Wednesday, October 23, 2019

कबीर पूजापाठ, आर्यसत्ये

भगवान बुध्द ने पूजा-पाठ का निषेध किया था. उन्होने अपनी पूजा तक को सार्थक न कहकर धर्म-आचरण की ओर सबको प्रेरित किया था. ("आव्यावटा तुम्हे आनन्द होथ तथागतस्स सरीरपूजाय"----महापरीनिब्बाण सुत्त, पृष्ठ १४४) उन्होने यह भी कहा था की मनुष्य भय के कारण पर्वत, वन, उद्यान, वृक्ष, चैत्य (चौरा) आदि को देवता मानकर उनकी शरण जाते हैं, किन्तु ये शरण मंगलदायक नहीं, उत्तम नहीं, क्योंकि इन शरणों में जाकर सब दु:खो से छुटकारा नहीं मिलता. (धम्मपद, गाथा-१८८-१८९) किन्तु जो बुध्द, धम्म और संघ की शरण जाता हैं और चार आर्यसत्यों की भावना करता हैं, वही सब दु:खो से मुक्त होता हैं. (धम्मपद, गाथा- १६०-१९२)

कबीर ने भी इसी भाव को लक्ष्य करके कहा हैं कि परमतत्व न तो मंदिर में हैं, न मसजिद में, न काबाशरीफ या कैलास में ही हैं, वह कर्म-काण्ड और योग-वैराग्य में भी नहीं हैं, वह तो अपने भीतर ही हैं, जो क्षणमात्र में खोजनेवाले को मिल जाता हैं -----

ना मैं देवल ना मैं मसजिद, ना काबे कैलास में।
ना तो कौन क्रिया कर्म में, नहीं योग वैराग में।
खोजी होय तो तुरतै मिलीहै पलभर की तालास में।
(कबीर, पृष्ठ २३०)

जिन आर्यसत्यो की भावना करने के लिए तथागत ने बतलाया हैं, वे चार हैं--- दु:ख, दु:ख-समुदय, दु:ख निरोध और दुख निरोध की ओर ले जानेवाला मार्ग. कबीर ने भी इनका उपदेश अपने ढंग से दिया हैं. कबीर का भी कथन हैं की यह संसार दु:ख का घर हैं -- "दुनिया भाडा दु:ख का, भरी मुहामुंह भूख" (वाणी, साखी- १२, ४७) यह दु:ख तृष्णा से उत्पन्न होता हैं, तृष्णा ही कर्म का कारण हैं, क्योंकि तृषा में ही पडकर व्यक्ति कर्म करता हैं और फिर कर्म के फँदे में पडा रहता हैं -----

माता जगत भूत सुधि नाही, भ्रम भूलै नर आवै जाही।
जानि बूझी चेतै नहीं अधा, करम जठर करम के फन्धा।। (कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ २२७-२८)

माया मोह धन जोवना, इनि बंधे सब लोइ।
झूठै झूठ बियापिया, कबीर अलख न लखई कोय।।
(कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ २२९)

जिस तृष्णा के कारण दुख उत्पन्न होते हैं, उसी तृष्णा के विनष्ट हो जाने पर सारे दु:खो का निरोध हो जाता हैं और तृष्णा के निरोध का मार्ग हरि-भक्ति हैं. हरि-भक्ति से ही मुक्ति की प्राप्ति होती हैं ------

हरि हिर? एक भाण उपाया ताथै छटि गई सब माया।
(बानी, पद १८७)

कहै कबीर हरि भगती बिन, मुकति नहीं रे मूल।
(कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ २४५)

ज्यू राम कहे ते रामै होई, दुख कलेस घालै सब कोई।
जन्म के किलवीष जाहिं बिलाई, भरम करम का कछु न बसाई । (कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ २३६)

यद्यापि कबीर ने प्रत्यक्ष आर्यसत्यों का नाम नहीं लिया हैं, किन्तु अप्रत्यक्ष रूप में उन्हें बतलाया हैं. दु:ख निरोध के मार्ग का ही नाम 'आर्य-अष्टांगिकमार्ग' हैं. उसे ही मध्यममार्ग कहते हैं. तथागत ने काम-वासना में लिप्त रहने तथा शरीर को नाना प्रकार से तपाने के इन दोनों अन्तो को छोड़कर मध्यममार्ग का उपदेश दिया हैं--- (धम्मचक्कप्पवत्तन सुत्त)

कबीर ने भी "मधि निरन्तर वास" (कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ ५४) अर्थात् मध्यममार्ग में ही निरन्तर रहने को कहा हैं---

भजू तो को हैं भजन को, तजू तो को हैं आन।
भजन तजन के मध्य में, सो कबीर मन मान।।
अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप।
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।।
(सन्तबानी संग्रह, भाग १, पृष्ठ ३२)

