Tuesday, August 27, 2019

जीव आत्मा भ्रांति

जीव, आत्मा या दूसरे तरह के शब्द बौध्द-दर्शन को समझने में भ्रान्ति पैदा करते हैं. क्योंकि वह किसी न किसी स्थिर तत्त्व की सुचना देते हैं, जब की बौध्द-दर्शन के अनुसार शरीर में आत्मा या जीव जैसी कोई चीज़ नहीं हैं, बल्कि जैसे शरीर भौतिक तत्त्वों का क्षण-क्षण बदलता प्रवाह हैं, उसी तरह उसके भीतर की चेतना (जीवन) भी क्षण-क्षण बदलती चेतना-प्रवाह हैं. द्वैतवादी बौध्द-दर्शन इन दोनों प्रवाहों को एक दूसरे पर अश्रित साथ-साथ बदलते हुए मानते हैं. अद्वैतवादी बौध्द इन में एक को मुख्यता देते हैं, और दूसरे को उसी मुख्य तत्व का परिणाम मात्र कहते हैं. शरीर भौतिक पदार्थ हैं. भौतिक पदार्थों को बौध्द परिभाषा में रुप कहा जाता हैं, और इसके भीतर के अभौतिक चेतना-प्रवाह को विज्ञान कहते हैं.

चेतना और चेतन का उनके यहा कोई भेद नहीं हैं. चेतना को ही चेतन का नाम दिया जाये, तो उन्हें आपत्ति नहीं हैं. पर इन दोनों (चेतना और चेतन) के अलग अस्तित्व को मानने में फिर आत्मवाद की भ्रांति उत्पन्न हो जाने का डर हैं, इसलिए इसे बौध्द पसन्द नहीं करते. इस असीम परिवर्तनशीलता को देखने पर दुनिया में वस्तुतः वस्तु नाम की कोई चीज़ नहीं हैं, बल्कि घटनाएं हो रही हैं. घटनाएं काल में इतने थोडे-थोडे अन्तर से होति हैं, की जिनका पकड़ना भी मुश्किल हैं, और उनके उस परिवर्तन को न देख़ने पर देर तक एक तरह के रुप देखकर एकता या स्थिरता का भ्रम हो जाता हैं. बौध्द-दर्शन स्थिरता के दर्शन से उलटा हैं. जब विश्व में स्थिरता नाम की कोई चीज़ हैं ही नहीं, बल्कि प्राकृतिक नियमों के कारण हरेक वस्तु-घटना-जड़-मुल से परिवर्तित होने के लिए मजबूर हैं, तो विश्व में परिवर्तन करने वाली, गतिकारक शक्ति की अवश्यकता नहीं. पदार्थों का अपना रुप ही गति देने के लिए पर्याप्त हैं.

गति, अनित्यता या विनाश के इस अटल सिध्दान्त को मान लेने पर इसकी यह व्याख्या स्पष्ट हो जाति हैं, की संसार में वस्तुओं के विनाश के लिए किसी कारण की अवश्यकता नहीं. बिना कारण बिना हेतू सारे पदार्थ उत्पन होकर दूसरे क्षण अपने आप नष्ट हो जायेगे, यह बौध्दों का ' अहेतुक विनाश ' सिध्दान्त हैं. इसके कारण वह अहेतुवादी नहीं कहे जा सकते. विनाश के लिए किसी कारण या हेतु की अवश्यकता नहीं हैं, क्योंकि विनाश अभावरुप हैं. लेकिन उत्पत्ति के लिए हेतु की -- हेतु नहीं बल्कि हेतुओं (कारण समूह) की अवश्यकता हैं. उत्पत्ति किसी वस्तु के भाव रुप में होती हैं, किसी एक वस्तु की उत्पत्ति के लिए एक कारण विश्व में कहीं नहीं देखा जाता. अनेक हेतु मिलकर एक कार्य को उत्पन्न करते हैं. बौध्दों के इस सिध्दान्त को हेतुसामग्रीवाद कहते हैं. जो लोग अनुमान से ईश्वर की सत्ता साबित करना चाहते हैं, उनके लिए बौध्दों की यह जबर्दस्त आपत्ति हैं, की दुनियां की छोटी या बड़ी किसी चीज़ को ले लिजियें, उसके उत्पन्न होने में अनेक कारण होते हैं. घड़े को पैदा करने में कुम्हार, उसका डंडा, चाक, मिट्टी, पानी, मिट्टी को ढोने वाला गदहा और कितनी ही चीजे. कुम्हार की कला के विकास करने में सहायता देने वाली सैकड़ों पीढ़ीयां हैं. यह सभी घड़े के उत्पादन में कारण हैं. अगर कार्य से कारण का अनुमान होता हैं, तो यही, की एक कार्य के अनेक कारण होते हैं. अनेक कारणों में किसी को महत्त्वहीन नहीं कहा जा सकता, क्योंकि बाज़ार के मोल भाव में किसी चीज़ का दाम कितना ही कम हो, लेकिन जब उसके बिना कार्य का होना बिल्कुल असम्भव हैं, तो वह दूसरे कार्यों के ही समान महत्व रखती हैं.

