Wednesday, December 2, 2020

भारत में बौध्दधर्म गेल ओमवेट

ब्राह्मणों का आत्म-निर्माण :

कई सदियों के दौरान उभर कर आए भारतीय ब्राह्मण, किसी समाज द्वारा उत्पन्न सर्वाधिक अनूठे कुलीनों का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे अपने मूल को वैदिक काल से संबंद्ध पाते हैं, जहाँ वे बलिकर्म के लिए पुरोहित थे, और वे पहली सदी ई.पू. के मध्य में, समाज में पुरोहितों, बौद्धिकों तथा वेदों के संसाधकों के रूप में सामने आए।हालांकि, ब्राह्मणों को पहली सदी ई.पू. में अनिवार्य रूप से, वैदिक पुरोहितों के वंशजों के सामाजिक समूह के रूप में देखना वैसे ही अनुचित होगा, जैसे खत्तियों को वैदिक योद्धा अथवा राजन्य माना जाना। दोनों ही वंश शुद्धता की मांग रखते हैं, परंतु यह एक स्वयंसेवी पौराणिकता थी।

थापर का कहना है कि अनार्य मूल के ब्राह्मण, अगस्त्य तथा वशिष्ठ जैसे मुनियों की जनश्रुतियों में प्रामाणिक थे, जिनका जन्म जारों तथा एक ऋग्वैदिक ऋषि से माना जाता है, जिन्हें दासपुत्र या गुलाम के पुत्र के रूप में वर्णित किया जाता है (Thapar 1984: 52)। कुछ पालि ग्रंथों, उदाहरण के लिए, अंबट्ठ सुत्तांत (तीसरा अध्याय देखें) संकेत करते हैं कि उनमें (ब्राह्मणों में) खत्तियों की नाजायज़ संतान भी शामिल हो सकती है। यहाँ तक कि उपनिषद भी दर्शाते हैं कि कभी-कभी संदेहास्पद जन्म रखने वाले व्यक्ति को भी शिष्य के रूप में स्वीकार करते हुए, ब्राह्मणों के वंश में शामिल किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, छांदोग्य उपनषिद में, सत्यकाम जाबाल की माता उसे कहती है, 'प्रिय पुत्र! मैं नहीं जानती कि तुम किस वंश से संबंध रखते हो। मैंने तुम्हें अपनी युवावस्था में जन्म दिया। जब मैं बहुत लोगों के पास एक दासी के रूप में काम करती थी।' (Upanisads 2000: 174) 

ब्राह्मण कौन थे? दूसरी सदी ईसवी में, पश्चिमी भारत के एक सातवाहन राजा को अभिलेख में वर्णित किया गया (ekakusas ekadhanudharas ekasuras ekabahmanas)। इसका अनुवाद है, 'एक अद्भुत नियंत्रक, एक अजेय धुनधर्र, एक विख्यात नायक तथा अतुलनीय ब्राह्मण' (Mirasi part 2: 45-47)। परंतु इस सूची में दिए गए (बाहमन) 'ब्राह्मण' शब्द को जाति के अर्थ में नहीं लिया गया, ऐसा जान पड़ता है कि इसे करुण रूप में शामिल किया गया; इसी राजा ने अपने पुत्र का विवाह 'बर्बर' शक शासक से किया और सातवाहनों के उन लोगों से नियमित वैवाहिक संबंध रहे, जो मूलतः देसी मराठा (इसके साथ ही अर्द्ध जनजातीय) थे। बुद्ध व उनके अनुयायियों ने निरंतर ‘ब्राह्मण या बामन' शब्द का प्रयोग चरित्र की अच्छाई व विद्वता के संदर्भ में किया है, हालांकि ग्रंथों से यह सजगता भी मिलती है कि यह एक प्रतियोगी प्रचलन था। 'ब्राह्मण' शब्द का प्रयोग उनके लिए किया जाता था जो बौद्धिक ज्ञान, अनुष्ठानिक जानकारी व काफ़ी हद तक नैतिक उपलब्धि के आधार पर सर्वोच्च पद पाने का दावा करते थे। उन्हें वेदों के ज्ञाता के रूप में जाना गया। वे लगभग और सदा अकुलीन थे, हालांकि जातकों में एक कुलीन का उदाहरण मिलता है जिसे बाद में एक 'ब्राह्मण' के रूप में वर्णित किया गया, खत्तिय और ब्राह्मण सामान्यत: विशिष्ट समूह थे। जहाँ खत्तियों ने स्वयं को युद्ध कला तथा शस्त्रों के साथ केंद्रित रखा और गण-संघों के साथ जाने गए, ब्राह्मण बलिकर्म, अनुष्ठानों व बौद्धिक उपलब्धि पर केंद्रित रहे और वे उदीयमान राज-तंत्रों में परामर्शदाताओं व पुरोहितों के रूप में संबंधित रहे।

