Wednesday, April 29, 2020

भारत में बौध्दधर्म का उत्थान और पतन १

गौतम बुद्ध का निर्वाण विक्रम पूर्व ४२६ में हुआ था. उन्होने अपने सारे उपदेश मौखिक किये थे; तो भी उनके शिष्य उनके जीवनकाल में ही उसे कंठस्थ कर लिया करते थे. यह उपदेश दो प्रकार के थे--एक साधारण, धर्म और दर्शन के विषय में, और दूसरे भिक्षु भिक्षुणीयों के नियम. पहले को पालि भाषा में "धम्म" (धर्म) कहा गया हैं और दूसरे को "विनय" कहा गया. बुध्द के निर्वाण के बाद उनके प्रधान शिष्यों ने (भविष्य में मतभेद न हो जाये, इसलिए) उसी वर्ष में राजगृह (जिला पटना) की सातपर्णी गुहा में एकत्र हो, "धर्म" और "विनय" का संगायन किया. इसी को प्रथम-संगिती कहा जाता हैं. इस में महाकाश्यप भिक्षु-संघ के प्रधान (संघ-स्थविर) की हैसियत से धर्म के विषय में बुध्द के चिर-अनुत्तर 'आनन्द' से और बुध्द-प्रशंसित 'उपालि' से प्रश्न पुछते थे. अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, अमद्य सुकर्मो को पालि में 'शील' कहते हैं, और स्कंध (रुप,वेदना,संज्ञा,संस्कार,विज्ञान), आयतन (रुप, चक्षु, चक्षु-विज्ञान आदि), धातु (पृथ्वी, जल आदि) के सूक्ष्म दार्शनिक विचार को प्रज्ञा, दृष्टि, दर्शन या विपश्यना कहते हैं. बुध्द के उपदेशो में शील और प्रज्ञा दोनों पर ही पूरा जोर दिया गया हैं. "धर्म" के लिए पालि में दूसरा शब्द "सुत्त" (सुक्त/सुत्र) या "सुतन्त" भी आया हैं. प्रथम संगिती के स्थविर भिक्षुओं ने "धर्म" और "विनय" का इस प्रकार संग्रह किया. पीछे भीन्न-भीन्न भिक्षुओं ने उनको पृथक पृथक कंठस्थ कर, अध्ययन-अध्यापन का भार आपने ऊपर लिया. उनमे उन्होने "धम्म" या "सुत्त" की रक्षा का भार लिया, वह "धम्मधर", "सुत्तधर" या "सुत्तंतिक" (सौत्रांतिक) कहलाये. जिन्होंने "विनय" की रक्षा का भार लिया, वह "विनयधर" कहलाये. इनके अतिरिक्त सुत्तो में दर्शन-संबंधी अंश कहीं-कहीं बड़े ही संक्षिप्त रूप में थे. इन्हें "मातिका" (मात्रिका) कहते थे. इन मातिकाओं के रक्षक "मातिकाधर" कहलाये. पीछे मातिकाओं को समझाने के लिए जब उनका विस्तार किया गया, तब इसी का नाम "अभिधम्म" (अभिधर्म--धर्म में से) हुआ, और इसके रक्षक "अभिधम्मिक" (अभिधर्मिक) हुये.