कबीर जी कहते है जरूरत से ज्यादा बोलना और चुप रहना दोनों ही गलत हैं। जैसे अधिक बारिश और अधिक धूप दोनों ही असहनीय हैं। कहने का तात्पर्य यह है व्यक्ति को यह पता होना चाहिए उसे कब बोलना हैं और कब चुप रहना हैं। क्योंकि अधिक बोलने वालों की लोग सुनते नहीं और चुप रहने वालों को लोग कुछ समझते नहीं।

हिन्दी सन्त साहित्य पर बौध्दधर्म का प्रभाव,
लेखिका - विद्यावती मालविका
एम ए पी एच डी साहित्यरत्न.

भगवान बुध्द ने वेदादि ग्रन्थों की प्रामाणिकता को नहीं माना हैं. (दीघनिकाय - 1/13) उन्होने कहा हैं कि किसी बात को इसलिए न मान लो कि वह ग्रन्थों में लिखी गई हैं. दीघनिकाय के तेविज्ज सुत्त में त्रिवेद तथा ब्राह्मण-ग्रन्थों के कर्ता-प्रवक्ता ऋषीयों को भी ब्रह्मा की सलोकता के मार्ग का अनभिज्ञ कहा गया हैं. (दीघनिकाय - 1.13) भदन्त धर्मकिर्ती ने भी तथागत की ही बात दुहराते हुए कहा हैं --- "वेद को प्रमाण मानना, संसार के कर्ता को मानना, स्नान में पुण्य मानना, जाति का अभिमान करना और पाप को दूर करने को शरीर को तपाना (कष्टाना) --- ये मूर्खों के पाँच लक्षण हैं. (वेदप्रामाण्यं कस्यचित् कर्तुवाद, स्नाने धर्मेच्छा जातिवादावलेप:। संताप्रारम्भ पापहानाय चेति, ध्वस्तप्रज्ञानां पञ्चलिंगानि जाड्य।। - प्रमाणवार्तिक - 1, 342)

कबीर ने भी इसी का प्रतिपादन अपनी वाणियों में किया हैं. उनका कहना हैं की 'वेद और कत्तेब (कुरान) परमतत्व को नहीं जानते हैं---"वेद कत्तेब की गम्म नाही." (कबीर - 247) इसलिए "कबीर पढीबा दुरि करि, पुस्तक देइ बहाइ बहाइ." (कबीरग्रन्थावली, पृष्ठ 38), क्योंकि "पोथी पढी पढी जग मुवा, पण्डित भया न कोइ." (कबीरग्रन्थावली, पृष्ठ 39) कबीर ने धर्मकिर्ती के ही स्वर में स्वर मिला कर गाया हैं --- "जप तप दीसै थोथरा, तिरथ व्रत बेसास." (कबीरग्रन्थावली, पृष्ठ 44) अर्थात् जप, तप और तिर्थ-व्रत तुच्छ और व्यर्थ दिखाई देते हैं, शुध्दी की भावना से स्नान करना भी निरर्थक हैं---"क्या तिरथ ब्रत अस्नान?" (कबीरग्रन्थावली, पृष्ठ 126)

धम्मपद में कहा गया हैं कि जो बिना चित्त को परिशुद्ध किये ही सन्यास-वस्र (काषाय) धारण करता हैं, वह संयम और सत्य से हीन व्यक्ति उस वस्र का अधिकारी नहीं हैं. (धम्मपद, गाथा, 9) वह केवल वेष धारण कर भिख माँगने मात्र से भिक्षु नही कहा जा सकता, किन्तु जो पाप और पुण्य को छोड़ ब्रह्मचारी बन, प्रज्ञा के साथ लोक में विचरण करता हैं, वही भिक्षु हैं. (धम्मपद, गाथा, 266-67)

कबीर ने भी इसी भाव को इस प्रकार प्रगट किया हैं ---- कबीर सतगुरु नॉ मिल्या, रही अधूरी सीष।
साँग जती का पहरि करि, घरि घरि माँगै भीष।। (कबीरग्रन्थावली, पृष्ठ 3)

अर्थात् उसे परमपद (निर्वाण) की प्राप्ति नहीं हुई, उसकी शिक्षा पूर्ण नहीं हो पाई और वह सन्यासी का वेष बनाकर घर-घर भीख माँगता फिरता हैं, तो इससे उसका क्या भला होगा? उसका यह सन्यास सार्थक नहीं.

