अश्वघोष-कृत,
सौन्दरनन्द-महाकाव्य
पंचम सर्ग, नन्द की दीक्षा।
अथाव्रतोयांश्वरथद्विपेभ्यः शाक्या यथास्वद्धि गृहीतवेषाः।महापणभ्यो व्यवहारिणश्च महामुनौ भक्तिवशात्प्रणमः।।१॥
तब घोड़ों रथों और हाथियों से उतर कर शाक्यों ने, जिन्होंने अपनी अपनी सम्पत्ति के अनुसार वेष धारण किया था, तथा बड़ी बढ़ी दूकानों से दूकानदारों (व्यापारियों) ने महामुनि को भक्तिपूर्वक प्रणाम किया॥१॥
केचित्प्रणम्यानुययुर्मूहूर्त केचित्प्रणम्यार्थवशेन जग्मु:। केचित्स्वकेष्वावसथेषु तस्थुः कृत्वाञ्जलीन्वीक्षण तत्पराक्षा: ॥२।।
कुछ लोग प्रणाम करके एक मुहूर्त तक उनके पीछे पीछे गये, कुछ लोग प्रणाम करके कार्यवश (वहाँ से) चले गये, और कुछ लोग हाथ जोड़ कर उन्ही की ओर देखते हुए अपने घरों में खड़े रहे। ॥२॥
बुद्धस्ततस्तत्र नरेन्द्रमार्गे स्त्रोतो महद्भक्तिमतो जनस्य।जगाम दुःखेन विगाहमानो जलागमे स्त्रोत इवापगायाः॥३॥
तब बुद्ध उस राज-मार्ग पर (खड़े) भक्त जनता की बड़ी भीड़ को चीरते हुए, मानो वर्षा के आने पर नदी की धारा में प्रवेश करते हुए, कठिनाई से गये ॥३॥
अथोमहद्धिः पथि संपतद्भिः संपूज्यमानाय तथागताय।कर्तु प्रणामं न शशाक नन्दस्तेनाभिरेमे तु गुरोर्महिम्ना॥४॥
तब नन्द झुण्ड के झुण्ड आते हुए बड़े बड़े लोगों से रास्ते में पूजित होते बुद्ध को प्रणाम न कर सका, किन्तु गुरु की इस महिमा से उसे आनन्द ही हुआ॥४॥
स्वं चावसङ्ग पथि निर्मुमुत्क्षुर्भक्ति जनस्याम्यमतेश्च रक्षन् ।नन्दं च गेहाभिमुखं जिघृक्षम्मार्गं ततोऽन्यं सुगत: प्रपेदे।।५॥
अपने साथ के लोगों से मुक्त होने की इच्छा से और दूसरे मत के लोगों की भक्ति की रक्षा करते हुए तथा गृहोन्मुख नन्द को पकड़ने की इच्छा से सुगत (बुद्ध) ने दूसरा रास्ता लिया ।।५॥
ततो विविक्त च विविक्तचेता: सन्मार्गविन्मार्गममिप्रतस्थे। गत्वाग्रतश्चाग्यतमाय तस्मे नान्दीविमुक्ताय ननाम नन्दः।।६॥
तब सन्मार्ग को जानने वाले शान्तचित्त मुनि एकान्त मार्ग पर आये और आगे से जाकर उन श्रेष्ठ मुनि को, जो आनंद से रहित थे, नंद ने प्रणाम किया। ॥६॥
शनैर्व्रजन्नेव स गौरवेण पटावृतांसो विनतार्धकायः।अधोनिबद्धाञ्जलिरूर्ध्वनेत्रः सगद्गदं वाक्यमिदं बभाषे। ।।७।।
सम्मानपूर्वक धीरे धीरे जाते हुए नंद ने, जिसका कंधा कपड़े से ढका हुआ था, आधा शरीर झुका कर नीचे की ओर हाथ जोड़कर और ऊपर की ओर नेत्र उठाकर गद्गद स्वर से यह वाक्य कहा :- ॥७॥
प्रासादसंस्थो भगवन्तमन्तः प्रविष्टमश्रौषमनुग्रहाय।अतस्त्वरावानहमभ्युपेतो गृहस्य कक्ष्यामहतोऽभ्यसूयन् ॥ ८॥
जब मैं अपने महल में था तब मैंने सुना कि भगवान् हमारे ऊपर अनुग्रह करने के लिए हमारे घर में प्रविष्ट हुए थे, इसलिए अपने बड़े घर के (नौकरों के) प्रति रोष करता हुआ मैं शीघ्रता से आपके समीप आया हूँ ॥८॥
