Wednesday, January 27, 2021

सौन्दरनन्द-आर्यसत्यों की व्याख्या, भाग १

सौन्दरनन्द-आर्यसत्यों की व्याख्या, षोडश सर्ग:

अबोधतो ह्यप्रतिवेधतश्च तत्त्वात्मकस्यास्य चतुष्टयस्य। भवाद्भवं याति न शान्तिमेति संसारदोलामधिरुह्य लोकः। ॥६॥

इस तत्वात्मक चार (आर्य-सत्य-समूह) को न समझ बूझ सकने के कारण मनुष्य संसाररूपी दोला पर चढ़कर एक जन्म से दूसरे जन्म में जाता है और शान्ति प्राप्त नहीं करता है। ॥६॥

तस्माज्जरादेर्व्यसनस्य मूलं समासतो दुःखमवैहि जन्म।सर्वौषधीनामिव भूर्भवाय सर्वापदां क्षेत्रमिदं हि जन्म। ॥७॥

इसलिए संक्षेप में जानो कि जरा आदि विपत्तियों का मूल जन्मरूपी दुःख है, जैसे सभी औषधियों की उत्पत्ति भूमि से होती है वैसे ही सभी विपत्तियों का (उत्पत्ति-) क्षेत्र जन्म है। ॥७॥

यज्जन्म रूपस्य हि सेन्द्रियस्य दुःखस्य तन्ने कविधस्य जन्म। यः संभवश्चास्य समुच्छ्रयस्य मृत्योश्च रोगस्य च संभवः सः। ॥८॥

इन्द्रियों सहित रूप की जो उत्पत्ति है वही उत्पत्ति (कारण) है अनेक प्रकार के दुःख का । इस शरीर का जो कारण है वही कारण है मृत्यु और रोग का । ॥८॥

सद्वाप्यसद्वा विषमिश्रमन्नं यथा विनाशाय न धारणाय ।लोके तथा तिर्यगुपर्यधो वा दुःखायसर्वंन सुखाय जन्म । ।।९॥

जैसे विष मिला हुआ अन्न, अच्छा हो या बुरा, विनाशक ही होता है न कि रक्षक या पोषक, वैसे ही संसार में पशु-पक्षियों की ऊपर या नीचे की योनि में कहीं भी जन्म लेना दुःख का ही कारण होता है, सुख का नहीं । ।।९॥ 

जरादयो नैकविधा प्रजानां सत्यां प्रवृत्तौ प्रभवन्त्यनर्थाः।प्रवात्सु घोरेष्वपि मारुतेषु न ह्यप्रसूतास्तरवश्चलन्ति । ॥१०॥

सांसारिक प्रवृत्ति के रहते प्राणियों को बुढापा आदि अनेक प्रकार की विपत्तियां होती हैं । (किंतु प्रवृत्ति अर्थात् जन्म के अभाव में उन्हें ये विपत्तियां नहीं सहनी पड़ती हैं), जैसे भीषण आंधी के चलते रहने पर भी अनुत्पन्न वृक्ष चलायमान नहीं होते । ॥१०॥

आकाशयोनिः पवनो यथा हि यथा शमीगर्भशयो हुताश ।आपो यथान्तर्वसुधाश्याश्च दुःख तथा चित्तशरीरयोनि। ॥ ११॥

जैसे आकाश में हवा की उत्पत्ति होती है, शमी नामक लकड़ी के भीतर अग्नि रहती है‌ और पृथ्वी के भीतर पानी रहता है वैसे ही चित्त और शरीर में दुःख की उत्पत्ति होती है । ॥११॥

अपां द्रवत्वं कठिनत्वमुर्व्या वायोश्चलत्व ध्रूषमौष्ण्यमग्नेः । यथा स्वभावो हि तथा स्वभावो दुःखं शरीरस्य च चेतसञ्च ॥१२॥

पानी का द्रवत्व, पृथ्वी की कठोरता (ठोस होने का गुण); हवा की अस्थिरता और अग्नि की उष्णता स्वभाव है, वैसे ही चित्त और शरीर का स्वभाव दुःख है। ॥१२॥

काये सति व्याधिजरादि दुःखं क्षुत्तर्षवर्षोष्णहिमादि चैव ।रूपाश्रिते चेतसि सानुबन्धे शोकारतिक्रोधभयादि दुःखं । ॥१३॥

शरीर के रहते रोग, बुढ़ापा आदि तथा भूख-प्यास, गर्मी-सर्दी, वर्षा आदि दुःख होते ही हैं वैसे ही रूप में आश्रित तथा अनुबन्ध-युक्त चित्त में शोक, अरति, क्रोध, भय आदि दु:ख होते ही हैं। ॥१३॥

प्रत्यक्षमालोक्य च जन्मदुःखं दुःख तथातीतमपीति विद्धि । यथा च तद्दुःखमिद च दुःख दुःखं तथानागतमप्यवेहि ॥१४॥

जन्म के दुःख को प्रत्यक्ष देखकर बीते हुए दुख को भी वैसा ही समझो और जैसा कि वह (बीता हुआ) दुःख था और यह (वर्तमान) दुःख है वैसा ही भावी दु:ख को भी समझो । ॥१४॥ 

बीजस्वभावो हि यथेह दृष्टो भूतोऽपि भव्योऽsपि तथानुमेय । प्रत्यक्षतश्च ज्वलनो यथोष्णो भूतोऽपि भव्योऽपि तथोष्ण एव ।॥१५।।

बीज का जैसा स्वभाव यहाँ देखा जाता है वैसा ही (अतीत में) था और वैसा ही (भविष्य में) रहेगा भी, यह अनुमान करना चाहिए और अग्नि प्रत्यक्ष में जैसी गर्म है वैसी ही गर्म थी और रहेगी भी।॥१५॥

तन्नामरूपस्य गुणानुरूपं यत्रैव निवृत्तिरुदारवृत्त । तत्रैव दुःखं न हि तद्विमुक्तं दु.खं भविष्यत्यभवद्भवेद्वा ॥१६॥

हे उदार आचरण वाले, गुणो के अनुसार जहाँ नाम-रूप की निष्पत्ति होती है वहीं दुःख है, इसको छोड़कर और कहीं भी दुःख न है, न था और न होगा। ॥१६॥

प्रकृत्तिदुःखस्य च तस्य लोके तृष्णादयो दोषगणा निमित्तं । नैवेश्वरो न प्रकृतिने कालो नापि स्वभावो न विधिर्यदृच्छा ॥१७॥