कार्य चरम अनित्यता के सिध्दान्त के अनुसार कारण का दूसरा रुप हो जाता हैं. स्थिरवाद में घड़े का कारण मिट्टी के लोंदे (गिला पिंड) को मानते हैं, और उस लोंदे और घड़े दोनों में मिट्टी परिवर्तन होते भी मौजूद हैं. इस तरह के स्थुल कथन को बौध्द भी व्यवहार सत्य के तौर पर मान लेते हैं, लेकिन यह परमार्थ सत्य नहीं हैं. परमार्थ दृष्टि से देखने पर मिट्टी के लोंदे के भीतर के सूक्ष्म अंशो (परमाणुओं) और उनकी नितान्त क्षणभंगुरता का ख्याल रखना होगा. वह दूसरे ही क्षण बिल्कुल नष्ट हो जाते हैं, और फिर दूसरी चीज़ उनकी जगह पर आ जाति हैं. कार्य और कारण में कोई चीज़ एक से दूसरे में स्थिर रहते स्थानान्तरित नहीं होति, बल्कि एक जड.-मूल से नष्ट होकर दूसरे के उत्पन्न होने के लिए रास्ता छोड़ती हैं. कारण जिस वक्त था, उस वक्त कार्य नहीं था, कार्य जिस वक्त अस्तित्व में आया, उस वक्त कारण का अत्यन्त विनाश हो चूका था. इसलिए वास्तविक तौर से कार्य और कारण का एक दूसरे के साथ कोई भी सम्पर्क नहीं हुआ. उनके बारे में यही कहा जा सकता हैं, की कारण पहले था, उसके बाद कार्य आया--' अस्मिन् सति इदं भवति ' (इसके होने पर यह होता हैं) इस तरह हम देखते हैं, की बौध्द दार्शनिक विचारों से कार्य-कारण की व्याख्या भी नई हो जाति हैं.

महामानव बुध्द
लेखक- भदन्त राहुल सांकृत्यायन

Friday, August 23, 2019

मध्यमा प्रतिपद

मध्यमा प्रतिपद : मध्य-मार्ग में बुध्द का हमेशा जोर था. कर्म में भी वह अति का रास्ता छोड़कर मध्य का रास्ता स्वीकार करते थे. (तपश्चर्या) से शरीर के अत्यंत सुखाने को भी वह अच्छा नहीं समझते, और न शरीर को ही सब कुछ समझकर उसकी पूजा में रत रहने को पसन्द करते थे. जिस तरह यहां बुध्द मध्य-मार्ग को स्वीकार करने की बात कहते हैं, वैसे ही दर्शन में भी वह मध्यमा-प्रतिपद् को मानते हैं. एक तरफ जड़वादी विचारधारा के लोग उनके समय भारत में थे, जिनके सामने जड़ वस्तुओं या महाभूतों से भिन्न कोई दूसरी वास्तविक वस्तु नहीं थी. जड़ वस्तुओं में ही चेतना उत्पन्न हो जाति हैं, जैसे गुड़ या दूसरी चीजों में मद्यरस, ऐसी उनकी विचारधारा थी. दूसरी तरफ ब्रह्मवादी लोग थे, जो जड़ की सत्ता को चेतन से उद्भूत मानते थे. एक आत्मवाद और दूसरा जड़वाद का रास्ता था. बुध्द ने दोनों का साफ़ इनकार किया. रुप और विज्ञान भिन्न हैं, और उनकी तीन स्थितियाँ (संज्ञा+वेदना+संस्कार) भी उसी तरह भेद रखती हैं. पांचो स्कन्ध (रुप+संज्ञा+वेदना+विज्ञान) मिलकर वह विश्व की व्याख्या करते हैं. जिसे नाम-रुप भी कहा जाता हैं. कार्य से कारण को बिल्कुल भिन्न मानने पर उनके सिध्दान्तो के अनुसार रुप से भी विलक्षण विज्ञान उत्पन्न हो सकता हैं; पर इस बात को कहीं स्पष्ट नहीं किया गया, इसलिए हमें भी खीचातानी नहीं करनी चाहिए.