तत्साधु साधुप्रिय मतप्रियार्थं तत्रास्तु भिक्षूत्तम भैक्षकाल:। अ्सौ हि मध्यं नभसो यियासुः कालं प्रतिस्मारयतीव सूर्यः॥९॥
इसलिये हे साधुप्रिय, हे भिक्षु-श्रेष्ठ, मेरा प्रिय करने के लिए आपका भिक्षा-काल वहीं (मेरे घर) पर ब्यतीत हो, आकाश के मध्य भाग में जाने की इच्छा करने वाला वह सूर्य मानो (भिक्षा-) काल का स्मरण करा रहा हैं। ॥९॥
(९-बौद्ध भिक्षु मध्याङ्ग-काल बीतने के पहले ही भिक्षा माँग कर अपना भोजन कर लेते हैं।)
इत्येवमुक्तः प्रणतेन तेन स्नेहाभिमानोन्मुखलोचनेन।ताद्दङ्निमित्तं सुगतश्चकार नाहारकृत्यं स यथा विवेद। ।।१०॥
जब उसने नम्रतापूर्वक स्नेह और सम्मान के साथ आँखों को ऊपर उठाकर इस प्रकार कहा, तब सुगत ने ऐसा सङ्केत किया जिससे उसने समझा कि (उन्हें) भोजन नहीं करना है। ॥१०॥
तत: स कृत्वा मुनये प्रणामं गृहप्रयाणाय मति चकार।अनुग्रहार्थ सुगतस्तु तस्मै पात्रं ददौ पुष्करपत्रनेत्र:॥ ११॥
तब उसने मुनि को प्रणाम कर घर (लौट) जाने का विचार किया, किंतु कमल के पत्तों के समान औंखों वाले सुगत ने अनुग्रह करने के लिये उसे अपना (भिक्षा-) पात्र दिया। ॥११॥
ततः स लोके ददतः फलार्थ पात्रस्य तस्याप्रतिमस्य पात्रं।जग्राह चापग्रहणक्षमाभ्यां पद्मोपमाभ्यां प्रयतः कराभ्यां।।१२॥
तब संसार में फल प्राप्त करने के लिये (पात्र) देने वाले उन अद्वितीय पात्र (बुद्ध) के (भिक्षा) पात्र को उसने अपने कमलोपम हाथों से, जो धनुष ग्रहण करने योग्य थे, संयमपूर्वक ग्रहण किया। ॥१२॥
पराङ्मुखन्त्वन्यमनस्कमाराद्विज्ञाय नन्दः सुगतं गतास्थं।हस्तस्थपात्रोऽपि गृहं यियासुः संसार मार्गान्मुनिमिक्षमाण:॥१३॥
सुगत को अन्यमनस्क अपने से विमुख तथा उदास जानकर, नंद हाथ में पात्र रहने पर भी घर जाने की इच्छा से मुनि को देखता हुआा मार्ग से हटने लगा। ।।१३॥
भार्यानुरागेण यदा गृह स पात्रं गृहीत्वापि यियासुरेव।विमोहयामास मुनिस्ततम्तं रथ्यामुखस्यावरणन तभ्य।।१४॥
प्रिया के अनुराग के कारण जब वह पात्र लेकर भी घर जाने की इच्छा करने लगा, तब मुनि ने उसके मार्ग के मुख (मार्ग-द्वार, मार्ग-प्रवेश ) को ढक कर उसे मोह में डाल दिया। ॥१४॥
निर्मोक्षबीजं हि ददर्श तस्य ज्ञानं मृदु क्लेशरजश्च तीव्र।क्लेशानुकूलं विषयात्मकं च नन्दं यतस्तं मुनिराचकर्ष। ।।१५॥
उसका ज्ञान मन्द है, क्लेशरूपी रज तीव्र है, वह क्लेशों (दोषों) के अनुकूल है और विषयासक्त है, किंतु उसमें मोक्ष का बीज वर्तमान है-यह देख कर ही मुनिने उसे आकृष्ट किया। ॥१५॥
संक्लेशपक्षो द्विविधश्च हृष्टस्तथा द्विकल्पो व्यवदानपक्षः।आत्माश्रयो हेतुबलाधिकस्य बाह्याश्रय: प्रत्ययगौरवस्य ।।१६॥