संसार में इस प्रवृत्ति (जन्म) रूपी दुःख का कारण तृष्णा आदि दोषों का समूह है; ईश्वर, प्रकृति, काल, स्वभाव, विधि या संयोग इसका कारण नहीं है। ।।१७॥

ज्ञातव्यमेतेन च कारणेन लोकस्य दोषेभ्य इति प्रवृत्ति ।यस्मान्त्रियन्ते सरजस्तमस्का न जायते वीतरजस्तमस्कः । ॥१८॥

अतः जानना चाहिए कि दोषों (तृष्णा आदि) से ही संसार की उत्पत्ति होती है; जो रज (मन का मैल) और तम (चित्त का अन्धकार) से युक्त हैं वे (फिर से जन्म लेने के लिए) मरते हैं, किन्तु जिसका रज और तम नष्ट हो गया है वह फिर जन्म नहीं लेता है । ॥१८॥

इच्छाविशेषे सति तत्र तत्र यानासनादेर्भवति प्रयोगः।यश्मादतस्तर्षवशात्तथैव जन्म प्रजानामिति वेदितव्यं ॥१९॥

उस उस विषय को इच्छा होने पर ही चलने और बैठने आदि की क्रिया होती है, इसलिए जानना चाहिए कि तृष्णा के वशीभूत होने पर ही प्राणियों का जन्म होता है । ॥१९॥

सत्वान्यभिष्वङ्गवशानि दृष्ट्वा स्वजातिषु प्रीतिपराण्यतिव । अभ्यासयोगादुपपादितानि तैरेव दोषैरति तानि विद्धि ।।२०॥

जीव आसक्तियों के अधीन और अपने अपने जन्म (जीवन, योनि) से प्रीति करते हुए देखे जाते हैं ; (आसक्तियों और प्रीति के) अभ्यास के कारण ही वे उन दोषो के साथ फिर जन्म लेते हैं, ऐसा जानना चाहिए । ।।२०॥

क्रोधप्रहर्षादिभिराश्रयाणामुत्पद्यते चेह यथा विशेषः ।तथैव जन्मस्वपि नैकरूपो निर्वर्तते क्लेशकृतो विशेषः। ॥२१॥

जैसे इस संसार में क्रोध और प्रसन्नता आदि के द्वारा प्राणियों में विशेषता होती है (अर्थात् कोई क्रोधी, कोई प्रसन्नचित्त होता है) वैसे ही भिन्न भिन्न जन्मों में अपने अपने दोषों के कारण उनमें अनेक प्रकार की विशेषता होती है । ॥२१॥

दोषाधिके जन्मनि तीव्रदोष उत्पद्यते रागिणि तीव्ररागः ।मोहाधिके मोहबलाधिकश्च तदल्पदोषे च तदल्पदोषः ।।२२॥

जिसमें दोषों की अधिकता होती है उसका जन्म होने पर तीव्र दोष उत्पन्न होता है, जिसमें (अत्यन्त) राग होता है उसका जन्म होने पर तीव्र राग उत्पन्न होता है, जिसमें मोहाधिक्य होता है उसका जन्म होने पर मोह-बल की अधिकता होती है और जिसमें अल्प दोष होता है उसका जन्म होने पर अल्प दोष होता है । ॥२२॥

फलं हि यादृक् समवैति साक्षात्तदागमाद्वीजमवैत्यतीतं ।अवेत्य बीजप्रकृति च साक्षादनागतं तत्फलमभ्युपैति ॥२३॥

मनुष्य फल को साक्षात् जैसा देखता है, उसी के अनुसार उसके ही अतीत (पूर्व) बीज को (वैसा ही) सममझ लेता है और बीज के स्वभाव को साक्षात देखकर उसके अनागत (भावी) फल को भी समझ लेता है। ॥२३॥

दोषक्षयो जातिषु यासु यस्य वैराग्यतस्तासु न जायते सः । दोषाशयस्तिष्ठति यस्य यत्र तस्योपपत्तिर्विवशस्य तत्र ॥२४॥

जिन (प्रकारों के) जन्मों में जिसके दोषों का नाश हो गया है उनमें वैराग्य होने के कारण वह फिर जन्म नहीं लेता; किन्तु जिन (प्रकारों के जन्मों) में जिसका दोषाशय रह जाता है उनमें वह विवश होकर जन्म लेता है। ॥२४॥

तज्जन्मनो नैकविधस्य सौम्य तृष्णादयो हेतव इत्यवेत्य ।तांश्छ्रन्धि दुखाद्यदि निर्मुमुक्षा कार्यक्षयः कारणसंक्षयाद्धि। ॥२५।।

इसलिए, हे सौम्य, अनेक प्रकार के जन्मों का कारण हैं तृष्णा आदि दोष; यदि दुःख से मुक्त होने की इच्छा है तो उन दोषों को काटो, क्योंकि कारण के नाश से कार्य का नाश होता है। ॥२५॥

दुःखक्षयो हेतुपरिक्षयाच्च शान्तं शिवं साक्षिकुरुष्व धर्मं।तृष्णाविरागं लयनं निरोधं सनातनं त्राणमहार्यमार्यं। ॥२६॥

कारण का नाश होने से दुःख का नाश होता है। शान्त एवं मङ्गल-मय धर्म का साक्षात्कार करो, जो तृष्णा-विनाशक, आश्रय रूप, निरोध-रूप, सनातन, रक्षक, अविनाशी और पवित्र है। ॥२६॥

यस्मिन्न जातिर्न जरा न मृत्युर्न व्याधयो नाप्रियसंप्रयोगः ।नेच्छाविपन्न प्रियविप्रयोगः क्षेमं पदं नैष्ठिकमच्युतं तत् ॥२७॥

(उस पद की खोज करो) जिसके प्राप्त होने पर न जन्म होता है, न बुड़ापा, न मृत्यु, न व्याधि, न अप्रिय-संयोग, न इच्छा-विघात (या इच्छा रूपी विपत्ति) और न प्रिय वियोग; वह कल्याण-कारी पद नैष्ठिक और अक्षय है। ॥२७॥

दीपो यथा निवृतिमभ्युपेतो नैवावनिं गच्छति नान्तरिक्षं ।दिशं न कांचिद्विदिशं न कोचित्स्नेहक्षयात्केवलमेति शान्तिं ॥२८॥

जिस प्रकार निर्वाण को प्राप्त हुआ दीप न पृध्वी पर रहता है, न आकाश में जाता है, न किसी दिशा या विदिशा में; किंतु तेल समाप्त हो जाने पर केवल शान्ति को प्राप्त होता है; ॥२८॥