वह उच्छेदवाद अर्थात् शरीर के साथ जीवन की समाप्ति को नहीं मानते, उन्हें यह मानने में उजुर नहीं की जीवन प्रतिक्षण उत्पन्न होकर सर्वथा नष्ट हो जाता हैं. उच्छेद (नष्टता) से उनका अभिप्राय जीवन-प्रवाह या सन्तान उच्छेद हैं. जीवन एक अविच्छिन्न-रेखा नहीं हैं, बल्की करोडो़ बिन्दुओं का समूह हैं. हर एक बिन्दु हर एक क्षण के जीवन का प्रतिनिधि हैं. यद्यपि जीवन का हर एक बिंदु हर क्षण नष्ट हो रहा हैं, लेकिन उससे प्रवाह उच्छिन्न नहीं होता. एक की जगह दूसरा आता हैं, दूसरे की जगह तिसरा. इस तरह वह प्रवाह जारी रहता हैं. इस शरीर में भी जीवन-बिंदु-प्रवाह जारी रहते उनके एक दूसरे के अतिसमिप रहने के कारण जीवन की एकता का भान होता हैं, जैसे बिंदुओ द्वारा बनी रेखा का भान होता हैं. इसी जीवन-प्रवाह को इस शरीर के बाद भी अच्छे-बुरे कर्मों के अनुसार बनते वह मानते हैं. कर्म का फलदाता कोई दूसरा नहीं हैं. हरेक आदमी जैसा करता हैं, उसी के अनुसार उसका जीवन बन जाता हैं, और यही तद्नुकुल फल हैं. बुध्द के सिध्दान्त के अनुसार हरेक मानव हर क्षण अपने अनंत काल के अर्जित सुगुणों-दूर्गुणों का मिश्रित समूह हैं. यहा भी मध्यमा प्रतिपद को ही बुध्द ने स्वीकार किया. आत्मवादी आत्मा को मान कर उसके चोले को बदलते रहने की बात करते थे, और जड़वादी मृत्यु के साथ जीवन की समाप्ति मानते थे. आत्मवाद को न मानते हुए बुध्द ने जन्मान्तर की संगति के लिए जीवन-बिंदु-प्रवाह को मान लिया, और उच्छेद को भी मानने से इनकार कर दिया.

महामानव बुध्द
लेखक- भदन्त राहुल सांकृत्यायन

Wednesday, August 21, 2019

प्रतित्यसमुत्पाद

प्रतित्यसमुत्पाद : प्रतीत्य-समुत्पाद के अर्थ को साफ करते हुए बुध्द ने स्वयं कहा हैं - 'इसके बाद यह होता हैं' (अस्मिन् सति इदं भवति); जो वस्तुतः बिना अपवाद के सभी वस्तुएं अनित्य (परिवर्तनीय) हैं, इसी मौलिक सिध्दान्त की व्याख्या हैं. बुध्द और बौध्द अनित्यवादी हैं. वह किसी चीज़ का वास्तविक होना स्वीकार नहीं कर सकते, जब तक की वह अनित्य न बतलाई जाये. पीछे के आचार्यों ने इसे और साफ करते हुए कहा -- 'यत् सत् तत क्षणिकं ' (जो वास्तविक हैं वह क्षणिक हैं). बाहरी वस्तुओं को सभी अनित्य और क्षणिक मानने को तैयार थे. लेकिन बुध्द ने बाहरी स्थूल जगत को ही क्षणिक नहीं बतलाय, बल्की आन्तरिक सूक्ष्म जगत पर भी इस निरपवाद नियम को लागू बताया. बुध्द से थोड़े ही दिनों पहले उपनिषद के विचारकों का समय बीता था. प्रवाहण, उद्दालक, याज्ञवल्क्य जैसे उपनिषद् के महान ऋषीयों ने बहुत प्रयत्न कर के इस बात को मानने के लिए लोगों को तैयार किया था, की क्षण-क्षण परिवर्तनशील बाह्य जगत के भीतर नित्य, कूटस्थ, अविचलित एक सूक्ष्म वस्तू (तत्व) हैं. इस तत्व को उन्होने आत्मा की संज्ञा दी, और उसी नित्य निर्विकार आत्मा को पाना जीवन का सर्वश्रेष्ठ उद्देश्य माना. उपनिषद् के इस आत्मवाद (ब्रह्मवाद) भक्तों की आज भी देश में कमी नहीं हैं. सचमुच ही यह बड़े परिश्रम और तपस्या का फल था, जीसे बुध्द ने अपने अनित्यतावाद द्वारा एक फूंक में उडा़ देना चाहा. उपनिषद् के आत्मवाद के ऊपर खास तौर से बुध्द प्रहार करना चाहते थे, यह इस से भी मालूम हैं, की उन्होने अपने सिध्दान्तो को अनात्मवाद कहा. वेदान्त ने सत्-चित्-आनन्द की घोषणा की और बुध्द ने असत्, अचित्-अनानन्द की! हा, शब्द-भेद से उन्होने इसके लिए, अनित्य, दु:ख और अनात्म शब्द का व्यवहार किया. सत् यह वेदान्त में नित्य के लिए कहा गया, चित् आत्मा के लिए और आनन्द का अर्थ हैं दु:ख का अभाव. इस से साफ ही हैं, की बुध्द उपनिषद् के मूल सिध्दान्तो के विरोधी थे. यह अश्चर्य की बात है, की आजकल कितने ही लेखक इसके बारे में समन्वय करने की कोशिश करते हुए बुध्द को भी उपनिषद् के सिध्दान्तो का प्रतिपादक बतलाना चाहते हैं.