क्लेश (दोष) दो प्रकार के देखे जाते हैं, उसी प्रकार शुद्धता (पवित्रता) भी दो प्रकार की है; जिसमें हेतु-बल (कुशल-मूल) की अधिकता है वह अपने पर ही आश्रित होता है और जिसके लिए बाहरी वस्तुओं (या सहारे) का महत्व अधिक है वह दूसरे पर आश्रित हैं ॥१६॥
अयत्नतो हेतुबलाधिकस्तु निर्मुच्यते घट्टितमात्र एव। यत्नेन तु प्रत्ययनेयबुद्धिर्विमोक्षमाप्रोति पराश्रयेण ॥१७॥
जिसमें हेतु-बल की अधिकता है वह प्रेरित होते ही अनायास ही मुक्त हो जाता है, किंतु जिसकी बुद्धि बाहरी सहारे पर चलती है वह दूसरे के आश्रय से कठिनाई से मुक्ति प्राप्त करता हैं ॥१७॥
नन्दः स च प्रत्ययनेयचेता यं शिश्रिये तन्मयतामवाप।यस्मादिमं तत्र चकार यत्नं तं स्नेहपङ्कान्मुनिरुज्जिहीर्षन् ॥१८॥
नन्द का चित्त बाहरी सहारे पर चलता था, वह जिस किसी का आश्रय लेता था, उसी में तन्मय हो जाता था, इसलिए उस स्नेहरूपी पङ्क (किचड़) से उबारने के लिए मुनि ने यह यत्न किया॥१८॥
नंदस्तु दुःखेन विचेष्टमानः शनैरगत्या गुरुमन्वगच्छत् ।भार्यामुखं वीक्षणलोलनेत्रं विचिन्तयन्नार्द्रविशेषकं तत् ।।१९॥
दुःख से छटपटाता हुआ नन्द लाचार होकर धोरे धीरे गुरु के पीछे पीछे गया और (महल में उसकी) प्रतीक्षा में चन्चल आँखों वाले तथा गीले विशेषक वाले पत्नी-मुख का ध्यान करता रहा ॥१९॥
ततो मुनिर्तं प्रियमाल्यहारं वसन्तमासेन कृताभिहारं।निनाय भग्नप्रमदाविहारं विद्याविहाराभिमतं विहारं॥२०॥
तब मुनि मालाओं और हारों को चाहने वाले नन्द को, जिस पर वसन्त ऋतु ने आक्रमण किया था और जिसका प्रमदा के साथ विहार करना नष्ट हो गया था, उस विहार (मठ) में ले गये जो विद्या में विहार करने वाले (ज्ञानियों ) का प्यारा है ।।२०॥
दीनं महाकारुणिकस्ततस्तं दृष्ट्रा मुहूर्त करुणायमानः।करेण चक्राङ्कतलन मूध्नि, परुपशं चेवेदमुवाच चैनं। ॥२१॥
तब उस दुःखी की ओर मुहूर्त भर देखकर महाकारुणिक ने करुणा करते हुए चक्र के चिह्न से युक्त हथेली वाले हाथ से उसके मस्तक पर स्पर्श किया और उसे यह वचन कहा :- ॥२१॥
यावन्न हिस्रः समुपैति काल: शमाय तावत्कुरु सौम्य बुद्धि।सर्वास्ववस्थास्विह वर्तमानं सर्वाभिसारेण निहन्ति मृत्युः ।।२२॥
"हे सौम्य, जबतक घातक काल समीप नहीं आता है तब तक बुद्धि को शान्ति में लगाओ; (क्योंकि) मृत्यु इस संसार में सब अवस्थाओं में रहनेवाले की सब प्रकार से हत्या करती हैं ॥२२॥
साधारणात्स्वप्रनिभादसाराल्लोल मनः कामसुखातन्नियच्छ। हव्यैरिवाग्ने: पवनेरितस्य लोकस्य कामैन हि तृप्तिरस्ति ॥२३॥
स्वप्न के समान असार तथा (सर्व-) साधारण (सब के द्वारा उपभोग्य) काम-सुख से अपने चंचल मन को रोको; क्योंकि जैसे वायु-प्रेरित अग्नि की (घृत आदि) हव्य -द्रव्यों से तृप्ति नहीं होती, वैसे ही संसार को कामोपभोगों से तृप्ति नहीं है ॥२३॥