अंबेडकर ने, कोलंबिया विश्वविद्यालय में छात्र जीवन के दौरान, एक निबंध लिखा था: 'भारत में जातियाँ: उनकी व्यवस्था, उत्पत्ति व विकास। जिसमें एक सिद्धांत दिया गया, जिसके अनुसार जाति एक 'सीमित वर्ग' का प्रतिनिधित्व करती थी, जो सगोत्र विवाह के आरोपण से सीमित थी, जिसे पहले-पहल स्वयं ब्राह्मणों की ओर से ही आरंभ किया गया (Ambedkar 1979: 15) । ऐसा ही कुछ जान पड़ता है, ब्राह्मणों ने एक वर्ण सामाजिक व्यवस्था को निर्विवाद रूप से स्वीकारा, और स्वयं को एक जाति के रूप में निर्मित करने की सामूहिक परियोजना को हाथ में लिया। कह सकते हैं कि स्वयं को सीमित करने की यह प्रक्रिया पहली सदी के दौरान जारी थी, इसी प्रक्रिया के हिस्से को मैंने ब्राह्मणों का ‘आत्म-निर्माण' अथवा 'आत्म-रचना' कहा है। जन्म के आधार पर श्रेष्ठता का दावा रचते हुए, इसे साकार रूप प्रदान किया गया।

अनेक बौद्ध ग्रंथों में एक प्रक्रिया दिखाई देती है, जो ब्राह्मणों के मध्य एक वाद-विवाद को चित्रित करती है कि वे स्वयं को आनुवांशिक रूप से अंतरंग समूह के रूप में पहचानें अथवा नहीं। सुत्त निपात का वासेट्ठ सुत्त, युवा ब्राह्मणों वासेट्ठ व भारद्वाज के मध्य विचार-विमर्श से आरंभ होता है (दोनों ही प्रतिष्ठित वंशों के नाम हैं); 'भारद्वाज कहते हैं कि दोनों पक्षों की पिछली सात पीढ़ियों से विशुद्ध पूर्वजों के कारण ही कोई ब्राह्मण शुद्ध माना जाता है . . . जबकि वासेट्ठ का कहना था कि गुणों
तथा नैतिक आचार के बल पर ही कोई व्यक्ति ब्राह्मण माना जा सकता है।' हो सकता है कि पालि ग्रंथों के पास भारी संख्या में ब्राह्मणों के धर्म-परिवर्तन की घोषणा के लिए सुनियोजित कारण हों, परंतु यह तथ्य कि कई ब्राह्मणों (तथा अन्य, उपनिषद की कथाओं में राजाओं के पास गए) ने प्रश्नों के उत्तर पाने के लिए बुद्ध की शरण ली, इस बात का सूचक है कि उस समय उनके बीच मुक्त
संवाद तथा विचार विभिन्नता थी। बौद्धों ने विवाद में हस्तक्षेप करते हुए ‘ब्राह्मणों' को अ-वंशानुगत कहा और इस तथ्य पर बल दिया कि कोई केवल जन्म से नहीं अपितु अपने गुणों व नैतिक आचार के कारण ब्राह्मण बन सकता था। हालांकि यह प्रयास असफल रहा व अंतत: इस विवाद में वे सफल रहे जिन्होंने इस स्तर को जन्म सिद्ध अधिकार व अनुवांशिकी से जोड़ा था। इसी प्रक्रिया में, ब्राह्मणों का एक सामाजिक दल ही नहीं बल्कि 'ब्राह्मणवाद' सामने आया।