अनित्यवाद या क्षणिकवाद बुध्द के दर्शन की आधारशिला हैं. उनका यह सिध्दान्त भारत के सब से प्रौढ और प्रगतिशील दर्शन का प्रेरणा-स्रोत भी हैं. इस सिध्दान्त को मान लेने पर एक तरफ आदमी ईश्वर और आत्मा के बन्धन से छुट जाता हैं, दूसरी तरफ़ वह नियति के फन्दे से भी मुक्त हो जाता हैं. संसार में कोई चीज़ दो क्षण भी नहीं रह सकती हैं. पैदा होने के साथ वह अपनी मृत्यु को अपने साथ लाती हैं. इस सत्य को समझाकर एक ओर बुध्द प्रियों के वियोग और अप्रियों के संयोग से होने वाली चिन्ता को भी अस्थायी मानकर छोड़ने के लिए कहते हैं. दूसरी ओर इस परिवर्तनशीलता से मानव के लिए अनुकुल परिवर्तन की सम्भावना हैं, वह उसके लिए उद्योग परायण हो सकता हैं.

क्षणिकवाद के अनुसार कारण क्षणिक हैं. जिस समय कार्य पैदा होता हैं, उस समय से पहले उसका कारण विलुप्त हो गया रहता है. इस विचार के अनुसार कार्य और कारण का क्या सम्बन्ध हैं, इसी बात को बतलाने के लिए बुध्द ने प्रतीत्य-समुत्पाद के नाम से नई परिभाषा गढी, एक के प्रतीत्य (नष्ट) होने पर दूसरे का उत्पाद (उत्पत्ति) होती हैं. कारण नष्ट हो जाने पर कार्य की उत्पत्ति होती हैं. इन दोनों का सम्बन्ध यही हैं, की 'इसके बाद यह होता हैं' कारण के बाद कार्य उत्पन्न होता हैं. बीज नष्ट होकर वृक्ष उत्पन्न होता हैं, इस बात को मानने में किसी को आपत्ति नहीं हो सकति, लेकिन बुध्द परिवर्तन को इतने स्थूल रुप में नहीं देखते. बाहरी परिवर्तन को हम आंखों से देख लेते हैं, वह बहुत ही स्थूल परिवर्तन हैं. वह इस स्थूल परिवर्तन को भी लाखों सूक्ष्म परिवर्तन का आभास बतलाना चाहते हैं, इस सिध्दान्त के अनुसार मनुष्य हर क्षण मर रहा हैं, और हर क्षण पहली की जगह, एक दूसरा बिल्कुल नया व्यक्ति प्रकट हो रहा हैं. परिवर्तन इतनी तेजी से होता हैं, की उसके काल को हम पकड़ नहीं सकते. पर हरेक परिवर्तन में पहले का सादृश्य प्रवाहरुपेन चलता रहता हैं, जो भ्रम पैदा कर देता हैं की यह वही वस्तु हैं. मनुष्य बाल्य, तारुण्य और वार्धक्य जैसे परिवर्तनों में ही नहीं पड़ता, बल्की हर क्षण वह मरता हैं, और दूसरा उसी के समान उस स्थान पर आता हैं. इस तरह के सिध्दान्त द्वारा बुध्द ने अपने समय के आत्मवादी विचारकों में कितनी खलबली मचाई होंगी, इसे कहने की अवश्यकता नहीं.

बुध्द चेतना को मानते हैं, और चेतना तथा चेतन को एक कहने पर इनकार नहीं करते. उनके दर्शन में इस तरह के गुण-गुणी के भेद के लिए स्थान नहीं हैं. तत्त्वों का वर्गीकरण करते हुए वह उन्हें पाँच स्कन्धो में बाँटते हैं -- रुप, वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान, जिन्हे बौध्द परिभाषा में पंचस्कन्ध कहा जाता हैं. इन पाँचों स्कन्धो में वस्तुतः रुप और विज्ञान मुख्य हैं, बाकी तीन (संज्ञा+वेदना+संस्कार) रुप और विज्ञान के सम्पर्क की भीन्न-भीन्न स्थितियाँ या क्रियायें हैं. स्थिति और क्रिया में बौध्द कोई अन्तर नहीं मानते, क्योंकि कोई ऐसी स्थिति नहीं हो सकती, जिसमे क्रिया न हो. नाश और उत्पत्ति का चक्कर तो किसी क्षण भी नहीं रुकता. रुप हैं भौतिक तत्त्व और विज्ञान हैं चेतना. वास्तविकता के ये दो रुप हैं. यह दोनों क्षण-क्षण परिवर्तनशील हैं. वास्तविकता देश-काल में बहती हुई नदी की धारा हैं. ऐसी नदी हैं, जीस में दो क्षण भी एक ही जगह अवगाहन नहीं किया जा सकता. रुप और विज्ञान दोनों की क्षणिक सत्ता को वास्तविक मानते हुए बुध्द को द्वैतवादी कहा जा सकता हैं. पर वस्तु के अन्तस्तल में जीस रुप में अति सूक्ष्म परिवर्तन को वह मानते हैं, उसके कारण दोनों का भेद नहीं रह जाता. इसी कारण पीछे (गत) बौध्द दर्शन में द्वैत और अद्वैत का भेद हो गया. सर्वास्तिवादी दोनों के अस्तित्त्वों को मानने वाले थे. स्वत्रांतिक बाह्य पदार्थों के अस्तित्त्वों को मुख्य मानते थे. विज्ञानवादी योगाचार अन्तस्तत्व या विज्ञान को ही मुख्य तत्त्व मानते थे, और शून्यवादी माध्यमिक दोनों के अस्तित्व को सापेक्ष मानकर उसकी परमार्थ सत्ता से इनकार करते थे. यह बौध्द धर्म के पीछे का विकास हैं. पर चारों दर्शनो का अंकुर बुध्द के विचारों में मिलता हैं.

