Monday, December 28, 2020

राजतरंगिणी, कल्हण का धर्म

रजतऱंगिणी से:

कल्हण का धर्म : काश्मिर का कल्हण शैव ब्राह्मण था । किन्तु वह बौद्ध धर्म का भी प्रशंसक था। बुद्ध-दर्शन का उस पर प्रभाव था। शिव भक्ति तथा मत का अत्याधिक वर्णन कल्हण ने किया हैं । उसके पश्चात् उसने बौद्ध धर्म को ही स्थान दिया हैं । उसके पिता चम्पक प्रतिवर्ष नन्दीक्षेत्र की तीर्थ यात्रा के लिए जाते थे । कल्हण भी पिता के साथ जाता था । यहाँ नन्दि पुराण भक्ति के साथ सुनता था । भूतेश्वर के पवित्र वातावरण में, मन्दिरों की सुन्दर श्रृंखलाओं के मध्य, सोदर तीर्थ का जल सेवन करते, प्रकृति के दान्त गम्भीर, सुरम्य, हरित वातावरण में वह शिवदर्शन एवं शिव सम्बन्धी कथादि सुनता था । इस वातावरण का संस्कार बाल्यकाल से ही उस पर पड़ा था । उसने शैवदर्शन के आचार्य भट्ट कल्लट का नाम आदर एवं श्रद्धा के साथ लिया हैं । कल्लट ने काश्मीर में शैव शास्त्र का प्रचार किया था (राजतरंगिणी, पृ. ५ : ६६)

शिवभक्त राजाओ का जहां भी कहीं कल्हण ने वर्णन किया हैं उसकी लेखनी से उनके लिए श्रद्धा-भक्ति प्रकट हुई हैं । जलौक (रा० त०: ३३५-३३८) विजय (रा.त. २ : १) सन्धि मति (रा० २ :६५) इसके ज्वलन्त उदाहरण हैं । उन्होने शैव मत का प्रसार किया था। वे शिव-पूजक थे । कल्हण ने स्वर्ग प्राप्ति किंवा किसी पुण्य-लोक में जाने की अपेक्षा शिव सायुज्यता को प्राथमिकता दी हैं। (रा० १:९५२) शिव मन्दिरो में शिव के सम्मुख नृत्य-गान का वर्णन ललित पदों में किया हैं । (रा० : १ : १५१, १५४, २७९, २८०)

कल्हण ने सम्पूर्ण राजतरंगिणी में भगवान् बुद्ध के प्रति अनुपम आदर एवं श्रद्धा प्रदर्शित की हैैं । अशोक से लेकर उसके काल तक जिन राजाओं ने बुद्ध विहार, स्तूप तथा चैत्यादि निर्माण कराया था उनका नाम एवं स्मरण श्रद्धा-भक्ति के साथ कल्हण ने किया हैं। उसने उक्त निर्माणों को कश्मीर मण्डल में खोज-खोजकर, शिव मन्दिरों के समान लिखा हैैं । राजाओं के अतिरिक्त यदि किसी अन्य व्यक्ति ने भी विहार, चैत्य, स्तूपादि का निर्माण कार्य किया था तो उसका भी सादर उल्लेख किया हैं । उन पर चढ़़ाये अग्रहारों एवं दान कर्मों की मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की हैैं ।

धर्म विश्वास में कल्हण ने कट्टरता कहीं नहीं प्रदर्शित की हैं । उसने शैव एवं बौद्ध धर्म को परस्पर विरोधी नही माना हैं । दोनों का उपासक होने के कारण उन्हें एक दूसरे का पूरक माना हैं, सहायक माना हैं । बौद्धों के प्राबल्य को रोककर जलौक ने शैव धर्म के पुनर्स्थापना के लिए प्रयास करते हुए विहारों तथा बौद्ध धर्म-स्थानों को क्षति पहुँचाने का प्रयास किया तो जलौक का विचार नाटकीय ढंग से कल्हण बदल देता हैं । राजा में उसने शिव के साथ बोधि-सत्व के प्रति रुचि भी उत्पन्न होने की कथा कही हैं । जलौक से विहार-निर्माण भी करा देता हैं ।

धार्मिक रुचि कल्हण की इसमे प्रकट होती है कि वह मेघवाहन को आदर्श किंवा अनुकरणीय राजा मानता हैं। मेघवाहन विश्वविजय द्वारा अहिंसा (प्रेम और मैत्री) का प्रचार करना चाहता था। उसने दूर दक्षिण भारत तक विजय कर राजाओं से अहिंसक (प्रेम और मैत्री बढ़ाने) की प्रतिज्ञा करायी थी । दिग्विजय के स्थान पर (अशोक की तरह) मेघवाहन ने धर्म-विजय किया था। मेघवाहन पशुबलि के स्थान पर, पशु की रक्षा के लिए स्वयं (बुद्ध की तरह) अपनी बलि चढ़ाने के लिए बारंबार उद्यत हो गया था। 

कल्हण ने अहिंसा व्रत का ओजमयी भाषा में वर्णन किया हैं । कल्हण प्रतीत होता हैं, शाकाहारी था । उसने प्याज तथा लहसुन भोजी ब्राह्मणों की निन्दा की हैं । अहिंसा व्रत एवं अहिंसक भावना का अवसर मिलते ही सबल भाषा में उल्लेख करता हैं । राजा हर्ष जिस समय परिहासपुर में भगवान बुद्ध की प्रतिमा खण्डित करना चाहता था तो उसके चाचा कनक ने राजा को इस अनुचित कार्य से विरत किया था । बौद्धमतानुयायी दूसरों के द्वारा मारा मांस निःसंकोच खाते हैं । परन्तु कल्हण इसको उचित नही मानता । वह एक शुद्ध ब्राह्मण के समान शाकाहारी था । यद्यपि काश्मीर में आमिष भोजियों की संख्या सर्वाधिक सर्वदा से रही हैं ।कल्हण ने बौद्ध घर्म सम्बन्धी अनेक पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग किया हैं । इससे प्रकट होता है कि उसने त्रिपिटको का अध्ययन किया था । कल्हण ने बौद्ध दर्शन, परम्परा, शासन तथा उसकी पध्दतियों का पूर्णतया अध्ययन किया था । अन्यथा वह साधिकार विश्वास के साथ लिखने में सफल न होता ।

Thursday, December 24, 2020

शील और इंद्रिय-संयम, सौन्दरनन्द

सौन्दरनन्द-महाकाव्य, त्रयोदश सर्ग
शील और इन्द्रिय-संयम

अथ संराधितो नन्दः श्रद्धां प्रति महर्षिणा ।परिषिक्तोऽमृतेनेव युयुजे परया मुदा ॥१॥

तब महर्षि के द्वारा श्रद्धा (को सबल एवं स्थिर बनाने) के प्रति प्रेरित (प्रोत्साहित) होकर नन्द को बढ़ा आनन्द हुआ, जैसे वह अमृत से नहवाया गया हो ॥१॥

कृतार्थमिव तं मेने सबुद्धः श्रद्धया तया । मेने प्राप्तमिव श्रेयः स च बुद्धेन संस्कृतः ॥२॥

बुद्ध ने उस श्रद्धा के कारण नन्द को कृतार्थ-सा समझा और बुद्ध से दीक्षित होकर नन्द ने श्रेय (अपने चरम लक्ष) को उपस्थित-सा समझा ॥२॥

श्लक्ष्णेन वचसषा कांश्चित्कांश्चित्परुषया गिरा।कांश्चिदाभ्यामुपायाभ्यां स विनिन्ये विनायक: ॥३॥

कतिपयों को कोमल वचन से, कतिपयों को कठोर वचन से और कतिपयों को दोनों ही उपायों से विनायक (बुद्ध) ने विनीत (दीक्षित) किया ॥३॥

पांसुभ्यः काञ्चनं जातं विशुद्धं निर्मलं शुचि । स्थितं पांसुष्वपि यथा पांसुदोषैर्न लिप्यते ॥४॥

जैसे धूल से पैदा होने वाला सोना विशुद्ध निर्मल और पवित्र होता है और धूल में रहकर भी वह धूल के दोषों से लिप्त नहीं होता है, ॥४॥

पद्मपर्ण यथा चैव जले जातं जले स्थितं ।उपरिष्टादधस्ताद्वा न जलेनोपलिप्यते ॥५॥

और जैसे जल में उत्पन्न होकर जल में ही रहने वाला कमल का पत्ता ऊपर या नीचे जल से लिप्त नहीं होता है, ॥५॥

तद्वल्लोके मुनिरजातो लोकस्यानुग्रहं चरन् । कृतित्वान्निर्मलत्वाच्च लोकधर्मैर्न लिप्यते ॥६॥

वैस ही संसार में उत्पन्न होकर, संसार के ऊपर अनुग्रह करते हुए, मुनि अपनी पवित्रता एवं निर्मलता के कारण सांसारिक धर्मों से लिप्त नहीं होते हैं ॥६॥

श्लेषं त्यागं प्रियं रूक्षं कथां च ध्यानमेव च । मन्तुकाले चिकित्सार्थं चक्रे नात्मानुवृत्तये ॥७॥

उपदेश-काल में उन्होंने, चिकित्सा के लिए न कि अपनी अनुकूलता के लिए, आलिङ्गन और परित्याग, प्यार और रूखापन, कथा और ध्यान का सहारा लिया ॥७॥

अतश्च संदधे कार्य महाकरुण्या तया । मोचयेयं कथं दुःखात्सत्त्वानीत्यनुकम्पकः ॥८॥

और इसलिए 'जीवों को दुःख से कैसे छुड़ाऊँ इस प्रकार अनुकम्पा करते हुए उन्होंने महाकरुणा के वशीभूत होकर शरीर धारण किया ॥८॥

अथ संहर्षणान्नन्दं विदित्वा भाजनीकृतं । अब्रवीद् ब्रुवतां श्रेष्ठः क्रमज्ञः श्रेयसां क्रमं ॥९॥

सब अपनी प्रेरणा (प्रोत्साहन) के फलस्वरूप नन्द को पात्र (योग्य) हुआ समझकर, क्रम को जानने वाले वक्ता-श्रेष्ठ ने श्रेय का क्रम बतलाया ॥९॥

अतः प्रभृति भूयस्त्वं श्रद्धेन्द्रियपुरः सरः । अमृतस्याप्तये सौम्य वृत्तं रक्षितुमर्हसि ॥१०॥

"अब से तुम श्रद्धारूपी साधन से सुसज्जित होकर, हे सौम्य, अमृत की प्राप्ति के लिए अपने आचार (शील) की रक्षा करो ॥१०॥

प्रयोगः कायवचसो: शुद्धो भवति ते यथा । उत्तानो विवृतो गुप्तोऽनवच्छिद्रस्तथा कुरु ॥११॥

ऐसा करो जिससे तुम्हारे शरीर और वचन का व्यापार (कर्म) होकर प्रकट (स्पष्ट), आवरण-रहित (खुला हुआ), सुरक्षित और निर्दोष हो जाय; ॥११॥

उत्तानो भावकरणाद्विवृतश्चाध्यगूहनात् । गुप्तो रक्षणतात्पर्यादच्छिद्रश्चानवद्यतः ॥१२॥

अपने भावों को स्पष्ट करने से प्रकट, कुछ भी नहीं छिपाने से आवरण-रहित, रक्षण (इन्द्रिय संवर) में तत्परता दिखलाने से सुरक्षित और दोष-रहित होने से निर्दोष हो जाय ॥१२॥

शरीरवचसोः शुद्धौ सप्तांगे चापि कर्मणि ।आजीवसमुदाचारं शौचात्संस्कर्तुमर्हसि ॥१३॥

शरीर और वचन की शुद्धि में तथा (उनके) सात कर्मों की शुद्धि में अपनी आजीविका के सम्पर्क को शुद्ध करो, ॥१३॥

दोषानां कुहनादीनां पन्चानामनिषवणात् । त्यागाच्च ज्योतिषादीनां चतुर्णों वृत्तिघातिना ॥१४॥

कपट आदि पाँच दोषों को छोड़कर तथा सद्वृत्ति की हत्या करने वाले ज्योतिष आदि चार (व्यवसायों) का परित्याग कर ॥१४॥

प्राणिधान्यधनादीनां वर्ज्यानामप्रतिग्रहात् । भैक्षाङ्गानां निसृष्टानां नियतानां प्रति्रहात् ॥१५॥

जीवन, अन्न, धन आदि वर्जित वस्तुओं को ग्रहण नहीं करके तथा भिक्षा-वृत्ति के निश्चित नियमों का पालन करके (अपनी आजीविका को शुद्ध करो) ॥१५॥

परितुष्टः शुचिर्मञ्जुश्चौक्षया जीवसंपदा । कुर्या दुःखप्रतीकारं यावदेव विमुक्तये ॥१६॥

संतुष्ट पवित्र मधुर-भाषी और शुद्ध आजीविका वाला होकर तब तक दुःख का प्रतिकार करते रहो जब तक (दुःख से) मुक्ति न हो जाय ॥१६।।

कर्मणो हि यथादृष्टात्कायवाक्प्रभवादपि । आजीव: पृथगेवोक्तो दुःशोधत्वादयं मया ॥१७॥

शरीर और वचन का जो कर्म देखा जाता है उससे आजीविका को अलग ही कहा गया हैं, इसलिए कि आजीविका को शुद्ध करना दुष्कर हैं ॥१७॥

गृहस्थेन हि दुःशोधा दृष्टिविविधदृष्टिना । आजीवो भिक्षुणा चैव परेष्टायत्तवृत्तिना ॥१८॥

विविध दृष्टियों वाले गृहस्थ के लिए दृष्टि को शुद्ध करना दुष्कर और भिक्षु की वृत्ति दूसरों के अधीन होने के कारण उसके लिए आजीविका शुद्ध करना कठिन हैं ।।१८॥

एतावच्छीलमित्युक्तमाचारोऽयं समासतः अस्य नाशेन नेव स्यात्प्रव्रज्या न गृहस्थता ॥१९॥

यही इतना शील हैं । संक्षेप में यही आचार हैं, जिसका नाश होने पर न प्रव्रज्या रहेगी और न गृहस्थता ॥१९॥

तस्माच्चारित्रसंपन्नो ब्रह्मचर्यमिदं चर । अणुमात्रेष्ववद्यषु भयदर्शी दृढ़ब्रतः ॥२०॥

इसलिए सदाचार से युक्त होकर इस ब्रह्मचर्य (श्रेष्ठ जीवन) का आचरण करो; अत्यन्त सूक्ष्म दोषों में भी भय देखते हुए अपना ब्रत दृढ रखो ॥२०॥

शीलमास्थाय वर्तन्ते सर्वों हि श्रेयसि क्रियाः ।स्थानाद्यानीव कार्याणि प्रतिष्ठाय वसुन्धरां ॥२१॥

शील का सहारा लेकर सभी श्रेयस्कर कार्य सम्पन्न होते हैं, जैसे पृथ्वी के आश्रय से खड़ा होना आदि कार्य होते हैं ॥२१॥

मोक्षस्योपनिषत्सौम्य वैराग्यमिति गृह्यतां । वैराग्यस्यापि संवेदः संविदो ज्ञानदर्शनं ॥२२॥

मोक्ष का उपनिषद् (आधार, समीप ले जाने वाला), हे सौम्य, वैराग्य हैं, ऐसा समझो । वैराग्य का भी उपनिषद् सम्यक ज्ञान हैं और सम्यक् ज्ञान का उपनिषद, ज्ञान का दर्शन हैं ॥२२॥

ज्ञानस्योपनिष्चैव समाधिरुपधार्यतां ।समाधेरप्युपनिषत्सुखं शारीरमानसं ॥२३॥

ज्ञान का उपनिषद् समाधि समझो, समाधि का भी उपनिषद् शारीरिक और मानसिक सुख समझो ॥२३॥

प्रश्रब्धि: कायमनसः सुखस्योपनिषत्परा । प्रश्नब्धेरष्युपनिषत्प्रीतिरप्यवगम्यतां ॥२४॥

शारीरिक और मानसिक सुख का उपनिषद् हैं परम शान्ति और शान्ति का भी उपनिषद् प्रीति जानो ॥२४॥

तथा प्रीतेरुपनिषत्प्रामोद्यं परमं मतं ।प्रामोद्यस्याप्यहृल्लेखः कुकृतेष्वकृतेषु वा ॥२५॥

प्रीति का उपनिषद् परम आनन्द माना गया हैं और आनन्द का भी उपनिषद् है कुकार्यों और अकार्यों से मन में पीड़ा का न होना ॥२५॥

अहृल्लेखस्य मनस: शीलं तूपनिषच्छुचि । अतः शीलं नयस्यग्रयमिति शीलं विशोधय ॥२६॥

मानसिक पीड़ा का अभाव का उपनिषद् हैं पवित्र शील । इस प्रकार शील ही प्रधान हैं और (श्रेष्ठता की ओर) ले जाने वाला (नेता हैं), इसलिए शील को शुद्ध करो ॥ २६॥

शीलनाच्छिलमित्युक्त शीलनं सेवनादपि । सेवनं तन्निदेशाच्च निदेशश्च तदाश्रयात् ॥२७॥

शीलन से शील कहा गया हैं, शीलन सेवन (अर्थात बार बार के अभ्यास) से होता हैं, सेवन किसी चीज के लिए उत्कट इच्छा होने से होता हैं और इच्छा उसके ही आश्रय से होती हैं ॥२७॥

शीलं हि शरणं सौम्य कान्तार इव दैशिक: । मित्रं बन्धुश्च रक्षा च धनं च वलमेव च ॥२८॥

शील, हे सौम्य, शरण है, जंगल में पथ-प्रदर्शक के समान हैं, मित्र, बन्धु, रक्षक, धन और बल हैं ।।२८।।

यतः शीलमतः सौम्य शीलं संस्कर्तुमर्हसि ।एतत्स्थानमथान्ये च मोक्षारम्भेषु योगिनां ॥२९॥

क्योंकि शील ऐसा हैं, इसलिए शील को तुम्हें शुद्ध करना चाहिये, मोक्ष के लिए आरम्भ करने वाले योगियों के लिए यह अनन्य (एकमात्र) सहारा हैं ॥२९॥

ततः स्मृतिमधिष्ठाय चपलानि स्वभावतः ।इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यो निवारयितुमर्हसि ॥३०॥

तब स्मृति को स्थिर करके तुम्हें स्वभाव से चन्चल इन्द्रियों को विषयों से हटाना चाहिये ॥३०॥

भेतव्यं न तथा शत्रोर्नाग्नेर्नाहेर्न चाशने:। इन्द्रियेभ्यो यथा स्वेभ्यस्तैरजस्र हि हन्यते ॥३१।।

शत्रु, अग्नि, सर्प और वज्र से उतना नहीं डरना चाहिये जितना कि अपने ही इन्द्रियों से, जो निरन्तर चोट करते रहते हैं ॥३१॥

द्विषद्भि शत्रुभिः कश्चित्कदाचित्पीड्यते न वा ।इन्द्रियैर्बाध्यते सर्वः सर्वत्र च स्दैव च ॥३२॥

द्वेष करनेवाले शत्रुओं से कोई कभी पीड़ित होता हैं या नहीं भी, किंतु इन्द्रियों से सभी सर्वत्र और सदा ही पीडित होते रहते हैं ॥३२॥

न च प्रयाति नरकं शत्रुप्रभृतिभिर्हेतः कृष्यते तत्र निघ्नस्तु चपलैरिन्द्रियैर्हत: ॥३३॥

शत्रु आदि से मारा जाकर मनुष्य नरक नहीं जाता हैं, किंतु चपल इन्द्रियों से मारा जाकर बेचारा वहाँ घसीट कर ले गया जाता हैं ॥३३॥

हन्यमानस्य तैर्दु:खं हार्दं भवाति वा न वा ।इम्द्रियैर्बाध्यमानस्य हार्दं शारीरमेव च ॥३४॥

उन (शत्रुओं) के द्वारा मारे जाते हुए को हार्दिक (मानसिक, आध्यात्मिक) दुखः होता हैं या नहीं भी, किंतु इन्द्रियों से पीड़ित होने वाले को हार्दिक और शारीरिक दोनों ही दुःख होते हैं ॥३४॥

संकल्पविषदिग्धा हि पचेन्द्रियमयाः शराः । चिन्तापुङ्खा रतिफला विषयाकाशगोचरा: ॥३५॥

सङ्कल्परूपी विष से लिप्त पन्च इन्द्रिय रूपी तीर, चिन्ताएँ ही जिनके पुङ्ग (तीर का त्रिकोनी भाग) हैं और रति (आनन्द, भोग) ही जिनका लक्ष्य हैं, विषयरूपी आकाश में चलते हैं ॥३५॥

मनुष्यहरिणान् घ्नन्ति कामव्याधेरिता हृदि । विहन्यन्ते यदि न ते ततः पतन्ति ते: क्षुता: ।।३६॥

कामरूपी व्याध (शिकारी) से सञ्चालित होकर वे मनुष्य रूपी हरिणों के हृदय में चोट करते हैं; यदि वे रोके न जाये तो उनसे घायल होकर मनुष्य गिर पढ़ते हैं ।।३६॥

नियमाजिरसंस्थेन धैर्यकार्मुकधारिणा । निपतन्तो निवार्यास्ते महता स्मृतिवर्मणा ॥३७॥

नियम रूपी आङ्गन में खड़ा होकर, धेर्यरूपी धनुष धारण कर, महान्स्मृतिरूपी कवच पहनकर, उन गिरते हुए तीरों को रोकना चाहिए ॥३७॥

इन्द्रियाणामुपशमादरीणां निग्रहादिव । सुखं स्वपिति वास्ते वा यत्र तत्र गतोद्धवः ॥३८॥

इन्द्रियों के शान्त होने पर, जैसे शत्रुओं का निग्रह होने पर, मनुष्य जहाँ तहाँ सुखपूर्वक सोता हैं या निश्चिन्त होकर बैठता हैं ॥३८॥

तेषां हि सततं लोके विषयानभिकांक्षतां । संविन्नैवास्ति कार्पणयाच्छुनामाशावतामिव ॥३९॥

तृष्णावान् कुत्तों की तरह संसार में सदा विषयों की आकाङक्षा करने वालों का ज्ञान नष्ट हो जाता हैं ॥ ३९॥

विषयैरिन्द्रियग्रामो न तृप्तिमधिगच्छति । अजस्रं पूर्यमाणोऽपि समुद्रः सलिलैरिव ।।४०।।

विषयों से इन्द्रिय-समूह को तृप्ति नहीं होती हैं, जैसे जल-राशि से निरन्तर पूर्ण होते रहने पर भी समुद्र को तृप्ति नहीं होती हैं ॥४०॥

अवश्यं गोचरे स्वे स्वे वर्तितव्यमिहेन्द्रियैः निमित्तं तत्र न ग्राह्यमनुव्यञ्जनमेव च ।।४१॥

इन्द्रिय तो अपने अपने क्षेत्र (विषय) में रहेंगे ही; किंतु उसमें निमित्त (लिङ्ग, आकृति आदि) और अनुव्यञ्जन को ग्रहण नहीं करना चाहिए ॥४१।।

आलोक्य चक्षु षा रूपं धातुमात्रे व्यवस्थितः। स्री वेति पुरुषो वेति न कल्पयितुमर्हसि ॥४२॥