भगवान बुध्द ने आत्मनिर्भर ("अत्तदीपा विहरथ अत्तसरणा अनञ्ञसरणा" महारिनिब्बाणसुत्तं, पृष्ठ 63) सदा कार्य में तत्पर रहने की शिक्षा दी हैं (धम्मपद, गाथा, 23) और कहा हैं कि केवल कथनी में न लगकर कार्य करो, बहुत बोलने से कोई धर्मधर नहीं होता ("न तावता धम्मधरो यावता बहुभासति" धम्मपद, गाथा 256), जो अनेक ग्रन्थों का पाठ मात्र करता हैं, किन्तु उसके अनुसार आचरण नहीं करता ("बहुम्पि चे संहितं भासमानो, न तक्करो होति नरो पमत्तो" धम्मपद, गाथा 19), वह परमपद को नहीं पा सकता.

कबीर ने भी कहा हैं कि कथनी मात्र से क्या होगा, यदि कार्य रुप में उसे परीणत नही किया जाता ----
"कथणी कथी तौ क्या भया, जै करणी ना ठहराइ" (कबीरग्रन्थावली, पृष्ठ 38)

धम्मपद में कहा गया हैं की मन सभी प्रवृत्तियों का अगुआ (प्रमुख) हैं, मन प्रवृत्तियों का प्रधान हैं, वे मन से ही उत्पन्न होती हैं (धम्मपद, गाथा- 1), दूरगामी, एकाकी विचरण करने वाले, निराकार, गुहाशायी स्वभाव वाले मन का जो संयम करता हैं, वही सांसारीक बन्धनों से मुक्त होता हैं (धम्मपद, गाथा-37), व्यक्ति अपना स्वामी आप हैं, भला दूसरा कोई उसका स्वामी क्या होगा? (धम्मपद, गाथा-160), ऐसे मन का दमन करना उत्तम हैं, क्योंकि दमन किया हुआ मन सुखदायक होता हैं (धम्मपद, गाथा-35).

कबीर ने भी मन को गोरख और गोविन्द कहा हैं, जो मन की रक्षा करता हैं, वह अपना स्वामी हैं. मन जल से सूक्ष्म, धूँआ से क्षीण, पवन के समान तीव्रगामी और चंचल हैं ------

मन गोरख मन गोविन्दौ, मन ही औधड होइ।
जे मन राखै जतन करि, तौ अपै करता सोइ ।।
पाणी हो तै पतला, धुआँ ही तै झीण।
पवना बेगि उतावला, सौ दोसत कबीरै किन्ह।। (कबीरग्रन्थावली, पृष्ठ 29)...

Tuesday, October 22, 2019

कबीर निर्वाण

भगवान बुध्द ने निर्वाण की स्थिति का वर्णन करते हुए कहा हैं कि निर्वाण की ऐसी अवस्था हैं, जहा जल, पृथ्वी, अग्नि और वायु नहीं ठहरते, वहा न तो शुक्र और सूर्य ही प्रकाश करते हैं, वहा चन्द्रमा भी नहीं चमकता और वहा अन्धकार भी नहीं होता. जब भिक्षु अपने आप जान लेता हैं, तब रुप, अरुप, सुख और दुख से मुक्त हो जाता हैं. (उदान, हिन्दी अनुवाद, पृष्ठ १४) ......

यत्थ आपो च पठवि तेजो वायो न गाधति।
न तत्थ सुक्का जोतन्ति आदिच्चो नप्पकासति।
न तत्थ चन्दिमा भाति तमो तत्थ न विज्जति।
यदा च अत्तना बेदि मुनि सो तेन ब्राह्मणों।
अथ रुपा अरुपा च सुखदुक्खा पमुच्चति।
(उदान, पालि, पृष्ठ ८-९)

इसी भाव को व्यक्त करते हुए सिध्द सरहपा ने कहा हैं कि ---- हे मन! जहा वायु का सञ्चार नहीं हैं, सूर्य और चन्द्रमा जहा प्रवेश नहीं कर सकते, तू वहा बढ़कर विश्राम करो ------

जहि मण पवन ण संचरइ, रवि ससि णाह पवेस।
तहि बढ चित्त विसाम करु, सरहे कहिअ उएस।
(दोहाकोश, पृष्ठ २०)

कबीर ने भी इसी स्थिति का वर्णन इस प्रकार किया हैं ---

जिहि बन सीही न संचरै, पंषि उड़े नहीं जाइ।
रैनि दिवस का गमि नहीं, तहाँ कबीर रह्या ल्यौ लाइ।
(कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ १८)

इन्हे मिलान करन पर स्पष्ट जान पड़ता हैं की कबीर ने जिस परमपद का वर्णन करते हुए कहा हैं कि "जिस वन में सींह का संचार नहीं हैं, वहा पक्षी नहीं उड़कर जा सकता, रात्रि और दिन की भी वहां पहुँच नही, उसी में कबीर लवलीन हैं." यह बुध्दोक्त निर्वाण का ही वर्णन हैं और न केवल भावो में ही समानता हैं, प्रत्युत शब्द-योजना में भी समानता हैं और सिध्द सरहपा के वचनो का तो परिवर्तन जान पड़ता हैं.