महामानव बुध्द
लेखक- भदन्त राहुल सांकृत्यायन

Sunday, March 27, 2016

मिलिंद प्रश्न

''महाराज, मनुष्यात वसणारे सात प्रकारचे चित्त पाहण्यात येतात ते असे- १. सक्लेश म्हणजे चिकटलेले असे चित्त २. श्रोतापन्न व्यक्तीचे चित्त ३. सकृदायामी व्यक्तीचे चित्त ४. आनागामी व्यक्तीचे चित्त ५. अर्हत व्यक्तीचे चित्त ६. प्रत्येक बुध्दाचे चित्त आणि ७. सम्यक सम्बुध्दाचे चित्त.

१. संक्लेश चित्त
''महाराज, लालसेच्या आहारी गेलेले ( रागयुक्त ), दुष्ट मोहात बुडालेले, क्लेशांच्या भोवर्यात सापडलेले चित्त ( मन ) कृत्याची व प्रज्ञेची जाणीव नसलेले अशा लोकांचे चित्त किंवा मन अतिशय जड, विकृत आणि मंद असते.

''ते का बरे? ''

''कारण की, त्यांच्या चित्ताला शिक्षण मिळालेले नसते. म्हणजे त्यावर सुसंस्कार जडलेले नसतात.

''महाराज, समजा एखादा वेळू त्याच्या रांजीतून काढावयाचा असल्यास तो कधीही सहजपणे काढता येणार नाही़. हे काम अत्यंत युक्ती, प्रयुक्ती व हळूहळू करावे लागते. कारण अवाढव्य वाढलेला वेळू आपल्या अनंत व विशाल शाखा संपूर्ण रांजीत पसरविल्यामुळे त्याची परस्परात चांगलीच गुंतागुंत झालेली असते. अशारीतीने फसलेला वेळू कापून काढणे अत्यंत कठीण असते. महाराज, याच उदाहरणाप्रमाणे लालसेच्या आहारी गेलेले.... जे लोक असतात त्यांचे चित्त अतिशय जड, विकृत आणि मंद असते. ''

''ते का बरे? '' तर सालसादी क्लेशांच्या रांजीत पूर्णतः त्याची गुंतागुंत होऊन फसल्यामुळे  होय. या सात प्रकारच्या चित्तांपैकी हा पहिला प्रकार होय.

२. श्रोतापन्न व्यक्तीचे चित्त

''दुसर्या प्रकारचे चित्त याहून वेगळे असते. महाराज, ज्यांनी श्रोतापन्नपदाचा लाभ करुन घेतला आहे, जे कधीही वाईट मार्गाने जात नाहीत, ज्यांनी सत्य ओळखले आहे आणि ज्यांना भगवान बुध्दाच्या धर्माची जाणीव झाली आहे अशा लोकांचे चित्त, आत्मभाव, कर्मकांड आणि शंका या तीन भ्रममूलक विषयापासून एकदम मुक्त, हलके व गतीमान होत असते. तथापि वरच्या ( आर्यमार्ग ) विषयात त्याला विचारशक्तीच्या कार्यात अडचणी येतात. कारण त्याबाबतीत ते जड, विकृत आणि मंदच असते. म्हणून त्यांची कार्य ही मंदगतीनेच चालतात. ''

''ते का बरे? '' तर तीन विषयात चित्त एकदम परिपूर्ण परिशुध्द झालेले असते. तथापि बाकीच्या अवस्थांचे बाबतीत चित्ताचे क्लेश ( मळ ) मात्र कायम असतात. महाराज, ज्याप्रमाणे वेळूवांच्या रांजीतील वेळू कापून काढताना तीन पेरांपर्यंत शाखा तोडून साफ केल्यामुळे आणि बाकी वरच्या शाखा तशाच त्या रांजीत गुंतलेल्या अवस्थेत सोडून दिल्यामुळे वेळू ओढताना तीन पेरांपर्यंत पकडावयास किंवा ओढावयास कठीण जाणार नाही़. परंतु बाकी वरचा भाग ओढने अशक्य व कठीणच होते.''