एवं कृती निर्वृतिमभ्युपेतो नैवावनिं गच्छति नान्तरिक्षं।दिशं न कांचिद्विदिशं न कांचित्क्लेशक्षयात्केवलमेति शान्तिं। ॥२९॥

उसी प्रकार निर्वाण को प्राप्त हुआ धन्य (पुण्यात्म, पवित्र साधु) पुरुष न पुथ्वी पर रहता है, न आकाश में जाता है, और न किसी दिशा या विदिशा में ही; किंतु क्लेशों (पापों, दोषों) का नाश होने पर केवल शान्ति को प्राप्त होता है। ॥२९॥

अश्याभ्युपायोऽधिगमाय मार्ग: प्रज्ञात्रिकल्प: प्रशमद्विकल्पः। स भावनीयो विधिवद्बुधेन शीले शुचौ त्रिप्रमुखे स्थितेन। ॥३०॥

इसकी प्राप्ति का उपाय है वह मार्ग, जो त्रिविध प्रज्ञा एवं द्विविध शान्ति से युक्त है; पवित्र त्रिविध शील में स्थित होकर बुदिमान् मनुष्य को उस (मार्ग) की भावना करनी चाहिए। ॥३०॥

वाक्कर्म सम्यक् सहकायकर्म यथावदाजीवनयश्च शुद्धः।इदं त्रयं वृत्तविधौ प्रवृत्तं शीलाश्रयं कर्मपरिग्रहाय। ॥३१॥

वाणी और शरीर के सम्यक् कर्म और शुद्ध आजीविका - ये तीनों आचरण से सम्बन्धित हैं, इनका आश्रय शील है, इनके द्वारा कर्मों का निग्रह होता है। ॥३१॥

सत्येषु दुःखदिषु दृष्टिरार्या सम्यग्वितर्कश्व पराक्रमश्च। इदं त्रयं ज्ञानविधौ प्रवृत्ं प्रज्ञाश्रयं क्लेशपरिक्षयाय। ॥३२॥

दुःख आदि सत्यों के विषय में सम्यक दृष्टि, सम्यक विचार और सम्यक् प्रयत्न ये तीन ज्ञान से सम्बन्धित हैं, इनका आश्रय प्रज्ञा है, इनके द्वारा क्लेशों का नाश होता है। ॥३२॥

न्यायेन सत्याधिगमाय युक्ता सम्यक् स्मृति: सम्यगथो समाधिः। इदं द्वयं योगविधौ प्रवृत्तं शमाश्रयं चित्तपरिग्रहाय। ॥३३॥

सम्यक् स्मृति, जो सत्य की प्राप्ति में न्यायपूर्वक लगी हुई हो तथा सम्यक समाधि - ये दो योग से सम्बन्धित हैं, इनका आश्रय शम (शान्ति) है, इनके द्वारा चित्त का निग्रह होता है। ॥३३॥

क्लेशांकुरान्न प्रतनोति शीलं बीजांकुरान काल इवातिषृत्तः। शुचौ हि शीले पुरुषस्य दोषा मनः सलज्जा इव धर्षयन्ति। ॥३४।।

शील के रहते क्लेशों (दोषों) के अंकुर नहीं पनप सकते, जैसे अकाल में बीजों से अंकुर नहीं उग सकते। पवित्र शील में रहने वाले मनुष्य के मन पर आक्रमण करने में दोष भी मानो लज्जित होते हैं। ॥३४॥

क्लेशांस्तु विष्कम्भयते समाधिर्वेगानिवाद्रिर्महतो नदीनां।स्थिते समाधौ हि न धर्षयन्ति दोषा भुजंगा इव मन्त्रबद्धाः। ॥३५॥

समाधि क्लेशों को रोकती है, जैसे पर्वत नदियों के महावेग में रुकावट डालता है। समाधिस्थ होने पर मन्त्र-बद्ध सर्पों के समान दोष आक्रमण नहीं कर सकते। ॥३५॥

प्रज्ञा त्वशेषेण निहन्ति दोषांस्तीरद्रुमान्प्रावृषि निम्नगेव।दग्धा यया न प्रभवन्ति दोषा वज्राग्निनेवानुसृतेन वृक्षा: ॥३६॥

प्रज्ञा दोषों को नि:शेष मार डालती है, जैसे वर्षाकाल में नदी अपने तटवर्ती वृक्षों को उखाड़ फेंकती है। प्रज्ञा से दग्ध होकर दोष उत्पन्न नहीं होते, जैसे फैलती हुई वज्राग्नि से वृक्ष जलकर नहीं पनपते। ॥३६॥

त्रिस्कन्धमेतं प्रविगाह्य मार्गं प्रस्पष्टमष्टाङ्गमहार्यमार्य।दुःखस्य हेतून्प्रजहाति दोषान्प्राप्नोति चात्यन्तशिवं पदं तत् । ॥३७॥

(शील-समाधि-प्रज्ञा रूपी) तीन स्कन्धों वाले इस स्पष्ट आर्य अष्टाङ्गिक अविनाशी मार्ग पर आारूढ होकर मनुष्य दुःख हेतुरूप दोषों को छोड़ता है और उस अत्यन्त मङ्गलमय (निर्वाण-) के पद को प्राप्त करता है। ॥३७॥

अस्योपचारे धृतिरार्जवं च ह्रीरप्रमादः प्रविविक्तता च। अल्पेच्छता तुष्टिरसंगता च लोकप्रवृत्तावरतिः क्षमा च। ॥३८॥

इस (दुःख) के उपचार में धैर्य, सरलता, लज्जा, अप्रमाद (सावधानी), एकान्त, अल्पेच्छता, संतोष, आसक्ति के अभाव, सांसारिक प्रवृत्ति में अरुचि और क्षमा की आवश्यकता होती है। ॥३८॥

याथात्म्यतो विन्दति यो हि दुःखं तस्योद्भवं तस्य च यो निरोधं। आर्येण मार्गेण स शान्तिमेति कल्याणमित्रैः सह वर्तमान:। ॥३९॥

जो मनुष्य दुःख, उसकी उत्पत्ति और उसके निरोध को ठीक-ठीक जानता है, वह कल्याण-कारी मित्रों के साथ रहता हुआ आर्य मार्ग से चलकर शान्ति प्राप्त करता है। ॥३९॥

यो व्याधितो व्याधिमवैति सम्यग् व्याधेर्निदानं च तदौषधं च। आरोग्यमाप्नोति हि सोऽचिरेण मित्रैरभिज्ञैरुपचर्यमाणः। ॥४०॥