धम्मपद में कहा गया हैं कि बहुत-से ग्रन्थों को पढ़कर भी यदि उसके अनुसार आचरण न करे तो वह व्यक्ति दूसरों की गौवें गिननेवाले ग्वाले की भाँति श्रामण्य का अधिकारी नहीं होता. (धम्मपद, गाथा-१९)

इसी से मिलते-जुलते भाव को सिध्द सरहपा ने इस प्रकार कहा हैं ---

पण्डिअ सअल सत्थ बक्खाणइ।
देहहि बुध्द बसन्त न जाणइ।।
(दोहाकोश, पृष्ठ ३०)

अर्थात् पण्डित केवल शास्रो की ही चर्चा करते हैं, किन्तु वे अपने शरीर में विद्यमान 'बुध्द' को नहीं जानते. कबीर ने तो मानो इसी को अपने शब्दों में कह डाला हैं की पण्डित पढ़-पढ़कर वेद की चर्चा करते हैं, किन्तु अपने ही भीतर रहनेवाले उस परमेश्वर को नहीं जानते ---

पढ़ि पढ़ि पंडित वेद बपांणै, भीतरि हूती बसत न जाणै।
(कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ १०२)

सिध्द शबरपा ने निर्वाण को प्राप्त करने का उपाय बतलाते हुए कहा हैं कि गुरु के उपदेश के अनुसार मन रुपी बाण से निर्वाण को बेध दो अर्थात् अपने मन को निर्वाण की स्थिति में पहुँचा दो ----

गुरुवाक् पुञ्छिआ, विन्ध्य निअमण बाणे।
एके सर सन्धाने बिन्धह बिन्धह पर णिवाणे।।
(चर्यापद, पृष्ठ १३४)

कबीर ने इसी भाव को व्यक्त करते हुए कहा हैं कि वास्तव में सतगुरु शूरवीर हैं. उन्होने जो एक शब्द निकाला, उससे मेरे कलेजे में छेद हो गया और उस शब्द रुपी बाण के लगते ही मुझे सारे भेदो का ज्ञान प्राप्त हो गया ----

सतगुरु सॉचा सूरिवाँ, सबद जु बाह्यो एक।
लागत ही मैं मिलि गया, पड्या कलेजै छेक।।
(कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ १)

इन दोनों के वचनो में कितनी समता हैं. दोनों का तात्पर्य गुरु का माहात्म्य बतलाना हैं. परम गुरु भगवान बुध्द ने यही बात कही थी की मैने जो मार्ग बतला दिया हैं, उस पर आरुढ़ होकर तुम दु:खो का अन्त कर दोगे. शल्य के सदृश दु:ख के निवारण-स्वरुप निर्वाण को जानकर मैने उसका उपदेश किया हैं. (एतं हि तुम्हे पटिपन्ना, दुक्खस्सन्तं करिस्सथ। अक्खातो वे मयो मग्गो।। गाथा २७५)

सिध्द शबरपा और कबीर की वाणी के मुलस्रोत का इस बुध्दवचन से पूर्ण आभास मिलता हैं.

हिन्दी सन्त साहित्य पर बौध्दधर्म का प्रभाव,
लेखिका- विद्यावती मालविका
एम ए पी एच डी, साहित्यरत्न

Saturday, October 19, 2019

कबीर जातिभेद विरोध

जाति-विरोधी बुध्द ने कहा था -- 'जाति मा पुच्छ वरणं पुच्छ," (संयुत्तनिकाय, १, ७, १, ९) अर्थात् जाति मत पुछो, आचरण पुछो, कबीर ने भी उन्ही शब्दों में कहा था --

"जाति न पूछो साध की पूछि लिजियें ज्ञान," (कबीर, पृष्ठ ३२३)

"सन्तन जात पूछो निरगुनियाँ" (कबीरग्रन्थावली, पृष्ठ २३१)

इतना ही नहीं, भगवान बुध्द ने जातिभेद का विरोध करते हुए कहा था की सोपाक चाण्डाल भी मातंग नाम से प्रसिद्ध ऋषि हो गया, इसमे जातिभेद या उसकी नीची जाति ने कुछ नहीं बिगाडा ---

न जच्चा वसलो होति न जच्चा होति ब्राह्मणों ।।
कम्मुना वसलो होति कम्मुना होति ब्राह्मणों ।।
तदइमिनापि जानाथ यथा मेदं निदस्सनं।
चण्डालपुत्तो सोपाको मातंगो इति विस्सुतो ।।
सो यसं परमं पत्तो मातंगो यं सुदुल्लभं।
अगञ्छुं तस्मुपट्ठानं खत्तिया ब्राह्मणा बहू ।।
(सुत्तनिपात, वसलसुत्त, गाथा संख्या, २१-२३)

