बुद्ध के दार्शनिक विचारों में प्रतीत्यसमुत्पाद का मूर्धन्य स्थान हैं। उनके कारणवाद की व्याख्या प्रतीत्यसमुत्पाद के ही अधार पर की जाती हैं। इस सिद्धान्त के मूल में बुद्ध का 'अस्मिन् सति इदं भवति' वचन हैं। इसके बारह अंग माने जाते हैं- १-अविद्या, २-संस्कार, ३-विज्ञान, ४-नामरूप, ५-षडायतन, ६-स्पर्श, ७-वेदना, ८-तृष्णा, ६-उपादान,१०-भव,११-जाति (जन्म), और १२-जरा-मरण-दुःख। इनमें से प्रत्येक अपने परवर्ती का कारण हैं। इसी को भवचक्र कहते हैं। इन्हीं द्वादशांगों को निदान भी कहा जाता हैं। विज्ञान का जो स्थान द्वादशांगों में हैं उसका विवेचन आवश्यक हैं।
इन्हे तीन भागों में बॉटा गया हैं अथवा इनका विस्तार तीन जीवनों तक हैं-अतीत जन्म (सांसारिक जीवन के पूर्व), वर्तमान जीवन (सांसारिक जीवन), भविष्य जन्म (अनागत जीवन)। अविद्या और संस्कार अतीत जन्म के अंतर्गत, विज्ञान, नाम-रूप, षडायतन, स्पर्श, वेदना, तृष्णा, उपादान और भव वर्तमान जीवन के अंतर्गत तथा जाति और जरा-मरण भविष्य जन्म के अंतर्गत माने जाते हैं। चार आर्यसत्यों में से दुःख-समुदय आर्यसत्य (दु:ख के कारण) के अंतर्गत इन निदानों का विचार होना चाहिए। प्राणी जन्म लेता हैं इसीलिये उसे बार-बार जरामरण का दुःख सहना पड़ता हैं। प्राणी अपने पूर्व के जीवन में अनेक प्रकार के ऐसे कर्म करता है जो पुनर्जन्म के कारण होते हैं क्योंकि वह कुशल अकुशल कर्मों का ज्ञान नहीं रखता। अर्थात् अविद्या के कारण ही मनुष्य को कर्म और उसके अनुभव के संस्कार प्राप्त होते हैं। अतीत (बिते हुए) जीवन के ये संस्कार पन्चस्कंधों के रुप में जब मातृगर्भ में स्थित होते हैं तब उन्हें विज्ञान या चैतन्य कहते हैं। इस विज्ञान या चैतन्य के बाद की अवस्था दृश्यमान शरीर और मन संचलित संस्थान की हैं। पंचेंद्रिय और मन की अव्यक्त और निष्क्रिय अवस्था को ही नाम-रूप कहते हैं। षड़ायतन (पंचेंद्रिय और मन) नाम-रूप की व्यक्तावस्था हैं। विषयेंद्रिय सम्पर्क ही स्पर्श हैं। मन के संनिकर्ष में आने पर इद्रियों का संपर्क जब विषयों से होता है, तब स्पर्श की उत्पति होती हैं। सुख, दु:ख और उपेक्षा की अनुभूति का नाम ही वेदना हैं। इस वेदना का कारण स्पर्श हैं। वेदना से तृष्णा की उत्पत्ति होती हैं। किसी विशेष सुख को या सुखकर वस्तु को या भाव को प्राप्त करने की इच्छा ही तृष्णा हैं। इसी तृष्णा से उपादान या आसक्ति की उपलब्धी होती हैं। स्त्री, व्रत और आत्मनित्यता के प्रति आसक्ति को ही उपादान के तीन प्रकार कह सकते हैं। वस्तु या भाव के प्रति आसक्ति के कारण, उसकी उपलब्धि के लिये अनेक कुशल अकुशल कर्म किए जाते हैं। इन्हीं कर्मों को भव कहते हैं।
वित्ति, प्राङ्मैथुनात्, तृष्णा भोग-मैथुन रागिण'।
उपादान तु भोगाना प्राप्तये परिधावतः ॥२३॥
स भविष्यद्भवफलं कुरुते कर्म तद्भव:।
प्रतिसन्धि, पुनर्जाति' जरामरण आविद ॥२४॥ अभिधर्मकोष, ३, २३-२४--
अविद्या से लेकर भव तक की अवस्थाएँ वर्तमान सांसारिक जीवन की अवस्थाएँ हैं जिनमें भविष्य जन्म के निदान घटित होते हैं। इस अवस्था में पाँच स्कन्धों (रूप, वेदना, सज्ञा, संस्कार और विज्ञान) का पूर्ण संघटन रहता हैं। भव अवस्था वह अवस्था है जिसमें स्कन्धों के बिखर जाने पर उन स्कन्धों के पुनः संघटित होने की शक्ति रहती हैं। भव पाँच स्कन्धों की वह अवस्था हैं जिसमें अगले जीवन के शुरू होने की योग्यता हैं। निष्कर्ष यह कि जीवन को आरंभ करने वाले हैं अविद्या और संस्कार, जीवन का संचालन करने वाले हैं तृष्णा और उपादान तथा एक जीवन के बाद दूसरे जीवन को आरंभ करने वाला है भव। ये तीनों पंचस्कन्धों की विभिन्न अवस्थाएं हैं। यह भव ही, शरीर रूप में विकसित पॉचो स्कन्धो को, उनके बिखर जाने पर फिर शरीर में विकास के योग्य पाँच स्कन्धों का रूप देता हैं। अनेक प्रकार के कुशल अकुशल कर्मों के करने के फलस्वरूप जन्म की उपलब्धि होती है और जन्म का परिणाम हैं जरा और मरण, जो स्वयं अपने में ही घोर दुःख हैं। ऐसी स्थिति में अविद्या से संस्कार और संस्कार से विज्ञान कार्यरूप में होते हैं। यदि विज्ञान सांसारिक जीवन का द्वार है तो भव भविष्यत् जीवन का। अतः भव के निरोध के लिये विज्ञान निरोध या संयम आवश्यक हैं।
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