नेत्र से रूप को देखकर (उसके आधारभूत पृथ्वी आदि ) घातुओं में ही अपना ध्यान स्थिर करना चाहिए; स्त्री हैं या पुरुष ऐसी कल्पना नहीं करनी चाहिए ॥४२॥

सचेत्त्स्रीपुरुषग्राहः क्वचिद्विद्येत कश्चन । शुभतः केशदन्तादीन्नानुप्रस्थातुमर्हसि ।।४३।।

स्त्री हैं या पुरुष, ऐसी कोई समझ यदि कहीं हो भी जाय, तो केश और दाँत आदि में तुम्हें सौन्दर्य नहीं देखना चाहिए ॥४३॥

नापनेयं ततः किंचित्प्रक्षेप्यं नापि किंचन । द्रष्टव्यं भूततो भूतं यादृशं च यथा च यत् ॥४४॥

उस (रूप) से न कुछ हटाना चाहिए और न उसमें कुछ जोडना ही चाहिए। रूप को ठीक ठीक देखना चाहिए कि वह कैसा, कैसे और क्या हैं ।।४४।।

एवं ते पश्यतस्तत्त्वं शश्वदिन्द्रियगोचरे । भविष्यति पदस्थानं नाभिध्यादौमनस्ययोः ॥४५॥

जब तुम इन्द्रियों के क्षेत्र (विषयों) में इस प्रकार तत्व को निरन्तर देखते रहोगे तो अभिध्या (लोभ) और दौर्मनस्य (संताप अरुचि), (तुम्हारे चित्त में) पाँव न जमा सकेंगे ।॥४५॥

अभिध्या प्रियरूपेण हन्ति कामात्मकं जगत् ।अरिर्मित्रमुखेनेव प्रियवाक्कलुषाशयः ।॥४६॥

अभिध्या आकर्षक रूप द्वारा कामासक्त जगत् की हत्या करती हैं, जैसे पाप आशय वाला शत्रु मित्र की तरह मुख से प्रिय वचन कहता हुआ (बुराई करता हैं) ॥४६॥

दौर्मनश्याभिधानस्तु प्रतिघो विषयाश्रितः । मोहाद्ये नानुवृत्त न परत्रेह च हन्यते ॥४७॥

विषयाश्रित प्रतिघ (अरुचि, विद्वेष) का ही नाम दौर्मनस्य है; मोह से मनुष्य इसके वशीभूत होकर इहलोक और परलोक में नष्ट होता हैं ॥४७॥

अनुरोधविरोधाभ्यां शीतोष्णाभ्यामिवार्दितः । शर्मं नाप्नोति न श्रेयश्चलेन्द्रियमतो जगत् ॥४८॥

सर्दी और गर्मी की तरह अनुकूलता और प्रतिकूलता से पीड़ित होकर जीव-लोक न शान्ति प्राप्त करता है और न श्रेय; अतः उसके इन्द्रिय चन्चल हैं ॥४८।।

नेन्द्रियं विषये तावत्प्रवृत्तमपि सज्जते । यावन्न मनसस्तत्र परिकल्प: प्रवर्तते ॥४९॥

विषय (के सम्पर्क) में रहकर भी इन्द्रिय तब तक उसमें आसक्त नहीं होता है, जब तक तत्सम्बन्धी मानसिक सङ्कल्प (कल्पना, विचार) नहीं होता है ॥४९॥

इन्धने सति वायौ च यथा ज्वलति पावक: ।विषयात्परिकल्पाच्च क्लेशाग्निर्जायते तथा ॥५०॥

जैसे जलावन (कचरा, कागज़ जैसी जलने वाली चीज) और हवा दोनों के रहने पर अग्नि प्रज्वलित होती हैं, वैसे ही विषय और कल्पना दोनों के होने से क्लेशाग्नि की उत्पत्ति होती है॥५०॥

अभूषपरिकल्पेन विषयस्य हि बध्यते । समेव विषयं पश्यन् भूततः परिमूच्यते ॥५१॥

विषय की अयथार्थ कल्पना से मनुष्य बाँधा जाता है और उसी विषय को ठीक ठीक देखता हुआ मुक्त होता हैं ।।५१ ।।

दृष्ट्वैक रूपमन्यो हि रज्यतेऽम्यः प्रदुष्यति । कश्चिद्भवति मध्यस्थस्तत्रेवान्य' घृणायते ॥५२॥

एक ही रूप को देखकर कोई अनुराग करता हैं, कोई दोष देखता है, कोई मध्यस्थ (उदासीन) रहता हैं और कोई घृणा करता हैं ॥५२॥

(५३' ५४, ५५ श्लोको का एक पन्ना गुम हैं)

तस्मादेषामकुशलकराणामरीणां चक्षुर्घ्रानश्र वणरसनस्पर्शनानां ।  सर्वावस्थं भव विनियमादप्रमत्तोमास्मिन्नर्थे क्षणमपि कृथास्त्वं प्रमादं ॥५६॥

इसलिए सभी अवस्थाओं में दृष्टि घ्राण श्रवण अस्वाद और स्पर्श-इन बुराई करनेवाले शत्रुओं का नियन्त्रण करने में सावधान रहो । इस विषय में तुम क्षण भर भी प्रमाद मत करो ॥५६॥

सौन्दरनन्दे महाकाव्ये शीलेन्द्रियजयो नाम त्रयोदशः सर्ग:  

सौदरनन्द महाकाव्य में शील और इन्द्रिय संयम नामक त्रयोदश सर्ग समाप्त ।

Saturday, December 12, 2020

सौन्दरनन्द, विवेक, सर्ग १२

सौन्दरनन्द महाकाव्य-द्वादश सर्ग, विवेक:

अप्सरोभृतको धर्म चरसीत्यथ चोदितः । आनन्देन तदा नन्दः परं व्रिडमुपागमत् ॥१॥

'अप्सराओं को प्राप्त करने के लिए धर्माचरण कर रहे हो' आनन्द के द्वारा इस प्रकार कहा जाने पर नन्द अत्यंत लज्जित हुआ ॥१॥

तम्य व्रिडेन महता प्रमोदो हृदि नाभवत् । अप्रामोद्यन विमुखं नावतस्थे व्रते मनः ॥२॥

उसके अत्यंत लज्जित होने के कारण उसके हृदय में आनन्द नहीं हुआ । आनन्द नहीं होने के कारण उसका उदास मन व्रत में नहीं लगा ।।२॥

कामरागप्रधानोऽपि परिहाससमोऽपि सन् । परिपाकगते हेतौ न स तन्ममृषे वचः ॥३॥

यद्यपि उसमें काम-राग की प्रधानता थी और यद्यपि वह परिहास की पर्वाह नहीं करता था, तो भी हेतु का परिपाक होने के कारण वह उस वचन को नहीं सह सका ॥३॥

अपरीक्षकभावाश्च पूर्वे मत्वा दिवं ध्रुवं । तस्मात्क्षेष्णुं परिश्रुत्य भृशं संवेगमेयिवान् ॥४॥

ठीक ठीक नहीं देख सकने के कारण उसने पूर्व में स्वर्ग (के भोगों) को ध्रुव (नित्य) समझा था, किंतु अब आनन्द से उस की अनित्यता के बारे में सुनकर उसको अत्यन्त संवेग (भय, वैराग्य) हुआ ॥४॥

तस्य स्वर्गाविनववृते संकल्पाश्वी मनोरथः । महारथ इवोन्मार्गादप्रमत्तस्य सारथे: ॥५॥

उसका मनोरथ, सङ्कल्प ही जिसके घोड़े हैं, स्वर्ग की ओर से लौट गया, जैसे सावधान रहने वाले सारथि का महारथ कुमार्ग से लौट आता हैं ॥५॥

स्वर्गतर्षान्निवृत्तश्च सद्यः स्वस्थ इवाभवत् ।मृष्टादपथ्याद्विरतो जिजीविषुरिवातुरः ॥६॥

स्वर्ग की तृष्णा के नष्ट होने पर वह तुरन्त स्वस्थ-जैसा हो गया, जैसे कि जीवित रहने की इच्छा करनेवाला रोगी स्वादिष्ठ अपथ्य से विरत होकर स्वस्थ हो जाता हैं ॥६॥

विसस्मार प्रियां भार्यामप्सरोदर्शनाद्यथा ।तथानित्यतयोद्विग्नस्तत्याजाप्सरसोऽपि स: ॥७॥

जैसे अप्सराओं को देखकर वह अपनी प्यारी भार्या (पत्नि) को भूल गया था, वैसे ही (स्वर्ग के भोगों की) अनित्यता से उद्विग्न होकर उसने अप्सराओं (को प्राप्त करने की इच्छा) को भी छोड़ दिया ॥७॥

महतामपि भूतानामावृत्तिरिति चिन्तयन् । संवेगाच्च सरागोऽपि वीतराग इवाभवत् ॥८॥

बड़े बड़े प्राणियों (महापुरुषों) को भी (इस लोक में) लौटना पड़ता हैं, इस प्रकार वह चिंता करने लगा और संवेग (भय, वैराग्य) होने के कारण वह रागी (कामी) भी वीतराग-जैसा हो गया ॥८॥

बभूव स हि संवेग: श्रयसस्तस्य वृद्धये ।धातुरेधिरिवाख्याते पठितोऽक्षरचिन्तकैः ॥९॥

यह संवेग उसके कल्याण की वृद्धि के लिए हुआ, जैसे शब्द-शास्त्रियों (वैयाकरणों) के अनुसार एघि धातु की धातु-रूप में वृद्धि होती हैं।॥९॥

न तु कामान्मनस्तस्य केनचिज्जगृहे धृति: । त्रिषु कालेषु सर्वषु निपातोऽस्तिरिव स्मृतः ॥१०॥

काम के कारण उसके मन में किसी भी प्रकार से किसी भी समय में धैर्य नहीं हुआ (अर्थात् उसकी मानसिक चंचलता सदा बनी ही रही), जिस प्रकार 'अस्ति' निपात का प्रयोग (भूत, भविष्य, वर्तमान) तीनों ही काल में बताया जाता हैं ।।१०॥

खेलगामी महाबाहुगजेन्द्र इव निर्मदः । सोऽभ्यगच्छद्गुरुं काले विवक्षुर्भावमात्मनः ॥११॥

मंदगामी गजेन्द्र के समान वह महाबाहु मद-मुक्त होकर समय पर गुरु के समीप अपना अभिप्राय बतलाने की इच्छा से गया।।११॥

प्रणम्य च गुरौ मूध्रा बाष्पव्याकुलनोचन: ।कृत्वाञ्जलिमुवाचेद ह्रिया किंचिदवाङ्मुखः ॥१२॥

उसने शिर नवाकर गुरु को प्रणाम् किया । उसकी आँखों में आँसू आ गये और हाथ जोडकर, लज्जावश कुछ अधोमुख होकर यों कहाः-।।१२।।

अप्सरः प्राप्तये यन्मे भगवन्प्रतिभूरसि ।नाप्सरोभिर्ममार्थोऽस्ति प्रतिभूत्वं त्यजाम्यहं ॥१३॥।

"हे भगवन्, अप्सराओं की प्राप्ति के लिए आप मेरा प्रतिभू (जमानतदार) हैं, मुझे अब अप्सराओं से प्रयोजन नहीं है, इसलिए मैं प्रतिभुत्व (जमानत) का परित्याग करता हूँ ।।१३।।

श्रुत्वा ह्यावर्तकं स्वर्ग संसारस्य च चित्रतां । न मर्ते्यषु न देवेषु प्रवृत्तिर्मम रोचते ॥१४॥

स्वर्ग से लौटना पड़ता हैं और संसार (की गति) विचित्र हैं, ऐसा सुनकर मर्त्य-लोक या देव-लोक में, कहीं भी रहना (जन्म लेना, रमण करना) मुझे पसन्द नहीं हैं ।।१४॥ 

यदि प्राप्य दिवं यत्नाभ्नियमेन दमेन च । अवितृप्ता: पतन्त्यन्ते स्वर्गाय त्यागिने नमः ॥१५।।

यदि प्रयत्नपूर्वक सयंम व इन्द्रिय-दमन के द्वारा स्वर्ग को प्राप्त कर लोग वहाँ से अतृप्त ही गिरते हैं तो मैं उस क्षण-भङ्गुर स्वर्ग को (दूर से) प्रणाम करता हूँ ॥१५॥

अतश्च निखिलं लोकं विदित्वा सचराचरं । सर्वेदुःखक्षयकरे त्वद्धर्मे परमे रमे ॥१६॥

अतः चराचर-सहित सम्पूर्ण लोक का ज्ञान प्राप्त कर मैं सब दु:खों का अन्त करने वाले आपके ही परम धर्म में आनन्द पाता हूँ ॥१६॥

तस्मादृध्याससमासाभ्यां तम्मे व्याख्यातुमर्हसि । यच्छुत्वा श्रृण्वतां श्रेष्ठ परमं प्राप्नुयां पदं ॥१७॥

इसलिए विस्तार और संक्षेप से कृपया मुझे वह बतलावें, जिसे सुनकर, हे श्रोता-श्रेष्ठ, मैं परम पद (निर्वाण) प्राप्त करुं" ।।१७॥

ततस्तस्याशयं ज्ञात्वा विपक्षाणीन्द्रियाणि च ।श्रेयश्चैवामुखीभूतं निजगाद तथागतः ॥१८॥

तब उसका आशय जानकर, उसके इन्द्रियों को वशीभूत और श्रेय को समीपवर्ती समझकर तथागत (बुद्ध) ने कहा--।।१८।।

अहो प्रत्यवमर्शोशयं श्रेयसस्ते पुरोजवः । अरण्या मध्यमानायामग्नेर्धुम इवोत्थितः ॥१९॥

"अहो, तुम्हारा विवेक तुम्हारे श्रेय का पुरोगामी हैं, जैसे अरणियों को रगड़ने से उठा हुआ धुवां अग्नि का अग्रदूत होता हैं ।।१९॥

चिरमुन्मार्गविहृतो लोलैरिन्द्रियवाजिभिः । अवतीर्णोऽसि पन्थानं दिष्ट्या दृष्ट्याविमूढया ॥२०॥

चन्चल इन्द्रिय रूपी घोडों द्वारा तुम चिरकाल तक कुमार्ग पर चले हो, किंतु अब सौभाग्य से सम्यक दृष्टि द्वारा सन्मार्ग पर उतरे हो ।।२०॥

अद्य ते सफल जन्म लाभोऽद्य सुमहांस्तव । यस्य कामरसज्ञस्य नेष्क्रम्यायोत्सुकं मनः ॥२१॥

आज तुम्हारा जन्म सफल हैं और अब तुम्हारा महान् लाभ हैं, जो काम-रस का आस्वाद कर के तुम्हारा मन वैराग्य के लिए उत्सुक हैं ॥२१॥

लोकेऽस्मिन्नालयारामे निवृत्तौ दुर्लभा रतिः । व्यथन्ते ह्यपुनर्भावात्प्रपातादिव बालिशा: ॥२२॥

भोगों में आनन्द पानेवाले इस लोक में निवृत्ति में रति होना दुर्लभ हैं, क्योंकि मूर्ख जन्म-विनाश (मोक्ष) से ऐसे डरते हैं जैसे प्रपात (ऊंची चट्टान, जहां से अपराधियों को दण्ड दिया जाता था) से ॥२२॥

दुःखं न स्यात्सुखं मे स्यादिति प्रथतते जनः ।अत्यन्तदुःखोपरमं सुखं तञ्च न बुध्यते ॥२३॥

'मुझे दुःख न हो, मुझे सुख हो इसके लिए मनुष्य प्रयत्न करता है; किंतु वह यह नहीं जानता हैं कि दुःख का अत्यन्त निरोध ही सुख हैं ॥२३॥

अरिभूतेष्वनित्येषु सततं दुःखहेतुषु । कामादिषु जगत्सक्तं न वेत्ति सुखमव्ययं ॥२४॥

शत्रु-स्वरूप, अनित्य और दुःख-जनक काम-आदि (विषय, भोग) में जगत् निरन्तर आसक्त रहता हैं और वह अविनाशी सुख को नहीं जानता हैं ॥२४॥

सर्वदुःखापहं तत्तु हस्तस्थममृतं तथ । विषं पीत्वा यदगढं समये पातुमिच्छशि ॥२५॥

विष-पान करके, समय पर जिस विष-नाशक औषध को पीना चाहते हो वह सर्व-दुःख-विनाशक अमृत (निर्वाण) तुम्हारे हाथ में हैं ॥२५॥

अनर्हसंसारभयं मानार्ह ते चिकीर्षितं । रागाग्निस्तादृशो यस्य धर्मोन्मुख पराङ्मुखः ॥२६॥

तुम्हारा अभिप्राय सम्मान के योग्य है, क्योंकि इसमें संसार के भय के लिए स्थान नहीं है । हे धर्म की ओर अग्रसर होनेवाले, तुम्हारी वह वैसी रागाग्नि अब विमुख हो गई ॥२६॥

रागोद्दामेन मनसा सर्वथा दुष्करा धृति: । सदोषं सलिल' दृष्ट्वा पथिनेव पिपासुना ॥२७॥

राग के कारण उच्छुङ्खल चित्त के लिए धैर्य धारण करना सब प्रकार से दुष्कर हैं, जैसे दूषित जल को (भी) देखकर प्यासे पथिक के लिए धैर्य रखना कठिन हैं ।।२७॥

ईदृशी नाम बुद्धिस्ते निरुद्धा रजसाभवत् । रजसा चण्डवातेन विवस्वत इव प्रभा ॥२८॥

तुम्हारी यह ऐसी बुद्धि रजोगुण से ढकी (अवरूद्ध) थी, जैसे आंधी की धूल से सूर्य की प्रभा छिपी रहती हैं ॥२८॥

सा जिघांसुस्तमो हार्दं या संप्रति विज़ृम्भते । तमो नैशं प्रभा सौरी विनिर्गीर्णेव मेरुणा ॥२९।।

तुम्हारी यह बुद्धि, जो अभी विकसित हो रही हैं, तुम्हारे हृदय का अज्ञान नष्ट करना चाहती हैं, जैसे मेरु-पर्वत से निकली सूर्य की प्रभा (चारों ओर) फैलकर रात्रि के अन्धकार को दूर करती हैं ॥२९॥

युक्तरूपमिदं चैव शुद्ध सत्वस्य चेतसः । यत्ते स्यान्नैष्ठिके सूक्ष्मे श्रेयसि श्रद्दधानता ॥३०॥

यह तुझ पवित्रतात्म के चित्त के ही अनुरूप हैं कि सूक्ष्म एवं नैष्ठिक श्रेय में तुम्हारी श्रद्धा उत्पन्न हुई हैं ॥३०॥

धर्मच्छन्दमिमं तस्माद्विवर्धयितुमर्हसि । सर्वधर्माहि धर्मज्ञ नियमाच्छन्दहेतवः ॥३१॥

इसलिए तुम्हें धर्म की इस इच्छा को बढ़ाना चाहिए; क्योंकि सब धर्मों (तत्वों) का कारण, हे धर्मज्ञ, इच्छा ही हैं ॥३१॥

सत्यां गमनबुद्धौ हि गमनाय प्रवर्तते । शय्याबुद्धौ च शयनं स्थानबुद्धौ तथा स्थितिः ॥३२॥

क्योंकि चलने की बुद्धि (इच्छा) होने पर मनुष्य चलने में प्रवृत्त होता हैं, सोने की बुद्धि होने पर सोता हैं और खड़ा होने की बुद्धि होने पर खड़ा होता हैं ॥३२॥

अन्तर्भूमिगतं ह्यम्भः श्रद्दधाति नरो यदा । अर्थित्वे सति यत्नेन तदा खनति गामिमां ॥३३।।

पृथ्वी के भीतर जल हैं, यह श्रद्धा (विश्वास) जब मनुष्य को होता हैं, तब प्रयोजन होने पर वह प्रयत्नपूर्वक पृथ्वी को खनता हैं ॥३३॥

नार्थी यद्यग्निना वा स्याच्छद्धध्यात्तं न वारणौ ।मथनीयात्नारणिं कश्चित्तद्भावे सति मथ्यते ॥३४॥

यदि अग्नि से प्रयोजन न हो, या यदि अरणि (काष्ठ) में अग्नि हैं यह श्रद्धा (विश्वास) न हो तो कोई भी मनुष्य अरणि को न रगड़ेगा; किंतु उस (श्रद्धा और प्रयोजन) के होने पर उसे रगड़ते हैं ॥३४॥

सस्योत्पत्तिं यदि न वा श्रद्दध्यात्कार्षकः क्षितौ । अर्थी सस्येन वा न स्याद् वीजानि न वपेद् भुवि ॥३५॥

भूमि से अन्न की उत्पत्ति होती हैं, यदि यह श्रद्धा कृषक (किसान) को न हो या यदि अन्न से उसे प्रयोजन न हो, तो वह भूमि में बीज न बोयेगा ॥३५॥

अतश्च हस्त इत्युक्ता मया श्रद्धा विशेषत: । यस्माद्गृहृति सद्धर्मं दायं हस्त इवाक्षत: ॥३६॥

जैसे हाथ दान ग्रहण करता हैं, वैसे ही श्रद्धा सद्धर्म को ग्रहण करती हैं; इसलिए मैंने श्रद्धा को विशेष रूप से हाथ कहा हैं ॥३६॥

प्राधान्यादिन्द्रियामति स्थिरत्वाद्बलमित्यतः ।गुणदारिद्र्यशमनाद्धनमिस्यभिवर्णिता ॥३७॥

प्रधान होने के कारण इसे (श्रद्धा को) इन्द्रिय, स्थिर होने के कारण इसे बल और गुणों की दरिद्रता दूर करने के कारण इसे धन बतलाया गया हैं ॥३७॥

रक्षणार्थेन धर्मस्य तथेषीकेत्युदाहृता ।लोकेऽस्मिन्दुर्लभत्वाच्च रत्नामत्यभिभाषिता ॥३८॥

उसी प्रकार धर्म की रक्षा कर सकने के कारण इसे ईषिका (नामक अस्त्र-विशेष), और इस लोक में दुर्लभ होने के कारण इसे रत्न कहा गया हैं॥३८॥

पुन्श्च बीजमित्युक्ता निमित्तं श्रेयसो यदा । पावनार्थेन पापस्य नदीत्यभिहिता पुनः ॥३९॥

फिर श्रेय का निमित्त होने के कारण बीज और पाप को पवित्र कर सकने के कारण नदी (तीर्थ) कहा गया हैं ॥३९॥

यस्माद्धर्मस्य चोत्पत्तौ श्रद्धा कारणमुक्तमं । मयोक्ता कार्यतस्तस्मात्तत्र तत्र तथा तथा ॥४०॥

क्योंकि धर्म की उत्पत्ति में श्रद्धा उत्तम कारण हैं, इसलिए मैंने इसके कार्य के अनुसार इसे ये (उपर्युक्त ) नाम दिये हैं ॥४०॥

श्रध्दाङ्कुरमिमं तस्मात्संवर्धेयितुमर्हसि । तदवृध्दौ वर्धते धर्मो मूलवृद्धौ यथा द्रुमः ॥४१॥