श्रद्धाधनं श्रेष्ठतमं धनेभ्यः प्रज्ञारसस्तृप्तिकरो रसेभ्य:।प्रधानमध्यात्मसुखं सुखेभ्योऽविद्यारतिर्दु:खतमारतिभ्यः ॥२४॥
धनों में श्रद्धारूपी धन श्रेष्ठ है, रसों में प्रज्ञारुपी-रस तृप्ति-कर है, सुखों में अध्यात्म-सुख प्रधान है, और दुःखों में अज्ञान-दुःख अत्यत दुःखदायी है ॥२४॥
हितस्य वक्ता प्रवरः सुहृद्भ्यो धर्माय खेदो गुणवान् श्रमेभ्यः। ज्ञानाय कृत्यं परमं क्रियाभ्यः किमिन्द्रियाणामुपगम्य दास्यं। ॥२५॥
हित (की बात) कहने वाला (मित्र) मित्रों में श्रेष्ठ है, धर्म के लिए किया जानेवाला परिश्रम परिश्रमों में उल्कृष्ट है, ज्ञान के लिए किया जानेवाला कार्य कार्यों में उत्तम है, इन्द्रियों का दास होने से क्या लाभ? ॥२५॥
तन्निश्चित भीक्तमशुग्वियुक्त' परेष्वनायत्तमहार्यमन्यैः। नित्यं शिवं शान्तिसुखं वृणीष्व किमिन्द्रियार्थार्थमनर्थमूढ्वा ॥२६॥
इसलिये निश्चित नित्य और शिव (कल्याण-कारी) शान्ति-सुख का वरण करो, जो भय थकावट और शोक-रहित है, जो दूसरों के अधीन नहीं है और जो दूसरों द्वारा नहीं छीना जा सकता; विषयों के लिए विपत्ति उठाने से क्या लाभ? ॥२६॥
जरासमा नास्त्यमृजा प्रजानां व्याधेः समो नास्ति जगत्यनर्थः। मृत्या: समं नास्ति भयं पृथिव्यामेतत्त्रयं खल्ववशेन सेव्यं ॥२७॥
प्राणियों के लिए बुढ़ापे के समान (रूप- विनाशक) और कोई गन्दगी नहीं है, संसार में रोग के समान और कोई अनर्थ नहीं है तथा पृथ्वी पर मृत्यु के समान कोई भय नहीं है; इन तीनों को लाचार होकर भोगना ही पड़ता है ॥ २७॥
स्नेहेन कश्चिन्न समोऽस्ति पाशः स्रोतो न तृष्णासममस्ति हारि। रागाग्निना नास्ति समस्तथाग्निस्तच्चेत्रयं नास्ति सुखं च तेऽस्ति ॥२८॥
स्नेह के समान कोई बन्धन नहीं है, तृष्णा के समान बहा ले जाने-वाली कोई धारा नहीं है और राग की अग्नि के समान कोई अग्नि नहीं है, इसलिए यदि ये तीन नहीं हैं तो तुम्हें सुख है ॥२८॥
अवश्यभावी प्रियविप्रयोगस्तस्माच्च शोको नियतं निषेव्य:। शोकेन चोन्मादमुपेयिवांसो राजर्षयोऽन्येऽप्यवशा विचेलु: ॥२९॥
प्रिय का वियोग अवश्यंभावी है इसलिए शोक सहना (भोगना) ही पड़ेगा। शोक से उन्मत्त होकर राजर्षिंगण तथा दूसरे भी विवश होकर विचलित हुए ॥२९॥
प्रज्ञामयं वर्म बधान तस्मात्नो क्षान्तिनिघ्रस्य हि शोकवाणा:। महच्च दग्धुं भवकक्षजालं संधुक्षयाल्पाग्निमिवात्मतेजः। ॥३०॥
इसलिए प्रज्ञा रूपी कवच पहन लो, क्योंकि जो धैर्य के अधीन हैं उसपर शोकरुपी तीरों का वश नहीं चलता। महा-भव-जाल को जलाने के लिए अपने तेज को प्रदीप्त करो, जैसे महान् तृण राशि को जलाने के लिए थोड़ी सी आग को (प्रयत्नपूर्वक) प्रज्वलित किया जाता है। ।।३०॥