जो रोगी रोग, रोग-निदान और रोग की औषधि को ठीक-ठीक जानता है वह निपुण मित्रों की चिकित्सा में रहकर शीघ्र आरोग्य प्राप्त करता है। ॥४०॥

तद्व्याधिसंज्ञां कुरु दुःखसत्ये दोषेष्वपि व्याधिनिदानसंज्ञां। आरोग्यसंज्ञां च निरोधसत्ये भैषज्यसंज्ञामपि मार्गसत्ये। ॥४१।।

इसलिए दुःख-सत्य को रोग, दोषों को रोग-निदान, निरोध-सत्य को आरोग्य, तथा मार्ग-सत्य को औषध समझो। ॥४१॥

तस्मात्प्रवृत्तिं परिगच्छ दुःखं प्रवर्तकानप्यवगच्छ दोषान् ।निवृत्तिमागच्छ च तन्निरोधं निवर्तकं चाप्यवगच्छ मार्ग। ॥४२॥

इसलिए दुःख को प्रवृति, दोषों को प्रवर्तक (प्रवृत्ति के कारण), निरोध को निवृत्ति और मार्ग को निवर्तक (निवृत्ति का उपाय) समझो। ॥४२॥

शिरस्यथो वासग्नि संप्रदीप्ते सत्यावबोधाय मतिर्विचार्या ।दग्धं जगत्सत्यनयं ह्यदृष्ट्वा प्रदह्यते संप्रति धक्ष्यते च। ॥४३॥

शिर और वस्त्र के जलते रहने पर भी सत्य के समझने में अ्पनी बुद्धि को लगाओ; क्योंकि सत्य को नहीं देखने के कारण यह संसार जला है, संप्रति जल रहा है और जलेगा। ॥४३॥

यदैव य: पश्यति नामरूपं क्षयीति तद्दर्शनमस्य सम्यक् ।सम्यक्च निर्वेदमुपैति पश्यन्नन्दीक्षयाच्च क्षयमेति राग: ॥४४॥

जब मनुष्य नामरूप (पंच-स्कन्ध, corporeality) को नाशवान देखता है तब वह ठीक-ठीक देखता है; और ठीक-ठीक देखता हुआ वह सम्यक निर्वेद (वैराग्य) को प्राप्त होता है और नन्दी (तृष्णा) का नाश होने से उसका राग नष्ट हो जाता है। ।।४४॥

तयोश्च नम्दीरजसोः क्षयेण सम्यग्विमुक्त' प्रवदामि चेतः ।सम्यग्विमुक्तिर्मनसश्च ताभ्यां न चास्य भूयः करणीयमस्ति। ॥४५॥

नन्दी (तृष्णा) और राग का नाश होने से, मैं कहता हूँ, उसके चित्त की सम्यक मुक्ति होती है और इन दोनों से चित्त की सम्यक मुक्ति होने पर उसके लिए और कुछ करने को नहीं रह जाता है। ॥४५॥

यथास्वभावेन हि नामरूपं तध्देतुमेवास्तगमं च तस्य ।विजानतः पश्यत एव चाहं ब्रवीमि सम्यक्क्षयमास्रवाणां ॥४६॥

जो मनुष नामरूप के वास्तविक स्वभाव, उसके कारण और उसके नाश होने को देखता और जानता है, मैं कहता हूँ , उसके आस्रव (चित्त-मल) अत्यन्त क्षीण हो जाते हैं । ।।४६।।

तस्मात्परं सौम्य विधाय वीरयें शीघ्रं घटस्वास्त्र वसंक्षयाय । दुःखाननित्यांश्च निरात्मकांश्च धातून्विशेषेण परीक्षमाणः । ।।४७।।

इसलिए, हे सौम्य, खूब उद्योग करके आस्रवों को नष्ट करने की चेष्टा करो और दुःखरूप अनित्य तथा अनात्म धातुओं की विशेष रूप से परीक्षा करो। ॥४७॥

धातून्हि षड् भूसलिलानलादीन्सामान्यतः स्वेन च लक्षणेन । अवैति यो नान्यमवैति तेभ्यः सोऽत्यन्तिकं मोक्षमवैति तेभ्यः। ॥४८॥

जो मनुष्य पृथ्वी, जल, अग्नि आदि छः धातुओं को सामान्य रूप से और विशिष्ट रूप से समझता है और जो उनको छोड़कर और कुछ नहीं है ऐसा समझता है, वह उनसे होने वाली आत्यन्तिक मुक्ति को समझता है। ॥४८॥

Sunday, January 17, 2021

बोधिसत्व का चिन्तन-नैरात्म

बोधिसत्त्व के दर्शन चिन्तन को एक शब्द द्वारा व्यक्त किया जा सकता हैं और वह शब्द है 'प्रज्ञा'। प्राणियों एवं वस्तुओं के विषय में यथाभूत ज्ञान को प्रज्ञा कहते हैं। प्रज्ञा दु:ख का नाश करके सुख प्रदान करती हैं, यह बोधिदात्री एवं मुक्तिदायिनी हैं। 

अनित्यता का ज्ञान होना प्रज्ञा का प्रथम लक्षण हैं। संसार परिवर्तनशील है, इसके सभी प्राणी एवं सारी वस्तुएँ अनित्य हैं। इस तथ्य का बोध प्रज्ञा की पहचान हैं। यह शरीर आत्मा रहित हैं। सभी प्राणी और सभी धर्म अनात्मक एवं निरात्मक हैं। यहाँ कोई चीज़ ऐसी नहीं हैं जिसको कोई व्यक्ति 'अपना', 'मेरा' अथवा 'मैं' कह सकता हैं। आत्मा की सत्ता का विचार एक भयंकर भ्रान्ति हैं, एक महामारी हैं, जिससे प्राणी पीड़ित एवं परेशान रहते हैं। यही विचार अहंकार एवं ममकार का मूल स्रोत हैं और सारे क्लेश इसी विचार से उत्पन्न होते हैं। निर्वाण अथवा मोक्ष की प्राप्ति के लिये आत्मवाद से छुटकारा होना परमावश्यक हैं। आपके सामने दो विकल्प हैं आत्मा और मोक्ष। दोनो में से आप एक को चुन सकते हैं। संसार में भ्रमण करना और दु:ख-सुख भोगना पसन्द हैं तो आत्मवाद अपनाइये, अकथनीय, अचिन्तनीय एव निरविकल्प शान्ति का साक्षात्कार करना पसन्द हैं तो मोक्ष की गवेषणा कीजिये। मोक्ष में न तो आत्मा हैं और न शरीर। जहां आत्मा का ही अस्तित्व नही रहता वहा परमात्मा का विचार उत्पन्न नहीं हो सकता हैं। अतएव सुख और दु:ख, आत्मा और परमात्मा, जीवन और जगत, कर्म और फल, पुण्य और पाप, मैं और आप, संसार और निर्वाण आदि के भेद मोक्ष में नहीं होते हैं। नैरात्म्य-दर्शन ही प्रज्ञा हैं। यही बोधिसत्व के चिन्तन का हृदय हैं। नैरात्म्य को शुन्यता भी कहते हैं क्योंकि वह विकल्पों, प्रपन्चो, धारणाओं एवं गुणों से सर्वथा मुक्त हैं। नैरात्म्य अथवा शून्य कोई चीज़ या वस्तु नहीं हैं, उसमें या उसकी कोई चीज़ या वस्तु भी कहते हैं। उसको आप 'कुछ' भी नहीं कह सकते हैं। कुछ भी कहना प्रपन्च करना हैं, वह मन व वाणी का विषय नहीं हैं। सभी मतो, दृष्टियों, विचारों, कल्पनाओ, रूपों एवं संकेतो का अतिक्रमण करके यह नैरात्म्य अथवा शून्य अथवा परमार्थ नामो से अभिहित निर्वाण अथवा मोक्ष सिद्ध होता हैं। 