इसलिए इस श्रद्धा-अङ्कुर को तुम्हें बढ़ाना चाहिये, क्योंकि इसके बढ़ने से धर्म वैसे ही बढ़ता हैं जैसे जड़ के बढ़ने से वृक्ष ॥४१॥

व्याकुलं दर्शनं यस्य दुर्बलो यस्य निश्चयः। तस्य पारिष्लवा श्रद्धा न हि कृत्याय वर्तते ॥४२॥

जिसकी विचार (दृष्टि) आकुल (बेचैन) हैं, जिसका निश्चय दुर्बल हैं उसकी चन्चल श्रद्धा सफलता के लिये नहीं हैं ॥४२॥

यावत्तत्त्वं न भवति हि दृष्टं श्रुतं वा तावच्छद्धा न भवति बलस्था स्थिरा वा । दृष्टे तत्त्वे नियमपरिभूतेन्द्रियस्य श्रद्धावृक्षो भवति सफलश्चाश्रयश्च ॥४३।।

सौन्दरनन्दे महाकाव्ये प्रत्यवमर्शो नाम द्वादशः सर्गः ।

जब तक मनुष्य तत्त्व को देख या सुन नहीं लेता हैं, तब तक उसकी श्रद्धा बलवती या स्थिर नहीं होती हैं । संयम के द्वारा इन्द्रियों को जीतकर जिसको तत्व का दर्शन होता है उसका श्रद्धा-रूपी वृक्ष फल और आश्रय देता हैं ।।४३॥

सौन्दरनन्द महाकाव में "विवेक" नामक द्वादश सर्ग समाप्त ।

Friday, December 11, 2020

सौन्दरनन्द : स्वर्ग की निन्दा

अश्वघोष कृत 'सौन्दरनन्द' महाकाव्य 
(सर्ग ११, स्वर्ग की निन्दा)

आर्जवाभिहितं वाक्यं न च गन्तव्यमन्यथा । रूक्षमप्याशये शुद्धे रूक्षतो नैति सज्जन: ॥१५॥ 

सरलता (साधुता) पूर्वक कहे गये वचन को अन्यथा नहीं समझना चाहिए । आशय शुद्ध होने पर रूखे वचन को भी सज्जन रूखा नहीं समझता है ॥१५॥

अप्रियं हि हितं स्निग्धमस्निग्धमहितं प्रियं । दुर्लभं तु प्रियहितं स्वादु पथ्यमिवौषधं ॥१६॥

क्योंकि हितकारी अप्रिय वचन स्नेह से परिपूर्ण (मित्र का) होता है और अहितकारी प्रिय वचन स्नेह से रहित (अमित्र का) होता है, प्रिय भी हो और हितकर भी हो ऐसा वचन दुर्लभ है, वैसे ही जैसे कि औषधि जो स्वादिष्ठ भी हो और रोग-निवारक (स्वास्थ्य-प्रद) भी हो ॥१६॥

विश्वासश्चार्थचर्या च सामान्यं सुखदुःखयोः । मर्षणं प्रणयश्चैव मित्रवृत्तिरियं सतां ॥१७॥

विश्वास, उपकार, सुख-दुःख में समान भाव, क्षमा और प्रेम-यही तो सज्जनो की मित्रता हैं ॥१७॥

तदिदं त्वा विवक्षामि प्रणयान्न जिघांसया । त्वच्छे यो हि विवक्षा मे यतो नार्हाम्युप्पेक्षतुं ॥१८॥

इसीलिए प्रेम के वशीभूत होकर, न कि तुम्हारी हिंसा करने की इच्छा से मैं (आनन्द) तुम्हें कुछ कहना चाहता हूँ; मैं तुम्हें तुम्हारा श्रय कहना चाहता हूँ; क्योंकि इसकी उपेक्षा करना मेरे लिए उचित नहीं है ॥१८॥

अप्सरोभृतको धर्म चरसीत्यभिधीयसे । किमिदं भूतमाहोस्वित्परिहासोऽयमीद्दशः ॥१९॥

अप्सराओं को प्राप्त करने के लिए धर्माचरण करते हो, ऐसा लोग कहते हैं। क्या यह सत्य है ? या यह परिहास है ? ॥१९॥

यदि तावदिदं सत्यं वक्ष्याम्यत्र यदौषधं । औद्धत्यमथ वक्तृणामभिधास्यामि तद्रजः ॥२०॥

यदि वास्तव में यह सत्य है तो मैं इसकी औषधि बतलाऊँगा या यदि कहने वालों की ढिठाई हैं तो मैं इसे उनका रजस् (दोष) कहूँगा" ॥२०॥

श्लक्ष्णपूर्वमथो तेन हृदि सोऽभिहतस्तदा । ध्यात्वा दीर्घं निशश्वास किंचिश्चावाङ् मुखोऽभवत् ॥२१॥

तब उसके द्वारा अपने हृदय में कोमलता पूर्वक आहत होकर उसने ध्यान (चिन्तन) किया और लम्बी साँस लेकर अपने मुखको कुछ नीचे कर लिया ॥२१।।

ततस्तस्येङ्गितं ज्ञात्वा मनःसंकल्पसूचकं । बभाषे वाक्यमानन्दो मधुरोदर्कमप्रियं ॥२२॥

तब उसके मानसिक-सङ्कल्प-सूचक सन्केत को जानकर आनन्द ने मधुर-फल-दायक यह अप्रिय वचन कहा:-॥२२।।

आकारेणावगच्छामि तव धर्मप्रयोजनं । यज्ज्ञात्वा त्वयि जातं मे हास्यं कारुण्यमेव च ॥२३॥

"तुम्हारी आकृति से ही तुम्हारे धर्माचरण का प्रयोजन जान लिया, जिसे जानकर तुम्हारे प्रति मुझे हंसी आती हैं और दया होती है ॥२३॥

यथासनार्थं स्कन्धेन कश्चिद्गुर्वी शिलां वहेत् । तद्वत्त्वमपि कामार्थ नियमं वोढुमुद्यतः ॥२४॥

बैठने के लिए जैसे कोई आदमी अपने कन्धे पर भारी पत्थर को ढोये, वैसे ही तुम भी कामोपभोग के लिए नियम को ढोने (पालन-करने) में उद्यत हुए हो ॥२४।।

तिताडीयषया दृप्तो यथा मेषोऽपसर्पति । तद्वदब्रह्मचर्याय ब्रह्मचर्यमिदं तव ॥२५॥

जैसे गर्वित भेड़ा चोट करने की इच्छा से पीछे हट जाता है, वैसे ही तुम्हारा यह ब्रह्मचर्य-पालन अब्रह्मचर्य (कामोपभोग) के लिए हैं ॥२५॥

चिक्रीषन्ति यथा पण्यं वणिजो लाभलिप्सया । धर्मचर्या तव तथा पण्यभूता नं शान्तये ॥२६।।

जिस प्रकार व्यापारी लाभ उठाने के लिए सौदा (पण्य=विक्रेय वस्तु) खरीदना चाहते हैं, उसी प्रकार तुम्हारा यह धर्माचरण पण्यं-स्वरूप (सौदा के समान) है, इससे शान्ति नहीं होगी ॥२६॥

यथाफलविशेषार्थ बीजं वरपति कार्षकः ।नद्वद्विषयकार्पण्याद्विषयांस्त्यक्तवानसि ॥२७॥

जिस प्रकार कृषक विशेष फल पाने के लिए बीज बोता है, उसी प्रकार विषयों के लोभ से ही तुमने विषयों का परित्याग किया हैं ।।२७॥

आकाङ्क्षच्च यथा रोगं प्रतीकारसुखेप्सया ।दुःखमन्विच्छति भवांस्तथा विषयतृष्णया ॥२८॥

जिस प्रकार (रोग के) प्रतीकार में होने वाला सुख प्राप्त करने की इच्छा से कोई आदमी रोग की अभिलाष करे, उसी प्रकार तुम विषयों की तृष्णा से दुःख की खोज करते हो ।।२८॥

यथा पश्यति मध्वेव न प्रपातमवेक्षते ।पश्यस्यप्सरसस्तद्वद्भ्रशमन्तं न पश्यसि ॥२९॥

जिस प्रकार (मनुष्य वृक्ष पर) मधु (शहद) को ही देखता है और (वृक्षसे) गिरने के खतरे को नहीं, उसी प्रकार तुम अप्सराओं को तो देखते हो, किंतु अन्त में होने वाले पतन को नहीं ॥२९॥

हृद कामाग्निना दीप्ते कारयन वहतो व्रतं । किमिदं ब्रह्मचर्य ते मनसाब्रह्मचारिणः ॥३०॥

कामाग्नि से तुम्हारा हृदय जल रहा हैं और शरीर से व्रत को ढो रहे हो। मन से अबह्मचारी रहते हुए तुम्हारा यह ब्रह्मचर्य कैसा ? ।।३०।।

संसारे वर्तमानेन यदा चाप्सरसस्त्वया । प्राप्तास्त्यक्ताश्च शतशस्ताभ्यः किमिति ते स्पृहा ॥३१॥

संसार में रहते हुए (जन्म-चक्र में भटकते हुए) जब कि तुमने सैकड़ों बार अप्सराओं को पाया और खोया, तब फिर क्यों तुम्हें उनकी अभिलाषा होती है ? ॥३१॥

तृप्तिर्नास्तीन्धनैरग्नेर्नाम्भसा लवणाम्भसः । नापि कामैः सतृष्णस्य तस्मात्कामा न तृप्तये ॥३२॥

जलावन से अग्नि की, जल से समुद्र की और कामोपभोग से तृष्णावान् की तृप्ति नहीं हैं; इसलिए कामोपभोग तृप्तिदायक नहीं ॥३२॥

अतृप्तौ च कुतः शान्तिरशान्तौ च कुतः सुखं । असुखे च कुतः प्रीतिरप्रीतौ च कुतो रतिः ॥३३॥

तृप्ति नहीं होने पर शान्ति कहाँ, शान्ति नहीं होने पर सुख कहाँ, सुख नहीं होने पर प्रीति कहाँ और प्रीति नहीं होने पर रति (आनन्द) कहाँ ? ॥३३।।

रिरंसा यदि ते तस्मादध्यात्मे धीयतां मनः । प्रशान्ता चानवद्या च नास्त्यध्यात्मसमा रतिः ॥३४॥

इसलिए यदि तुम आनन्द चाहते हो तो अ्पने मन को अध्यात्म में लगाओ। शान्त एव निर्दोष अध्यात्म-आनंद के समान दूसरा कोई आनन्द नहीं हैं ।।३४।।

न तत्र कार्य तूर्येरते न स्त्रीभिर्नं विभृषणै: । एकस्त्वं यत्रस्थस्तया रत्याभिरंस्यसे ॥३५॥

उस (अध्यात्म-रति) में तुम्हें संगीत (तूर्य=वाद्य-विशेष) स्त्रियों, अभूषणों का काम नहीं होगा । जहाँ-तहाँ रहकर अकेले ही तुम उस (अध्यात्म-) आनन्द में रमोगे ॥३५॥

मानसं बलवद्दुःखं तर्षे निष्ठति तिष्ठति । तं तर्षं छिन्धि दुःखं हि तृष्णा चास्ति च नास्ति च ॥३६॥

जब तक तृष्णा रहेगी तब तक चित्त को अत्यन्त दुःख होगा । (इसलिए) उस तृष्णा को काटो; क्योंकि दुःख और तृष्णा एक साथ आतें हैं और एक साथ जातें हैं ।।३६॥

संपत्तौ वा विपत्तौ वा दिवा वा नक्तमेव वा । कामेषु हि सतृष्णस्य न शान्तिरुपपद्यते ॥३७॥

समृद्धि में या विपत्ति में, दिन को या रात को, विषयों की तृष्णा रखने वाले को (कभी) शान्ति नहीं होती है ॥३७॥

कामानां प्रार्थना दुःखा प्राप्तौ तृप्तिने विद्यते ।वियोगान्नियतः शोको वियोगश्च ध्रुवो दिवि ॥३८॥

विषयों की खोज में दुःख हैं, उनकी प्राप्ति होने पर तृप्ति नहीं होती हैं। वियोग होने पर शोक नियत हैं और स्वर्ग में उनका वियोग निश्चित हैं ।।३८॥

कृत्वापि दुष्करं कर्म स्वर्ग लब्ध्वापि दुर्लभं । नृलोकं पुनरेवैति प्रवासास्त्वगृहं यथा ॥३९॥

मनुष्य दुष्कर कर्म करके स्वर्ग प्राप्त करता हैं और फिर मनुष्य-लोक को ही लौट आता हैं, जैसे प्रवास के बाद अपने घर को लौटता हो ॥३९॥

यदा भ्रष्टस्य कुशलं शिष्टं किंचिन्न विद्यते । तिर्यक्षु पितृलोके वा नरके चोपपद्यते ॥४०॥

(स्वर्ग से) गिरे हुए का थोड़ा सा भी कुशल (पुण्य) शेष नहीं रहता हैं, इसलिए वह पशु-पक्षियों की योनि में प्रेत-लोक में या नरक में उत्पन्न होता है ।।४०।।

तस्य भुक्तवतः स्वर्गे विषयानुत्तमानपि। भ्रष्टस्यार्तस्य दुःखेन किमाश्वाद: करोति सः ॥४१॥

स्वर्ग में उत्तम विषयों को भोगने के बाद वहाँ से गिरकर वह अत्यत दुःखी हो जाता है, उस समय (उन विषयों का) वह आस्वाद उसका क्या (उपकार) करता हैं ? ।।४१।।

श्येनाय प्राणिवात्सल्यात्स्वमांसान्यपि दत्तवान् । शिबिः स्वर्गात्परिभ्रष्टस्ताद्दक्कृत्वापि दुष्करं ॥४२।।

प्राणियों के प्रति (अतिशय) स्नेह होने के कारण शिबि ने वाज (पक्षी) को अपने शरीर का मांस भी दे दिया, ऐसा दुष्कर कर्म करके भी वह (पुण्य क्षीण होने पर) स्वर्ग से च्युत हुआ ।।४२॥

शक्रस्यार्धासनं गत्वा पूर्वपार्थिव एव यः । स देवत्वं गतः काले मान्धाताधः पुनर्ययो ॥४३।।

जिस प्राचीन राजा मान्धाता ने इन्द्र का आधा आसन प्राप्त किया वह देवत्व को प्राप्त होकर भी समय होने पर नीचे (पृथ्वी पर ही) लौट आया ॥४३।।

राज्यं कृत्वापि देवानां पपात नहुषो भुवि । प्राप्तः किल भुजंगत्वं नाद्यापि परिमुच्यते ॥४४॥

नहुष ने देवताओं के ऊपर राज्य किया, तो भी वह (स्वर्ग से) पृथ्वी पर गिर कर सर्प हो गया और अब तक (उस योनि से) मुक्त नहीं हुआ ॥४४॥

तथैवेलिविलो राजा राजवृत्तेन संस्कृतः । स्वर्ग गतवा पुनर्भ्रष्टः कूर्मीभूतः किलार्णवे ॥४५॥

उसी प्रकार राजा इलिविल, जो राजोचित आचरण से शुद्ध (पवित्र) हो गया था, स्वर्ग चला गया और फिर (वहाँ से) गिरकर समुद्र में कछुआ हो गया ॥४५॥

भूरिद्युम्नो ययातिश्च ते चान्ये च नृपर्षभाः ।कर्मभिद्यामभिक्रीय तत्क्षयात्पुनरत्यजन् ॥४६॥

भूरिद्युम्न, ययाति और दूसरे राजर्षियों ने अपने कर्मों से स्वर्ग को खरीदा और उन (कर्मों) के क्षीण होने पर फिर उस (स्वर्ग) का परित्याग किया ॥४६॥

असुराः पूर्वेदेवास्तु सुरैरपहृश्रियः । श्रियं समनुशोचन्तः पातालं शरणं ययुः ॥४७॥

असुरगण पूर्व काल में देवता थे, जब सुरों ने उनकी राज्य-लक्ष्मी का हरण किया तो वे लक्ष्मी के लिए शोक करते हुए पाताल की शरण में चले गये ! ॥४७॥

किं च राजर्षिभिस्तावदसुरैर्वा सुरादिभिः । महेन्द्राः शतशः पेतुर्माहात्म्यमपि न स्थिरं ॥४८॥

राजर्षियों, असुरों, सुरों और दूसरों का क्या कहना ? शत शत महेन्द्र (इन्द्र-लोक से) च्युत हुए, जो महान् से महान् है वे भी चिर-स्थायी नही हैं ॥४८॥

संसदं शोयित्वैन्द्रीमुपेद्रश्चेन्द्रविक्रमः । क्षीणकर्मा पपातोर्वी मध्यादप्सरसां रसन् ॥४९॥

इन्द्र के समान पराक्रमी उपेन्द्र, जिसने इन्द्र की सभा को सुशोभित किया था, अपने कर्मों के क्षीण होने पर अप्सराओं के बीच से रोता हुआ पृथ्वी पर गिरा ॥४९॥

हा चैत्रररथ हा वापि हा मन्दाकिनि हा प्रिये । इत्यार्ता विलपन्तोऽपि गां पतन्ति दिवौकसः ॥५०॥

हा चैत्ररथ (बन) ! हा वापी (सरोवर) हा मन्दाकिनी ! हा प्रिये! इस प्रकार आर्त होकर विलाप करते हुए स्वर्ग के रहने वाले पृथ्वी पर गिरते हैं ।।५०॥

तीव्रं ह्युत्पद्यते दुःखमिह तावन्मुमूर्षतां । किं पुन: पततां स्वर्गादेवान्ते सुखसेविनां ॥५१॥

यहाँ (इस पृथ्वी पर) मरण-काल में मनुष्यों को तीव्र दुःख होता हैं, फिर अन्त में स्वर्ग से गिरते हुए (स्वर्ग-) सुख-सेवियों के दुःख का क्या कहना ? ॥५१॥

रजो गृह्णन्ति वासांसि म्लायन्ति परमा: स्रज: । गात्रेभ्यो जायते स्वेदो रतिर्भवति नासने ॥५२॥

उनके कपड़े धूल से मलिन हो जाते हैं, उनकी उत्तम मालाए मुरझा जाती हैं, शरीर से पसीना निकलता है और वहा रहने में (या सुख भोगने) में उन्हे आनन्द नहीं मिलता है ॥५२॥

एताम्यादौ निमित्तानि च्युतौ स्वर्गाद्दिवौकसां । अनिष्टानीव मर्त्यानामरिष्टानि मुमूर्षतां ॥५३॥

स्वर्ग से गिरते समय स्वर्ग-वासियों के ये पूर्व लक्षण देख पडते हैं, जैसे कि मृत्यु-काल में मनुष्यों के अनिष्ट लक्षण देखे जाते हैं ॥५३॥

सुखमुत्पद्यते यश्च दिवि कामानुपाश्रतां । यश्च दुःखं निपततां दुःखमेव विशिष्यते ॥५४॥

स्वर्ग में कामोपभोग करते समय जो सुख होता है और वहाँ से गिरते समय जो दुःख होता है, सो (सुख से) दुःख ही अधिक है ॥५४॥

तस्मादस्वण्तमत्राणमविश्वास्यमतर्पकं । विज्ञाय क्षयिणं स्वर्गमपवर्गे मरतिं कुरु ॥५५॥

इसलिए, स्वर्ग परिणाम में अच्छा नहीं है, वह रक्षा नहीं करता, वह विश्वसनीय और तृप्ति-दायक नहीं है, वह नाशवान् (क्षणिक, अनित्य) हैं, ऐसा जानकर मोक्ष में अपने मन को जगाओ ॥५५॥

अशरीरं भवाग्रं हि गत्वापि मुनिरुद्रकः । कर्मोणोऽन्ते च्युतस्तस्मात् तिर्यग्योनिं प्रपत्यते ॥५६॥

शरीर-रहित उत्तम जन्म (अरूप लोक) को प्राप्त होकर भी उद्रक मुनि अपने कर्मों का अन्त होने पर वहा से गिरकर पशु-पक्षियों की योनि में गिरेगा ।।५६।। 

मैत्रया सप्तवार्षिक्या ब्रह्मलोकमितो गतः । सुनेत्रः पुनरावृत्ती गर्भवासमुपेयिवान् ॥५७॥

सात वर्षों तक मैत्री-भावना करके सुनेत्र यहाँ से ब्रह्मलोक को गया और फिर लौट कर उसने गर्भ में निवास किया है, उसी प्रकार अज्ञान-सूत्र से बँधा हुआ मनुष्य दूर जाकर भी लौट आता है ।।५७॥

यदा चेश्वर्यवन्तोऽपि क्षयिणः स्वर्गवासिनः । को नाम स्वर्गवासाय क्षष्णवे स्पृहयेद्बुधः ॥५८॥

जब कि ऐश्वर्यशाली स्वर्ग-निवासी भी स्थायी नहीं हैं, तब कौन बुध्दिमान् मनुष्य क्षणिक स्वर्ग-निवास की अभिलाषा करे ? ॥५८॥

सुत्रेण बद्धो हि यथा विहंगो व्यावर्तते दूरगतोऽपि भूय: ।अज्ञानसूत्रेण तथावबद्धो गतोऽपि दूरं पुनरेति लोकः ॥ ५९॥

जिस प्रकार सूते से बँधा हुआ पक्षी दूर जाकर भी फिर लौट आता है, उसी प्रकार अज्ञान-सुत्र से बंधा हुआ मनुष्य दूर जाकर भी लौट आता हैं ।।५९।।

कृत्वा कालविलक्षणं प्रतिभुवा मुक्तो यथा बन्धनाद्भुक्त्वा वंश्मसुखान्यतीत्य समयं भूयो विशंद्धन्धनं । तद्भदुद्यां प्रतिभूवदात्मनियमैर्ध्यानादिभिः प्राप्तवान । काले कर्मसु तेषु भुक्तविषयेष्वाकृष्यते गां पुनः ॥६०॥

जिस प्रकार निश्चित समय के लिए मनुष्य प्रतिभू (जमानतदार) के द्वारा बन्धन (जेल) से मुक्त होता है और घर के सुखों को भोगकर, समय बीतने के बाद, पुनः बंधन में प्रवेश करता है, उसी प्रकार मनुष्य आत्मनियम एवं ध्यान आदि के द्वारा, जैसे प्रतिभू के द्वारा, स्वर्ग प्राप्त करता है और उन कर्मों का फल भोगने के बाद समय होने पर वह फिर पृथ्वी पर घसीट लाया जाता हैं ॥१०॥

अन्तर्जालगताः प्रमत्तमनसो मीनास्तढागे यथाजानग्ति व्यसनं न रोधजनितं स्वस्थाश्चरन्त्यम्भसि । अन्तर्लोकगताः कृतार्थमतयस्तद्वद्दिवि ध्यायिनोमन्यन्ते शिवमच्युतं ध्रुवर्मति स्वं स्थानमावर्तकं ॥६१॥

पोखर में जाल के भीतर असावधान मछलियाँ घेरे से उत्पन्न हुए खतरे को नहीं जानती हैं और प्रसन्नता पूर्वक जल में विचरण करती हैं, उसी प्रकार इस लोक में रहकर स्वर्ग का ध्यान करने वाले (स्वर्ग में प्राप्त होने वाले) अपने विनाशवान् स्थान को ही मङ्गलमय, अविनाशी और स्थिर मानते हैं और अपने को कृतार्थ समझते हैं ।।११॥