इसी सोपाक को कबीर ने श्वपच ऋषि नाम से स्मरण किया और कहा कि भंगी की जाति (जन्म) होकर भी ऋषि हो गये थे -- "साधनमॉ रैदास सन्त हैं, सुपच ऋषि सो भाँगियॉ" (कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ २३१)

श्वपच और सोपाक में कोई अन्तर नहीं हैं. दोनों का शाब्दिक अर्थ एक ही हैं और दृष्टान्त आदि में भी समानता हैं. अत: श्वपच की कथा पीछे के ग्रन्थों में भले ही कुछ भिन्न दिखाई पड़े, किन्तु इसका मुलस्रोत पालि-साहीत्य में ही उपलब्ध हैं और पूरी कथा जातक (मातंग जातक-४९७), चरियापिटक (मातंगचरिया- २, ७) आदि ग्रंथो में आई हुई हैं.

भगवान बुध्द ने जातिभेद का विरोध करते हुए ही कहा था --- "माता की योनि से उत्पन्न होने के कारण मै ब्राह्मण नहीं कहता," (मज्झिम निकाय, २, ५, ८ तथा धम्मपद 'न चाहं ब्राह्मणं ब्रूमि, योनिजं मत्तिसम्भवं." गाथा ३९६), आश्वलायन! ब्राह्मणों कि ब्राह्मणियाँ ऋतु-मती एवं गर्भिनी होती, प्रसव करती, दूध पीलाती देखी जाती हैं, योनि से उत्पन्न होते हुए भी वे ऐसा कहते हैं - ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न होने के कारण ब्राह्मण ही श्रेष्ठ वर्ण हैं."

इसी को सिध्द सरहपा ने इस प्रकार कहा --- "ब्राह्मण ब्रह्मा के मुख से हुआ था, जब हुआ था, तब हुआ था, अब तो दूसरे होते हैं, ब्राह्मण भी उसी प्रकार होते हैं, तो ब्राह्मणत्व कहा रह गया?" (बौध्दगान वो दोहा, धर्मदूत, वर्ष २६ अंक ११, पृष्ठ २२३) और फिर देखिए, कबीर ने इसे ही किस प्रकार कहा हैं -- तुम कैसे ब्राह्मण हो मैं कैसे शूद्र हूँ रक्त में तो कोई भिन्नता नहीं.

तुम कत बाभन हम कत सूद?
हम कत लोहू तुम कत दूध?

एक ज्योति में ही सब उत्पन्न हैं, इनमे कोई ब्राह्मण कोई शूद्र नहीं हैं, उत्पन्न होते हुए भी सभी माँ के पेट से ही बाहर आते हैं, चाहे ब्राह्मण हो या शूद्र ----
जो तु बांभन बभनीं जाया,
तौ आन बाट ह्वै काहे न आया?"
(कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ १०२)
"अष्ट कमल दोउ पदुमि आया,
छूत कहॉ तै उपजि?"

बौध्दधर्म में जातिभेद के लिए स्थान नहीं हैं. जो भी व्यक्ति प्रव्रजित होकर भिक्खुसंघ में सम्मिलित हो जाता हैं, वह अपनी जाति, गोत्र आदि को छोड़कर शाक्यपुत्रीय श्रमण कहा जाता हैं. उदान ग्रंथ में कहा गया हैं --- भिक्षुओं! जैसे जितनी बड़ी बड़ी नदियाँ हैं, जैसे की गंगा, यमुना, अचिरवती, मही --- सभी समुद्र में गिरकर अपने पहले नाम को छोड़ देती हैं, सभी महासमुद्र के ही नाम से जानी जाती हैं, वैसे ही ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ----- चारो वर्ण के जो लोग इस धर्मविनय (बौध्दधर्म) में घर से बेघर होकर प्रव्रजित होते हैं, अपने पहले नाम और गोत्र को छोड़ सभी शाक्यपुत्रीय श्रमण (बौध्दभिक्षु) इस एक नाम से जाने जाते हैं. (उदान, हिन्दी अनुवाद, पृष्ठ ७५)

ऐसे ही कबीर ने भी कहा हैं कि जिस प्रकार नदी-नाले गंगा से मिलकर गंगा कहलाने लगते हैं, वैसे ही सब एक हैं, जाति और कुल विचार व्यर्थ हैं ----

जाति कुल ना लखै कोई सब भये भृंगी।
नदी नाले मिले गंगै कहलावैं गंगी।
दरियाव दरिया जा समाने संग में संगी।
(कबीर, पृष्ठ ३३९)

हिन्दी सन्त साहित्य पर बौध्दधर्म का प्रभाव,
लेखिका- विद्यावती मालविका
एम ए पी एच डी, साहित्यरत्न....