जन्मसिद्ध अधिकार व ऋषियों के वंशज होने की घोषणा के साथ, ब्राह्मणों ने निश्चित रूप से अपनी ही पारिवारिक पृष्ठभूमि में अस्थिरता व अनियमितता को उपेक्षित किया; ऐसा कुलीन वर्ग द्वारा प्रत्येक स्थान पर किया गया। इसके साथ ही, ब्राह्मणों के चरित्र के अंश के रूप में देखे जाने वाले नैतिक आचार की, ब्राह्मणवादी साहित्य में, बौद्ध धर्म के विपरीत (उलटा), अनुष्ठानिक व नीतिपरक रूप में विवेचना की गई, ताकि इनमें विशेष जातिगत
कर्तव्यों तथा अनुष्ठानों के प्रदर्शन को सम्मिलित किया जा सके। शुद्धता की व्याख्या भी, भौतिकवादी रूप में हुई, ब्राह्मण संसार त्यागी नहीं, गृहस्थ बने रहे, परंतु ऐसा करते हुए, वे धीरे-धीरे भौतिक जगत में हिंसा व मृत्यु जैसे प्रदूषकों से शांत भाव से दूर होते चले गए, और इसका अर्थ था कि सामाजिक व्यवस्था में, अन्य समूहों (क्षत्रिय, शूद्र व स्त्रियाँ) को भौतिक उत्पादन के हिंसा व
मृत्यु से जुड़े पक्षों से निपटने का उत्तरदायित्व ग्रहण करना पड़ा। ड्यूमोंट के शब्दों में, इसका अर्थ था,
वंशानुक्रम तंत्र के लिए महत्त्वपूर्ण और शिखर पर आसीन ब्राह्मण की विशुद्धता का मेल, सबसे निम्न तल पर आसीन अस्पृश्य की अशुद्धता से किया गया (Dumont 1988)। इसके साथ ही, ब्राह्मणों ने वैदिक आर्य मूल पर भी दावा कर दिया, वेदों को अपने पवित्र ग्रंथों का दर्जा देते हुए, पौरोहित्य अनुष्ठानों की निरंतरता
बनाए रखी। सामाजिक समूह के रूप में, अपने लिए सबसे उच्चतम स्तर का दावा करते हुए,.उन्होंने समाज के अन्य विविध वर्गों को, विविध सामाजिक कार्यों के विस्तृत ढाँचे में व्याख्या करना आरंभ कर दिया। इस प्रक्रिया का आरंभ, पुरुषसूक्त में वर्गों की दैवीय रचना की घोषणा से हुआ, जिसे ऋग्वेद का उत्तरकालीन प्रक्षेप माना जाता है:

जब उन्होंने पुरुष को विभाजित किया, उन्होंने
उसे कितने अंशों में विभाजित किया? . . .
उसका मुख ब्राह्मण बना; उसकी भुजाओं को
क्षत्रिय माना गया; उसकी दो जंघाओं से वैश्य;
तथा उसके दो पैरों से शूद्र जन्मे। 
(Rig Veda 10.90. 11-12)