तज्जन्मव्याधिमृत्युव्यसनपरिगतं मत्वा जगदिदं संसारे भ्राम्यमाणं दिवि नृषु नरके तिर्यकपितृषु च । यत्त्राणं निर्भयं यच्छिवममरजरं निःशोकममृतं तद्धेतोब्रह्मचर्यं चर जहि हि चलं स्वर्ग प्रति रुचि || ६२।।

इसलिए यह जानकर कि जन्म-मरण और रोग से घिरा हुआ यह जगत् जन्म-चक्र में-स्वर्ग नरक पशु-पक्षिर्यों की योनि, मनुष्य-लोक और पितृ-लोक में-भटक रहा है। जो जरा मरण शोक और भय से रहित है, जो त्राण (रक्षा ) करने वाला, कल्याण-कारी और अमृत हैं उसी के लिए ब्रह्मचर्य का आचरण करो और अस्थायी स्वर्ग के प्रति अपनी इच्छा को छोड़ो ॥६२॥

सौन्दरनन्द महाकाव्ये स्वर्गापवादो नामैकादशः सगेः ।

सौन्दरनन्द महाकाव्य में "स्वर्ग की निन्दा" नामक एकादश सर्ग समाप्त ।

(विस्तार भय के कारण क्रमांक १ से लेकर १४ तक के श्लोकों को कम किया गया हैं)

स्वर्गाची निंदा:सौन्दरनन्द महाकाव्य-

मानसं बलवद्दुःखं तर्षे निष्ठति तिष्ठति । तं तर्षं छिन्धि दुःखं हि तृष्णा चास्ति च नास्ति च ॥३६॥

जोवर तृष्णा राहील तोवर चित्ताला अत्यन्त दुःख होत राहील.(यासाठी) त्या तृष्णेला कापून टाका; कारण दुःख आणि तृष्णा एकत्र येतात व एकत्र जातात. ।।३६॥

संपत्तौ वा विपत्तौ वा दिवा वा नक्तमेव वा । कामेषु हि सतृष्णस्य न शान्तिरुपपद्यते ॥३७॥

समृद्धित किंवा विपत्तीत, दिवसा किंवा रात्री, विषयांची तृष्णा बाळगणाऱ्यांना (कधी) शान्तीची प्राप्ति होत नाही. ॥३७॥

कामानां प्रार्थना दुःखा प्राप्तौ तृप्तिने विद्यते ।वियोगान्नियतः शोको वियोगश्च ध्रुवो दिवि ॥३८॥

विषयांच्या चिंतनात दुःख आहे, त्यांची प्राप्ती झाल्यावर तृप्ती मिळत नाही. वियोग झाल्यावर शोक ठरलेला आहे आणि स्वर्गात त्यांचा वियोग निश्चित आहे. ।।३८॥

कृत्वापि दुष्करं कर्म स्वर्ग लब्ध्वापि दुर्लभं । नृलोकं पुनरेवैति प्रवासास्त्वगृहं यथा ॥३९॥

मनुष्य दुष्कर कर्म करुन स्वर्ग (सुगति) प्राप्त करतो आणि मग मनुष्य-लोकातच परत येतो, जसा काही प्रवासानंतर आपल्या घरी परत येतो. ॥३९॥

यदा भ्रष्टस्य कुशलं शिष्टं किंचिन्न विद्यते । तिर्यक्षु पितृलोके वा नरके चोपपद्यते ॥४०॥

(स्वर्गातून) च्युत होणारांचे थोडे सुध्दा कुशल (पुण्य) शेष राहत नाही, त्यामुळे ते पशु-पक्ष्यांच्या योनित, प्रेत-लोकात किंवा अपायगतित उत्पन्न होतात. ।।४०।।

तस्य भुक्तवतः स्वर्गे विषयानुत्तमानपि। भ्रष्टस्यार्तस्य दुःखेन किमाश्वाद: करोति सः ॥४१॥

स्वर्गात उत्तम विषयांना भोगल्यानंतर तेथून च्युत होऊन ते अत्यत दुःखी होतात, त्या समयी (त्या विषयांचे) ते आस्वाद त्यांचे काय (उपकार) करतात? ।।४१।।

श्येनाय प्राणिवात्सल्यात्स्वमांसान्यपि दत्तवान् । शिबिः स्वर्गात्परिभ्रष्टस्ताद्दक्कृत्वापि दुष्करं ॥४२।।

प्राण्यांच्या प्रति (अतिशय) स्नेह झाल्या कारणाने शिबि ने वाज (पक्ष्या) ला आपल्या शरीराचे मांसही दिले होते, असे दुष्कर कर्म करुन देखील तो (पुण्य क्षीण झाल्यावर) स्वर्गातून च्युत झाला. ।।४२॥

शक्रस्यार्धासनं गत्वा पूर्वपार्थिव एव यः । स देवत्वं गतः काले मान्धाताधः पुनर्ययो ॥४३।।

ज्या प्राचीन राजा मान्धाताने इन्द्राचे अर्धे आसन प्राप्त केले तो देवत्वाला प्राप्त होऊन सुध्दा कालोपरांत खाली (पृथ्वीवरच) परतला॥४३।।

राज्यं कृत्वापि देवानां पपात नहुषो भुवि । प्राप्तः किल भुजंगत्वं नाद्यापि परिमुच्यते ॥४४॥

नहुषाने देवतांवर राज्य केले, तरीही तो (स्वर्गातुन) पृथ्वीवर पडून सर्प झाला आणि आतापर्यंत (त्या योनितुन) मुक्त झाला नाही. ॥४४॥

तथैवेलिविलो राजा राजवृत्तेन संस्कृतः । स्वर्ग गतवा पुनर्भ्रष्टः कूर्मीभूतः किलार्णवे ॥४५॥

त्याच प्रकारे राजा इलिविल, जो राजोचित आचरणाने शुद्ध (पवित्र) झाला होता, स्वर्गाला गेला व नंतर (तेथून) च्युत होऊन समुद्रात कासव बनला.॥४५॥

भूरिद्युम्नो ययातिश्च ते चान्ये च नृपर्षभाः ।कर्मभिद्यामभिक्रीय तत्क्षयात्पुनरत्यजन् ॥४६॥

भूरिद्युम्न, ययाति व दूसरे राजर्षि यांनी आपल्या कर्माने स्वर्गाला विकत घेतले आणि त्यांचे (कर्म) क्षीण झाल्यावर त्या (स्वर्गाचा) परित्याग केला.॥४६॥

असुराः पूर्वेदेवास्तु सुरैरपहृश्रियः । श्रियं समनुशोचन्तः पातालं शरणं ययुः ॥४७॥

असुरगण पूर्व काळी देवता होते, जेव्हा सुरांनी त्यांच्या राज्य-लक्ष्मीचे हरण केले तेव्हा ते तिच्यासाठी शोक करीत पाताळाच्या शरणात गेले ! ॥४७॥

किं च राजर्षिभिस्तावदसुरैर्वा सुरादिभिः । महेन्द्राः शतशः पेतुर्माहात्म्यमपि न स्थिरं ॥४८॥

राजर्षी, असुर, सुर आणि दूसऱ्यांचे काय सांगावे ? शत शत महेन्द्र (इन्द्र-लोकातुन) च्युत झाला, जो महानापेक्षा महान् आहेत तेही चिर-स्थायी नाही. ॥४८॥

संसदं शोयित्वैन्द्रीमुपेद्रश्चेन्द्रविक्रमः । क्षीणकर्मा पपातोर्वी मध्यादप्सरसां रसन् ॥४९॥

इन्द्रा समान पराक्रमी उपेन्द्र, ज्याने इन्द्राच्या सभेला सुशोभित केले होते, आपले कर्म क्षीण झाल्यावर अप्सरांच्या मधून रडत-रडत पृथ्वीवर पडला. ॥४९॥

हा चैत्ररथ हो वापि हा मन्दाकिनि हा प्रिये । इत्यार्ता विलपन्तोऽपि गां पतन्ति दिवौकसः ॥५०॥

हे चैत्ररथ (वन) ! हे वापी (सरोवर) हे मन्दाकिनी ! हे प्रिये! याप्रमाणे आर्त होऊन विलाप करीत स्वर्गात राहणारे पृथ्वीवर पडतात.।।५०॥

तीव्रं ह्युत्पद्यते दुःखमिह तावन्मुमूर्षतां । किं पुन: पततां स्वर्गादेवान्ते सुखसेविनां ॥५१॥

येथे (पृथ्वीवर) मरण-काळात मनुष्यांना तीव्र दुःख होते, मग अंततः स्वर्गातून पडणाऱ्या (स्वर्ग-) सुख-सेवींच्या दुःखाचे काय बोलावे ? ॥५१॥

रजो गृह्णन्ति वासांसि म्लायन्ति परमा: स्रज: । गात्रेभ्यो जायते स्वेदो रतिर्भवति नासने ॥५२॥

त्यांचे कपड़े धुळीने मलिन होतात, त्यांच्या उत्तम फुलमाळा कोमेजून जातात, शरीरातून घामाच्या धारा निघतात आणि तेथे राहण्यात (किंवा सुख भोगण्यात) त्यांना आनन्द मिळत नाही. ॥५२॥

एताम्यादौ निमित्तानि च्युतौ स्वर्गाद्दिवौकसां । अनिष्टानीव मर्त्यानामरिष्टानि मुमूर्षतां ॥५३॥

स्वर्गातून पडताना स्वर्ग-वासियांचे हे पूर्व लक्षण दिसून येतात, ज्याप्रमाणे मृत्यु-समयी मनुष्यांचे अनिष्ट लक्षण दिसून येतात. ॥५३॥

सुखमुत्पद्यते यश्च दिवि कामानुपाश्रतां । यश्च दुःखं निपततां दुःखमेव विशिष्यते ॥५४॥

स्वर्गात कामोपभोग भोगताना जे सुख होते व तेथून च्युत होताना जे दुःख होते, त्या (सुखा पेक्षा) दुःखच अधिक आहे. ॥५४॥

तस्मादस्वण्तमत्राणमविश्वास्यमतर्पकं । विज्ञाय क्षयिणं स्वर्गमपवर्गे मरतिं कुरु ॥५५॥

म्हणून, स्वर्ग परिणामत: उत्तम नाही, रक्षा नाही करीत, तो विश्वसनीय आणि तृप्ति-दायक नाही, तो नाशवान् (क्षणिक, अनित्य) आहे, असे जाणून मोक्ष प्राप्तीसाठी आपल्या मनाला जागवावे ॥५५॥

अशरीरं भवाग्रं हि गत्वापि मुनिरुद्रकः । कर्मोणोऽन्ते च्युतस्तस्मात् तिर्यग्योनिं प्रपत्यते ॥५६॥

शरीर-रहित उत्तम जन्म (अरूप लोकाला=नामक्षेत्राला) प्राप्त होऊन देखील उद्रक मुनि, आपल्या कर्मांचा अन्त झाल्याने, तेथून च्युत होऊन पशु-पक्ष्यांच्या योनित पडला. ।।५६।। 

मैत्रया सप्तवार्षिक्या ब्रह्मलोकमितो गतः । सुनेत्रः पुनरावृत्ती गर्भवासमुपेयिवान् ॥५७॥

सात वर्षे पर्यंत मैत्री-भावना करुन सुनेत्र येथून ब्रह्मलोकाला गेला आणि तेथून परतून त्याने गर्भ निवास केला आहे, त्याच प्रकारे अज्ञान-सूत्राने बांधलेला मनुष्य दूर जाऊन देखील परत येतो. ।।५७॥

यदा चेश्वर्यवन्तोऽपि क्षयिणः स्वर्गवासिनः । को नाम स्वर्गवासाय क्षष्णवे स्पृहयेद्बुधः ॥५८॥

जेव्हा ऐश्वर्यशाली स्वर्ग-निवासी सुध्दा अस्थायी आहे, तेव्हा कोण बुध्दिमान मनुष्य क्षणिक स्वर्ग-निवासाची अभिलाषा बाळगणार ? ॥५८॥

सुत्रेण बद्धो हि यथा विहंगो व्यावर्तते दूरगतोऽपि भूय: ।अज्ञानसूत्रेण तथावबद्धो गतोऽपि दूरं पुनरेति लोकः ॥ ५९॥

ज्या प्रकारे सुताने बांधलेला पक्षी दूर जाऊन ही परत फिरुन येतो, त्या प्रकारे अज्ञान-सुत्राने बांधलेला मनुष्य दूर जाऊन परत फिरुन येतो. ।।५९।।

कृत्वा कालविलक्षणं प्रतिभुवा मुक्तो यथा बन्धनाद्भुक्त्वा वंश्मसुखान्यतीत्य समयं भूयो विशंद्धन्धनं । तद्भदुद्यां प्रतिभूवदात्मनियमैर्ध्यानादिभिः प्राप्तवान । काले कर्मसु तेषु भुक्तविषयेष्वाकृष्यते गां पुनः ॥६०॥

ज्या प्रकारे एक निश्चित वेळेसाठी मनुष्य प्रतिभूचे (जमानतदारचे) द्वारे बन्धनातुन (कारागृहातुन) मुक्त होतो आणि घरच्या सुखांना भोगून, वेळ निघून गेल्यावर, पुनः बंधनात प्रवेश करतो, त्याच प्रकारे मनुष्य आत्मनियम तसेच ध्यान इत्यादी  द्वारे, जसे प्रतिभूच्या द्वारे, स्वर्ग प्राप्त करतो आणि त्या कर्मांचे फळ भोगल्यानंतर वेळ आल्यावर तो परत फिरुन पृथ्वीवर ओढून आणला जातो. ॥६०॥

अन्तर्जालगताः प्रमत्तमनसो मीनास्तढागे यथाजानग्ति व्यसनं न रोधजनितं स्वस्थाश्चरन्त्यम्भसि । अन्तर्लोकगताः कृतार्थमतयस्तद्वद्दिवि ध्यायिनोमन्यन्ते शिवमच्युतं ध्रुवर्मति स्वं स्थानमावर्तकं ॥६१॥

डबक्यात जाळ्याच्या आत असावधान मासोळ्या वेढ्याने उत्पन्न झालेल्या धोक्याला समजत नाही आणि प्रसन्न पूर्वक पाण्यात विचरण करतात, त्याच प्रकारे इहलोकात राहून स्वर्गाचे ध्यान करणारे (स्वर्गात प्राप्त होणाऱ्या) आपल्या विनाशवान् स्थानालाच, मङ्गलमय, अविनाशी, स्थिर मानतात आणि आपल्याला कृतार्थ समजतात.।।६१॥

तज्जन्मव्याधिमृत्युव्यसनपरिगतं मत्वा जगदिदं संसारे भ्राम्यमाणं दिवि नृषु नरके तिर्यकपितृषु च । यत्त्राणं निर्भयं यच्छिवममरजरं निःशोकममृतं तद्धेतोब्रह्मचर्यं चर जहि हि चलं स्वर्ग प्रति रुचि || ६२।।

यासाठी हे जाणून कि जन्म-मरण व रोगाने वेढलेले हे जग जन्म-चक्रात-स्वर्ग-नर्क, पशु-पक्ष्यांची योनि, मनुष्य-लोक आणि पितृ-लोक यांत-भटकत आहे. पण जे जरा मरण शोक व भयापासून रहित आहे, त्राण (रक्षा) करणारे, कल्याण-कारी आणि अमृत आहे त्याचसाठी ब्रह्मचर्याचे आचरण करावे आणि अस्थायी स्वर्गा प्रति आपल्या इच्छेला सोडावे. ॥६२॥

सौन्दरनन्द महाकाव्ये स्वर्गापवादो नामैकादशः सगेः ।

सौन्दरनन्द महाकाव्यात "स्वर्गाची निन्दा" नावाने आकरावे सर्ग समाप्त ।

हिंदी ते मराठी भाषांतर, देव भिवसने....

Wednesday, December 2, 2020

प्रतित्यसमुत्पाद

बुद्ध के दार्शनिक विचारों में प्रतीत्यसमुत्पाद का मूर्धन्य स्थान हैं। उनके कारणवाद की व्याख्या प्रतीत्यसमुत्पाद के ही अधार पर की जाती हैं। इस सिद्धान्त के मूल में बुद्ध का 'अस्मिन् सति इदं भवति' वचन हैं। इसके बारह अंग माने जाते हैं- १-अविद्या, २-संस्कार, ३-विज्ञान, ४-नामरूप, ५-षडायतन, ६-स्पर्श, ७-वेदना, ८-तृष्णा, ६-उपादान,१०-भव,११-जाति (जन्म), और १२-जरा-मरण-दुःख। इनमें से प्रत्येक अपने परवर्ती का कारण हैं। इसी को भवचक्र कहते हैं। इन्हीं द्वादशांगों को निदान भी कहा जाता हैं। विज्ञान का जो स्थान द्वादशांगों में हैं उसका विवेचन आवश्यक हैं।

इन्हे तीन भागों में बॉटा गया हैं अथवा इनका विस्तार तीन जीवनों तक हैं-अतीत जन्म (सांसारिक जीवन के पूर्व), वर्तमान जीवन (सांसारिक जीवन), भविष्य जन्म (अनागत जीवन)। अविद्या और संस्कार अतीत जन्म के अंतर्गत, विज्ञान, नाम-रूप, षडायतन, स्पर्श, वेदना, तृष्णा, उपादान और भव वर्तमान जीवन के अंतर्गत तथा जाति और जरा-मरण भविष्य जन्म के अंतर्गत माने जाते हैं। चार आर्यसत्यों में से दुःख-समुदय आर्यसत्य (दु:ख के कारण) के अंतर्गत इन निदानों का विचार होना चाहिए। प्राणी जन्म लेता हैं इसीलिये उसे बार-बार जरामरण का दुःख सहना पड़ता हैं। प्राणी अपने पूर्व के जीवन में अनेक प्रकार के ऐसे कर्म करता है जो पुनर्जन्म के कारण होते हैं क्योंकि वह कुशल अकुशल कर्मों का ज्ञान नहीं रखता। अर्थात् अविद्या के कारण ही मनुष्य को कर्म और उसके अनुभव के संस्कार प्राप्त होते हैं। अतीत (बिते हुए) जीवन के ये संस्कार पन्चस्कंधों के रुप में जब मातृगर्भ में स्थित होते हैं तब उन्हें विज्ञान या चैतन्य कहते हैं। इस विज्ञान या चैतन्य के बाद की अवस्था दृश्यमान शरीर और मन संचलित संस्थान की हैं। पंचेंद्रिय और मन की अव्यक्त और निष्क्रिय अवस्था को ही नाम-रूप कहते हैं। षड़ायतन (पंचेंद्रिय और मन) नाम-रूप की व्यक्तावस्था हैं। विषयेंद्रिय सम्पर्क ही स्पर्श हैं। मन के संनिकर्ष में आने पर इद्रियों का संपर्क जब विषयों से होता है, तब स्पर्श की उत्पति होती हैं। सुख, दु:ख और उपेक्षा की अनुभूति का नाम ही वेदना हैं। इस वेदना का कारण स्पर्श हैं। वेदना से तृष्णा की उत्पत्ति होती हैं। किसी विशेष सुख को या सुखकर वस्तु को या भाव को प्राप्त करने की इच्छा ही तृष्णा हैं। इसी तृष्णा से उपादान या आसक्ति की उपलब्धी होती हैं। स्त्री, व्रत और आत्मनित्यता के प्रति आसक्ति को ही उपादान के तीन प्रकार कह सकते हैं। वस्तु या भाव के प्रति आसक्ति के कारण, उसकी उपलब्धि के लिये अनेक कुशल अकुशल कर्म किए जाते हैं। इन्हीं कर्मों को भव कहते हैं।

वित्ति, प्राङ्मैथुनात्, तृष्णा भोग-मैथुन रागिण'। 
उपादान तु भोगाना प्राप्तये परिधावतः ॥२३॥
स भविष्यद्भवफलं कुरुते कर्म तद्भव:। 
प्रतिसन्धि, पुनर्जाति' जरामरण आविद ॥२४॥ अभिधर्मकोष, ३, २३-२४--

अविद्या से लेकर भव तक की अवस्थाएँ वर्तमान सांसारिक जीवन की अवस्थाएँ हैं जिनमें भविष्य जन्म के निदान घटित होते हैं। इस अवस्था में पाँच स्कन्धों (रूप, वेदना, सज्ञा, संस्कार और विज्ञान) का पूर्ण संघटन रहता हैं। भव अवस्था वह अवस्था है जिसमें स्कन्धों के बिखर जाने पर उन स्कन्धों के पुनः संघटित होने की शक्ति रहती हैं। भव पाँच स्कन्धों की वह अवस्था हैं जिसमें अगले जीवन के शुरू होने की योग्यता हैं। निष्कर्ष यह कि जीवन को आरंभ करने वाले हैं अविद्या और संस्कार, जीवन का संचालन करने वाले हैं तृष्णा और उपादान तथा एक जीवन के बाद दूसरे जीवन को आरंभ करने वाला है भव। ये तीनों पंचस्कन्धों की विभिन्न अवस्थाएं हैं। यह भव ही, शरीर रूप में विकसित पॉचो स्कन्धो को, उनके बिखर जाने पर फिर शरीर में विकास के योग्य पाँच स्कन्धों का रूप देता हैं। अनेक प्रकार के कुशल अकुशल कर्मों के करने के फलस्वरूप जन्म की उपलब्धि होती है और जन्म का परिणाम हैं जरा और मरण, जो स्वयं अपने में ही घोर दुःख हैं। ऐसी स्थिति में अविद्या से संस्कार और संस्कार से विज्ञान कार्यरूप में होते हैं। यदि विज्ञान सांसारिक जीवन का द्वार है तो भव भविष्यत् जीवन का। अतः भव के निरोध के लिये विज्ञान निरोध या संयम आवश्यक हैं।

भारत में बौध्दधर्म गेल ओमवेट

ब्राह्मणों का आत्म-निर्माण :

कई सदियों के दौरान उभर कर आए भारतीय ब्राह्मण, किसी समाज द्वारा उत्पन्न सर्वाधिक अनूठे कुलीनों का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे अपने मूल को वैदिक काल से संबंद्ध पाते हैं, जहाँ वे बलिकर्म के लिए पुरोहित थे, और वे पहली सदी ई.पू. के मध्य में, समाज में पुरोहितों, बौद्धिकों तथा वेदों के संसाधकों के रूप में सामने आए।हालांकि, ब्राह्मणों को पहली सदी ई.पू. में अनिवार्य रूप से, वैदिक पुरोहितों के वंशजों के सामाजिक समूह के रूप में देखना वैसे ही अनुचित होगा, जैसे खत्तियों को वैदिक योद्धा अथवा राजन्य माना जाना। दोनों ही वंश शुद्धता की मांग रखते हैं, परंतु यह एक स्वयंसेवी पौराणिकता थी।