Thursday, October 17, 2019

कबीर

कबीर की वाणियों में बौध्दविचार :

कबीर ने बौध्दधर्म का अध्ययन नहीं किया था और न तो किसी बौध्द विद्वान से उसका सत्संग ही किया था, किन्तु बौध्द विचारों से प्रभावित सन्तो की परम्परा तथा जन-समाज में व्याप्त बुध्दशिक्षा का प्रभाव उन पर पड़ा था. सन्त सत्संग की प्रशंसा करते थे और विशेषकर साधू-सत्संग की... इस भावना के परिणामस्वरूप कबीर ने एक जिज्ञासु रुप में तत्कालीन प्रसिद्ध विद्वानों का सत्संग किया था और उनसे धर्म को सिखा था. स्वामी रामानन्द का विशेष प्रभाव उन पर पड़ा था और सिध्द-नाथ परम्परा से आई हुई विचारधारा का प्रत्यक्ष एवं गहरा प्रभाव रामानन्द तथा उनके पूर्ववर्ती सन्तो पर पड़ा था. साधु-समागम अथवा सत्पुरुष सत्संग बुध्दकाल से ही प्रशंसित था. सत्संग अड़तीस मंगलो में से एक माना जाता था. (कालेन धम्मसाकच्छा एतं मंगलमुत्तमं। महामंगलसुत्त, ९) संयुत्तनिकाय में कहा गया हैं कि व्यक्ति को चाहिए की वह सन्तो के साथ रहे और सन्तो की ही संगति करे, क्योंकि सन्तो का सधर्म जानने से कल्याण होता हैं, अकल्याण नही. (सब्भिसुत्त-१, ४, १)। सन्तो की संगति करने से ज्ञान प्राप्त होता हैं, शोक नहीं होता, अपने लोगो में शोभता हैं, सद्गति (स्वर्ग) की प्राप्ति होती हैं, वह चिरकाल तक सुखी रहता हैं और सब दुखो से मुक्त हो जाता हैं. (सब्भिसुत्त-सब्भिरेव समासेथ, सब्भि कुब्बेथ संथवं। सतं सधम्ममञ्ञाय सब्बदुक्खा पमुच्चति।।) इसी प्रकार कबीर ने भी साधु-संगति की प्रशंसा की हैं --- कबीर संगति साध की बैगि करीजै जाइ। दुरमति दूरी गँवाइसि, देसी सुमति बताइ।। कबीर संगति साध की, कदे न निरफल होइ। चन्दन होसी बाबना, नीव न कहसी कोइ।। मथुरा जावै व्दारिका भावे जावै जगनाथ। साध संगति हरि भगति बिन कछू न आये हाथ।। (कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ ४९)

कबीर ने साधु-संगति को ही वकुैण्ठ माना हैं ----- "साध संगति वैकुण्ठहि आहि" (कबीर- पृष्ठ ३२२) धर्मानन्द कौशाम्बी का मत हैं की कबीर तथा उनके पूर्ववर्ती सन्तो ने बौध्दसाहित्य से ही सत्संगति की कल्पना की होगी. (भारतीय संस्कृति और अहिंसा, पृष्ठ २०६) किन्तु कबीर के लिए तो केवल इतना ही माना जा सकता हैं की उन्होने परम्परागत (परम्परा से आये हुए) बौध्द विचारों को ही ग्रहण किया था, क्योंकि की उन्हें बौध्दसाहित्य का प्रत्यक्ष रुप में ज्ञान नहीं था और उन्होने बुध्द के केवल विष्णु-पुराण के अनुसार असुर-संहारक रुप को ही सुन रखा था---- वे कर्ता नहीं बौध्द कहावै नहीं असुर को मारा। ज्ञानहीन कर्ता भरमे माया जग संहारा।। (बीजक, पृष्ठ ६३) यही नहीं कबीर ने बौध्दो को भी शाक्तो, जैनो, चार्वाको के साथ पाखण्डी कहा हैं, जिससे जान पडता हैं की उन्हें बौध्दों के सम्बन्ध में केवल नाममात्र की जानकारी थी और वह भी श्लाघ्य रुप में नहीं ---- केते बौध भये निकलंकी तिन भी अन्त न पाया। (कबीर, पृष्ठ ३२६) जैन बौध अरु साकम सैना, चारवाक चतुरंग बिहूना। (कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ २४०)