यथौपधैहस्तगतै: सविद्यो न दश्यते कश्चन पन्नगेन।तथानपेक्षो जितलोकमोहो न दश्यते शोकभुजंगमेन। ॥३१॥
जिस प्रकार हाथ में औषधियों के रहने पर कोई भी (सर्प-) विद्या जानने वाला सर्पद्वारा नहीं डसा जाता है, उसी प्रकार निरपेक्ष व्यक्ति, जिसने संसार के मोह को जीत लिया है, शोकरुपी सर्पद्वारा नहीं डसा जाता है। ।।३१।।
आस्थाय योगं परिगम्य तत्त्वं न त्रासमागच्छ ति मृत्युकाले। आबद्धवर्मा सुधनुः कृतास्त्रो जिगीषया शुर इवाहवस्थः॥३२॥
योगाभ्यास द्वारा तत्व को जानकर मनुष्य मृत्यु-काल में संत्रस्त नहीं होता है, जैसे कवच पहनकर सुन्दर धनुष और अस्त्र लेकर विजयीच्छु वीर पुरुष युद्ध में उतरकर भयभीत नहीं होता है" ॥३२।।
इत्येवमुक्तः स तथागतेन सर्वषु भूतेऽष्वनुकम्पकेन। धृष्टं गिरान्तह्रदयेन सीदस्तथेति नन्दः सुगतं बभाषे ॥३३॥
सब जीवों पर दया करनेवाले तथागत द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर दुःखी हृदय से किंतु उत्साहपूर्ण वाणी से नन्द ने सुगत को कहा "अच्छा" ।।३३।।
अथ प्रमादाच्च तमुज्जिहीर्षन्मत्वागमस्यैव च पात्रभूतं।प्रब्राजयानन्द शमाय नम्दमित्यत्रवीन्मैत्रमना महर्षि:॥ ३४।।
तब प्रमाद (अविवेक, अज्ञान) से उसका उध्दार करने की इच्छा से और उसको धर्म का पात्र हुआ जान कर महर्षि ने मैत्रीपुर्ण चित्त से कहा-"आनन्द! नन्द को उसकी शान्ति के लिए प्रव्रजित करो"। ॥३४।।
नन्दं ततोऽन्तर्मनसा रुदन्तमेहीति वैदेहमुनिर्जंगाद।शनैस्ततस्त समुपेत्य नन्दो न प्रव्रजिष्याम्यहमित्युवाच ॥३५॥
तब मन ही मन रोते हुए नन्द को वैदेह मुनि (आनन्द) ने कहा- "आओ"। तब शनैः शनैः उसके समीप जाकर नन्द ने कहा- "मैं प्रव्रजित न होऊँगा" ॥३५॥
श्रुत्वाथ नन्दस्य मनीपितं तद्बुद्धाय वैदेहमुनि: शशंस।संश्रुत्य तस्मादपि तस्य भावं महामुनिर्नन्दमुवाच भूयः ॥३६॥
तब नंद का वह अभिप्राय सुनकर वैदेह मुनि ने बुद्ध से कहा। उससे भी नंद का (वह) भाव सुनकर महामुनि ने पुनः नंद को कहाः-॥ ३६ ।।
मय्यग्रजे प्रव्रजितेऽजितात्मन् भ्रातृष्वनुप्रव्रजितेषु चास्मान्। ज्ञातिंश्च दृष्ट्रा व्रतिनो गृहस्थान् संविन्नकिंतेऽस्ति न वास्ति चेत:॥३७॥
"हे असंयतात्म, मुझ अग्रज के प्रव्रजित होने पर, हमारे पीछे अपने भाईयों के प्रव्रजित होने पर तथा अपने जाति बन्धुओं को घर में ही रहकर व्रत पालन करते देख कर क्या तुम्हें ज्ञान (का उदय) ही नहीं होता है या तुम्हें चित्त ही नहीं है? ॥३७॥
राजर्षेयस्ते विदिता न नूनं वनानि ये शिश्रियिरे हसन्तः।निष्ठीव्य कामानुपशान्तिकामाः कामेषु नैवं कृपणेषु सक्ताः ॥३८॥
अवश्य ही तुम उन राजर्षियों को नहीं जानते हो, जिन्होंने हँसते हँसते वन का आश्रय लिया। उन्होंने शान्ति पाने की इच्छा से कामोपभोगों का तिरस्कार किया, वे कामोपभोगों में इस प्रकार आसक्त नहीं थे ।।३८।।