थापर का कहना है कि अनार्य मूल के ब्राह्मण, अगस्त्य तथा वशिष्ठ जैसे मुनियों की जनश्रुतियों में प्रामाणिक थे, जिनका जन्म जारों तथा एक ऋग्वैदिक ऋषि से माना जाता है, जिन्हें दासपुत्र या गुलाम के पुत्र के रूप में वर्णित किया जाता है (Thapar 1984: 52)। कुछ पालि ग्रंथों, उदाहरण के लिए, अंबट्ठ सुत्तांत (तीसरा अध्याय देखें) संकेत करते हैं कि उनमें (ब्राह्मणों में) खत्तियों की नाजायज़ संतान भी शामिल हो सकती है। यहाँ तक कि उपनिषद भी दर्शाते हैं कि कभी-कभी संदेहास्पद जन्म रखने वाले व्यक्ति को भी शिष्य के रूप में स्वीकार करते हुए, ब्राह्मणों के वंश में शामिल किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, छांदोग्य उपनषिद में, सत्यकाम जाबाल की माता उसे कहती है, 'प्रिय पुत्र! मैं नहीं जानती कि तुम किस वंश से संबंध रखते हो। मैंने तुम्हें अपनी युवावस्था में जन्म दिया। जब मैं बहुत लोगों के पास एक दासी के रूप में काम करती थी।' (Upanisads 2000: 174) 

ब्राह्मण कौन थे? दूसरी सदी ईसवी में, पश्चिमी भारत के एक सातवाहन राजा को अभिलेख में वर्णित किया गया (ekakusas ekadhanudharas ekasuras ekabahmanas)। इसका अनुवाद है, 'एक अद्भुत नियंत्रक, एक अजेय धुनधर्र, एक विख्यात नायक तथा अतुलनीय ब्राह्मण' (Mirasi part 2: 45-47)। परंतु इस सूची में दिए गए (बाहमन) 'ब्राह्मण' शब्द को जाति के अर्थ में नहीं लिया गया, ऐसा जान पड़ता है कि इसे करुण रूप में शामिल किया गया; इसी राजा ने अपने पुत्र का विवाह 'बर्बर' शक शासक से किया और सातवाहनों के उन लोगों से नियमित वैवाहिक संबंध रहे, जो मूलतः देसी मराठा (इसके साथ ही अर्द्ध जनजातीय) थे। बुद्ध व उनके अनुयायियों ने निरंतर ‘ब्राह्मण या बामन' शब्द का प्रयोग चरित्र की अच्छाई व विद्वता के संदर्भ में किया है, हालांकि ग्रंथों से यह सजगता भी मिलती है कि यह एक प्रतियोगी प्रचलन था। 'ब्राह्मण' शब्द का प्रयोग उनके लिए किया जाता था जो बौद्धिक ज्ञान, अनुष्ठानिक जानकारी व काफ़ी हद तक नैतिक उपलब्धि के आधार पर सर्वोच्च पद पाने का दावा करते थे। उन्हें वेदों के ज्ञाता के रूप में जाना गया। वे लगभग और सदा अकुलीन थे, हालांकि जातकों में एक कुलीन का उदाहरण मिलता है जिसे बाद में एक 'ब्राह्मण' के रूप में वर्णित किया गया, खत्तिय और ब्राह्मण सामान्यत: विशिष्ट समूह थे। जहाँ खत्तियों ने स्वयं को युद्ध कला तथा शस्त्रों के साथ केंद्रित रखा और गण-संघों के साथ जाने गए, ब्राह्मण बलिकर्म, अनुष्ठानों व बौद्धिक उपलब्धि पर केंद्रित रहे और वे उदीयमान राज-तंत्रों में परामर्शदाताओं व पुरोहितों के रूप में संबंधित रहे।

अंबेडकर ने, कोलंबिया विश्वविद्यालय में छात्र जीवन के दौरान, एक निबंध लिखा था: 'भारत में जातियाँ: उनकी व्यवस्था, उत्पत्ति व विकास। जिसमें एक सिद्धांत दिया गया, जिसके अनुसार जाति एक 'सीमित वर्ग' का प्रतिनिधित्व करती थी, जो सगोत्र विवाह के आरोपण से सीमित थी, जिसे पहले-पहल स्वयं ब्राह्मणों की ओर से ही आरंभ किया गया (Ambedkar 1979: 15) । ऐसा ही कुछ जान पड़ता है, ब्राह्मणों ने एक वर्ण सामाजिक व्यवस्था को निर्विवाद रूप से स्वीकारा, और स्वयं को एक जाति के रूप में निर्मित करने की सामूहिक परियोजना को हाथ में लिया। कह सकते हैं कि स्वयं को सीमित करने की यह प्रक्रिया पहली सदी के दौरान जारी थी, इसी प्रक्रिया के हिस्से को मैंने ब्राह्मणों का ‘आत्म-निर्माण' अथवा 'आत्म-रचना' कहा है। जन्म के आधार पर श्रेष्ठता का दावा रचते हुए, इसे साकार रूप प्रदान किया गया।

अनेक बौद्ध ग्रंथों में एक प्रक्रिया दिखाई देती है, जो ब्राह्मणों के मध्य एक वाद-विवाद को चित्रित करती है कि वे स्वयं को आनुवांशिक रूप से अंतरंग समूह के रूप में पहचानें अथवा नहीं। सुत्त निपात का वासेट्ठ सुत्त, युवा ब्राह्मणों वासेट्ठ व भारद्वाज के मध्य विचार-विमर्श से आरंभ होता है (दोनों ही प्रतिष्ठित वंशों के नाम हैं); 'भारद्वाज कहते हैं कि दोनों पक्षों की पिछली सात पीढ़ियों से विशुद्ध पूर्वजों के कारण ही कोई ब्राह्मण शुद्ध माना जाता है . . . जबकि वासेट्ठ का कहना था कि गुणों
तथा नैतिक आचार के बल पर ही कोई व्यक्ति ब्राह्मण माना जा सकता है।' हो सकता है कि पालि ग्रंथों के पास भारी संख्या में ब्राह्मणों के धर्म-परिवर्तन की घोषणा के लिए सुनियोजित कारण हों, परंतु यह तथ्य कि कई ब्राह्मणों (तथा अन्य, उपनिषद की कथाओं में राजाओं के पास गए) ने प्रश्नों के उत्तर पाने के लिए बुद्ध की शरण ली, इस बात का सूचक है कि उस समय उनके बीच मुक्त
संवाद तथा विचार विभिन्नता थी। बौद्धों ने विवाद में हस्तक्षेप करते हुए ‘ब्राह्मणों' को अ-वंशानुगत कहा और इस तथ्य पर बल दिया कि कोई केवल जन्म से नहीं अपितु अपने गुणों व नैतिक आचार के कारण ब्राह्मण बन सकता था। हालांकि यह प्रयास असफल रहा व अंतत: इस विवाद में वे सफल रहे जिन्होंने इस स्तर को जन्म सिद्ध अधिकार व अनुवांशिकी से जोड़ा था। इसी प्रक्रिया में, ब्राह्मणों का एक सामाजिक दल ही नहीं बल्कि 'ब्राह्मणवाद' सामने आया।

जन्मसिद्ध अधिकार व ऋषियों के वंशज होने की घोषणा के साथ, ब्राह्मणों ने निश्चित रूप से अपनी ही पारिवारिक पृष्ठभूमि में अस्थिरता व अनियमितता को उपेक्षित किया; ऐसा कुलीन वर्ग द्वारा प्रत्येक स्थान पर किया गया। इसके साथ ही, ब्राह्मणों के चरित्र के अंश के रूप में देखे जाने वाले नैतिक आचार की, ब्राह्मणवादी साहित्य में, बौद्ध धर्म के विपरीत (उलटा), अनुष्ठानिक व नीतिपरक रूप में विवेचना की गई, ताकि इनमें विशेष जातिगत
कर्तव्यों तथा अनुष्ठानों के प्रदर्शन को सम्मिलित किया जा सके। शुद्धता की व्याख्या भी, भौतिकवादी रूप में हुई, ब्राह्मण संसार त्यागी नहीं, गृहस्थ बने रहे, परंतु ऐसा करते हुए, वे धीरे-धीरे भौतिक जगत में हिंसा व मृत्यु जैसे प्रदूषकों से शांत भाव से दूर होते चले गए, और इसका अर्थ था कि सामाजिक व्यवस्था में, अन्य समूहों (क्षत्रिय, शूद्र व स्त्रियाँ) को भौतिक उत्पादन के हिंसा व
मृत्यु से जुड़े पक्षों से निपटने का उत्तरदायित्व ग्रहण करना पड़ा। ड्यूमोंट के शब्दों में, इसका अर्थ था,
वंशानुक्रम तंत्र के लिए महत्त्वपूर्ण और शिखर पर आसीन ब्राह्मण की विशुद्धता का मेल, सबसे निम्न तल पर आसीन अस्पृश्य की अशुद्धता से किया गया (Dumont 1988)। इसके साथ ही, ब्राह्मणों ने वैदिक आर्य मूल पर भी दावा कर दिया, वेदों को अपने पवित्र ग्रंथों का दर्जा देते हुए, पौरोहित्य अनुष्ठानों की निरंतरता
बनाए रखी। सामाजिक समूह के रूप में, अपने लिए सबसे उच्चतम स्तर का दावा करते हुए,.उन्होंने समाज के अन्य विविध वर्गों को, विविध सामाजिक कार्यों के विस्तृत ढाँचे में व्याख्या करना आरंभ कर दिया। इस प्रक्रिया का आरंभ, पुरुषसूक्त में वर्गों की दैवीय रचना की घोषणा से हुआ, जिसे ऋग्वेद का उत्तरकालीन प्रक्षेप माना जाता है:

जब उन्होंने पुरुष को विभाजित किया, उन्होंने
उसे कितने अंशों में विभाजित किया? . . .
उसका मुख ब्राह्मण बना; उसकी भुजाओं को
क्षत्रिय माना गया; उसकी दो जंघाओं से वैश्य;
तथा उसके दो पैरों से शूद्र जन्मे। 
(Rig Veda 10.90. 11-12)

अगले चरण में, मौजूदा व्यक्तियों के जन्म की व्याख्या को, आचार के आधार पर विविध वर्गों में हुआ, जिनमें से
मनुस्मृति विशेष तौर पर उल्लेखनीय है। विभिन्न प्रकार के पेशे अपनाने वाले 'निम्न' माने गए, वर्ण व्यवस्था में अवशोषित जनजातीय समूह, तथा ब्राह्मणवादी सत्ता को न मानने वाले सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को नीच या जाति से बहिष्कृत माना गया क्योंकि वे विभिन्न वर्गों के पुरुष व स्त्रियों से जन्मे थे। प्रतिलोम संबंधों (जहाँ माता का वर्ण पिता के वर्ण से उच्च होता था) से उत्पन्न भी नीच माने गए। इन मिश्रित समूहों में से पहले आठ,(जो जन्मजात गतिविधियों से आजीविका कमाते थे) जिन्हें द्विजों द्वारा तिरस्कृत किया गया; उनमें चिकित्सक के तौर पर काम करने वाले (वैश्य माता, ब्राह्मण पिता) अंबष्ठ; मछलियों का शिकार करने वाले (शूद्र माता, ब्राह्मण पिता) निषाद; उग्र (शूद्र माता, क्षत्रिय पिता) कसत्त (क्षत्रिय माता, शूद्र पिता) शामिल थे, इन दोनों को बिलों में रहने वाले जीवों को पकड़ कर मारने का काम दिया गया था; इसके अतिरिक्त अश्वपालक या सारथी सूत (ब्राह्मण माता, क्षत्रिय पिता); व्यापार करने वाले मगध (क्षत्रिय माता, वैश्य पिता); स्त्रियों के लिए काम करके आजीविका कमाने वाले वैदेह (ब्राह्मण माता, वैश्य पिता); बढ़ईगिरि करने वाले (वैश्य माता, शूद्र पिता) अयोगव और अंत में चांडाल (ब्राह्मण माता, शूद्र पिता) शामिल थे। सबसे आखिर वाले सबसे निम्नतम माने गए और कम से कम एक सहस्राब्दि तक अस्पृश्यों के लिए प्रतिमान बने रहे, उन्हें कोई निश्चित कार्य या पेशा नहीं दिया गया (Manusmriti 10: 8726, 45) । इसके
अतिरिक्त, मनुस्मृति में सत्रह अन्य वर्ण संकर जातियों के बारे में बताया गया है (इनमें उग्र माता व कसत्त पिता से जन्मे सोपक भी शामिल हैं), और साथ ही यह भी कहा गया कि ये निम्न जातियाँ हैं:

इन्हें छोटे टीलों, पेड़ों तथा श्मशान गृहों, पर्वतों
व झुरमुटों में रहते हुए, अपनी जन्मजात
गतिविधियों से आजीविका कमानी चाहिए।
परंतु चांडाल और सोपकों का आवास देहात के
बाहर होना चाहिए; उन्हें तिरस्कृत पात्रों को
प्रयोग में लाना चाहिए, कुत्ते व गधे उनकी
संपदा हों। वे मृत लोगों के वस्त्र पहनें और उन्हें
फूटे पात्रों में भोजन दिया जाए; उनके आभूषण
काले लोहे के बने हों, वे निरंतर यहाँ से वहाँ
घूमते रहें। (पूर्वोक्त: 50)

हालांकि मनुस्मृति के इस विभाग को बहुत बाद में आया हुआ माना जाता है, यह (Sharma 1958: 191) के अनुसार यह पांचवीं सदी का है) इन चांडालों के प्रति ब्राह्मणों के विस्तृत रवैए का सूचक है। एक ही ब्राह्मण या क्षत्रिय जातियों से जन्मे अन्य लोगों को नीचा इसलिए माना गया क्योंकि उनके पिता विभिन्न संकल्प व अनुष्ठानों का पालन नहीं कर रहे थे। इनमें मल्ल तथा
लिच्छवी जैसे गण-संघ समूह, तथा द्रविड़ व करण (जो बाद में लिपिकों व नौकरशाहों की जाति के रूप में महत्त्वपूर्ण हुए) शामिल थे। अनुष्ठान करने में असफल तथा पुरोहितों के संपर्क में न रहने वाले नीच खत्तियों की संतानों में द्रविड़, चोल, पारसी, चीनी, यवन, शक, पुंड्रक, किरात व अन्य शामिल हैं (Manusmriti 10: 32-41) यह सब कुछ सही मायनो में सामाजिक यथार्थ का विवरण नहीं था परंतु एक नव विकसित वर्ग विभाजन के संदर्भ में तार्किक ठहरने का एक प्रयत्न था। यह भी एक
रोचक तथ्य है कि आरंभिक महाकाव्य में चारण (भाट) कहलाने वाले सूत और माग्ध, अब निम्न जाति के रूप में वर्गीकृत हुए। माग्ध को वैदेहिका के साथ, माग्ध व विदेही के आरंभिक राज्यों से जोड़ा जा सकता है और तब तक, स्पष्ट रूप से बढ़े रहे आक्रामक ब्राह्मणवाद में संपूर्ण मौर्य साम्राज्य को ब्राह्मण-विरोधी धर्मों के क्षेत्र मान कर, नीचा माने जाने लगा था। जिन समूहों को निम्न या बहिष्कृत माना गया, उनमें से अधिकतर, सीमावर्ती क्षेत्रों के जनजातीय समुदायों का प्रतिनिधित्व करते थे। उनमें से अनेक महाभारत व रामायण महाकाव्यों में वर्णित हैं; और अलग-अलग समय पर, विभिन्न सूचियों व प्रसंगों के माध्यम से उनके गिरते हुए स्तर का परिचय मिलता है।उदाहरण के लिए, निषादों को पहले स्वतंत्र रूप में, 'आर्य योद्धाओं' के समकक्ष माना जाता था परंतु परवर्ती संदर्भो में उन्हें नीच मान कर अरुचि प्रकट की गई है (Brockington 1997: 101-105) | कुछ सुनिश्चित समूहों के बदलते संदर्भो से न केवल उनके कुछ इतिहास का परिचय मिलता है, बल्कि ब्राह्मणवादी परंपरा में वर्गीकृत संकल्पना के विकास का भी पता चलता है। यह एक ऐसा विकास है जिसमें कृषि का अभ्यास, अधिकतर कलात्मक पेशे तथा चिकित्सा जैसे मूलत: महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक व्यवसाय निम्न होते चले गए। वर्ण व्यवस्था को परिभाषित करने की प्रक्रिया में, ब्राह्मणों ने अपने लिए कड़े प्रशिक्षण व अनुशासन की व्यवस्था की, जिसमें अध्ययन, वेदों का ज्ञान प्राप्त करना, पुरोहितों के कर्म-कांड सीखना, कई प्रकार के भोजन से संयम तथा विस्तृत अनुष्ठानिक व्यवहार शामिल था ताकि उनकी निजी शुचिता (शुुुुध्दी) बनी रहे। इसके लिए संसारी जीवन के सभी भौतिक तथा निम्न माने जाने वाले पक्षों से संपर्क को उपेक्षित करना अनिवार्य था। मादक पेय पदार्थ सोम तथा गोमांस के वैदिक प्रेम के विपरीत, शाकाहारवाद इसके महत्त्वपूर्ण अंग के रूप में सामने आया। 'शुचिता-अशुद्धि' (सोवला-ओवला) के प्रति ब्राह्मणों की यह चिंता, उनकी पहचान का एक महत्त्वपूर्ण अंग बन कर उभरी; परिश्रम तथा समाज के अन्य वर्गों की सेवा इसका आधार थी, परंतु इसने एक अनूठी रहस्यात्मकता को रचने में सहयोग दिया।

ब्राह्मणवाद का दर्शन व धर्म :
पहली सदी ई.पू. के मध्य तक आते-आते, प्राचीन वैदिक धर्म के रूपांतरण की आवश्यकता स्पष्ट हो गई। जहाँ चारागाही समाज के लिए बलिकर्म उपयुक्त था, वहीं यह अतिरिक्त संसाधनों के उत्पादक प्रयोग के लिए बेपरवाह था और निरंतर गतिशील बना रहता, यह कृषि व शहरी समाज के लिए अनुपयुक्त था, जिसे उत्पादक उद्देश्यों
(निर्माण व व्यापार) व व्यक्तिगत आनंद के लिए अपने अतिरिक्त संसाधनों की आवश्यकता थी। इसके साथ ही, बौद्ध, जैन तथा अन्य द्वारा, पशुओं की बलि के लिए निरंतर की जाने वाली निंदा का भी प्रभाव हो रहा था। 'ब्राह्मणवाद' का प्रत्युत्तर, वैदिक बलिकर्म की श्रेष्ठता को नकारना नहीं परंतु इसकी नए सिरे से व्याख्या करना था। दिन-प्रतिदिन, बलिकर्म, जीवन के पूरे चक्र को अनुष्ठानिक बनाने लगा और इसके माध्यम से ही किसी व्यक्ति के जीवन के इतिहास की सभी प्रमुख घटनाओं को देखा गया। वैदिक धर्म से उपजा, 'ब्राह्मणवाद' अपने ग्रंथों की सत्ता का दावा कर रहा था परंतु उसने मूलत: विभिन्न रूपों में उनका प्रयोग करते हुए, संसार को रिवाज़ व संस्कार सौंपे।

यह सब बहुत अधिक दार्शनिक व रहस्यवादी परिकल्पनाओं के साथ किया गया। हालांकि, समन परंपरा के विपरीत, इसे संभ्रांत व साधारणजन के बीच, क्षेत्रों व वनों में, नगर के चौराहों व सभा कक्षों में खुलेआम विवाद के विषय के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया। इसकी बजाए,  जैसा कि उपनिषद दिखाते हैं गुप्त शिक्षा की परंपरा, संरक्षण व सेवा के सामाजिक संबंध की सुदृढ स्थापना के साथ, गुरु के माध्यम से शिष्य तक पहुँचाई गई। प्राय: उपनिषदों के अंत में ऐसा विभाग दिया जाता है जिससे पता चलता है कि वह ज्ञान किन वंशों से होते हुए वहाँ तक पहुँचा - यह बाइबिल के 'उत्पत्ति के समानांतर है!