अगले चरण में, मौजूदा व्यक्तियों के जन्म की व्याख्या को, आचार के आधार पर विविध वर्गों में हुआ, जिनमें से
मनुस्मृति विशेष तौर पर उल्लेखनीय है। विभिन्न प्रकार के पेशे अपनाने वाले 'निम्न' माने गए, वर्ण व्यवस्था में अवशोषित जनजातीय समूह, तथा ब्राह्मणवादी सत्ता को न मानने वाले सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को नीच या जाति से बहिष्कृत माना गया क्योंकि वे विभिन्न वर्गों के पुरुष व स्त्रियों से जन्मे थे। प्रतिलोम संबंधों (जहाँ माता का वर्ण पिता के वर्ण से उच्च होता था) से उत्पन्न भी नीच माने गए। इन मिश्रित समूहों में से पहले आठ,(जो जन्मजात गतिविधियों से आजीविका कमाते थे) जिन्हें द्विजों द्वारा तिरस्कृत किया गया; उनमें चिकित्सक के तौर पर काम करने वाले (वैश्य माता, ब्राह्मण पिता) अंबष्ठ; मछलियों का शिकार करने वाले (शूद्र माता, ब्राह्मण पिता) निषाद; उग्र (शूद्र माता, क्षत्रिय पिता) कसत्त (क्षत्रिय माता, शूद्र पिता) शामिल थे, इन दोनों को बिलों में रहने वाले जीवों को पकड़ कर मारने का काम दिया गया था; इसके अतिरिक्त अश्वपालक या सारथी सूत (ब्राह्मण माता, क्षत्रिय पिता); व्यापार करने वाले मगध (क्षत्रिय माता, वैश्य पिता); स्त्रियों के लिए काम करके आजीविका कमाने वाले वैदेह (ब्राह्मण माता, वैश्य पिता); बढ़ईगिरि करने वाले (वैश्य माता, शूद्र पिता) अयोगव और अंत में चांडाल (ब्राह्मण माता, शूद्र पिता) शामिल थे। सबसे आखिर वाले सबसे निम्नतम माने गए और कम से कम एक सहस्राब्दि तक अस्पृश्यों के लिए प्रतिमान बने रहे, उन्हें कोई निश्चित कार्य या पेशा नहीं दिया गया (Manusmriti 10: 8726, 45) । इसके
अतिरिक्त, मनुस्मृति में सत्रह अन्य वर्ण संकर जातियों के बारे में बताया गया है (इनमें उग्र माता व कसत्त पिता से जन्मे सोपक भी शामिल हैं), और साथ ही यह भी कहा गया कि ये निम्न जातियाँ हैं:

इन्हें छोटे टीलों, पेड़ों तथा श्मशान गृहों, पर्वतों
व झुरमुटों में रहते हुए, अपनी जन्मजात
गतिविधियों से आजीविका कमानी चाहिए।
परंतु चांडाल और सोपकों का आवास देहात के
बाहर होना चाहिए; उन्हें तिरस्कृत पात्रों को
प्रयोग में लाना चाहिए, कुत्ते व गधे उनकी
संपदा हों। वे मृत लोगों के वस्त्र पहनें और उन्हें
फूटे पात्रों में भोजन दिया जाए; उनके आभूषण
काले लोहे के बने हों, वे निरंतर यहाँ से वहाँ
घूमते रहें। (पूर्वोक्त: 50)