भूयः समालोक्य गृहेषु दोषान्निशाम्य तत्त्यागकृतं च श्मे।नैवास्ति मोक्तुं मतिरालयं ते देशं मुमूर्षोरिव सोपसर्गं ।।३९॥
फिर घर के दोषों तथा उसके त्याग से होने वाली शांति को देखकर तुम घर छोड़ने का विचार नहीं करते हो, जैसे कि मृत्यु की इच्छा करनेवाला (मरणासन्न) व्यक्ति उपद्रव-युक्त स्थान को नहीं छोड़ना चाहता है ॥३९॥
संसारकान्तारपरायणस्य शिवे कथं ते पथि नारुरुक्षा।आरोप्यमाणस्य तमेव मार्ग भ्रष्टस्य सार्थादिव सार्थिकस्य ।।४०॥
संसाररूपी बीहड़ वन में लीन होकर तुम, काफिले से भटके हुए व्यापारी के समान, कल्याण-कारी मार्ग पर चढ़ाया जाने पर भी क्यों नहीं चढ़ना चाहते हो? ॥४०।।
यः सर्वतो वेश्मनि दह्यमाने शयीत मोहान्न ततो व्यपेयात् |कालाग्निना व्याधिजराशिखेन लोके प्रदीप्ते स भवेत्प्रमत्तः ॥४१॥
जो चारों ओर जलते हुए घर में मोहवश सोये और उससे नहीं भागे वही मनुष्य रोग और जरारुपी लपटोंवाली कालाग्नि से प्रज्वलित संसार में असावधान रहेगा ॥४१॥
प्रणीयमानश्च यथा वधाय मत्तो हसेच्च प्रत्नपेच्च वध्यः।मृत्यौ तथा तिष्ठति पाशहस्ते शोच्यः प्रमाद्यन्विपरीतचेता: ॥४२॥
जिस प्रकार वध के लिए (वध्य-भूमि की ओर) लिबाया जाता हुआ वध्य व्यक्ति मत्त (नशे में चूर) होकर हँसता और प्रलाप करता हैं उसी प्रकार हाथ में पानी लेकर मृत्यु के वर्तमान रहते प्रमाद (असावधानी) करने वाला आदमी शोंक करने योग्य है ॥४२॥
यदा नरेन्द्राश्च कुटुम्बिनश्च विहाय बन्धूश्च परिग्रहांश्च। ययुश्च यास्यन्ति च यान्ति चैव प्रियेष्वनित्येषु कुतोऽनुरोध: ॥४३॥
जब कि राजा लोग और परिवार वाले अपने बन्धुओं और परिग्रहों को छोड़कर चले गये, चले जायँगे और चले जा रहे हैं तब क्यों अनित्यप्रिय वस्तुओं में अनुराग (आसक्ति) किया जाय? ॥४३॥
किचिन्न पश्यामि रतस्य यत्र तदन्यभावेन भवेन्न दुखं।तस्मात्क्वचिन्न क्षमते प्रसक्तियोदि क्षमस्तद्विगमान्न शोक:।।४४।।
मैं ऐसा कुछ नहीं देख रहा हूँ जिसमें आसक्त होने वाले को उस (चीज) के अन्यथा होन पर दुःख न हो। इसलिए किसी में भी आसक्त होना उचित नहीं; यदि उचित होता तो उसका वियोग होने से शोक नहीं होता ॥४४॥
तत्सौम्य लोलं परिगम्य लोकं मायोपमं नित्रमिवेन्द्रजालं।प्रियाभिधानं त्यज मोहजालं छेत्तुं मतिस्ते यदि दुःखजालं ।।४५॥
इसलिए, हे सौम्य, संसार को अस्थिर, माया के समान, और इन्द्रजाल के समान विचित्र जानकर यदि तुम्हारा विचार दुःख-जाल को काटने का है तो प्रिया नामक मोह जाल का परित्याग करो ।।४५॥
वरं हितोदकेमनिष्टमन्नं न स्वादु यत्स्यादाहितानुवद्धं।यश्मादहंत्वा विनियोजयामि शिवै शुचों वत्मेनि विप्रियेऽपि ॥४६॥