''ते का बरे? ''

''खालचा भाग कापून साफ केला असला तरी वरचा भाग तसाच सोडून दिला आहे. महाराज, याप्रमाणेच ज्यांनी श्रोतापन्नपदाचा लाभ केला आहे... अशा लोकांचे चित्त, आत्मभाव, कर्मकांड आणि शंका या तीन भ्रममूलक विषयांपासून एकदम मुक्त, हलके व गतीमान होत असते. तरीपण वरच्या विषयावरील त्याला विचार शक्तीच्या कार्यात अडचणी येतात. कारण त्याबाबतीत ते जड, विकृत आणि मंदच असते. ते का म्हणून? तर, ह्या तीन भ्रममूलक बाबी दूर झाल्या असल्या तरी बाकीचे क्लेश अवशिष्ट असल्यामुळेच असे घडते. दुसर्या प्रकारचे चित्त हे असे आहे.

३. सकृदागामी व्यक्तीचे चित्त

''तिसर्‍या प्रकारचे चित्त या दोन्ही प्रकाराहूनही वेगळे असते. ''महाराज, लालसा, द्वेष आणि मोह हे केवळ नाममात्र राहिले आहेत. अशा सकृदागामी व्यक्तीचे चित्त पाच अवस्थांत एकदम हलके व गतीमान असते. परंतु यापेक्षा उंच अवस्थांत जड, विकृत आणि मंद असते. कारण जीवनातील खालच्या दर्जाच्या पाच अवस्थांपर्यंत चित्त परिशुध्द झालेले असले तरी वरच्या अवस्थांत क्लेश अजून शिल्लकच असते. हे असे घडते- महाराज, वेळूवाच्या रांजीमधून कापून काढत असता वेळू पाच पेरांपर्यंत एकदम गुंतलेल्या शाखा प्रशाखा साफ केल्यामुळे तिथपर्यंत ओढून काढावयास मुळीच कठीण जाणार नाही. परंतु वरच्या शाखा प्रशाखा अजून रांजीत परस्परात गुंतुन असल्यामुळे तो भाग ओढून काढण्यास बरीच अडचण जाते. का की, वेळू खाली पाच पेरांपर्यंत साफ केलेला असला तरी उरलेला वरचा भाग साफ न करता असाच सोडून देण्यात आला आहे. महाराज, याप्रमाणेच ज्यांनी सकृदागामी पदाचा लाभ करुन घेतला आहे, त्यांचे चित्त जीवनातील पाच कनिष्ठ अवस्थांपर्यंत एकदम दृतगतीने high speed विचार कार्य करीत असते. का की, येथे ते हलके आणि गतीमान असते. तरीपण यापेक्षा वरच्या अवस्थांत जड आणि मंदच असते. हे तिसर्‍या प्रकारचे चित्त समजावे.''

४. अनागामी व्यक्तीचे चित्त

''चौथ्या प्रकारचे चित्त याहून वेगळे असते.''

''महाराज, ज्यांनी अनागामी नावाची वरची अवस्था गाठली, त्यांचे पाच बंधन आपोआप गळून पडतात आणि जीवनाच्या दहा अवस्थांपर्यंत त्यांचे चित्त एकदम साफ झालेले असते. म्हणून येथपर्यंत विचारशक्ती सुलभतेने व तत्परतेने कार्य करीत असते. का की, चित्त हलके आणि गतीमान असते. परंतु याहीपेक्षा वरच्या भूमीत चित्तास कार्य करावयास बर्याच अडचणी येतात. कारण येथे चित्त जड आणि मंद असते. का की, दहा स्थानांपर्यंत चित्त एकदम परिशुध्द झाले असले तरीपण वरच्या अवस्थेतील चित्तमळ अजून अवशिष्ट असतात. महाराज, वेळवाच्या रांजीतून वेळू कापून काढत असता दहा पेरांपर्यंत समस्त शाखा प्रशाखा तोडून काढल्यामुळे तिथपर्यंत ओढून काढणे कठीण नाही़... महाराज, असेच आहे अनागामी अवस्था प्राप्त करणार्या व्यक्तीचे चैतासिक दहा स्थानांपर्यंत चित्त दृतगतीने कार्य करण्यास त्यास कठीण जात नाही़, परंतु यापेक्षा वरच्या भूमीत अत्यंत कठीण व मंद गतीने कार्य करणे भाग पडते. का की, दहा स्थानांपर्यंत चित्त एकदमच परिशुध्द झालेले असले तरी बाकीच्या वरच्या अवस्थांत अजून क्लेश शिल्लक राहिलेले आहेत. असे अनागामी पदाचा लाभ करणारे व्यक्ती पुन्हा मानवी जगात कधीही येत नाही. ह्यांचे चित्त चौथ्या प्रकारचे चित्त होय.''

