भगवान बुध्द ने पूजा-पाठ का निषेध किया था. उन्होने अपनी पूजा तक को सार्थक न कहकर धर्म-आचरण की ओर सबको प्रेरित किया था. ("आव्यावटा तुम्हे आनन्द होथ तथागतस्स सरीरपूजाय"----महापरीनिब्बाण सुत्त, पृष्ठ १४४) उन्होने यह भी कहा था की मनुष्य भय के कारण पर्वत, वन, उद्यान, वृक्ष, चैत्य (चौरा) आदि को देवता मानकर उनकी शरण जाते हैं, किन्तु ये शरण मंगलदायक नहीं, उत्तम नहीं, क्योंकि इन शरणों में जाकर सब दु:खो से छुटकारा नहीं मिलता. (धम्मपद, गाथा-१८८-१८९) किन्तु जो बुध्द, धम्म और संघ की शरण जाता हैं और चार आर्यसत्यों की भावना करता हैं, वही सब दु:खो से मुक्त होता हैं. (धम्मपद, गाथा- १६०-१९२)
कबीर ने भी इसी भाव को लक्ष्य करके कहा हैं कि परमतत्व न तो मंदिर में हैं, न मसजिद में, न काबाशरीफ या कैलास में ही हैं, वह कर्म-काण्ड और योग-वैराग्य में भी नहीं हैं, वह तो अपने भीतर ही हैं, जो क्षणमात्र में खोजनेवाले को मिल जाता हैं -----
ना मैं देवल ना मैं मसजिद, ना काबे कैलास में।
ना तो कौन क्रिया कर्म में, नहीं योग वैराग में।
खोजी होय तो तुरतै मिलीहै पलभर की तालास में।
(कबीर, पृष्ठ २३०)
जिन आर्यसत्यो की भावना करने के लिए तथागत ने बतलाया हैं, वे चार हैं--- दु:ख, दु:ख-समुदय, दु:ख निरोध और दुख निरोध की ओर ले जानेवाला मार्ग. कबीर ने भी इनका उपदेश अपने ढंग से दिया हैं. कबीर का भी कथन हैं की यह संसार दु:ख का घर हैं -- "दुनिया भाडा दु:ख का, भरी मुहामुंह भूख" (वाणी, साखी- १२, ४७) यह दु:ख तृष्णा से उत्पन्न होता हैं, तृष्णा ही कर्म का कारण हैं, क्योंकि तृषा में ही पडकर व्यक्ति कर्म करता हैं और फिर कर्म के फँदे में पडा रहता हैं -----
माता जगत भूत सुधि नाही, भ्रम भूलै नर आवै जाही।
जानि बूझी चेतै नहीं अधा, करम जठर करम के फन्धा।। (कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ २२७-२८)
माया मोह धन जोवना, इनि बंधे सब लोइ।
झूठै झूठ बियापिया, कबीर अलख न लखई कोय।।
(कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ २२९)
जिस तृष्णा के कारण दुख उत्पन्न होते हैं, उसी तृष्णा के विनष्ट हो जाने पर सारे दु:खो का निरोध हो जाता हैं और तृष्णा के निरोध का मार्ग हरि-भक्ति हैं. हरि-भक्ति से ही मुक्ति की प्राप्ति होती हैं ------
हरि हिर? एक भाण उपाया ताथै छटि गई सब माया।
(बानी, पद १८७)
कहै कबीर हरि भगती बिन, मुकति नहीं रे मूल।
(कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ २४५)
ज्यू राम कहे ते रामै होई, दुख कलेस घालै सब कोई।
जन्म के किलवीष जाहिं बिलाई, भरम करम का कछु न बसाई । (कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ २३६)