प्रश्न उठता हैं जब आदमी की ही सत्ता नहीं हैं तो निर्वाण किसका होता हैं? यह प्रश्न अविद्या, अहंकार एवं भय के मिश्रण से हुई स्थिति में उत्पन्न होता हैं। 'मेरी आत्मा', 'मेरी आत्मा की रक्षा', 'मेरी आत्मा की मुक्ति आदि इस प्रकार के विचार अविद्या की उपज हैं। 

Tuesday, January 5, 2021

सौन्दरनन्द, आदि-प्रस्थान

सौन्दरनन्द (महाकाव्य) चतुर्दश सर्ग, आदि-प्रस्थान 

अथ स्मृतिकवाटेन पिधायेन्द्रियसंवरं । भोजने भव मात्राज्ञो ध्यानायानामयाय च ।।१॥

स्मृतिरूपी किवाड़ से इन्द्रियरूप बांध को बन्द करके ध्यान और आारोग्य के लिए भोजन की मात्रा जानो ॥१॥ 

प्राणापानौ निगृह्रति ग्लानिनिद्रे प्रयच्छति । कृतो ह्यत्यर्थमाहारो विहन्ति च पराक्रमं ॥२॥

यदि अधिक भोजन किया जाय तो वह प्राण-वायु और अपान-वायु में रुकावट डालता हैं, आलस्य और नींद लाता हैं, तथा पराक्रम की हत्या करता हैं ।।२॥

यथा चात्यर्थमाहारः कृतोंऽनर्थाय कल्पते ।उपयुक्तस्तथात्यल्पो न सामर्थ्याय कल्पते ॥३॥

जिस प्रकार अधिक भोजन करने से अनर्थ होता हैं उसी प्रकार अत्यल्प भोजन करने से शक्ति नहीं होती हैं॥३॥

आचयं द्युतिमुत्साहं प्रयोगं बलमेव च। भोजनं कृतमत्यल्पं शरीरस्यापकर्षनि ॥४॥

अत्यल्प भोजन करने से शरीर की पुष्टि, कान्ति, उत्साह, प्रयोग और बल का र्हास होता हैं।।४॥

यथा भारेण नमते लघुनोन्नमते तुला। समातिष्ठति युक्तेन भोज्येनेयं तथा तनुः ॥५॥

जैसे अधिक भार से तुल्ला (पलढ़ा) मुकरती हैं, हलके भार से खठती हैं और उचित भार से समान रहती हैं उसी प्रकार (अधिक अल्प एवं युक्त) आहार से यह शरीर (क्रमशः भारी, क्षीण और ठीक होता हैं) ॥५॥

तस्मादभ्यवहर्तव्यं स्वशक्तिमनुपश्यता । नातिमात्रं न चात्यल्पं मेयं मानवशादपि ॥६॥

इस लिए अपनी शक्ति को देखते हुए भोजन करना चाहिए; मान के वशीभूत होकर भी न बहुत अधिक और न बहुत कम ही खाना (मापना, काढना) चाहिए ॥६॥

अत्याक्रान्तो हि कायाग्निर्गुरुणान्नेन शाम्यति । अवच्छन्न इवाल्पोऽग्निः सहसा महतेन्धसा ॥७॥

शरीर की अग्नि अन्न के भार से दबकर ऐसे शान्त हो जाती हैं जैसे थोड़ी सी आग इठात ही जलावन के बोझ से ढककर बुझ जाती हैं।।७।।

अत्यन्तमपि संहारो नाहारस्य प्रशस्यते । अनाहारो हि निर्वाति निरिन्धन इवानलः ॥८॥

भोजन बिल्कुल छोड़ देना भी प्रशंसनीय नहीं हैं; क्योंकि भोजन नहीं करने वाला मनुष्य इन्धन-रहित अग्नि के समान शान्त हो जाता हैं।।८।।

यस्मान्नास्ति विनाहारात्सर्वप्राणभृतां स्थिति:। तश्मा दुष्यति नाहारो विकल्पोऽत्र तु वार्यते ॥९॥ 

क्यों कि भोजन के बिना कोई भी प्राणी जीवित नहीं रह सकता, इसलिए भोजन में दोष नहीं हैं, किंतु भोजन-विशेष (भोजन का चुनाव) निषिद्ध हैं।।९॥

न ह्ये कविषयेऽन्यत्र सज्यन्ते प्राणिन्स्तथा । अविज्ञाते यथाहारे बोद्धव्यं तत्र कारणं ॥१०।।

प्राणी दूसरे किसी एक विषय में उतना आासक्त नहीं होते हैं, जितना कि अज्ञान (विशिष्ट ?) भोजन में, इसका कारण जानना चाहिए ।।१०॥

चिकित्सार्थं यथा धर्त्त व्रणस्याजपनं व्रणी।क्षुद्विधातार्थमाहारस्तद्वत्सेव्यो मुमक्षुणा ॥११॥

घायल आदमी जैसे घाव की चिकित्सा के लिए मलहम लगाता हैं, वैसे ही मुक्ति चाहने वाले को भूख मिटाने के लिए भोजन का सेवन करना चाहिए ।।११।।

भारस्याद्वहनार्थ च रथाक्षोऽभ्यज्यते यथा । भोजनं प्राणयात्रार्थ तद्वद्विद्वान्निषेवेते ॥१२॥