हालांकि मनुस्मृति के इस विभाग को बहुत बाद में आया हुआ माना जाता है, यह (Sharma 1958: 191) के अनुसार यह पांचवीं सदी का है) इन चांडालों के प्रति ब्राह्मणों के विस्तृत रवैए का सूचक है। एक ही ब्राह्मण या क्षत्रिय जातियों से जन्मे अन्य लोगों को नीचा इसलिए माना गया क्योंकि उनके पिता विभिन्न संकल्प व अनुष्ठानों का पालन नहीं कर रहे थे। इनमें मल्ल तथा
लिच्छवी जैसे गण-संघ समूह, तथा द्रविड़ व करण (जो बाद में लिपिकों व नौकरशाहों की जाति के रूप में महत्त्वपूर्ण हुए) शामिल थे। अनुष्ठान करने में असफल तथा पुरोहितों के संपर्क में न रहने वाले नीच खत्तियों की संतानों में द्रविड़, चोल, पारसी, चीनी, यवन, शक, पुंड्रक, किरात व अन्य शामिल हैं (Manusmriti 10: 32-41) यह सब कुछ सही मायनो में सामाजिक यथार्थ का विवरण नहीं था परंतु एक नव विकसित वर्ग विभाजन के संदर्भ में तार्किक ठहरने का एक प्रयत्न था। यह भी एक
रोचक तथ्य है कि आरंभिक महाकाव्य में चारण (भाट) कहलाने वाले सूत और माग्ध, अब निम्न जाति के रूप में वर्गीकृत हुए। माग्ध को वैदेहिका के साथ, माग्ध व विदेही के आरंभिक राज्यों से जोड़ा जा सकता है और तब तक, स्पष्ट रूप से बढ़े रहे आक्रामक ब्राह्मणवाद में संपूर्ण मौर्य साम्राज्य को ब्राह्मण-विरोधी धर्मों के क्षेत्र मान कर, नीचा माने जाने लगा था। जिन समूहों को निम्न या बहिष्कृत माना गया, उनमें से अधिकतर, सीमावर्ती क्षेत्रों के जनजातीय समुदायों का प्रतिनिधित्व करते थे। उनमें से अनेक महाभारत व रामायण महाकाव्यों में वर्णित हैं; और अलग-अलग समय पर, विभिन्न सूचियों व प्रसंगों के माध्यम से उनके गिरते हुए स्तर का परिचय मिलता है।उदाहरण के लिए, निषादों को पहले स्वतंत्र रूप में, 'आर्य योद्धाओं' के समकक्ष माना जाता था परंतु परवर्ती संदर्भो में उन्हें नीच मान कर अरुचि प्रकट की गई है (Brockington 1997: 101-105) | कुछ सुनिश्चित समूहों के बदलते संदर्भो से न केवल उनके कुछ इतिहास का परिचय मिलता है, बल्कि ब्राह्मणवादी परंपरा में वर्गीकृत संकल्पना के विकास का भी पता चलता है। यह एक ऐसा विकास है जिसमें कृषि का अभ्यास, अधिकतर कलात्मक पेशे तथा चिकित्सा जैसे मूलत: महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक व्यवसाय निम्न होते चले गए। वर्ण व्यवस्था को परिभाषित करने की प्रक्रिया में, ब्राह्मणों ने अपने लिए कड़े प्रशिक्षण व अनुशासन की व्यवस्था की, जिसमें अध्ययन, वेदों का ज्ञान प्राप्त करना, पुरोहितों के कर्म-कांड सीखना, कई प्रकार के भोजन से संयम तथा विस्तृत अनुष्ठानिक व्यवहार शामिल था ताकि उनकी निजी शुचिता (शुुुुध्दी) बनी रहे। इसके लिए संसारी जीवन के सभी भौतिक तथा निम्न माने जाने वाले पक्षों से संपर्क को उपेक्षित करना अनिवार्य था। मादक पेय पदार्थ सोम तथा गोमांस के वैदिक प्रेम के विपरीत, शाकाहारवाद इसके महत्त्वपूर्ण अंग के रूप में सामने आया। 'शुचिता-अशुद्धि' (सोवला-ओवला) के प्रति ब्राह्मणों की यह चिंता, उनकी पहचान का एक महत्त्वपूर्ण अंग बन कर उभरी; परिश्रम तथा समाज के अन्य वर्गों की सेवा इसका आधार थी, परंतु इसने एक अनूठी रहस्यात्मकता को रचने में सहयोग दिया।