यद्यापि कबीर ने प्रत्यक्ष आर्यसत्यों का नाम नहीं लिया हैं, किन्तु अप्रत्यक्ष रूप में उन्हें बतलाया हैं. दु:ख निरोध के मार्ग का ही नाम 'आर्य-अष्टांगिकमार्ग' हैं. उसे ही मध्यममार्ग कहते हैं. तथागत ने काम-वासना में लिप्त रहने तथा शरीर को नाना प्रकार से तपाने के इन दोनों अन्तो को छोड़कर मध्यममार्ग का उपदेश दिया हैं--- (धम्मचक्कप्पवत्तन सुत्त)
कबीर ने भी "मधि निरन्तर वास" (कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ ५४) अर्थात् मध्यममार्ग में ही निरन्तर रहने को कहा हैं---
भजू तो को हैं भजन को, तजू तो को हैं आन।
भजन तजन के मध्य में, सो कबीर मन मान।।
अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप।
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।।
(सन्तबानी संग्रह, भाग १, पृष्ठ ३२)
कबीर जी कहते है जरूरत से ज्यादा बोलना और चुप रहना दोनों ही गलत हैं। जैसे अधिक बारिश और अधिक धूप दोनों ही असहनीय हैं। कहने का तात्पर्य यह है व्यक्ति को यह पता होना चाहिए उसे कब बोलना हैं और कब चुप रहना हैं। क्योंकि अधिक बोलने वालों की लोग सुनते नहीं और चुप रहने वालों को लोग कुछ समझते नहीं।
हिन्दी सन्त साहित्य पर बौध्दधर्म का प्रभाव,
लेखिका - विद्यावती मालविका
एम ए पी एच डी साहित्यरत्न.
भगवान बुध्द ने वेदादि ग्रन्थों की प्रामाणिकता को नहीं माना हैं. (दीघनिकाय - 1/13) उन्होने कहा हैं कि किसी बात को इसलिए न मान लो कि वह ग्रन्थों में लिखी गई हैं. दीघनिकाय के तेविज्ज सुत्त में त्रिवेद तथा ब्राह्मण-ग्रन्थों के कर्ता-प्रवक्ता ऋषीयों को भी ब्रह्मा की सलोकता के मार्ग का अनभिज्ञ कहा गया हैं. (दीघनिकाय - 1.13) भदन्त धर्मकिर्ती ने भी तथागत की ही बात दुहराते हुए कहा हैं --- "वेद को प्रमाण मानना, संसार के कर्ता को मानना, स्नान में पुण्य मानना, जाति का अभिमान करना और पाप को दूर करने को शरीर को तपाना (कष्टाना) --- ये मूर्खों के पाँच लक्षण हैं. (वेदप्रामाण्यं कस्यचित् कर्तुवाद, स्नाने धर्मेच्छा जातिवादावलेप:। संताप्रारम्भ पापहानाय चेति, ध्वस्तप्रज्ञानां पञ्चलिंगानि जाड्य।। - प्रमाणवार्तिक - 1, 342)
कबीर ने भी इसी का प्रतिपादन अपनी वाणियों में किया हैं. उनका कहना हैं की 'वेद और कत्तेब (कुरान) परमतत्व को नहीं जानते हैं---"वेद कत्तेब की गम्म नाही." (कबीर - 247) इसलिए "कबीर पढीबा दुरि करि, पुस्तक देइ बहाइ बहाइ." (कबीरग्रन्थावली, पृष्ठ 38), क्योंकि "पोथी पढी पढी जग मुवा, पण्डित भया न कोइ." (कबीरग्रन्थावली, पृष्ठ 39) कबीर ने धर्मकिर्ती के ही स्वर में स्वर मिला कर गाया हैं --- "जप तप दीसै थोथरा, तिरथ व्रत बेसास." (कबीरग्रन्थावली, पृष्ठ 44) अर्थात् जप, तप और तिर्थ-व्रत तुच्छ और व्यर्थ दिखाई देते हैं, शुध्दी की भावना से स्नान करना भी निरर्थक हैं---"क्या तिरथ ब्रत अस्नान?" (कबीरग्रन्थावली, पृष्ठ 126)