जैसे भार ढोने के लिए रथ के धुरे में चर्बी लगाई जाती हैं वैसे ही बुद्धिमान् मनुष्य जीवन-यात्रा के लिए भोजन का सेवन करता हैं ।।१२॥

समतिक्रमणार्थं च कान्तारस्य यथाध्वगौ । पुत्रमांसानि खादेतां दम्पती भृशदुःखितौ ॥१३॥

जिस प्रकार यात्री दम्पती मरुभूमि को पार करने के लिए अत्यन्त दुःखी होकर अपने पुत्र का मांस खायें, ॥१३॥

एवमभ्यवहर्तव्यं भोजनं प्रतिसंख्यया । न भूषार्थं न वपुषे न मदाय न द्दप्तये ॥१४॥

उसी प्रकार समझ-बूझ कर भोजन करना चाहिए; सौन्दर्य रूप मद या औद्धत्य के लिए नहीं खाना चाहिए ।।१४।।

धारणार्थ शरीरस्य भोजनं हि विधीयते । उपस्तम्भ: पिपतिषोदुर्बलस्येव वेश्मनः ॥१५॥

शरीर धारण करने के लिए ही भोजन विहित हैं, जैसे गिरते हुए दुर्बल घर की रक्षा के लिए उसमें उपस्तम्भ (खम्भा) लगाया जाता हैं ॥१५॥

प्लवं यत्नाद्यथा कश्चिद्वध्नीयाद्वारयेदपि । न तत्भ्नेहन यावत्तु महौधस्योत्तितीर्षया ॥१६॥

जैसे कोई मनुष्य नाव को, उसके स्नेह से नहीं किंतु बाढ़ पार करने की इच्छा से, यत्नपूर्वक बनाये और ढोये भी ॥१६॥

तथोपकरणै: कायं धारयन्ति परीक्षका: । न तत्स्नेहेन  यावत्तु दुःखौघस्य तितीर्षया ॥१७॥ 

वैसे ही दार्शनिक (योगाभ्यासी) लोग शरीर को, उसके स्नेह से नहीं किंतु दुःखरूप बाढ़ को पार करने की इच्छा से, (भोजन आदि आवश्यक) उपकरणों द्वारा धारण करते हैं ॥१७॥

शोचता पीड्यमानेन दीयते शत्रवे यथा । न भक्त्या नापि तर्षेण केवलं प्राणगुप्तये ॥१८॥

जैसे (शत्रु द्वारा) पीड़ित होकर कोई मनुष्य (द्रव्य आदि) जो कुछ शत्रु को देता हैं, वह भक्ति से नहीं, इच्छा से (या किसी वस्तु की तृष्णा से) नहीं, किंतु केवल प्राण-रक्षा के लिए ही शोकपूर्वक देता हैं, ॥१८॥

योगाचारस्तथाहारं शरीराय प्रयच्छति । केवलं क्षूद्विघातार्थ न रागेण न भक्तये। ॥१९॥॥

वैसे ही योगाभ्यासी मनुष्य शरीर को जो आहार देता हैं वह अनुराग या भक्ति से नहीं, किंतु केवल भूख मिटाने के लिए ही देता हैं। ॥१९॥

मनोधारणया चैव परिणाम्यात्मवानहः। विधूय निद्रां योगेन निशामप्यतिनामयेः। ॥२०।।

संयतात्म होकर दिवस को मनोनिग्रह में बिताओ और निद्रा को दूर करके रात्रि को भी योगाभ्यास में बिताओ। ॥२०॥

हृदि यत्संज्ञिनश्चैव निद्रा प्रादुर्भवेत्तव । गुणवत्संज्ञितां संज्ञां तदा मनसि मा कृथाः। ॥२१॥

संज्ञा (चेतना, होश) के रहते यदि तुम्हारे हृदय में निद्रा का प्रादुर्भाव हो तो उस संज्ञा को अपने मन में उत्तम संज्ञा मत समझो। ॥२१॥

धातुरारम्भधृत्योश्च स्थामविक्रमयोरपि । नित्यं मनसि कार्यस्ते बाध्यमानेन निद्रया ॥२२।।

नींद से पीड़ित होने पर आरम्भ (उद्योग) और धैर्य तथा शक्ति और पराक्रम के तत्वों का अपने मन में चिन्तन करो ॥२२॥

आम्नातव्याश्च विशदं ते धम्मा ये परिश्रुताः। परेभ्यश्चोपदेष्टव्याः संचिन्त्याः स्वयमेव च ॥२३।।

जिन धर्मों को तुमने सुना हैं उनका साफ साफ पाठ करो, दूसरों को उपदेश दो और स्वयं भी चिन्तन करो। ॥२३॥

प्रक्लेद्यभ्दिर्वदनं विलोक्याः सर्वतो दिशः। चार्या दृष्टिश्च तारासु जिजागरिषुणा सदा ॥२४॥

सदा जागरण की इच्छा करने वाले को जल से मुख भिगोना चाहिए, चारों ओर दृष्टि-पात करना चाहिए और ताराओं की ओर देखना चाहिए ॥२४।।

अन्तर्गतैरचपलैवंशस्थायिभिरिन्द्रियैः । अविक्षप्तेन मनसा चंक्रम्यस्वास्व वा निशि ॥२५॥

इन्द्रियों को भीतर की ओर (अन्तर्मुख), स्थिर और वश में करके शान्त चित्त से चंक्रमण (चहल कदमी) करो या बैठे रहो ।।२५॥

भये प्रीतौ च शोके च निद्रया नाभिभूयते ।तस्मान्निद्राभियोगेषु सेवितव्यमिदं त्रयं ॥२६॥

भय, प्रीति और शोक में मनुष्य निद्रा से पीड़ित नहीं होता है, इसलिए निद्रा का आक्रमण होते समय इन तीनों का सेवन करना चाहिए ॥२६॥

भयमागमनान्मृत्योः प्रीतिं धर्मपरिग्रहात् ।जन्मदुःखादपर्यंताच्छोकमागन्तुमर्हसि ॥२७॥

मृत्यु आ रही हैं इस प्रकार (मृत्यु से) भय, धर्म ग्रहण कर रहा हूँ इस प्रकार (धर्म से) प्रीति और जन्म का दुःख अनन्त हैं; इस प्रकार (जन्म के लिए) शोक करना चाहिए ॥२७৷।

एवमादिः क्रमः सौम्य कार्यो जागरणं प्रति । वन्ध्यं हि शयनादायुः कः प्राज्ञः कर्तुमर्हति ॥२८।।

