा वा, संसारस्सत्थिकारको :
सुद्धधम्मा पवत्तन्ति, हेतुसम्भारपच्चया ।।
(विसुद्धि 2/689. पच्चयपरिगहकथा)

(संसार का निर्माण करने वाला न कोई देव है न ब्रह्मा। हेतु-प्रत्यय यानी कारणों पर आधारित मात्र शुद्ध धर्म प्रवर्तित हो रहे हैं।)

संसार चक्र को इस स्पष्टता से समझने और समझाने वाले महापुरुष को हम संसार का निर्माता ईश्वर मान लेंगे तो वास्तविक 'भगवान' शब्द को दूषित कर लेंगे। परवर्ती पौराणिक काल में भगवान को इस अर्थ में माना जाने लगा कि वह किसी देवलोक का ऐसा समर्थ देवता है जो कि समय-समय पर इस पृथ्वी पर इस या उस रूप में अवतरित होता है यानी जन्म लेता है और साधु-सज्जनों का परित्राण तथा दुष्ट-दुर्जनों का विनाश करता है और जो उसकी शरण ग्रहण कर ले, उसे सारे पापों से मुक्त कर देने का दावा करता है। बुद्ध को ऐसा ईश्वरावतार मान लेना, उनके प्रति तथा उनकी शिक्षा के प्रति नितांत अज्ञानता का प्रदर्शन होगा...

भव-भ्रमण (जन्म-मरन) से स्वयं नितांत विमुक्त हुए तथा भव-भ्रमण में पड़े हुए अन्य लोगों को नितांत भव-विमुक्त हो सकने की शिक्षा देने वाले बुद्ध की सायुज्जता, सारूप्यता और तादात्म्यता बार-बार जन्म लेने वाले भव-भ्रमण में पड़े हुए किसी ईश्वर नामधारी देवता से की जाए तो यह बुद्ध और उनकी शिक्षा के प्रति नितांत अज्ञानता ही मानी जाएगी। और फिर ऐसा ईश्वर जिसकी शरण ग्रहण कर लेने मात्र से वह अपने भक्त को सारे पापों से मुक्त कर देने का दावा करे, ऐसी मान्यता बुद्ध की शिक्षा के विपरीत है। वे तो डंके की चोट पर कहते हैं कि :

'तुम्हेहि किच्चमातप्पं, अक्खातारो तथागता।' 
(धम्मपद 276, मग्गवग्ग)

(अर्थ-मैं तो मार्ग आख्यात करता हूं, तुम्हारी मुक्ति के लिए तपना तो तुम्हें ही पड़ेगा।)

ऐसे मार्ग-आख्याता तथागत को तारक-ब्रह्म के अर्थ वाला भगवान मान लें, तो 'भगवान' शब्द के अर्थ का अनर्थ हो जाएगा। इसलिए समझें-किस अर्थ में भगवान? :

'भगवाति, गारवाधिवचनं'-भगवान शब्द गौरव व गरिमा का पर्यायवाची है। गौरव, गरिमायुक्त होने के कारण गौतम बुद्ध 'भगवान' कहलाए।

'भग्गरागोति भगवा'-राग भग्न कर लिया, इस माने में भगवान।

'भग्गदोसोति भगवा'-द्वेष भग्न कर लिया, इस माने में भगवान।

वीतराग और वीतद्वेष तो आठों ध्यान समापत्तियों से संपन्न व्यक्ति भी हो सकता है, जो कि मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा के ब्रह्मविहार का जीवन जीता है। लेकिन इससे अधिक महत्त्वपूर्ण है-वीतमोह होना, क्योंकि वीतराग, वीतद्वेष होते हुए भी किसी काल्पनिक मिथ्या मान्यता में उलझा हुआ, आत्मभाव में लिपटा हुआ, मोहग्रस्त व्यक्ति भवमुक्त नहीं होता। अतः मोह का नष्ट होना नितांत अनिवार्य है। इसलिए कहा:

'भग्गमोहोति भगवा'-मोह भग्न कर लिया, इस माने में भगवान।

'भग्गमानोति भगवा'-अभिमान नष्ट कर लिया, इस माने में भगवान।

'भग्गदिट्ठीति भगवा'-दार्शनिक मान्यताओं को भग्न कर लिया, इस माने में भगवान।

'भग्गकण्डकोति भगवा'-कंटक भग्न कर लिया, इस माने में भगवान।

'भग्गकिलेसोति भगवा'-क्लेश, काषाय भग्न कर लिये, इस माने में भगवान।

'भजि विभजि पविभजि धम्मरतनन्ति भगवा'-'भजि' यानी जिसने धर्म रत्न का भजन किया, यानी सेवन किया, इस माने में भगवान।