हितकारी भोजन अप्रिय (होने पर भी) अच्छा है न कि स्वादिष्ट भोजन जो कि अहितकारी है। इसीलिए मैं तुम्हें मङ्गलमय पवित्र मार्ग में अप्रिय होने पर भी, लगा रहा हूँ ॥४६॥
बालस्य धात्री विनिगृह्य लोष्टं यथोद्धरत्यास्यपुटप्रविष्टं।तथोज्जिहर्षु: खलु रागशल्यं तत्त्वामवोचं परुषं हिताय ।।४७॥
जिस प्रकार दाई बालक को पकड़ कर उसके मुख में घुसे हुए ढेले को बाहर निकालती है, उसी प्रकार (तुम्हारे हृदय में गड़े हुए) रागरूपी शल्य को निकालने की इच्छा से मैंने यह कठोर वचन तुम्हारे हित के लिए कहा ।।४७।।
अनिष्टमध्यौषधमातुराय ददाति वैद्यश्च यथा निगृह्म । तद्वन्मयोक्त प्रतिकूलमेतत्तुभ्यं हितोदकमनुग्रहाय ।।४८।।
जिस प्रकार वैद्य रोगी को पकड़कर अप्रिय (कटु) औषधि भी देतां है उसी प्रकार मैंने यह अप्रिय किंतु हितकारी वचन तुम्हारे ऊपर अनुग्रह करके कहा हैं ॥४८॥
तद्यावदेव क्षणसंनिपातो न मृत्युरागच्छति यावदेव ।यावद्वयो योगविधौ समर्थ बुद्धि कुरु श्रेयसि तावदेव ॥४९॥
इसलिए जब तक कि (कुछ ही क्षणों का) यह जीवन रहता हैं, जब तक कि मृत्यु (समीप) नहीं आती है, जब तक कि उम्र (शरीर) योगाभ्यास करने में समर्थ हैं तब तक अपनी बुद्धि को श्रेय में लगाओ" ॥४९॥
इत्येवमुक्तः स विनायकेन हितैषिणा कारुणिकेन नन्दा:।कर्तास्मि सर्व भगवश्चवस्ते तथा यथाज्ञापयसित्युवाच ॥५०॥
हितैषी और कारुणिक विनायक (बुद्ध) के द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर नन्द ने कहा-"आपके आज्ञानुसार मैं आपके वचन का पूरा पूरा पालन करूगा" ।।५०।।
आदाय वैदेहमुनिस्ततस्तं निनाय संश्लिष्य विचेष्टमानं ।व्ययोजयच्चाश्रुपरिप्लुताक्षं केशश्रियं छत्रनिभस्य मूध्र: ॥५१॥
तब वैदेह मुनि (आनन्द) उस छटपटाते हुए (अनिच्छुक) को वहाँ से ले गये और उस रोते हुए (अश्रु-प्लावित आँखोवाले) के छत्र-तुल्य मस्तक की केश-शोभा को अलग किया ।।५१।।
अथो नतं तस्य मुखं सबाष्पं प्रवास्यमानेषु शिरोरुहेषु ।वक्राग्रनालं नलिनं तडागे वर्षोदकल्किन्नमिवाबभासे ॥५२॥
केशों के काटे जाते समय उसका झुका हुआ अश्रु-पुर्ण मुख ऐसे शोभित हुआ जैसे पोखर में बर्षा के जल से भींगा हुआ कमल जिस के नाल का अग्र-भाग झुक गया हो ॥५२॥
नन्दस्ततस्तरुकषायविरक्तवासा-श्चिन्तावशो नवगृहीत इव द्विपेन्द्रः। पूर्णः शशी बहुलपक्षगत: क्षपान्ते बालातपेन परिषिक्त इवाबभासे ।।५३॥
सौन्दरनन्दे महाकाव्ये नन्दप्रव्राजनो नाम पन्चम: सर्ग:
तब विरक्तों (भिक्षुओं) का काषाय वस्त्र पहनकर नन्द हाल में ही पकड़े गये गजेन्द्र के समान चिन्ता के वशीभूत हो गया और ऐसे शोभित हुआ जैसे कृष्ण-पक्ष में गया हुआ पूर्ण चन्द्रमा जो कि रात्रि के अन्त में बाल सूर्य की किरणों से सिक्त हो रहा हो ।।५३॥
सौन्दरनन्द महाकाव्य में "नन्द की दीक्षा" नामक पञ्चम सर्ग समाप्त।