जागरण के लिए, हे सौम्य, इस और ऐसे ही क्रम का सेवन करना चाहिए; क्योंकि कौन ज्ञानवान् मनुष्य सोकर पनी आयु को निष्फल करेगा ? ॥२८।।

दोषव्यालानतिक्रम्य व्यालान गृहगतानिव । क्षमं प्राज्ञस्य न स्वप्तुं निस्तितीर्षोर्महद्भयं ॥२९॥

जैसे घर में रहने वाले साँपों की अवहेलना करके समझदार आदमी के लिए सोना उचित नहीं हैं, वैसे ही दोषरूपी सर्पों की उपेक्षा करके महाभय को पार करने की इच्छा करने वाले ज्ञानी के लिए सोना उचित नहीं हैं। ॥२९॥

प्रदीप्ते जीवलोके हि मृत्युव्याधिजराग्रिभिः । क: शयीत निरुद्वेगः प्रदीप्त इव वेश्मनि। ॥३०।।

जैसे जलते हुए घर में कोई भी आदमी निश्चिंत होकर नहीं सो सकता, वैसे ही मृत्यु, व्याधि और जरारूपी अग्नियों से प्रज्वलित जीव-लोक में कौन निर्भय होकर सोयेगा ? ॥३०॥

तस्मात्तम इति ज्ञात्वा निद्रां नावेष्टुमर्हसि । अप्रशान्तेषु दोषषु सशस्त्रेष्विव शत्रुषु ॥३१॥

इसलिए जब तक शस्त्र-युक्त शत्रुं के समान तुम्हारे दोष शान्त नहीं हो जाते तब तक निद्रा को मानसिक अन्धकार समझकर अपने को उसके वशीभूत न होने दो। ॥३१॥

पूर्व यामं त्रियामायाः प्रयोगेणातिनाम्य तु । सेव्या शय्या शरीरस्य विश्रामार्थ स्वतन्त्रिणा ॥३२॥

तीन प्रहर वाली रात्रि के प्रथम प्रहर को योगाभ्यास में बिताकर, (दूसरे प्रहर में) शरीर के विश्राम के लिए सावधान होकर शस्या का सेवन करो ।।३२।।

दक्षिणेन तु पार्श्वेन स्थितयालोकसंज्ञया । प्रबोधं हृदये कृत्वा शयीथा: शान्तमानसः॥३३॥

दाई करवट से, आलोक (प्रकाश) की भावना करते हुए, हृदय में ज्ञान (होश) रखकर, शान्तचित्त होकर सोओ ।।३३॥

यामे तृतीये चोत्थाय चरन्नासीन एव वा । भूयो योगं मनःशुद्धौ कुर्वीथा नियतेन्द्रियः ॥३४॥

और तीसरे पहर में उठकर, टहलते हुए या बैठे हुए ही, संयतेन्द्रिय होकर मानसिक शुद्धि में पुनः योगारूढ़ हो जाओ ॥३४।।

अथासनगतस्थानप्रेक्षतव्याहृतादिषु । सं?जानन् क्रियाः सर्वाः स्मृतिमाधातुमर्हसि ॥३५॥

बैठते, चलते, खड़ा होते, देखते, बोलते और ऐसे ही दूसरे कार्य करते समय, अपने सभी कार्यो को अच्छी तरह जानते हुए (अनुभव करते हुए), अपनी स्मृति (जागरूकता) को स्थिर रखो ॥३५॥

द्वाराध्यक्ष इव द्वारि यस्य प्रणिहिता स्मृतिः । धर्षयन्ति न तं दोषाः पुरं गुप्तमिवारय: ॥३६॥

द्वार पर नियुक्त द्वाराध्यक्ष के समान जिसकी स्मृति स्थिर हैं उसके ऊपर दोषों का आक्रमण नहीं होता हैं जैसे कि रक्षित नगर पर शत्रुओं का आक्रमण नहीं होता हैं। ॥३६॥

न तस्योत्पद्यते क्लेशो यस्य कायगता स्मृतिः । चित्तं सर्वास्ववस्थासु बालं धात्रीव रक्षति ॥३७॥

उस मनुष्य को कोई क्लेश (दोष) नहीं हो सकता जिसकी काय-गत (शरीर में लगी हुई) स्मृति सभी अवस्थाओं में उसके चित्त की रक्षा करती हैं, जैसे धाई बालक की रक्षा करती हैं। ॥३७॥

शरव्यः स तु दोषाणां यो हीन: स्मृतिवर्मणा। रणस्थः प्रतिशत्रूणो विहीन इव वर्मणा ॥३८॥

दोषों का लक्ष्य वही आदमी होता हैं जो स्मृतिरूपी कवच से हीन हैं, जैसे प्रतिपक्षी शत्रुओं का लक्ष्य वही योद्धा होता हैं जो कवच से रहित हैं ॥३८॥

अनाथं तन्मनो ज्ञेयं यत्स्मृतिर्नाभिरक्षति । निर्णेता दृष्टरहितो विषमेषु चरन्निव ॥३९॥

स्मृतिद्वारा अरक्षित चित्त को वैसे ही अनाथ समझना चाहिए, जैसे पथ-प्रदर्शक के बिना विषम स्थलों पर चलता हुआ दृष्टि-रहित मनुष्य असहाय होता हैं ॥३९॥

अनर्थेषु प्रसक्ताश्च स्वार्थेभ्यश्च पराङ्मुखाः। यद्भये सति नोद्विग्न: स्मृतिनाशोऽत्र कारणं ॥४०॥

लोग अनर्थों में आसक्त होते हैं, स्वार्थों (अपने उत्तम लक्ष्य) से विमुख रहते हैं और भय के रहते उद्विग्न (भयभीत) नहीं होते हैं, इसका कारण हैं स्मृति-विनाश ॥४०॥

स्वभूमिषु गुणाः सर्वे ये च शीलादयः स्थिताः । विकीर्ण इव गा गोपः स्मृतिस्ताननुगच्छति ॥४१॥

स्मृति अपने अपने क्षेत्र में रहने वाले शील आदि सभी सद्गुणों का अनुसरण करती हैं, जैसे कि गोप बिखरी हुई गौओं का पीछा करता हैं। ॥४१॥

प्रनष्टममृतं तस्य यस्य विप्रसृता स्मृतिः । हस्तस्थममृतं तस्य यस्य कायगता स्मृतिः ॥४२॥

जिसकी स्मृति बहकी हुई हैं उसका अमृत (श्रेय) नष्ट हो गया। जिसकी स्मृति उसके शरीर (काया) में लगी हुई है उसके हाथ में अमृत हैं। ॥४२॥