इसी प्रकार सन्त तुकाराम ने तो बुध्द को केवल गूँगा होने की भी कल्पना कर ली थी --- "बौध्य अवतार मझिया अदृष्टा, मौन मुखे निष्ठा धरियेली." (भारतीय संस्कृति और अहिंसा, पृष्ठ २०६) आचार्य धर्मानन्द कौशाम्बी का कथन सर्वथा ही उचित हैं कि साधु-सन्तो के वचनो में बौध्दसाहित्य में मिलनेवाले भूतदया, सब लोगो के साथ समता का व्यवहार तथा सन्त-संगति के गुण-वर्णन के जो उद्गार मिलते हैं, वे आये कहा से? इसका उत्तर यही हैं की जनसाधारण में बुध्दोपदेश के बीज समूल नष्ट नहीं हुए थे, किसी-न-किसी रुप में वे बने हुए थे और इन साधु-सन्तो ने उन्हीं को अनेक प्रकार से बढाया. यद्यापि कबीर भगवान बुध्द के स्थविरवादी स्वरुप से परिचित नहीं थे, किन्तु चौरासी सिध्दों को कबीर जानते थे, अर्थात् उनके समय तक चौरासी सिध्दों का इतिहास भूला नहीं था. राहुल सांकृत्यायन का मत हैं की कबीर ने चौरासी सिध्दों का विरोध किया हैं, किन्तु वास्तव में वे उन्हीं के निर्गुण, योग और विचित्र ढंग को अपनाकर नाथ सम्प्रदाय से भिडे थे. (पुरातत्वनिबंधावली, पृष्ठ १६४) किन्तु इसमे वास्तविकता इतनी ही हैं की कबीर ने अप्रत्यक्ष रूप में ही सिध्दों से ग्रहण किया था, जो कि जनसाधारण द्वारा ही उन्हें प्राप्त हुआ था, इसीलिए उन्होने सिध्दों को भी भ्रम में पड़ा कहा हैं ---- धरनी अरु असमान बिचि, दोइ तूंबडा अबध। पटदरसन संसै पंड्या, अरु चौरासी सिध्द।। (कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ ५४)

Sunday, October 13, 2019

पूर्व-कालीन सन्त

सन्त जयदेव:

हम देखते हैं की भक्ति साधना के वैष्णव सम्प्रदाय ने भी जयदेव के समय तक भगवान बुध्द को अवतार मान लिया था और वैष्णव सन्तो के भी बुध्द 'हरि' बन गये थे. इसीलिए सन्त जयदेव ने अपने 'गीतगोविन्द' में बड़े ही प्रेम से बुध्द-स्तुति की हैं -- 'हे केशव, अपने जिन यज्ञों में पशूहिंसा हैं, उनकी निन्दा की, अत: हे बुध्द-रुपधारीन् , जगदीश, अपकी जय हो."

(निन्दसि यज्ञविधेरहहश्रुतिजातम। सदयह्रदय-दर्शित पशू-धातम् । केशव धृतबुध्दशरीर जय जगदीश हरे। (गीतगोविन्द, प्रथम सर्ग, श्लोक ९)

इससे ज्ञात होता हैं की जयदेव 'हरि' के रुप में बुध्द को मानते थे. गीतगोविन्द में इसके अतिरिक्त 'तन्त्र' शब्द भी आया हैं. (जितमनसिजतंत्रविचारम्- गीतगोविन्द, द्वितीय सर्ग: श्लोक ५), जो वज्रायन के तंत्र-मंत्र का स्मरण दिलाता हैं. कुछ विद्वानों का मत हैं की इस ग्रन्थ में निर्गुण पंथियों के अनुसार जयदेव ने अन्योक्ति के रुप में ज्ञान कहा हैं और भाव यह हैं की गोपियाँ पाँच इन्द्रियां हैं और राधा दिव्य ज्ञान. गोपियों को छोड़कर कृष्ण का राधा से प्रेम करना यही जीव की मुक्ति हैं. (हिन्दी काव्य में निर्गुण सम्प्रदाय, पृष्ठ ३३) यह व्याख्या यथार्थ हैं, क्योंकि प्रत्येक सर्ग के अन्त में 'हरि' को कल्याण के रुप में स्मरण किया गया हैं और जयदेव के लिए हरि का जप प्रधान था. योग, यज्ञ, दान, तप आदि भक्त के लिए व्यर्थ हैं, इसीलिए कबीर ने जयदेव को केवल भक्त कहा हैं, ज्ञानी नहीं. आदिग्रन्थ में जयदेव के जो दो पद संकलित हैं उनसे भी यही बात सिध्द होति हैं की हरि-स्मरण सच्चे मन से करना ही भक्त का कर्तव्य हैं, उसे कर्मकांड, तप आदि के प्रपंचों से क्या तात्पर्य? यह भक्ति भी मन, वचन और कर्म से ही सर्वांश रुप से पूर्ण हो जाति हैं--- हरिभगत निज निहकेवला, रिद करमणा वचसा। जोगेन कीं जगेन किं, दानेन कीं तपसा।। (सन्तकाव्य पृष्ठ १३५)