उपनिषदों की परिकल्पना 700 ई.पू. से ईसवी की आरंभिक सदियों तक विस्तृत है। (Roebuck, introduction to Upanishads 2000: 12-16), जो काफ़ी हद तक, कर्म व पुनर्जन्म की संरचना में, पुनर्जन्म के सभी चक्रों में व्यक्तिगत आत्मन् की परिकल्पना के आसपास घूमती है। इसमें एक अनुभवसिद्ध, वस्तुपरक आत्म का सार्वभौमिक, आदिकालीन सत्ता में रूपांतरण शामिल है, जो अमूर्त व अनंत था। इसका एक आरंभिक व विख्यात उदाहरण, ऋषि याज्ञवल्क्य द्वारा अपनी पत्नी मैत्रेयी को दी गई शिक्षा में देखा जा सकता है, जिसे बृहदारण्यक उपनिषद में वर्णित किया गया है। (4.5.6)

पति के प्रति प्रेम के कारण ही पति प्रिय नहीं
जान पड़ता: आत्मा के प्रति प्रेम के कारण पति
प्रिय लगता है। पत्नी के प्रति प्रेम के कारण
पत्नी प्रिय नहीं जान पड़ती: आत्मा के प्रति
प्रेम के कारण पत्नी प्रिय है। संतान के प्रति प्रेम
के कारण संतान प्रिय नहीं है: आत्मा के प्रति
प्रेम के कारण संतान प्रिय है। ... वेदों के प्रति
स्नेह के कारण वेद प्रिय नहीं हैं . यह आत्मा
है जिसे देखा, सुना व सोचा तथा ध्यान किया
जाना चाहिए, मैत्रेयी; जब आत्मा को देखा,
सुना व सोचा तथा ध्यान किया जाता है, तो यह
सब ज्ञात होता है।

आत्मन् या आत्मा को निराकार, नित्य व सभी जीवों में एक सी माना गया; यह ब्राह्मण के समान थी। ‘सोल' शब्द से इसका अधूरा अनुवाद सामने आता है। उप्रेती ने बौद्ध धर्म का विश्लेषण करते हुए कहा कि इसने नए वाणिज्यिक युग के उपयुक्त व्यक्तिवाद के सृजन में सहायता प्रदान की, परंतु वे उपनिषद की शिक्षाओं को ऐसे व्यक्तिवाद के विकास की दिशा में एक प्रमुख व उल्लेखनीय कदम के रूप में देखते हैं (Upreti 1997: 89- 98) । यदि ऐसा था, तो यह एक अमूर्त व्यक्तिवाद था। ऐसा व्यक्तिवाद जिसमें सच्चे अर्थों में एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के बीच कोई नैतिक अथवा आचार से जुड़ा
संबंध नहीं रहता। याज्ञवल्क्य की शिक्षा के अनुसार, दूसरे व्यक्ति को अनुभवजन्य व्यक्ति के रूप में प्रेम करने के लिए कोई दार्शनिक औचित्य नहीं दिया जा सकता।चेतना के विषय, व्यक्तिगत 'मैं अथवा अहं' को सार्वभौमिक इष्ट, 'तत् त्वम असि', माना जाता था या कहते थे कि आत्मा ही ब्राह्मण है। इस संसार की लीला, इसकी ऋतुएँ व परिवर्तन, इसके दु:ख व आनंद अंतत: एक खेल थे, एक नाटक, उस अनंत आत्मा की एक माया। कर्म व पुनर्जन्म की अवधारणा को इसके एक अंश के रूप में स्वीकारा गया; वास्तव में उन्हें वर्ण तंत्र के लिए प्रमुख कारण के रूप में प्रयुक्त किया गया। हालांकि वेदों के लिए गुप्त रूप में निंदा थी परंतु उन्हें प्रत्यक्ष तौर पर कभी नहीं नकारा गया। ठीक इसी प्रकार, उपनिषद दर्शाते थे कि वास्तव में अनेक गैर-ब्राह्मण गैर-ब्राह्मणों ने इसके दार्शनिक विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, परंतु इसे कभी खुलेआम स्वीकार कर, ब्राह्मणों की श्रेष्ठता को चुनौती नहीं दी गई। अंत में, कई बार कहा जाता था कि पहली सदी ई.पू. में उपनिषद की शिक्षाएँ
हाशिए पर थीं। आगे चल कर शंकराचार्य जैसे चिंतकों ने उनके आधारभूत विषयों का विस्तार किया और उन्हें 'वेदांत' का नाम दिया गया ताकि वेदों के साथ उनकी निरंतरता पर बल दिया जा सके।

इस अनंत ब्राह्मण, जिसे व्यक्तिगत 'मैं' भी कहा जाता था, इसे किसी भी वैदिक देव अथवा लोकप्रिय स्थानीय संप्रदाय के देवताओं के साथ पहचाना जा सकता था। ब्राह्मणों द्वारा, मौजूदा संप्रदायों को उपयुक्त बनाने की योग्यता ही उनकी संभावित ऐतिहासिक सफलता के प्रमुख कारकों में से एक रही। शैववाद तथा वैष्णववाद नामक दो प्रमुख संप्रदाय सम्मुख आए जो कि शिव/शक्ति अथवा ‘पशुपति' व कृष्ण का भागवत संप्रदाय थे,
और इन्हें एक प्रकार के वैदिक ढाँचे में उपयुक्त बिठाया गया। वे वास्तव में परस्पर इतने अलग थे कि दो सदी बाद भी, वे दो विभिन्न धार्मिक परंपराओ की पहचान बने रहे।

देवों की ब्राह्मण संबंधी विकसित 'त्रिमूर्ति' में दूसरे, 'विष्णु' के संबंध में मान्यता थी कि उनके अनेक अवतार हुए और उनमें से कृष्ण का अवतार सबसे मनमोहक था। कृष्ण के आसपास अनेक प्रसंग गुंथे हैं, यादवों के शासक तथा महाकाव्य महाभारत के चचेरे भाईयों पांडवों के साथी (वास्तव में, समाज में बहुत सारी कथाएँ कही जाती थीं, उनमें से अनेक को जातक कथाओं में
दिखाया गया, जिन्होंने राम व महाभारत की आरंभिक संस्करणों को भी जन्म दिया।) सर्वाधिक विख्यात ब्राह्मणवादी धार्मिक ग्रंथ में अर्जुन के इस सारथी का संबंध सर्वोच्च देवता से जोड़ा गया, भगवद् गीता, को महाभारत में ही शामिल किया गया।

भगवद् गीता, केवल संभ्रांत वर्ग के लिए नहीं बल्कि जनसाधारण के लिए रची गई, यह नए वर्णाश्रम धर्म समाज का सर्वव्यापी ब्रह्माण्ड संबंधी-दार्शनिक प्रामाणिकता थी। गीता में, कुरुक्षेत्र के मैदान में, युद्ध आरंभ होने से पूर्व, पांडवों के नायक अर्जुन की दुविधा का चित्रण है: उसे अपने ही सगे-संबंधियों के संहार का माध्यम क्यों बनना चाहिए? उसे प्रत्युत्तर देते हुए, कृष्ण न केवल अपनी दिव्यता का दावा प्रकट करते हैं तथा इस नर-संहार को अवास्तविक बताते हुए, जाति के आदर्श स्थापित करते हैं व स्वधर्म की घोषणा करते हैं। इसके अनुसार, अपनी जाति के अनुसार कर्तव्य का निर्वाह करना ही, व्यक्ति का सर्वोच्च उत्तरदायित्व है। गीता के आरंभ व अंत में यही प्रतिबिंबित होता है, 'किसी दूसरे के काम को श्रेष्ठ रूप में करने से उचित है कि व्यक्ति अपने ही कर्तव्य का बुरा प्रदर्शन करे।' आत्म-नियंत्रण, अनासक्त कर्म, मोह से मुक्ति आदि की घोषणा, वर्ण के ढाँचे के भीतर की गई:

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यों व शूद्रों तथा शत्रुओं पर
प्रहार करने वालों के लिए कर्मों में अंतर है।
अपनी सहज वृत्ति से उत्पन्न तंतुओं के
अनुसार, प्रशांति, आत्म-नियंत्रण, तपश्चर्या,
शुद्धता, धैर्य व सत्यनिष्ठा, सैद्धांतिक व
व्यावहारिक ज्ञान व धार्मिक आस्था, ब्राह्मणों
के सहज प्राकृतिक कर्म हैं।

नायकत्व, प्रताप, दृढता, कौशल तथा रण से
पीठ न दिखाना, क्षत्रियों के सहज प्राकृतिक
कर्म हैं।

कृषि, पशु-पालन तथा वाणिज्य वैश्यों के सहज प्राकृतिक कर्म हैं; ऐसे कर्म, जिनमें सेवा शामिल है, वह शूद्रों के सहज प्राकृतिक कर्म हैं। (Edgerton 1944: 87) द्वारा अनूदित यहाँ हम देख सकते हैं कि किस प्रकार सर्वव्यापी ब्रह्म के 'सार' को मानवता तथा वर्ण-जाति के विशिष्टीकरण को अंशों में बाँट दिया गया। उदाहरण के लिए, अपनी जाति के अनुसार किया गया प्रदर्शन, योद्धा के मामले में लड़ने के कर्तव्य का निर्वाह, वैदिक बलिदान, सच्चे यज्ञ के प्रदर्शन का प्रतिनिधित्व करता है। इस प्रकार क्षत्रियों की नर-संहार भूमि, वास्तव में धार्मिक कर्तव्य का क्षेत्र अर्थात 'धर्मक्षेत्र' है।

गीता के साथ, यह स्पष्ट हो गया कि जब तक आत्मा उस सर्वव्यापी तत्त्व के साथ विलीन नहीं होती, तब तक आत्मा का सार यही प्राप्त करना है कि वह ब्रह्माण्ड का स्थिर-चक्रीय दृष्टिकोण तथा इसमें मानवता का स्थान बनाए रखे। जीवन, सामाजिक चक्र, युद्ध, संभोग, धनार्जन आदि सभी पवित्र कर्तव्य के अंश हैं और सामाजिक उत्तरदायित्व से परे, कोई व्यक्तिगत मोक्ष नहीं है।

सार्वभौमिक व्यक्तिगत अधिकारों व कर्तव्यों के विचारों के साथ उस उत्तरदायित्व में संशोधन की भी आवश्यकता नहीं है (भले ही कोई राजा हो या योद्धा, जमींदार हो या कृषक अथवा कोई दास)। लोगों से आग्रह किया जाता था कि वे अपने वचन का पालन करें, जिस में चारों वर्गों का संसार तथा उनके अनुष्ठानों का जीवन भी सम्मिलित था। गीता में कृष्ण का सबसे प्रमुख वचन यही है कि वे अधर्म का नाश करने के लिए बार-बार अवतार लेते रहेंगे, और ब्राह्मणवादी सांसारिक दृष्टिकोण में, न केवल बढ़ते हुए अपराध व हिंसा, बल्कि पत्नियों द्वारा पतियों के त्याग व वर्गों के आपसी मिश्रण को भी शामिल किया गया है। एक नए वर्गीय समाज के
उभरने के साथ ही, ब्राह्मणवाद ने सामाजिक व्यवस्था के लिए यह प्राथमिक समाधान प्रस्तुत किया। जाति पर आधारित इस समाधान में, व्यक्तियों के कर्म, मनोवांछित रूप से अवसरवादी हो सकते थे, परंतु उनके लिए वर्ण व्यवस्था के ढाँचे में रहना अनिवार्य था।

शिव का संप्रदाय भी ब्राह्मणवादी हुआ। शिव का संबंध वैदिक देव रुद्र से जोड़ा गया, और उन्हें त्रिमूर्ति में विनाशक या संहारक देव के रूप में जाना गया। यह भी प्राचीन संप्रदाय था और प्रायः इसे मातृ-देवी, शिव-शक्ति संप्रदाय के साथ जोड़ा जाता था। बौद्ध धर्म के एक विद्वान रिचर्ड गोंब्रिच का तर्क है कि आंगुलिमाल, दुष्ट दस्यु व हत्यारा, जिसे बुद्ध ने दीक्षा प्रदान की, उसकी प्रसिद्ध कथा इसी परंपरा की ओर संकेत करती है। अन्य सूचकों के अतिरिक्त, वह दस्यु अपने गले में उन सभी लोगों की कटी अंगुलियों की माला धारण करता था, जिन्हें वह जान से मार देता था। गोंब्रिच का तर्क है कि यह माला, संहारक शिव के कंठ में पड़ी मुंडमाल के समान थी (Gombrich 1997:133-63) यह सत्य हो अथवा न हो, यह तो सुनिश्चित है कि वह संप्रदाय बुद्ध तथा अन्य के समय में भी उपस्थित था और इसे ब्राह्मणवादी परंपरा द्वारा अवशोषित किया गया।

बैरागियों के रूप में, शिव के अनुयायी, स्वयं को बौद्ध, जैन तथा अन्य जटाधारियों से अलग मानते थे और उन्हें
जटिल (जटाधारी) कहा जाता था। दो प्रकार के साधुओं का एक साथ वर्णन मिलता है, वे थे मुंडकजटिल (मुंडित और जटाधारी)। ब्राह्मणवाद संप्रदायों ने तपश्चर्या पर बल दिया जिसके माध्यम से जादुई शक्तियों को अर्जित कर सकते थे और कहते हैं कि स्वयं शिव भी महायोगी व शक्तिशाली थे। शक्ति की अवधारणा को, ऊर्जा व सृजन के रूप में देखा जाता था और उसका संबंध देवी की
उपासना से जोड़ा गया (Bhattacharya 1996)

हालांकि ब्राह्मणवाद ने त्याग व संन्यास को स्वीकारा परंतु इसने अनिच्छा से ही ऐसा किया। ब्राह्मवाद में गृहस्थ जीवन को प्रश्रय (आधार) दिया जाता था; पुरोहित का गृहस्थी होना आवश्यक था; समाज की अंतिम अवस्था में ही संन्यास को स्वीकार किया जाता था। इससे पूर्व, संभ्रांत अथवा कुलीनवर्ग के लिए, ब्रह्मचर्य का पालन करना अनिवार्य था - एक युवक को समाज का उचित ज्ञान प्रदान किया जाता, इसके बाद गृहस्थ जीवन और फिर वानप्रस्थ की बारी आती। परिणामवश, पूर्ण रूप से कट्टर ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था सामने आई - वर्णाश्रम धर्म, अर्थात चार वर्णों का धर्म व जीवन की चार अवस्थाओं का पथ। गृहस्थ के रूप में कर्तव्य का निर्वाह किए बिना, संन्यास धारण करने को पूरी तरह से निरुत्साहित किया जाता था।

By Gail Omvedt 

सौन्दरनन्द, अभिमान की निन्दा

अश्वघोष कृत 'सौन्दरनन्द' (महाकाव्य)
नवम सर्ग, अभिमान की निन्दा:

अथैवमुक्तोऽपि स तेन भिक्षुणा जगाम नैवोपशमं प्रियां प्रति । तथा हि तामेव तदा स चिन्तयश्न तस्य शुश्राव विसंज्ञवद्धचः ॥१॥

उस भिक्षु के द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर भी अपनी प्रिया के विषय में उसे (नन्द को) शांन्ति नहीं मिली । उस समय वह अपनी प्रिया की ही चिन्ता करता रहा और बेहोश व्यक्ति के समान उसका वचन नहीं सुना ।।१॥ 

यथा हि वैद्यस्य चिकीर्षत: शिवं वचो न गृह्धाति मुमूषुरातुरः । तथैव मत्तो बलरूपयौवनैहितं न जग्राह स तस्य तद्वचः ॥२॥

जिस प्रकार मरणासन्न रोगी हितैषी वैद्य की बात नहीं सुनता है, उसी प्रकार बल रूप और यौवन से मत्त होने के कारण उसने उसके उस हितकारी वचन को ग्रहण नहीं किया ॥२॥

न चात्र चित्रं यदि रागपाप्मना मनोऽभिभूयेत तमोवृतात्मनः । नरस्य पाप्मा हि तदा निवर्तते यदा भवत्यन्तगतं तमस्तनु ॥३॥

इसमें कुछ आश्चर्य नहीं कि तमोवृत (अज्ञानी) का मन रागरूपी दोष से अभिभूत होता है। मनुष्य का यह दोष उस समय निवृत्त होता हैं जब कि उसका तम (अज्ञान) क्षीण हो जाता है ॥३॥

ततस्तथाक्षिप्तमवेक्ष्य तं तदा बलेन रूपेण च यौवनेन च । गृहप्रयाणं प्रति च व्यवस्थितं शशास नन्दं श्रमणः स शान्तये ॥४॥

तब उस समय उसको बल रूप और यौवन से मत्त तथा घर जाने के लिए स्थिर (कृतनिश्रय) देखकर उस भिक्षु ने उसकी शान्ति के लिए कहाः-।।४।।

बलं च रूपं च नवं च यौवनं तथावगच्छामि यथावगच्छसि । अहं त्विदं ते त्रयमव्यवस्थितं यथावबुद्धो न तथावबुध्यसे ॥५॥

"बल रूप और नवयौवन को जिस प्रकार तुम समझ रहे हो वह मैं समझता हूं; किंतु मैं तुम्हारे इन तीनों को जिस प्रकार अस्थिर समझ रहा हूँ वह तुम नहीं समझते हो ।।५॥

इदं हि रोगायतनं जरावशं नदीतटानोकहवचलाचलें । न वेत्सि देहं जलफेनदुबलं बलस्थतामात्मनि येन मन्यसे ।।६॥

यह शरीर रोगों का घर, जरा के वशीभूत, नदी-तीर-वर्ती वृक्ष के समान चलाचल और जल के फेन के समान दुर्बल है, यह तुम नहीं जानते हो और इसीलिए अपने बल को स्थायी समझ रहे हो ॥६॥

यदान्नपानासनयानकर्मणामसेवनादप्यतिसेवनादप ।शरीरमासन्नत्ति हृश्यते बलेऽभिमानस्तव केन हेतुना ॥७॥

जब कि खाना, पीना, बैठना, चलना इन कर्मों का सेवन नहीं करने से या अतिसेवन करने से शरीर का विपत्ति-ग्रस्त होना देखा जाता है, तब क्यों तुम बल का अभिमान करते हो ? ॥७॥

हिमातपव्याधिजराक्षुदादिभिर्यदाष्यनथैरुपमीयते जगत् ।जलं शुचौ मास इवार्करश्मिभि: क्षयं त्रजन् कि बलद्दप्त मन्यसे ॥८॥

जब सर्दी गर्मी रोग बुढ़ापा भूख आदि अनर्थों से यह जगत् पीढ़ित हो रहा है, तब जेठ मास में सूर्य की किरणों से जल के समान क्षीण होते हुए, हे बलाभिमानी, क्या सोच रहे हो ? ।।८॥

त्वगस्थिमांसक्षतजात्मकं यदा शरीरमाहारवशेन तिष्ठति ।अजस्रमार्तं सततप्रतिक्रियं बलान्वितोऽस्मीति कथं विहन्यसे ॥९॥

जब त्वचा हड्डी मांस और रक्त का बना हुआ शरीर आहार के वशीभूत, निरन्तर पीड़ित और सदा (भूख रोग आदि के) प्रतिकार में लगा हुआ है, तब 'मैं बलवान हूँ' ऐसी कल्पना क्यों कर रहे हो ? ॥९॥

यथा घटं मृन्मयमाममाश्रितो नरस्तितीर्षेत्क्षभितं महार्णवं । समुच्छ्रयं तद्वदसारमुद्द्न्बलं व्यवस्येद्विषयार्थमुद्यतः ॥ १०॥

जब मिट्टी के कच्चे घड़े का सहारा लेकर मनुष्य क्षुब्ध महासागर को पार करना चाहे, तब उसी प्रकार असार शरीर (धातुओं के समवाय) को धारण करता हुआ, विषय-भोग के लिए उद्यत मनुष्य अ्पने को बलवान् (समर्थ) समझे ॥१०॥

शरीरमामादपि सृन्मयाद्घटा-दिदं तु नि:सारतमं मतं मम । चिरं हि तिष्ठेद्विधिवद्धृतो घट:समुच्छ्रयोऽयं सुधृतोऽप भिद्यते ॥११॥

यह शरीर मिट्टी के कच्चे घड़े से भी असार है, ऐसा मैं समझता हूँ; क्योंकि विधिपुर्वक रखा जाने पर घड़ा चिर काल तक रहता है किन्तु यह शरीर अच्छी तरह रखा जाने पर भी नष्ट हो जाता है ॥११॥

यदाम्बुभूवाय्वनलाश्च धातवः सदा विरुद्धा विषमा इवोरगाः । भवन्त्यनर्थाय शरीरमाश्रिता: कथं बलं रोगविधो व्यवस्यसि ॥१२॥

जब पृथ्वी, जल, अनल, अनिल ये धातु शरीर में आश्रय पाकर विषम सर्पो के समान सदा एक-दूसरे के विरोधी होते हैं और अनर्थ उत्पन्न करते हैं तब व्याधिधर्मा होने पर क्यों अपने को बलवान् समझ रहे हो ? ॥१२॥

प्रयान्ति मन्त्रैः प्रशमं भुरजंगमा न मन्त्रसाध्यास्तु भवन्ति धातवः । कचिश्च कंचिच्च दशन्ति पन्नगा: सदा च सर्व च तुदन्ति धातव ॥१३॥

मंत्रों से सर्प' शान्त हो जाते हैं, किंतु मंत्रों से (शरीर के) धातुओं को वश में नहीं कर सकते । कहीं कहीं और किसी किसी को ही सर्प"डंसते हैं, किंतु ये धातु सदा सब को पीड़ित करते रहते हैं ।।१३॥

इदं हि शय्यासनपानभोजनैर्गुणे: शरीर चिरमप्यवेक्षितं । न मर्षेयत्येक्रमपि व्यतिक्रमं यतो महाशीविषवत्प्रकुप्यति ॥१४॥

सोना, बैठना, खाना, पीना इन कार्यों से चिरकाल तक पोषित होने पर भी यह शरीर एक भी व्यतिक्रम (गड़बड़ी) को नहीं सहता हैं जिसके होने पर (पाँव से रौंदे गये) विषधर सर्प के समान यह कुपित हो जाता हैं ॥१४॥

यदा हिमार्तो ज्वलनं निषेवते हिमं निदाघाभिहतोऽभिकाङ्क्षति । क्षुधान्वितोऽन्नं सलिलं तृषान्तवितोबल कुत: किं च कथं च कस्य च ॥१५॥

जब कि हिम से पीड़ित व्यक्ति अग्नि का सेवन करता है, गर्मी से पीड़ित व्यक्ति हिम (शीतलता) की आकांक्षा करता है, भूखा भोजन चाहता है और प्यासा पानी, तब बल कहाँ है, क्या है, कैस है और किसका है ? ॥१५॥

तदेवमाज्ञाय शरीरमातुरं बलान्वितोऽस्मोति न मन्तुमर्हसि । असारमस्वन्तमनिश्चितं जगज्जगत्यनित्ये बलमव्यवस्थितं ॥१६॥

इसलिए शरीर को पीड़ित जानकर "मैं बलवान् हूँ" ऐसा तुम्हें नहीं समझना चाहिए। जगत् असार, अनिश्चित और बुरा परिणाम-वाला है; अनित्य जगत् में बल अस्थिर है ॥१६॥

क्व कार्तवीर्यस्य बलाभिमानिनः सहस्रबाहोर्बलमर्जुनस्य तत् । चकर्त बाहून्युधि यस्य भार्गवो महान्ति शृङ्गाण्यशनिर्गिरेरिव ॥१७॥

बल का अभिमान करने वाले सहस्र भुजाओं वाले कार्तवीर्य अर्जुन का वह बल कहां है ? परशुराम ने युद्ध में उसकी बाहुओं को वैस ही काट डाला, जैसे कि वज्र पर्वत की बड़ी बढ़ी चोटियों को काटता हैं ॥१७॥

क्व तद्वलं कंसविकर्षिणो हरेस्तुरङ्गराजस्य पुटावभेदिनः ।यमेकबाणेन निजघ्निवान् जराः क्रमागता रूपमिवोत्तमं जरा ॥ १८॥

कंस की हत्या करनेवाले तथा अश्व-राज (केशी) के मुख को विदीर्ण करनेवाले कृष्ण का वह बल कहाँ है ? जरा (नामक व्याध) ने एक ही बाण से उसे मार डाला, जैसे क्रम से आई हुई वृद्धावस्था उत्तमरूप की हत्या करती है ॥१८॥

दितेः सुतस्यामररोषकारिणश्चमूरुचेर्वा नमुचे: क तद्बलं ।यमाहवे क्रुद्धामवान्तकं स्थितं जघान फेनावयवेन वासवः ॥१९॥

देवों को क्रुद्ध करनेवाले युद्ध-प्रिय नमुचि दैत्य का वह बल कहाँ है ? युद्ध में वह क्रुध्द यम के समान खड़ा था और इन्द्र ने (पानी के) फेन से उसे मार डाला ॥१९॥

बलं कुरूणां क च तत्तदाभवद्युधि ज्वलित्वा तरसौजसा च ये। समित्समिद्धा ज्वलना इवाध्वरेहतासवो भस्मनि पर्यवस्थिताः ॥२०॥

कौरवों का वह बल उस समय कहाँ चला गया जब कि वे युद्ध में पराक्रम एवं वीरतापूर्वक प्रज्वलित होकर, यज्ञ में लकड़ियों से प्रज्वलित अग्नि के समान, निष्प्राण होकर भस्मसात् हो गये ? ॥ २०॥

अतो विदित्वा बलीर्यमानिनां बलान्वितानामवमदितं बलं । जगज्जरामृत्युवशं विचारयन्बलेऽभिमानं न विधातुमर्हसि ॥२१॥

अतः बल एवं वीर्य का अभिमान करनेवाले बलवानों के बल को चूर्ण हुआ जानकर और जगत् को जरा एवं मृत्यु के वशीभूत समझ कर तुम्हें बल का अभिमान नहीं करना चाहिए ॥२१॥

बलं महद्वा यदि वा न मन्यसे कुरुष्व युद्धं सह तावदिन्द्रियैः । जयश्च ते ऽत्रास्ति महच्च ते बलं पराजयश्चेद्वितथं च ते बलं ॥२२॥

यदि तुम अपने बल को महान् समझते हो या अन्यथा, तो (इसकी परीक्षा के लिए) अपने इन्द्रियों से युद्ध करो, यदि इसमें तुम्हारी जीत होती है तो तुम्हारा बल महान् है, यदि पराजय होता है तो तुम्हारा बल व्यर्थ है ॥२२॥