धम्मपद में कहा गया हैं कि जो बिना चित्त को परिशुद्ध किये ही सन्यास-वस्र (काषाय) धारण करता हैं, वह संयम और सत्य से हीन व्यक्ति उस वस्र का अधिकारी नहीं हैं. (धम्मपद, गाथा, 9) वह केवल वेष धारण कर भिख माँगने मात्र से भिक्षु नही कहा जा सकता, किन्तु जो पाप और पुण्य को छोड़ ब्रह्मचारी बन, प्रज्ञा के साथ लोक में विचरण करता हैं, वही भिक्षु हैं. (धम्मपद, गाथा, 266-67)
कबीर ने भी इसी भाव को इस प्रकार प्रगट किया हैं ---- कबीर सतगुरु नॉ मिल्या, रही अधूरी सीष।
साँग जती का पहरि करि, घरि घरि माँगै भीष।। (कबीरग्रन्थावली, पृष्ठ 3)
अर्थात् उसे परमपद (निर्वाण) की प्राप्ति नहीं हुई, उसकी शिक्षा पूर्ण नहीं हो पाई और वह सन्यासी का वेष बनाकर घर-घर भीख माँगता फिरता हैं, तो इससे उसका क्या भला होगा? उसका यह सन्यास सार्थक नहीं.
भगवान बुध्द ने आत्मनिर्भर ("अत्तदीपा विहरथ अत्तसरणा अनञ्ञसरणा" महारिनिब्बाणसुत्तं, पृष्ठ 63) सदा कार्य में तत्पर रहने की शिक्षा दी हैं (धम्मपद, गाथा, 23) और कहा हैं कि केवल कथनी में न लगकर कार्य करो, बहुत बोलने से कोई धर्मधर नहीं होता ("न तावता धम्मधरो यावता बहुभासति" धम्मपद, गाथा 256), जो अनेक ग्रन्थों का पाठ मात्र करता हैं, किन्तु उसके अनुसार आचरण नहीं करता ("बहुम्पि चे संहितं भासमानो, न तक्करो होति नरो पमत्तो" धम्मपद, गाथा 19), वह परमपद को नहीं पा सकता.
कबीर ने भी कहा हैं कि कथनी मात्र से क्या होगा, यदि कार्य रुप में उसे परीणत नही किया जाता ----
"कथणी कथी तौ क्या भया, जै करणी ना ठहराइ" (कबीरग्रन्थावली, पृष्ठ 38)
धम्मपद में कहा गया हैं की मन सभी प्रवृत्तियों का अगुआ (प्रमुख) हैं, मन प्रवृत्तियों का प्रधान हैं, वे मन से ही उत्पन्न होती हैं (धम्मपद, गाथा- 1), दूरगामी, एकाकी विचरण करने वाले, निराकार, गुहाशायी स्वभाव वाले मन का जो संयम करता हैं, वही सांसारीक बन्धनों से मुक्त होता हैं (धम्मपद, गाथा-37), व्यक्ति अपना स्वामी आप हैं, भला दूसरा कोई उसका स्वामी क्या होगा? (धम्मपद, गाथा-160), ऐसे मन का दमन करना उत्तम हैं, क्योंकि दमन किया हुआ मन सुखदायक होता हैं (धम्मपद, गाथा-35).
कबीर ने भी मन को गोरख और गोविन्द कहा हैं, जो मन की रक्षा करता हैं, वह अपना स्वामी हैं. मन जल से सूक्ष्म, धूँआ से क्षीण, पवन के समान तीव्रगामी और चंचल हैं ------
मन गोरख मन गोविन्दौ, मन ही औधड होइ।
जे मन राखै जतन करि, तौ अपै करता सोइ ।।
पाणी हो तै पतला, धुआँ ही तै झीण।
पवना बेगि उतावला, सौ दोसत कबीरै किन्ह।। (कबीरग्रन्थावली, पृष्ठ 29)...