५. अर्हतपद प्राप्‍त व्यक्तीचे चित्त

''पाचव्या प्रकारचे चित्त वरील चार चित्ताहून एकदम वेगळे आहे.

''महाराज, ज्यांनी अर्हतपदाचा लाभ करुन घेतला आहे. ज्यांचे चारही आश्रव तुटून पडले, ज्यांचे क्लेश-मळ सर्वस्वी नाहीसे झाले, चित्त निर्मळ व स्वच्छ झाले, ज्यांचे ब्रह्मचर्य जीवन सफल झाले, अडचणीचे ओझे उतरले, कार्यसिध्दी पूर्णं झाली, ज्यांना सत्यज्ञानाचा साक्षात्कार झाला, ज्यांचे समस्त भावबंधणे नष्ट होऊन चित्त पुर्णत: विशुद्ध झाले. त्यामुळे आता पुनर्जन्माची बेडी कायमची तुटली. श्रावकांनी मानवी जीवनात करावयाच्या किंवा समजून घ्यावयाच्या बाबतीत ज्यांच्या चित्ताने सफलता प्राप्त केली आहे. म्हणजे यांत ते हलके व तत्पर आहे. परंतु प्रत्येक बुध्दाच्या भूमी संबंधाने ते अजूनही जड व मंदच असते. ते का बरे? श्रावकाच्या भूमीकेत त्याचे चित्त एकदम परिशुध्द झाले असले, तरी प्रत्येक बुध्दाच्या भूमीके संबंधाने अजून शुद्ध झालेले नाही.

''महाराज, वेळवाची संपूर्ण रांज तोडून एकदम साफ केली असता त्यातील कोणताही वेळू सहजपणे ओढून काढता येतो. महाराज, त्याचप्रमाणे अर्हतपद प्राप्‍त केलेल्या व्यक्तीचे असते. श्रावकाने मानवी जीवनात करावयाच्या किंवा समजून घ्यावयाच्या बाबतीत त्यांचे चित्त एकदम हलके व दृतगतीने कार्य करणारे असले तरी प्रत्येक बुध्दाच्या भूमीकेत जड व मंद गतीनेच त्याला कार्य करावी लागतात. हेच आहे पाचव्या प्रकारचे चित्त.

६. प्रत्येक बुध्दाचे चित्त

''सहाव्या प्रकारचे चित्त पाचही चित्ताहून वेगळे असते. महाराज, ते म्हणजे प्रत्येक बुध्दचित्त. ते स्वतः चा आधार स्वयंमच असतात, त्यांना दुसर्यावर अवलंबून राहण्याची अवश्यकता नसते, त्यांचा कोणी गुरु किंवा आचार्य नसतो. त्यांचे वास्तव्य गेंड्याच्या शिंगाप्रमाणे एकट्याचेच असते, ते आपल्या जीवनात एकदम निर्मळ व परिशुध्द झालेले असतात, त्यांच्यात कसल्याही प्रकारचा दोष नसतो. त्यांचे चित्त स्वतः संबंधाने अतिशय हलके व गतीमान असते. परंतु सम्यक सम्बुध्दाच्या क्षेत्राच्या बाबतीत जड व मंदच असते. का की, जरी ते प्रत्येक बुध्दाच्या विषयी बिल्कूल परिशुध्द व निर्मळ असले तरीपण सर्वज्ञ बुध्दाचे क्षेत्र विशाल आहे. जे स्वतः प्रज्ञावंत असून दुसर्यांना देखील प्रज्ञेच्या मार्गाने नेतात ते सर्वज्ञ बुध्द होत. असे तरी का व्हावे, तर प्रत्येक बुध्द स्वतः च्या क्षेत्रामध्ये एकदम निष्कलंक असले तरी सम्यक सम्बुध्दाचे क्षेत्र इतके विस्तृत असते की सामान्य बुध्द पोहचूच शकत नाही. त्याच्या चित्ताच्या कार्यशक्तीला तोड नाही़.

''महाराज, समजा एखादा माणूस आपल्या परिसरातील लहान ओढे किंवा लहान नदी तो स्वतः च्या इच्छेनुसार कधीही पार करतो. मग तो दिवस असो की रात्र असो त्याला कशाची भीती वाटत नाही़, परंतु अत्यंत खोल, विशाल, अथांग आणि ज्याचा किनारा दृष्टीस पडत नाही असा महान समुद्र जर त्याने पाहिले तर त्यास काय वाटेल? तो भयभीत होईल आणि पलीकडे जाण्याची हिम्मत चूकूनही करणार नाही. असेच प्रत्येक बुध्दाचे. ते का बरे? तर का की, आपल्या क्षेत्रातील नदीशी तो पूर्णपणे परिचित आहे. परंतु महान समुद्र विशाल आहे. हाच चित्ताचा सहावा प्रकार आहे.''

७. सम्यक सम्बुध्दाचे चित्त

सातव्या प्रकारचे चित्त या सहाही चित्तांहून पूर्णतः वेगळे असते.