आज की हिन्दी में 'भजन' शब्द का अर्थ बदल गया। आज यह कीर्तन का पर्यायवाची बन गया है। उन दिनों की जनभाषा में इसका अर्थ सेवन करना अर्थात संगति करना था। 'भजि' विभाजन करने के अर्थ में भी प्रयुक्त होता था। इस माने में भी कहा गया: भजि, विभजि, पविभजि यानी जिसने एक शोधकर्ता वैज्ञानिक की भांति धर्मरत्न का विभाजन किया, भली प्रकार विभाजन किया, विभक्त किया, विघटन किया और यों विश्लेषण कर-करके उसे भली प्रकार जान लिया, इस माने में भगवान।

'भवानं अन्तकरोति भगवा'-अपने भव-संस्कारों का अंत कर निर्वाण तक पहुंचे, इस माने में भगवान।

_ 'भावितकायो भावितसीलो भावितचित्तो भावितपोति भगवा'-काया, शील, समाधि और प्रज्ञा की साधना भावित कर ली, इस माने में भगवान।

'भागी वा भगवा चतुनं झानानं चतुनं अप्पमज्ञानं चतुनं अरूपसमापत्तीनन्ति भगवा'-चार सामान्य ध्यान, चार अप्रामाण्य (ब्रह्मविहार) ध्यान, चार अरूप ध्यान
समापत्तियों के ऐश्वर्य के भागीदार है, इस माने में भगवाना।

'भागी वा भगवा चतुन्नं सतिपट्ठानानं चतुन्नं सम्मप्पधानानं चतुन्नं इखिपादानं पञ्चनं इन्द्रियानं पञ्छनं बलानं सत्तन्नं बोज्झङ्गानं अरियस्स अट्ठनिकस्स मग्गस्साति भगवा'-चार स्मृति-प्रस्थान, चार सम्यक प्रधान, चार ऋषिपाद, पांच इंद्रिय, पांच बल, सात बोध्यंग और आठ अंग वाला आर्य मार्ग-यों इन संतीस बोधिपक्षीय धर्मो के ऐश्वर्य के भागीदार हैं, इस माने में भगवान।

'भागी वा भगवा दसन्नं तथागतबलानं चतुन्नं वेसारज्जानं चतुम्नं पटिसम्भिदानं छत्रं अभिज्ञानं एवं बुद्धधम्मानन्ति भगवा', (महानि। 149, महावियूहसुत्तनिदेश)-दस तथागत बल, चार वेशारध, चार प्रतिसंभिदा, छ: अभिज्ञान और छ: बुद्ध धर्म, यानी बुद्ध-गुणों के ऐश्वर्य के भागीदार हैं, इस माने में भगवान।

इन-इन विशेषताओं के अर्थ में बुद्ध को भगवान कहा जाता है, न कि ईश्वर या परमात्मा के अर्थ में।

.... 'विमोक्खन्तिकमेतं बुद्धानं भगवन्तानं बोधिया मूले सह सब तआणस्स पटिलाभा सच्छिका पञ्अत्ति यदिदं भगवा' (महानि। 149, महावियूहसुत्तनिदेश)-वोधि वृक्ष के वर्तमान तथा भूत-भविष्य को जाननेवाले हैं, यथावादी तथाकारी, जैसा कहते हैं वैसा करते हैं और जैसा करते है वैसा ही कहते हैं, ऐसे आचरण वाल है, आदमी को लोभ, द्वेष और मोह से छुड़ाने वाले अप्रतिम सारथी हैं, देवता तथा मनुष्यों के शास्ता है, गुरु है, उपदेशक हैं, ऐसे मनुष्यों में अनुपम श्रेष्ठतम भगवान बुद्ध है।)

___ संक्षेप में कहें तो, 'भग्ग रागो, भग्ग द्वेषो, भग्ग मोहोति भगवा' अर्थात् जिसने अपने चित्त को राग-द्वेष और मोह से पूरी तरह मुक्त कर लिया, वह भगवान हो गया।

भगवान वह जिसने भगवत्ता प्राप्त कर ली। यह एक उपलब्धि है जिसे दस पारमिताएं पूरी करके आर्य आष्टांगिक मार्ग पर चलकर, सम्यक् संबोधि प्राप्त कर हासिल किया जा सकता है। इसका अवतारवाद से कुछ लेना-देना नहीं है। बुद्ध ने स्वयं कहा था कि प्रत्येक इंसान के भीतर संबोधि का बीज मौजूद है और प्रत्येक इंसान में बुद्ध होने की संभावना होती है। इसलिए बुद्धत्व एक उपलब्धि है जिसे स्वयं हासिल करना पड़ता है। इसमें किसी की कृपा और अनुकम्पा के लिए कोई स्थान नहीं है।

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