आयों न्यायः कुतस्तस्य स्मृतिर्यस्थ न विद्यते । यस्यार्यों नास्ति च न्यायः प्रनष्टस्तस्य सत्पथः ॥४३॥

जिसको स्मृति नहीं हैं उनको आर्यं न्याय (सत्य) कहाँ से प्राप्त होगा? और जिसको आर्य न्याय (सत्य) प्राप्त नहीं हैं उसका सन्मार्ग नष्ट हो गया ॥४३॥

प्रनष्टो यस्य सन्मार्गो नष्टं तस्यामृतं पदं । प्रनष्टममृतं यस्य स दुःखान्न विमुच्यते ॥४४॥

जिसका सन्मार्ग नष्ट हो गया उसका अमृत पद (निब्बाण पद) नष्ट हो गया। जिसका अमृत पद नष्ट हो गया वह दुःख से मुक्त नहीं हो सकता ॥४४॥

तस्माच्चरन् चरोऽम्मीति स्थितोऽस्मीति च धिष्ठित: ।एवमादिषु कालेषु स्मृतिमाधातुमर्हसि ॥४५॥

इसलिए चलता हुआ 'चल रहा हूँ' खड़ा हुआ 'खड़ा हूं, ऐसे ही दूसरे कार्य करते समय अपनी स्मृति बनाये रहो ॥४५॥

योगानुनोमं विजनं विशब्दं शय्यासनं सौम्य तथा भजस्व । कायस्य कृत्वा हि विवेकमादौ सुखोऽधिगन्तुं मनसो विवेक: ॥४६॥

हे सौम्य, योग के अनुकूल निर्जन और निःशब्द शय्या और आसन का सेवन करो । क्योंकि पहले शरीर को एकान्त में कर लेने पर मानसिक एकान्त (एकाग्रता) आसानी से प्राप्त हो सकता हैं ।I४६॥

अलब्धचेत: प्रशमः सरागो यो न प्रचारं भजते विविक्तं ।स क्षण्यते ह्यप्रतिलब्धमार्गश्चरन्निवोर्व्यो बहुकण्टकार्या ॥४७॥

जो राग से मुक्त हैं, जो एकान्त में नहीं रहता हैं, और जिसने मानसिक शान्ति नहीं पाई हैं; वह मार्ग नहीं पा सकने के कारण कण्टकाकीर्ण भूमि पर चलते हुए के समान कष्ट पाता हैं ॥४७॥ 

अदृष्टतत्वेन परीक्षकेण स्थितेन चित्रे विषय प्रचारे । चित्तं निषेद्धुं न सुखेन शक्यं कृष्टादको गौरिव सस्यमध्यात् ॥४८॥

जिस परीक्षक (जिज्ञासु, योगी, दार्शनिक) ने तत्त्व का दर्शन नहीं किया हैं और जो विविध विषयों के बीच पड़ा हुआ वह अपने चित्त को आसानी से नहीं रोक सकता हैं, जैसे खेती खाने (चरने) वाले सांड को फसल के बीच से आसानी से नहीं हटाया जा सकता ॥४८॥

अनीर्यमाणस्तु यथानिलेन प्रशान्तिमागच्छति चित्रभानु: ।अल्पेन यत्नेन तथा विविक्तेष्वघट्टितं शान्तिमुपैति चेतः ॥४९॥

जिस प्रकार हवा से नहीं प्रेरित होती हुई अग्नि शान्त हो जाती हैं, उसी प्रकार एकान्त में प्रकम्पनरहित चित्त अल्प यत्न से शान्ति को प्राप्त होता हैं ॥४९॥

क्वचिद्भुक्त्वा यत्तद्वसनमपि यत्त्परिहितो वसन्नात्मारामः क्वचन विजने योऽभिरमते । कृतार्थ: स ज्ञेयः शमसुखरसज्ञः कृतमतिः परेषां संसर्ग परिहरति यः कण्टकभिव ॥५०॥

जहाँ कहीं भी जो-सो खाकर, जैसा-तैसा कपडा पहनकर, और जहाँ-कहीं भी रहकर जो आत्म-तुष्ट रहता हैं, निर्जन स्थान में रमण करता हैं और दूसरों के संसर्ग से ऐसे बचता हैं जैसे काँटे से, वह बुद्धिमान शान्ति-सुख के रस को जानता हैं और उसे ही कृतार्थ समझना चाहिए ॥५०॥

यदि द्वन्द्वारामे जगति विषयव्यग्रहृदये विविक्ते निर्द्वन्द्वो विहरति कृती शान्तहृदय: । ततः पीत्वा प्रज्ञारसममृतवत्तृप्तह्दयो विविक्तः संसक्तं विषयकृपणं शोचति जगत् ॥५१॥

(सुख-दुःख आदि) द्वन्द्वों में आनन्द पाने वाले एवं विषयों से व्यग्र हृदय वाले जगत् में यदि द्वन्द्व-रहित और शान्तहृदय होकर कोई पवित्रात्म एकान्त में विहार करता हैं, तो वह अमृत के समान प्रज्ञा-रस का पान कर तृप्तहृदय और अनासक्त हो जाता हैं तथा आसक्ति में पड़े हुए एवं विषयों के लिए आतुर जगत् के लिए शोक करता हैं॥५१॥

वस्रव्शून्यागारे यदि सततमेकोऽभिरमते यदि क्लेशोत्पादैः सह न रमते शत्रुभिरिव। चरन्नात्मारामो यदि च पिबति प्रीतिसलिलं ततो भुङ्क्ते श्रेष्ठं त्रिदशपतिराज्यादपि सुखं ॥५२॥

यदि वह सूने घर में सदा अकेला ही रमण करता हैं, यदि क्लेशों (दोषों) के कारणों से ऐसे दूर रहता हैं जैसे शत्रुओं से और यदि आत्म-तुष्ट रहता हुआ प्रीति-जल का पान करता हैं तो वह देवेन्द्र के राज्य से भी उत्तम सुख का भोग करता हैं ॥५२॥

सौन्दरनन्दे महाकाव्य आदिप्रस्थानो नाम चतुर्दश: सर्गः

सौन्दरनन्द महाकाव्य में 'आदि-प्रस्थान "नामक चतुर्दश सर्ग समाप्त ।


सौन्दरनन्द-महाकाव्य, आज्ञा-व्याकरण, सर्ग १८

सौन्दरानन्द महाकाव्य, अष्टादश (१८ वां) सर्ग, आज्ञा-व्याकरण (उपदेश): अथ द्विजो बाल इवाप्तवेदः क्षिप्रं वणिक् प्राप्त इवाप्तलाभः । जित्वा च रा...