''महाराज, ज्यांनी सम्यक सम्बुध्दत्व प्राप्‍त केले त्यांना जगातील सर्वच प्रकारचे ज्ञान असते. अर्थात ते सर्वज्ञ असतात. त्यांना दहा प्रकारची शक्ती लाभलेली असते. म्हणूनच ते दशबल या नावाने संबोधिले जातात. चार प्रकारच्या विशेष ज्ञानावर त्यांचा आत्मविश्वास असतो. बुध्द धर्माची १८ लक्षणे त्यांचे अंगी असतात. त्यांचे इंद्रिये पूर्णतः ताब्यात असतात. त्यांच्या आकलन शक्तीपासून काहीही लपून राहू शकत नाही. अर्थात त्यांचे ज्ञान सर्वत्रगामी असते. समस्त क्षेत्रात त्यांचे चित्त तेजस्वी आणि दृतगामी असते. का की, ते सर्वच प्रकारे एकदम परिपूर्ण व परिशुध्द झालेले असते.

''महाराज, एखादा तीक्ष्णधार लावलेला, कोठेही गंज न लागलेला, अगदी सरळ, गाठरहीत नोकदार आणि कोठेही वळसा नसलेला बाण आहे. तो जर जबरदस्त धनुष्यास जोडून शक्तीशाली तिरंदाजाने एखाद्या पातळ रेशमी किंवा मलमल किंवा पातळ उनी कापडाच्या आडव्या पट्टीवर सोडला तर त्या कापडाने त्यास प्रतिबंध होईल काय? त्याच्या कार्यात मंदपणा येईल काय?

''नाही भंते, धनुष्यामधून अत्यंत वेगाने सुटलेल्या तीक्ष्ण बाणास तेवढ्याशा पातळ कापडाने कसा काय मंदपणा येऊ शकेल? ''

''ते का बरे? ''

''का की, इतके पातळ आणि मऊ कापड आहे आणि बाण तिक्ष्ण असून बाण सोडणारा शक्तीशाली आहे? ''

''महाराज, त्याचप्रमाणे बुध्दत्व प्राप्त केलेल्या लोकांचे चित्त सर्वच विषयात अत्यंत तीक्ष्ण व दृतगती असते. असे का घडते? का की, ते सर्व प्रकारे परिपूर्ण व परिशुध्द असतात, हाच चित्ताचा सातवा प्रकार होय.

''महाराज, हे जे सातव्या प्रकारचे सम्यक सम्बुध्दाचे चित्त आहे, ते बाकी सर्व चित्तांपेक्षा सर्वच प्रकारने श्रेष्ठ असते. ते आपल्या अपरिमित गुणामध्ये हलके व शुद्ध असे असते. महाराज, त्यांचे चित्त इतके हलके आणि शुद्ध असल्या कारणानेच भगवान सम्यक सम्बुध्द दोन्ही प्रकारच्या ऋध्दीशक्ती दाखवू शकतात. यावरुनच त्यांच्या चित्ताची शुध्दता व हलकेपणा  दिसून येतो, याशिवाय त्या ऋध्दीशक्तींचे दुसरे कोणते कारण दिसत नाही. या ऋध्दीशक्तींचे सुध्दा भगवान बुध्दाच्या चित्ताशी तुलना केली तर त्याही अत्यल्प वाटतात. तरीपण भगवान बुध्दांची सर्वज्ञाता 'अवर्जन' प्रतिबध्द ( इच्छा करताच सिध्द होणारी ) अशी होती. ज्या गोष्टी जाणून घ्यावयाच्या आहेत  त्या क्षणात चिंतन ( ध्यान ) करुन बुध्द जाणून घेत असत. यातच त्यांची सर्वज्ञता होती.

''महाराज, जसा कोणी मनुष्याने अगदी सुलभतेने एखादी वस्तू आपल्या हातातून दुसर्याच्या हातात द्यावी, तोंड उघडताच आवाज केला जावा; तोंडात पडलेला घास गिळून टाकावा, डोळे मिटल्यावर ते उघडता यावे, हात मागेपुढे करावे. याप्रमाणे किंवा याहीपेक्षा अधिक सुलभतेने बुध्द आपल्या सर्वज्ञतेच्या बळावर जी गोष्ट जाणून घेण्याची इच्छा असेल ती जाणून घेत असत. तथापि ते ध्यानावस्थेत जरी नसले तरी त्यांना सर्वज्ञ या संबोधाशिवाय दुसरे संबोधन त्यांच्याकरीता लावता येणार नाही़.''

सौन्दरनन्द-महाकाव्य, आज्ञा-व्याकरण, सर्ग १८

सौन्दरानन्द महाकाव्य, अष्टादश (१८ वां) सर्ग, आज्ञा-व्याकरण (उपदेश): अथ द्विजो बाल इवाप्तवेदः क्षिप्रं वणिक् प्राप्त इवाप्तलाभः । जित्वा च रा...