तथा हि वीराः पुरुषा न ते मताजयन्ति ये साश्वरथद्विपानरीयथा मता वीरतरा मनोषिणोजयन्ति लोलानि षडिन्द्रियाणि ये ॥२३॥

क्योंकि वे पुरुष, जो घोड़ों, रथों और हाथियों से युक्त शत्रुओं पर विजय प्राप्त करते हैं, उतने वीर नहीं समझे जाते हैं जितने वीर कि वे मनीषी समझे जाते हैं, जो अपने छ: चंचल इन्द्रियों को जीत लेते हैं ॥२३॥

अहं वपुष्मानिति यन्च मन्यसे विचक्षणं नैतदिद्दं च गृह्यतां । क्व तद्वपुः सा च वपुष्मती तनुर्गदस्य शाम्बस्य च सारणस्य च ।।२४।।

"मैं रूपवान् हूँ" तुम्हारी यह समझ ठीक नाहीं है, यह तुम मानलो । गद, शाम्ब और सारण का वह रूप और रूपवान् शरीर कहाँ है ? ॥२४॥

यथा मयूरश्चनचित्रचन्द्रको बिर्भति रूपं गुणवत्स्वभावतः । शरीरसंस्कारगुणाद्दते तथा बिभर्षि रूपं यदि रूपवानसि ।।२५॥

जिस प्रकार चञ्चल चित्र-विचित्र चन्द्रक (नेत्राकार चिह्न) वाला मयूर स्वभाव से ही उस्कृष्ट रूप धारण करता है, उसी प्रकार शरीर का संस्कार किये बिना ही यदि तुम (उत्कृष्ट, स्वाभाविक) रूप धारण करते हो तो तुम रूपवान् हो ॥२५॥

यदि प्रतीपं वृणुयान्न वाससा न शौचकाले यदि संस्पृशेदप: । मृजाविशेषं यदि नाददीत वा वपुर्वपुष्मन्वद कीद्दशं भवेत् ॥२६॥

यदि प्रतिकूल (वीभत्स स्थान) को वस्त्र से न ढके, यदि शौचकाल में जल का स्पर्श न करे, या यदि सफाई-सजावट न करे तो हे रूपवान्, कहो, वह रूप कैसा हो जायेगा ? ॥२६।।

नवं वयश्चात्मगतं निशाम्य यद्गृहोन्मुखं ते विषयाप्तये मनः । नियच्छ तच्छैलनदीरयोपमं द्रुतं हि गच्छत्यनिवर्ति यौवनं ॥२७॥

अपनी नई वयस को देखकर तुम्हारा मन विषय-भोगों की प्राप्ति के लिए घर की ओर लगा हुआ है, सो पहाड़ी नदी के समान वेगवान् उस मन को रोको; क्योंकि कभी नहीं लौटने वाला यौवन तेजी से जा रहा हैं ॥२७॥॥

ऋतुव्यंतीत: परिवर्तते पुनः क्षयं प्रयात: पुनरेति चन्द्रमाः ।गतं गतं नैव तु संनिवर्तते जलं नदीनां च नृणां च यौवनं ॥२८॥

बीता हुआ ऋतु पलटता है, क्षय को प्राप्त हुआ चन्द्रमा फिर आता हैं, किंतु नदियों का जल और मनुष्यों का यौवन जाकर चला ही जाता हैं, लौटता नहीं हैं ॥२८॥

विवर्णितश्मश्चु वलीविकुङ्चितं विशीर्णदन्तं शिथिलभ्रु, निष्प्र्भं । यदा मुखं द्रक्षसि जर्जरं तदा जराभिभूतो विमदो भविष्यसि ॥२९॥

जब तुम देखोगे कि तुम्हारे मुख की मूछ-दाढ़ी विवर्ण (सफेद) हो गई हैं, मुख पर झुरियाँ पड़ गई हैं, दाँत टूट गए हैं, भौहें शिथिल हो गई हैं, मुख निष्प्रभ और जर्जर हो गया है, तब जरा से अभिभूत होकर तुम मद-रहित हो जाओगे ।।२९॥

निषेव्य पानं मदनीयमुत्तमं निशाविवासेषु चिराद्विमाद्यति । नरस्तु मत्तो बलरूपयौवनैने कश्चिदप्राप्य जरां दिमाद्यति ॥३०॥

आदमी उत्तम मादक पान-द्रव्य का सेवन करके रात्रि के बीतने पर बहुत देर के बाद मद से मुक्त हो जाता है; किंतु बल रूप और यौवन से मत्त कोई भी मनुष्य बुढ़ापे को प्राप्त हुए बिना मद से मुक्त नहीं होता हैं ॥३०॥

यथेक्षुरत्यन्तरसप्रपीडितो भुवि प्रविद्धो दहनाय शुष्यते ।तथा जरान्त्रनिपीडिता तनुर्निपीतसारा मरणाय तिष्ठति ॥३१।।

जिस प्रकार सब रस निचोड़ लिये जाने पर ऊँख पृथ्वी पर फेंक दिया जाता है और जलावन के लिये सूखता रहता है उसी प्रकार जरा-रूपी यन्त्र में दुबकर शरीर सार-रहित हो जाता है और मृत्यु की प्रतीक्षा में रहता है ॥३१॥

यथा हि नृभ्यां करपत्रमोरितं समुच्छितं दारु भिनत्त्यनेकधा । तथोच्छितां पातयति प्रजामिमामहर्निशाभ्यामुपसंहिता जरा ॥३२॥

जिस प्रकार दो मनुष्यों द्वारा संचालित आरा (करवत) ऊँचे वृक्ष को अनेक खण्डों में काट देता है, उसी प्रकार दिवस और रात्रि के द्वारा समीप लाया गया बुढ़ापा इस उन्नत (अभिमानी, मत्त) जगत् का पतन उपस्थित करता है ॥३२॥

स्मृतेः प्रभोषो वपुषः पराभवोरते: क्षयो वाच्छु तिचक्षुषां ग्रह: । श्रमस्य योनिर्बलवीर्ययोर्वधोजरासमो नास्ति शरीरिणां रिपु: ॥३३॥

यह (बुढ़ापा) स्मरण-शक्ति का हरण करनेवाला, रूप का तिरस्कार करनेवाला, आनन्द का विनाशक, आंख, कान और वाणी का ग्रहण पैदा करनेवाला, थकावट उत्पन्न करनेवाला तथा बल एवं वीर्य की हत्या करनेवाला है; शरीर-धारियों के लिए बुढ़ापे के समान कोई दूसरा शत्रु नहीं हैं ॥३३॥

इदं विदित्वा निधनस्य दैशिकं जराभिधानं जगतो महद्भयं । अहं वपुष्मान्वलवान्युवेति वा न मानमारोढुमनार्यमर्हसि ॥३४॥

जरा नामक संसार के इस महाभय को मृत्यु (-मार्ग) का उपदेशक (निर्देशक) जानकर मैं रूपवान् , बलवान् वा युवा हूँ, इस अनार्य अभिमान के वश में तुम्हें न होना चाहिए ॥३४॥

अहं ममेत्येव च रक्तचेतसां शरीरसंज्ञा तव यः कलौ प्रहः । तमुत्सृजैवं यदि शाम्यता भवेद्भयं ह्यहं चेति ममेति चार्छति ॥३५॥

अपने आसक्त चित्त के कारण शरीर को "मैं" और 'मेरा' ही समझना, यह जो तुम्हारा दूषित विचार है, इसको छोड़ो, ऐसा करने पर ही शान्ति होगी; क्योंकि 'मैं' और "मेरा" का भाव भय उत्पन्न करता हैं ।।३५।।

यदा शरीरे न वशोऽस्ति कस्यचिश्निरस्यमाने विविधैरुपल्पवैः । कथं क्षमं वत्तु महंममेति वा शरीरसंज्ञं गृहमापदामिदं ॥३६॥

विविध उपद्रवों से पीढ़ित रहने वाले शरीर पर जब किसी का वश चलता ही नहीं है तब शरीर नामक आपत्तियों के घर को "मै" या "मेरा" समझना कैसे उचित हो सकता है ? ॥३६॥

सपन्नगे यः कुगृहे सदाशुचौ रमेत नित्यं प्रतिसंस्कृतेऽबले । स दुष्टधातावशुचौ चलाचले रमेत काये विपरीतदर्शनः ॥३७॥

जो सर्प-युक्त सदा मैले-कुचैले जीर्ण-शीर्ण व कमजोर कुगृह में बराबर रमण करेगा वही विपरीत दृष्टिवाला मनुष्य दुष्ट (परस्पर-विरोधी) धातुओं से युक्त अपवित्र और क्षणभंगुर शरीर में रमण करेगा ॥३७॥

यथा प्रजाभ्यः कुनृपो बलाद्वलीन्हरत्यशेषं च न चाभिरक्षति । तथैव कायो वसनादिसाधनं हरत्यशेषं च न चानुवर्तते ॥३८॥

जिस प्रकार कुराजा प्रजाओं से बलात् अशेष कर लेता है और उनकी रक्षा नहीं करता है उसी प्रकार शरीर अशेष वस्त्र-आदि साधन हरण करता है और अनुकूल नहीं रहता है ॥३८॥

यथा प्ररोहन्ति तृणान्ययत्नतः क्षितौ प्रयत्नात्तु भवन्ति शालयः। तथैव दुःखानि भवन्त्ययत्नतः सुखानि यत्नेन भवन्ति वा न वा ॥३९।।

जिस प्रकार पृथ्वी पर तृण अनायास (बिना प्रयत्न) ही अंकुरित होते हैं और धान (अनाज) प्रयत्न करने पर उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार दुःख बिना प्रयत्न के ही होते हैं किंतु सुख प्रयत्न करने पर होते हैं या नहीं भी होते हैं ॥३९॥

शरीरमार्तं परिकर्षतश्चलं न चास्ति किंचित्परमार्थत: सुखं । सुखं हि दुःखप्रतिकार सेवया स्थिते च दुःखे तनुनि व्यवस्यति ।।४०॥

आर्त एवं क्षणभङ्गुर शरीर को घसीटने में वास्तव में कुछ भी सुख नहीं है। दुःख का प्रतिकार करके थोड़ा-सा दुःख रहने पर ही आदमी सुख की कल्पना कर लेता है ॥४०॥

यथानपेक्ष्याम्र्यमपीप्सितं सुखं प्रबाधते दुःखमुपेतमण्वपि । तथानपेक्ष्यात्मान दुःखमागतं न विद्यते किंचन कस्याचत्सुखं ॥४१॥

जिस प्रकार अभिलषित महासुख की अपेक्षा करने पर भी उपस्थित दुःख, चाहे अत्यल्प ही क्यों न हो, कष्ट देता ही है उसी प्रकार आये हुए दुःख की अवहेलना करके किसी को कोई सुख नहीं हो सकता हैं ।।४१।।

शरीरमीद्दग्बहुदुःखमध्रुवंफलानुरोधादथ नावगच्छसि । द्रवत्फलेभ्यो धृतिरश्मिभिर्मनोनिगृह्यतां गौरिव शस्यलालसा ॥४२॥

शरीर दुःख-पूर्ण और क्षणभङ्गुर है, यदि फल की आसक्ति के कारण इसे नहीं समझ रहे हो तो भी चन्चल (नाशवान्) फलों की ओर से अपने मन को धैर्यरूपी रस्सी से रोको, जैसे कि फसल (चरने) के लिये लालायित गौ को रोकते हैं ।।४२॥

न कामभोगा हि भवन्ति तृप्तये हर्वीषि दीप्तस्य विभावसोरिव । यथा यथा कामसुखेषु वर्तते तथा तथेच्छा विषयेषु वर्धते ॥४३॥

काम-भोगों से तृष्ति नहीं होती हैं, जैसे कि जलती आग को आहुतियों से तृप्ति नहीं होती हैं । जैसे जैसे काम- सुखों में प्रवृत्ति होती जाती हैं वैसे वैसे विषय-भोगों की इच्छा बढ़ती जाती हैं ॥४३॥

यथा च कुष्ठव्यसनेन दुःखितः प्रतापनान्नैव शमं निगच्छति । तथेन्द्रियार्थेष्वजितेन्द्रियश्चरन्न कामभोगैरुपशान्तिमृच्छति ॥४४॥

जिस प्रकार कुष्ठ रोग से पीड़ित व्यक्ति अपने (शरीर) को तपा कर शान्ति नहीं प्राप्त करता है, उसी प्रकार विषयों के बीच अजितेन्द्रिय होकर रहनेवाला मनुष्य काम-भोगों से शान्ति नहीं पाता है ।।४४॥

यथा हि भैषज्यसुखाभिकाङ्क्षया भजेत रोगान्न भजेत तत्क्षमं । तथा शरीरे बहुदुःखभाजने रमेत मोहाद्विषयाभिकाङ्क्षया ॥४५॥

जिस प्रकार (स्वादिष्ठ) औषधि के सुख की आकांक्षा से रोगों का सेवन करे और उनके (कटु) प्रतिकार का सेवन न करे, उसी प्रकार मोहवश विषयों की आकांक्षा से दुःखपूर्ण शरीर में रमण करे ॥४५॥

अनर्थकामः पुरुषस्य यो जनः स तस्य शत्रुः किल तेन कर्मणा। अनर्थमूला विषयाश्च केवला ननु प्रहेया विषमा यथारयः ॥४६॥

जो मनुष्य किसी दूसरे के अनर्थ की कामना करता हैं वह अपने उस कर्म के कारण उसका शत्रु है; विषय केवल अनर्थ के मू्ल हैं; विषम शत्रुओं के समान उनका परित्याग करना चाहिए ॥४६॥

इहैव भूत्वा रिपवो वधात्मकाः प्रयान्ति काले पुरुषस्य मित्रतां । परत्र चैवेह च दुःखहेतवो भवन्ति कामा न तु कस्यचिच्छिवाः ।॥४७॥

इस संसार में जो शत्रु होकर हत्या करना चाहते हैं; वे समय पर मनुष्य के मित्र हो जाते हैं; किंतु काम (विषय) इहलोक और परलोक में दुःख के हेतुस्वरूप हैं, उनसे किसी का कल्याण नहीं होता है ॥४७॥

यथोपयुक्त' रसवर्णगन्धवद्वधाय किपाकफलं न पुष्टये।निषंव्यमाणा विषयाश्चलात्मनो भवन्त्यनर्थाय तथा न भूतये ॥४८॥

जिस प्रकार (सुन्दर) रस, वर्ण व गन्ध से युक्त किम्पाक फल का उपयोग करने से मृत्यु होती है, पुष्टि नहीं, उसी प्रकार विषयों का सेवन करने से चन्चलात्म व्यक्ति का अनर्थ (अनिष्ट) ही होता है, कल्याण नहीं ॥४८।।

तबेतदाज्ञाय विपाप्मनात्मना विमोक्षधर्माद्युपसंहितं हितं ।जुषस्व मे सज्जनसंमतं मतं प्रचक्ष्व वा निश्चयमुद्गिरन् गिरं ॥४९॥

इसलिए पाप-रहित आत्मा (चित्त) से मोक्ष-धर्म के आरम्भ से युक्त इस हित को पहचानो और सज्जन-सम्मत मेरे मत का सेवन करो या वचन बोलकर अपना निश्चय कहो" ॥४९॥

इति हितमपि बह्वपीदमुक्तः श्रुतमहता श्रमणेन तेन नन्द: । न धृतिमुपययौ न शर्म लेभे द्विरद इवातिमदो मदान्धचेता: ॥५०॥

उस महाविद्वान् भिक्षु के द्वारा इस प्रकार बहुत कुछ हित कहे जाने पर भी नन्द को न धैर्य हुआ न शान्ति; क्योंकि मत्त हाथी के समान उसका चित्त मदान्ध था ॥५०॥

नन्दस्य भावमवगम्य ततः स भिक्षु: पारिप्लवं गृहसुखाभिमुखं न धर्मे ।सत्त्वाशयानुशयभावपरीक्षकायबुद्धाय तत्त्वविदुषे कथयांचकार ॥५१॥

सौन्दरनन्दे महाकाव्ये मदापवादो नाम नवमः सर्ग: ।

तब नन्द के चित्त को चन्चल, घर के सुखों की ओर उन्मुख और धर्म से विमुख जानकर, उस भिक्षु ने प्राणियों के आशय अनुशय और भाव के परीक्षक तत्वज्ञ बुद्ध से (उसका अभिप्राय) निवेदन किया ॥५१॥

सौन्दरनन्द महाकाव्य में "अभिमान की निन्दा" नामक नवम सर्ग समाप्त ।

सौन्दरनन्द, नन्द कि दीक्षा

अश्वघोष-कृत,
सौन्दरनन्द-महाकाव्य 

पंचम सर्ग, नन्द की दीक्षा।

अथाव्रतोयांश्वरथद्विपेभ्यः शाक्या यथास्वद्धि गृहीतवेषाः।महापणभ्यो व्यवहारिणश्च महामुनौ भक्तिवशात्प्रणमः।।१॥

तब घोड़ों रथों और हाथियों से उतर कर शाक्यों ने, जिन्होंने अपनी अपनी सम्पत्ति के अनुसार वेष धारण किया था, तथा बड़ी बढ़ी दूकानों से दूकानदारों (व्यापारियों) ने महामुनि को भक्तिपूर्वक प्रणाम किया॥१॥

केचित्प्रणम्यानुययुर्मूहूर्त केचित्प्रणम्यार्थवशेन जग्मु:। केचित्स्वकेष्वावसथेषु तस्थुः कृत्वाञ्जलीन्वीक्षण तत्पराक्षा: ॥२।। 

कुछ लोग प्रणाम करके एक मुहूर्त तक उनके पीछे पीछे गये, कुछ लोग प्रणाम करके कार्यवश (वहाँ से) चले गये, और कुछ लोग हाथ जोड़ कर उन्ही की ओर देखते हुए अपने घरों में खड़े रहे। ॥२॥

बुद्धस्ततस्तत्र नरेन्द्रमार्गे स्त्रोतो महद्भक्तिमतो जनस्य।जगाम दुःखेन विगाहमानो जलागमे स्त्रोत इवापगायाः॥३॥

तब बुद्ध उस राज-मार्ग पर (खड़े) भक्त जनता की बड़ी भीड़ को चीरते हुए, मानो वर्षा के आने पर नदी की धारा में प्रवेश करते हुए, कठिनाई से गये ॥३॥

अथोमहद्धिः पथि संपतद्भिः संपूज्यमानाय तथागताय।कर्तु प्रणामं न शशाक नन्दस्तेनाभिरेमे तु गुरोर्महिम्ना॥४॥

तब नन्द झुण्ड के झुण्ड आते हुए बड़े बड़े लोगों से रास्ते में पूजित होते बुद्ध को प्रणाम न कर सका, किन्तु गुरु की इस महिमा से उसे आनन्द ही हुआ॥४॥

स्वं चावसङ्ग पथि निर्मुमुत्क्षुर्भक्ति जनस्याम्यमतेश्च रक्षन् ।नन्दं च गेहाभिमुखं जिघृक्षम्मार्गं ततोऽन्यं सुगत: प्रपेदे।।५॥

अपने साथ के लोगों से मुक्त होने की इच्छा से और दूसरे मत के लोगों की भक्ति की रक्षा करते हुए तथा गृहोन्मुख नन्द को पकड़ने की इच्छा से सुगत (बुद्ध) ने दूसरा रास्ता लिया ।।५॥

ततो विविक्त च विविक्तचेता: सन्मार्गविन्मार्गममिप्रतस्थे। गत्वाग्रतश्चाग्यतमाय तस्मे नान्दीविमुक्ताय ननाम नन्दः।।६॥

तब सन्मार्ग को जानने वाले शान्तचित्त मुनि एकान्त मार्ग पर आये और आगे से जाकर उन श्रेष्ठ मुनि को, जो आनंद से रहित थे, नंद ने प्रणाम किया। ॥६॥

शनैर्व्रजन्नेव स गौरवेण पटावृतांसो विनतार्धकायः।अधोनिबद्धाञ्जलिरूर्ध्वनेत्रः सगद्गदं वाक्यमिदं बभाषे। ।।७।।

सम्मानपूर्वक धीरे धीरे जाते हुए नंद ने, जिसका कंधा कपड़े से ढका हुआ था, आधा शरीर झुका कर नीचे की ओर हाथ जोड़कर और ऊपर की ओर नेत्र उठाकर गद्गद स्वर से यह वाक्य कहा :- ॥७॥

प्रासादसंस्थो भगवन्तमन्तः प्रविष्टमश्रौषमनुग्रहाय।अतस्त्वरावानहमभ्युपेतो गृहस्य कक्ष्यामहतोऽभ्यसूयन् ॥ ८॥

जब मैं अपने महल में था तब मैंने सुना कि भगवान् हमारे ऊपर अनुग्रह करने के लिए हमारे घर में प्रविष्ट हुए थे, इसलिए अपने बड़े घर के (नौकरों के) प्रति रोष करता हुआ मैं शीघ्रता से आपके समीप आया हूँ ॥८॥

तत्साधु साधुप्रिय मतप्रियार्थं तत्रास्तु भिक्षूत्तम भैक्षकाल:। अ्सौ हि मध्यं नभसो यियासुः कालं प्रतिस्मारयतीव सूर्यः॥९॥

इसलिये हे साधुप्रिय, हे भिक्षु-श्रेष्ठ, मेरा प्रिय करने के लिए आपका भिक्षा-काल वहीं (मेरे घर) पर ब्यतीत हो, आकाश के मध्य भाग में जाने की इच्छा करने वाला वह सूर्य मानो (भिक्षा-) काल का स्मरण करा रहा हैं। ॥९॥

(९-बौद्ध भिक्षु मध्याङ्ग-काल बीतने के पहले ही भिक्षा माँग कर अपना भोजन कर लेते हैं।)

इत्येवमुक्तः प्रणतेन तेन स्नेहाभिमानोन्मुखलोचनेन।ताद्दङ्निमित्तं सुगतश्चकार नाहारकृत्यं स यथा विवेद। ।।१०॥

जब उसने नम्रतापूर्वक स्नेह और सम्मान के साथ आँखों को ऊपर उठाकर इस प्रकार कहा, तब सुगत ने ऐसा सङ्केत किया जिससे उसने समझा कि (उन्हें) भोजन नहीं करना है। ॥१०॥

तत: स कृत्वा मुनये प्रणामं गृहप्रयाणाय मति चकार।अनुग्रहार्थ सुगतस्तु तस्मै पात्रं ददौ पुष्करपत्रनेत्र:॥ ११॥

तब उसने मुनि को प्रणाम कर घर (लौट) जाने का विचार किया, किंतु कमल के पत्तों के समान औंखों वाले सुगत ने अनुग्रह करने के लिये उसे अपना (भिक्षा-) पात्र दिया। ॥११॥

ततः स लोके ददतः फलार्थ पात्रस्य तस्याप्रतिमस्य पात्रं।जग्राह चापग्रहणक्षमाभ्यां पद्मोपमाभ्यां प्रयतः कराभ्यां।।१२॥

तब संसार में फल प्राप्त करने के लिये (पात्र) देने वाले उन अद्वितीय पात्र (बुद्ध) के (भिक्षा) पात्र को उसने अपने कमलोपम हाथों से, जो धनुष ग्रहण करने योग्य थे, संयमपूर्वक ग्रहण किया। ॥१२॥