प्रथम-संगिति के सौ साल बाद वैशाली के भिक्षुओं ने  विनय के कुछ नियमों की अवहेलना शुरु की. इस पर विवाद आरम्भ हुआ, और अन्त में फिर भिक्षु-संघ ने एक हो, उन विवाद-ग्रस्त विनयों पर अपनी राय दी; एवं "धर्म" और "विनय" का संगायन किया. इसी का नाम द्वितीय संगिती हुआ. कितने भिक्षु इस संगीती से सहमत न हुए और उन्होने अपने महासंघ का कौशाम्बी में पृथक सम्मेलन किया, तथा अपने मतानुसार धर्म और विनय का संग्रह किया. स्थविरों (वृध्द-भिक्षुओं) का अनुगमन करने वाला होने से, पहला समुदाय (निकाय) आर्यस्थविर या स्थविरवाद के नाम से प्रसिद्ध हुआ, और दूसरा महासांघिक के नाम से. इन्हीं दो समुदायों से अगले सवा सौ वर्षों में स्थविरवाद से --- वज्जिपुत्तक, महिशासक, धर्मगुप्तिक, सौत्रांतिक, सर्वास्तिवाद, काश्यपीय, संक्रांतिक, सम्मीतीय, पण्णागरिक, भद्रयानिक, धर्मोत्तरिय इ. और महासांघिक से -- गोकुलिक, एकव्यहारीक, प्रज्ञप्तिवाद (लोकोत्तरवाद), बाहुलिक, चैत्यवादी; यह १८ निकाय हुए. इनका मतभेद विनय और अभिधम्म की बातो को लेकर था. कोई कोई निकाय आर्यस्थविरों की तरह बुध्द को मनुष्य न मानकर उन्हें लोकोत्तर मानने लगे. वह बुध्द में अद्भुत और दिव्य-शक्तियों का होना मानते थे. कोई कोई बुध्द के जन्म और निर्वाण को दिखावा मात्र समझते थे. इन्ही भिन्न-भिन्न मान्यताओं के अनुसार उनके सुत्र और विनय में भी फर्क पडने लगा. बुध्द की अमानुषिक लिलाओं के समर्थन में नये-नये सुत्तो की रचना हुई. बुध्द के निर्वाण के प्राय: सवा दो सौ वर्ष बाद, सम्राट अशोक ने बौध्दधर्म ग्रहण किया. उनके गुरु मोग्गलिपुत्त तिस्स उस समय आर्यस्थविरों के संघ-स्थविर थे. उन्होने मतभेद दूर करने के लिए पटना में अशोक के बनाये गये "अशोकाराम" नामक मठ में भिक्षु-संघ के द्वारा चुने गये हजार भिक्षुओं का सम्मेलन किया. यही सम्मेलन तृतीय संगिति के नाम से प्रसिद्ध हुआ. इसी समय आर्यस्थविरों से निकाले सर्वास्तिवाद आदि ग्यारह निकायों ने नालन्दा में अपनी पृथक संगीति की. नालन्दा जो समय-समय पर बुध्द का  निवासस्थान होने से पुनीत स्थानों में गिनी जाती थी,  इसी समय सर्वास्तिवादीयों का मुख्य स्थान बन गयी. 

तृतीय संगिति समाप्त कर मोग्गलिपुत्त तिस्स ने सम्राट अशोक की सहायता से भिन्न-भिन्न देशो में धर्मप्रचारक भेजे. यह पहला मौका था जो एक भारतीय धर्म संगठित रुप में भारत की सिमा के बाहर प्रचारित होने लगा. यह प्रचारक जहां पश्चिम में यवन राजाओं के राज्यों (ग्रीस, मिस्र, सीरिया आदि देशों) में गये, वहां उत्तर में मध्य-एशिया तथा दक्षिण में ताम्रपर्णी (लंका) और सुवर्ण देश (बर्मा) में भी पहुँचें. लंका में अशोक के पुत्र तथा मोग्गलिपुत्त तिस्स के शिष्य महेन्द्र (महिंद) और उनकी सहोदरा संघमित्रा गयी. लंका के राजा देवानंपिय तिस्स बौध्दधर्म में दीक्षित हुए. कुछ ही दिनों में वहां की सारी जनता बौध्द हो गयी. आर्यस्थविरवाद का आरम्भ से ही यहा प्रचार रहा. बीच में, बारहवी तेरहवी शताब्दीयों में जब बर्मा और श्याम (थाईलैंड) का महायान बौध्दधर्म विकृत तथा जर्जरित हो, लुप्त होने लगा तब आर्यस्थविरवाद वहा भी सर्वव्याप्त हो गया. लंका में ही ईसा की प्रथम शताब्दी में सुत्र, विनय और अभिधर्म --- त्रिपिटक जो अब तक कंठस्थ चले आते थे, लेखनबध्द किये गये, और यही आज कल का पालि त्रिपिटक (तीन पिटक) हैं. 

त्रिपिटकाचार्य
राहुल सांकृत्यायन 



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