भगवान बुध्द ने यज्ञ, हवन, तप आदि को महागुणकारी नहीं कहा हैं, इनसे निर्वाण का साक्षात्कार नहीं हो सकता, निर्वाण के साक्षात्कार के लिए चित्त-शुध्दी परम आवश्यक हैं और उसे मध्यम मार्ग पर चलकर ही प्राप्त किया जा सकता हैं. यही बात सिध्दों और नाथों ने भी कही हैं. सिध्द दारिकपा कहते हैं -- किन्तो मन्तो किन्तो तन्तो किन्तो झाण बखाणे। (चर्यापद, ३४)

सिध्द कण्हपा ने भी यही बात कही हैं --
ऐसो जप होमे मण्डल कम्मे, अणुदीन अच्छसि काहिउ धम्मे। (दोहाकोष, पृष्ठ २९)

सिध्द तिलोपा का भी कथन हैं की तीर्थ और तप व्यर्थ हैं, इनसे शरीर पापो से शुध्द नहीं होता और न तो देव-पूजा से ही शुध्दता प्राप्त होति हैं, शान्त मन से बुध्द की आराधना करो--

तित्थ तपोवण ण करहु सेवा, देह सुचीहि ण सन्ति पावा। ब्रह्मा विह्णू महेसुर देवा, बोहिसत्व मा करहु सेवा। देव ण पूजहु तित्थ ण जावा देवपूजाही मोक्ख ण पावा। बुध्द अराहहु अविकल चित्ते, भव निब्बाणे म करहु थित्तें। (हिन्दी काव्यधारा, पृष्ठ १७४)

यही बुध्द जयदेव के 'हरि' बन गये हैं, जो स्वयं बुध्दशरीर ही हैं. यज्ञ, तप आदि को छोड़कर सिध्दी-पद स्वरुप, सर्वत्र व्याप्त हरि की आराधना ही अपेक्ष्य हैं. हम कह आये हैं कि बुध्द वज्रयान में निरन्तर विद्यमान, सर्वत्र विराजमान और निरंजन स्वरुप हो गये थे. (हँउ जग हँउ बुध्द हँउ णिरंजण--सिध्द तिलोपा, दोहाकोष १६)

सन्त जयदेव ने सिध्दों एवं नाथो के हठयोग को नहीं छोड़ा, उन्होने योग को तो बुरा कहा, किन्तु हठयोग को नहीं. हठ़योग कि साधना में नाद से ही निर्वाण को प्राप्त किया जा सकता हैं और जब नाद की प्राप्ति होती हैं तभी ब्रह्म-निर्वाण में लवलीन होने की अवस्था होती हैं ---
चंदसत भेदिआ, नादसत पुरिआ,
सूरसद षोडसादतु कीआ,
ब्रह्मु निरबाणु लिवलिणु पाइआ।
(सन्तकाव्य, पृष्ठ १३६)

सिध्द गोरखनाथ ने भी यही बात कही हैं ----

नाद ही ते आछे बाबू सब कछू निधाणा।
नाद ही ते पाइये परम निरवाणा।
(गोरखबाणी, पृष्ठ ६६)

इस प्रकार सन्त जयदेव पर बौध्द प्रभाव स्पष्ट हैं. उनकी वाणी में बुध्द, तंत्र, निर्वाण आदि बौध्दधर्म के शब्द विद्यमान हैं और उनके 'हरि' राम, केशव, गोविन्द आदि-पुरुष हैं, जो अनुपम, सत्य, सिध्दपद तथा ब्रह्म-निर्वाण स्वरुप हैं. ('परमादि पुरुष मनोपिम'--सन्तकाव्य, पृष्ठ १३५), और वे ही बुध्दशरीर भी हैं. उनके अनुस्मरण से ही जल में जल के प्रवेश करने की भाँति निर्वाण का लाभ हो सकता हैं. (सललिकउ सललि समानि आइया-- सन्तकाव्य, पृष्ठ १३६)

ऐतिहासिक दृष्टिकोण से भी यह माना जाता हैं की जयदेव पर सहजयान का प्रभाव पड़ा था, क्योंकि की उनके समय में उड़िसा तथा बंगाल प्रदेशों में सहजयान बौध्दधर्म का प्रभाव बना हुआ था और पुरी के जगन्नाथ बुध्दस्वरुप माने जाते थे. (सुइ बउध्द रुप हइ कलियुगरे थिवु रही... दर्शन तथा साहित्य, पृष्ठ २०४)

हिंदी सन्त साहित्य पर बौध्द धर्म का प्रभाव,
लेखिका - डॉ. विद्यावती मालविका
एम ए पि एच डी, साहित्यरत्न.....

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