पराङ्मुखन्त्वन्यमनस्कमाराद्विज्ञाय नन्दः सुगतं गतास्थं।हस्तस्थपात्रोऽपि गृहं यियासुः संसार मार्गान्मुनिमिक्षमाण:॥१३॥

सुगत को अन्यमनस्क अपने से विमुख तथा उदास जानकर, नंद हाथ में पात्र रहने पर भी घर जाने की इच्छा से मुनि को देखता हुआा मार्ग से हटने लगा। ।।१३॥

भार्यानुरागेण यदा गृह स पात्रं गृहीत्वापि यियासुरेव।विमोहयामास मुनिस्ततम्तं रथ्यामुखस्यावरणन तभ्य।।१४॥

प्रिया के अनुराग के कारण जब वह पात्र लेकर भी घर जाने की इच्छा करने लगा, तब मुनि ने उसके मार्ग के मुख (मार्ग-द्वार, मार्ग-प्रवेश ) को ढक कर उसे मोह में डाल दिया। ॥१४॥ 

निर्मोक्षबीजं हि ददर्श तस्य ज्ञानं मृदु क्लेशरजश्च तीव्र।क्लेशानुकूलं विषयात्मकं च नन्दं यतस्तं मुनिराचकर्ष। ।।१५॥

उसका ज्ञान मन्द है, क्लेशरूपी रज तीव्र है, वह क्लेशों (दोषों) के अनुकूल है और विषयासक्त है, किंतु उसमें मोक्ष का बीज वर्तमान है-यह देख कर ही मुनिने उसे आकृष्ट किया। ॥१५॥

संक्लेशपक्षो द्विविधश्च हृष्टस्तथा द्विकल्पो व्यवदानपक्षः।आत्माश्रयो हेतुबलाधिकस्य बाह्याश्रय: प्रत्ययगौरवस्य ।।१६॥

क्लेश (दोष) दो प्रकार के देखे जाते हैं, उसी प्रकार शुद्धता (पवित्रता) भी दो प्रकार की है; जिसमें हेतु-बल (कुशल-मूल) की अधिकता है वह अपने पर ही आश्रित होता है और जिसके लिए बाहरी वस्तुओं (या सहारे) का महत्व अधिक है वह दूसरे पर आश्रित हैं ॥१६॥

अयत्नतो हेतुबलाधिकस्तु निर्मुच्यते घट्टितमात्र एव। यत्नेन तु प्रत्ययनेयबुद्धिर्विमोक्षमाप्रोति पराश्रयेण ॥१७॥

जिसमें हेतु-बल की अधिकता है वह प्रेरित होते ही अनायास ही मुक्त हो जाता है, किंतु जिसकी बुद्धि बाहरी सहारे पर चलती है वह दूसरे के आश्रय से कठिनाई से मुक्ति प्राप्त करता हैं ॥१७॥

नन्दः स च प्रत्ययनेयचेता यं शिश्रिये तन्मयतामवाप।यस्मादिमं तत्र चकार यत्नं तं स्नेहपङ्कान्मुनिरुज्जिहीर्षन् ॥१८॥

नन्द का चित्त बाहरी सहारे पर चलता था, वह जिस किसी का आश्रय लेता था, उसी में तन्मय हो जाता था, इसलिए उस स्नेहरूपी पङ्क (किचड़) से उबारने के लिए मुनि ने यह यत्न किया॥१८॥

नंदस्तु दुःखेन विचेष्टमानः शनैरगत्या गुरुमन्वगच्छत् ।भार्यामुखं वीक्षणलोलनेत्रं विचिन्तयन्नार्द्रविशेषकं तत् ।।१९॥

दुःख से छटपटाता हुआ नन्द लाचार होकर धोरे धीरे गुरु के पीछे पीछे गया और (महल में उसकी) प्रतीक्षा में चन्चल आँखों वाले तथा गीले विशेषक वाले पत्नी-मुख का ध्यान करता रहा ॥१९॥

ततो मुनिर्तं प्रियमाल्यहारं वसन्तमासेन कृताभिहारं।निनाय भग्नप्रमदाविहारं विद्याविहाराभिमतं विहारं॥२०॥

तब मुनि मालाओं और हारों को चाहने वाले नन्द को, जिस पर वसन्त ऋतु ने आक्रमण किया था और जिसका प्रमदा के साथ विहार करना नष्ट हो गया था, उस विहार (मठ) में ले गये जो विद्या में विहार करने वाले (ज्ञानियों ) का प्यारा है ।।२०॥

दीनं महाकारुणिकस्ततस्तं दृष्ट्रा मुहूर्त करुणायमानः।करेण चक्राङ्कतलन मूध्नि, परुपशं चेवेदमुवाच चैनं। ॥२१॥

तब उस दुःखी की ओर मुहूर्त भर देखकर महाकारुणिक ने करुणा करते हुए चक्र के चिह्न से युक्त हथेली वाले हाथ से उसके मस्तक पर स्पर्श किया और उसे यह वचन कहा :- ॥२१॥

यावन्न हिस्रः समुपैति काल: शमाय तावत्कुरु सौम्य बुद्धि।सर्वास्ववस्थास्विह वर्तमानं सर्वाभिसारेण निहन्ति मृत्युः ।।२२॥

"हे सौम्य, जबतक घातक काल समीप नहीं आता है तब तक बुद्धि को शान्ति में लगाओ; (क्योंकि) मृत्यु इस संसार में सब अवस्थाओं में रहनेवाले की सब प्रकार से हत्या करती हैं ॥२२॥

साधारणात्स्वप्रनिभादसाराल्लोल मनः कामसुखातन्नियच्छ। हव्यैरिवाग्ने: पवनेरितस्य लोकस्य कामैन हि तृप्तिरस्ति ॥२३॥

स्वप्न के समान असार तथा (सर्व-) साधारण (सब के द्वारा उपभोग्य) काम-सुख से अपने चंचल मन को रोको; क्योंकि जैसे वायु-प्रेरित अग्नि की (घृत आदि) हव्य -द्रव्यों से तृप्ति नहीं होती, वैसे ही संसार को कामोपभोगों से तृप्ति नहीं है ॥२३॥

श्रद्धाधनं श्रेष्ठतमं धनेभ्यः प्रज्ञारसस्तृप्तिकरो रसेभ्य:।प्रधानमध्यात्मसुखं सुखेभ्योऽविद्यारतिर्दु:खतमारतिभ्यः ॥२४॥

धनों में श्रद्धारूपी धन श्रेष्ठ है, रसों में प्रज्ञारुपी-रस तृप्ति-कर है, सुखों में अध्यात्म-सुख प्रधान है, और दुःखों में अज्ञान-दुःख अत्यत दुःखदायी है ॥२४॥

हितस्य वक्ता प्रवरः सुहृद्भ्यो धर्माय खेदो गुणवान् श्रमेभ्यः। ज्ञानाय कृत्यं परमं क्रियाभ्यः किमिन्द्रियाणामुपगम्य दास्यं। ॥२५॥

हित (की बात) कहने वाला (मित्र) मित्रों में श्रेष्ठ है, धर्म के लिए किया जानेवाला परिश्रम परिश्रमों में उल्कृष्ट है, ज्ञान के लिए किया जानेवाला कार्य कार्यों में उत्तम है, इन्द्रियों का दास होने से क्या लाभ? ॥२५॥

तन्निश्चित भीक्तमशुग्वियुक्त' परेष्वनायत्तमहार्यमन्यैः। नित्यं शिवं शान्तिसुखं वृणीष्व किमिन्द्रियार्थार्थमनर्थमूढ्वा ॥२६॥

इसलिये निश्चित नित्य और शिव (कल्याण-कारी) शान्ति-सुख का वरण करो, जो भय थकावट और शोक-रहित है, जो दूसरों के अधीन नहीं है और जो दूसरों द्वारा नहीं छीना जा सकता; विषयों के लिए विपत्ति उठाने से क्या लाभ? ॥२६॥

जरासमा नास्त्यमृजा प्रजानां व्याधेः समो नास्ति जगत्यनर्थः। मृत्या: समं नास्ति भयं पृथिव्यामेतत्त्रयं खल्ववशेन सेव्यं ॥२७॥

प्राणियों के लिए बुढ़ापे के समान (रूप- विनाशक) और कोई गन्दगी नहीं है, संसार में रोग के समान और कोई अनर्थ नहीं है तथा पृथ्वी पर मृत्यु के समान कोई भय नहीं है; इन तीनों को लाचार होकर भोगना ही पड़ता है ॥ २७॥

स्नेहेन कश्चिन्न समोऽस्ति पाशः स्रोतो न तृष्णासममस्ति हारि। रागाग्निना नास्ति समस्तथाग्निस्तच्चेत्रयं नास्ति सुखं च तेऽस्ति ॥२८॥

स्नेह के समान कोई बन्धन नहीं है, तृष्णा के समान बहा ले जाने-वाली कोई धारा नहीं है और राग की अग्नि के समान कोई अग्नि नहीं है, इसलिए यदि ये तीन नहीं हैं तो तुम्हें सुख है ॥२८॥

अवश्यभावी प्रियविप्रयोगस्तस्माच्च शोको नियतं निषेव्य:। शोकेन चोन्मादमुपेयिवांसो राजर्षयोऽन्येऽप्यवशा विचेलु: ॥२९॥

प्रिय का वियोग अवश्यंभावी है इसलिए शोक सहना (भोगना) ही पड़ेगा। शोक से उन्मत्त होकर राजर्षिंगण तथा दूसरे भी विवश होकर विचलित हुए ॥२९॥

प्रज्ञामयं वर्म बधान तस्मात्नो क्षान्तिनिघ्रस्य हि शोकवाणा:। महच्च दग्धुं भवकक्षजालं संधुक्षयाल्पाग्निमिवात्मतेजः। ॥३०॥

इसलिए प्रज्ञा रूपी कवच पहन लो, क्योंकि जो धैर्य के अधीन हैं उसपर शोकरुपी तीरों का वश नहीं चलता। महा-भव-जाल को जलाने के लिए अपने तेज को प्रदीप्त करो, जैसे महान् तृण राशि को जलाने के लिए थोड़ी सी आग को (प्रयत्नपूर्वक) प्रज्वलित किया जाता है। ।।३०॥

यथौपधैहस्तगतै: सविद्यो न दश्यते कश्चन पन्नगेन।तथानपेक्षो जितलोकमोहो न दश्यते शोकभुजंगमेन। ॥३१॥ 

जिस प्रकार हाथ में औषधियों के रहने पर कोई भी (सर्प-) विद्या जानने वाला सर्पद्वारा नहीं डसा जाता है, उसी प्रकार निरपेक्ष व्यक्ति, जिसने संसार के मोह को जीत लिया है, शोकरुपी सर्पद्वारा नहीं डसा जाता है। ।।३१।। 

आस्थाय योगं परिगम्य तत्त्वं न त्रासमागच्छ ति मृत्युकाले। आबद्धवर्मा सुधनुः कृतास्त्रो जिगीषया शुर इवाहवस्थः॥३२॥

योगाभ्यास द्वारा तत्व को जानकर मनुष्य मृत्यु-काल में संत्रस्त नहीं होता है, जैसे कवच पहनकर सुन्दर धनुष और अस्त्र लेकर विजयीच्छु वीर पुरुष युद्ध में उतरकर भयभीत नहीं होता है" ॥३२।।

इत्येवमुक्तः स तथागतेन सर्वषु भूतेऽष्वनुकम्पकेन। धृष्टं गिरान्तह्रदयेन सीदस्तथेति नन्दः सुगतं बभाषे ॥३३॥

सब जीवों पर दया करनेवाले तथागत द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर दुःखी हृदय से किंतु उत्साहपूर्ण वाणी से नन्द ने सुगत को कहा "अच्छा" ।।३३।।

अथ प्रमादाच्च तमुज्जिहीर्षन्मत्वागमस्यैव च पात्रभूतं।प्रब्राजयानन्द शमाय नम्दमित्यत्रवीन्मैत्रमना महर्षि:॥ ३४।। 

तब प्रमाद (अविवेक, अज्ञान) से उसका उध्दार करने की इच्छा से और उसको धर्म का पात्र हुआ जान कर महर्षि ने मैत्रीपुर्ण चित्त से कहा-"आनन्द! नन्द को उसकी शान्ति के लिए प्रव्रजित करो"। ॥३४।।

नन्दं ततोऽन्तर्मनसा रुदन्तमेहीति वैदेहमुनिर्जंगाद।शनैस्ततस्त समुपेत्य नन्दो न प्रव्रजिष्याम्यहमित्युवाच ॥३५॥

तब मन ही मन रोते हुए नन्द को वैदेह मुनि (आनन्द) ने कहा- "आओ"। तब शनैः शनैः उसके समीप जाकर नन्द ने कहा- "मैं प्रव्रजित न होऊँगा" ॥३५॥ 

श्रुत्वाथ नन्दस्य मनीपितं तद्बुद्धाय वैदेहमुनि: शशंस।संश्रुत्य तस्मादपि तस्य भावं महामुनिर्नन्दमुवाच भूयः ॥३६॥

तब नंद का वह अभिप्राय सुनकर वैदेह मुनि ने बुद्ध से कहा। उससे भी नंद का (वह) भाव सुनकर महामुनि ने पुनः नंद को कहाः-॥ ३६ ।।

मय्यग्रजे प्रव्रजितेऽजितात्मन् भ्रातृष्वनुप्रव्रजितेषु चास्मान्। ज्ञातिंश्च दृष्ट्रा व्रतिनो गृहस्थान् संविन्नकिंतेऽस्ति न वास्ति चेत:॥३७॥

"हे असंयतात्म, मुझ अग्रज के प्रव्रजित होने पर, हमारे पीछे अपने भाईयों के प्रव्रजित होने पर तथा अपने जाति बन्धुओं को घर में ही रहकर व्रत पालन करते देख कर क्या तुम्हें ज्ञान (का उदय) ही नहीं होता है या तुम्हें चित्त ही नहीं है? ॥३७॥ 

राजर्षेयस्ते विदिता न नूनं वनानि ये शिश्रियिरे हसन्तः।निष्ठीव्य कामानुपशान्तिकामाः कामेषु नैवं कृपणेषु सक्ताः ॥३८॥

अवश्य ही तुम उन राजर्षियों को नहीं जानते हो, जिन्होंने हँसते हँसते वन का आश्रय लिया। उन्होंने शान्ति पाने की इच्छा से कामोपभोगों का तिरस्कार किया, वे कामोपभोगों में इस प्रकार आसक्त नहीं थे ।।३८।।

भूयः समालोक्य गृहेषु दोषान्निशाम्य तत्त्यागकृतं च श्मे।नैवास्ति मोक्तुं मतिरालयं ते देशं मुमूर्षोरिव सोपसर्गं ।।३९॥

फिर घर के दोषों तथा उसके त्याग से होने वाली शांति को देखकर तुम घर छोड़ने का विचार नहीं करते हो, जैसे कि मृत्यु की इच्छा करनेवाला (मरणासन्न) व्यक्ति उपद्रव-युक्त स्थान को नहीं छोड़ना चाहता है ॥३९॥

संसारकान्तारपरायणस्य शिवे कथं ते पथि नारुरुक्षा।आरोप्यमाणस्य तमेव मार्ग भ्रष्टस्य सार्थादिव सार्थिकस्य ।।४०॥

संसाररूपी बीहड़ वन में लीन होकर तुम, काफिले से भटके हुए व्यापारी के समान, कल्याण-कारी मार्ग पर चढ़ाया जाने पर भी क्यों नहीं चढ़ना चाहते हो? ॥४०।।

यः सर्वतो वेश्मनि दह्यमाने शयीत मोहान्न ततो व्यपेयात् |कालाग्निना व्याधिजराशिखेन लोके प्रदीप्ते स भवेत्प्रमत्तः ॥४१॥

जो चारों ओर जलते हुए घर में मोहवश सोये और उससे नहीं भागे वही मनुष्य रोग और जरारुपी लपटोंवाली कालाग्नि से प्रज्वलित संसार में असावधान रहेगा ॥४१॥

प्रणीयमानश्च यथा वधाय मत्तो हसेच्च प्रत्नपेच्च वध्यः।मृत्यौ तथा तिष्ठति पाशहस्ते शोच्यः प्रमाद्यन्विपरीतचेता: ॥४२॥

जिस प्रकार वध के लिए (वध्य-भूमि की ओर) लिबाया जाता हुआ वध्य व्यक्ति मत्त (नशे में चूर) होकर हँसता और प्रलाप करता हैं उसी प्रकार हाथ में पानी लेकर मृत्यु के वर्तमान रहते प्रमाद (असावधानी) करने वाला आदमी शोंक करने योग्य है ॥४२॥

यदा नरेन्द्राश्च कुटुम्बिनश्च विहाय बन्धूश्च परिग्रहांश्च। ययुश्च यास्यन्ति च यान्ति चैव प्रियेष्वनित्येषु कुतोऽनुरोध: ॥४३॥

जब कि राजा लोग और परिवार वाले अपने बन्धुओं और परिग्रहों को छोड़कर चले गये, चले जायँगे और चले जा रहे हैं तब क्यों अनित्यप्रिय वस्तुओं में अनुराग (आसक्ति) किया जाय? ॥४३॥

किचिन्न पश्यामि रतस्य यत्र तदन्यभावेन भवेन्न दुखं।तस्मात्क्वचिन्न क्षमते प्रसक्तियोदि क्षमस्तद्विगमान्न शोक:।।४४।। 

मैं ऐसा कुछ नहीं देख रहा हूँ जिसमें आसक्त होने वाले को उस (चीज) के अन्यथा होन पर दुःख न हो। इसलिए किसी में भी आसक्त होना उचित नहीं; यदि उचित होता तो उसका वियोग होने से शोक नहीं होता ॥४४॥

तत्सौम्य लोलं परिगम्य लोकं मायोपमं नित्रमिवेन्द्रजालं।प्रियाभिधानं त्यज मोहजालं छेत्तुं मतिस्ते यदि दुःखजालं ।।४५॥

इसलिए, हे सौम्य, संसार को अस्थिर, माया के समान, और इन्द्रजाल के समान विचित्र जानकर यदि तुम्हारा विचार दुःख-जाल को काटने का है तो प्रिया नामक मोह जाल का परित्याग करो ।।४५॥

वरं हितोदकेमनिष्टमन्नं न स्वादु यत्स्यादाहितानुवद्धं।यश्मादहंत्वा विनियोजयामि शिवै शुचों वत्मेनि विप्रियेऽपि ॥४६॥

हितकारी भोजन अप्रिय (होने पर भी) अच्छा है न कि स्वादिष्ट भोजन जो कि अहितकारी है। इसीलिए मैं तुम्हें मङ्गलमय पवित्र मार्ग में अप्रिय होने पर भी, लगा रहा हूँ ॥४६॥

बालस्य धात्री विनिगृह्य लोष्टं यथोद्धरत्यास्यपुटप्रविष्टं।तथोज्जिहर्षु: खलु रागशल्यं तत्त्वामवोचं परुषं हिताय ।।४७॥

जिस प्रकार दाई बालक को पकड़ कर उसके मुख में घुसे हुए ढेले को बाहर निकालती है, उसी प्रकार (तुम्हारे हृदय में गड़े हुए) रागरूपी शल्य को निकालने की इच्छा से मैंने यह कठोर वचन तुम्हारे हित के लिए कहा ।।४७।।

अनिष्टमध्यौषधमातुराय ददाति वैद्यश्च यथा निगृह्म । तद्वन्मयोक्त प्रतिकूलमेतत्तुभ्यं हितोदकमनुग्रहाय ।।४८।। 
जिस प्रकार वैद्य रोगी को पकड़कर अप्रिय (कटु) औषधि भी देतां है उसी प्रकार मैंने यह अप्रिय किंतु हितकारी वचन तुम्हारे ऊपर अनुग्रह करके कहा हैं ॥४८॥

तद्यावदेव क्षणसंनिपातो न मृत्युरागच्छति यावदेव ।यावद्वयो योगविधौ समर्थ बुद्धि कुरु श्रेयसि तावदेव ॥४९॥

इसलिए जब तक कि (कुछ ही क्षणों का) यह जीवन रहता हैं, जब तक कि मृत्यु (समीप) नहीं आती है, जब तक कि उम्र (शरीर) योगाभ्यास करने में समर्थ हैं तब तक अपनी बुद्धि को श्रेय में लगाओ" ॥४९॥

इत्येवमुक्तः स विनायकेन हितैषिणा कारुणिकेन नन्दा:।कर्तास्मि सर्व भगवश्चवस्ते तथा यथाज्ञापयसित्युवाच ॥५०॥

हितैषी और कारुणिक विनायक (बुद्ध) के द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर नन्द ने कहा-"आपके आज्ञानुसार मैं आपके वचन का पूरा पूरा पालन करूगा" ।।५०।।

आदाय वैदेहमुनिस्ततस्तं निनाय संश्लिष्य विचेष्टमानं ।व्ययोजयच्चाश्रुपरिप्लुताक्षं केशश्रियं छत्रनिभस्य मूध्र: ॥५१॥

तब वैदेह मुनि (आनन्द) उस छटपटाते हुए (अनिच्छुक) को वहाँ से ले गये और उस रोते हुए (अश्रु-प्लावित आँखोवाले) के छत्र-तुल्य मस्तक की केश-शोभा को अलग किया ।।५१।।

अथो नतं तस्य मुखं सबाष्पं प्रवास्यमानेषु शिरोरुहेषु ।वक्राग्रनालं नलिनं तडागे वर्षोदकल्किन्नमिवाबभासे ॥५२॥

केशों के काटे जाते समय उसका झुका हुआ अश्रु-पुर्ण मुख ऐसे शोभित हुआ जैसे पोखर में बर्षा के जल से भींगा हुआ कमल जिस के नाल का अग्र-भाग झुक गया हो ॥५२॥

नन्दस्ततस्तरुकषायविरक्तवासा-श्चिन्तावशो नवगृहीत इव द्विपेन्द्रः। पूर्णः शशी बहुलपक्षगत: क्षपान्ते बालातपेन परिषिक्त इवाबभासे ।।५३॥

सौन्दरनन्दे महाकाव्ये नन्दप्रव्राजनो नाम पन्चम: सर्ग: 

तब विरक्तों (भिक्षुओं) का काषाय वस्त्र पहनकर नन्द हाल में ही पकड़े गये गजेन्द्र के समान चिन्ता के वशीभूत हो गया और ऐसे शोभित हुआ जैसे कृष्ण-पक्ष में गया हुआ पूर्ण चन्द्रमा जो कि रात्रि के अन्त में बाल सूर्य की किरणों से सिक्त हो रहा हो ।।५३॥ 

सौन्दरनन्द महाकाव्य में "नन्द की दीक्षा" नामक पञ्चम सर्ग समाप्त।

सौन्दरनन्द-महाकाव्य, आज्ञा-व्याकरण, सर्ग १८

सौन्दरानन्द महाकाव्य, अष्टादश (१८ वां) सर्ग, आज्ञा-व्याकरण (उपदेश): अथ द्विजो बाल इवाप्तवेदः क्षिप्रं वणिक् प्राप्त इवाप्तलाभः । जित्वा च रा...