ब्राह्मणवाद का दर्शन व धर्म :
पहली सदी ई.पू. के मध्य तक आते-आते, प्राचीन वैदिक धर्म के रूपांतरण की आवश्यकता स्पष्ट हो गई। जहाँ चारागाही समाज के लिए बलिकर्म उपयुक्त था, वहीं यह अतिरिक्त संसाधनों के उत्पादक प्रयोग के लिए बेपरवाह था और निरंतर गतिशील बना रहता, यह कृषि व शहरी समाज के लिए अनुपयुक्त था, जिसे उत्पादक उद्देश्यों
(निर्माण व व्यापार) व व्यक्तिगत आनंद के लिए अपने अतिरिक्त संसाधनों की आवश्यकता थी। इसके साथ ही, बौद्ध, जैन तथा अन्य द्वारा, पशुओं की बलि के लिए निरंतर की जाने वाली निंदा का भी प्रभाव हो रहा था। 'ब्राह्मणवाद' का प्रत्युत्तर, वैदिक बलिकर्म की श्रेष्ठता को नकारना नहीं परंतु इसकी नए सिरे से व्याख्या करना था। दिन-प्रतिदिन, बलिकर्म, जीवन के पूरे चक्र को अनुष्ठानिक बनाने लगा और इसके माध्यम से ही किसी व्यक्ति के जीवन के इतिहास की सभी प्रमुख घटनाओं को देखा गया। वैदिक धर्म से उपजा, 'ब्राह्मणवाद' अपने ग्रंथों की सत्ता का दावा कर रहा था परंतु उसने मूलत: विभिन्न रूपों में उनका प्रयोग करते हुए, संसार को रिवाज़ व संस्कार सौंपे।

यह सब बहुत अधिक दार्शनिक व रहस्यवादी परिकल्पनाओं के साथ किया गया। हालांकि, समन परंपरा के विपरीत, इसे संभ्रांत व साधारणजन के बीच, क्षेत्रों व वनों में, नगर के चौराहों व सभा कक्षों में खुलेआम विवाद के विषय के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया। इसकी बजाए,  जैसा कि उपनिषद दिखाते हैं गुप्त शिक्षा की परंपरा, संरक्षण व सेवा के सामाजिक संबंध की सुदृढ स्थापना के साथ, गुरु के माध्यम से शिष्य तक पहुँचाई गई। प्राय: उपनिषदों के अंत में ऐसा विभाग दिया जाता है जिससे पता चलता है कि वह ज्ञान किन वंशों से होते हुए वहाँ तक पहुँचा - यह बाइबिल के 'उत्पत्ति के समानांतर है!

उपनिषदों की परिकल्पना 700 ई.पू. से ईसवी की आरंभिक सदियों तक विस्तृत है। (Roebuck, introduction to Upanishads 2000: 12-16), जो काफ़ी हद तक, कर्म व पुनर्जन्म की संरचना में, पुनर्जन्म के सभी चक्रों में व्यक्तिगत आत्मन् की परिकल्पना के आसपास घूमती है। इसमें एक अनुभवसिद्ध, वस्तुपरक आत्म का सार्वभौमिक, आदिकालीन सत्ता में रूपांतरण शामिल है, जो अमूर्त व अनंत था। इसका एक आरंभिक व विख्यात उदाहरण, ऋषि याज्ञवल्क्य द्वारा अपनी पत्नी मैत्रेयी को दी गई शिक्षा में देखा जा सकता है, जिसे बृहदारण्यक उपनिषद में वर्णित किया गया है। (4.5.6)

पति के प्रति प्रेम के कारण ही पति प्रिय नहीं
जान पड़ता: आत्मा के प्रति प्रेम के कारण पति
प्रिय लगता है। पत्नी के प्रति प्रेम के कारण
पत्नी प्रिय नहीं जान पड़ती: आत्मा के प्रति
प्रेम के कारण पत्नी प्रिय है। संतान के प्रति प्रेम
के कारण संतान प्रिय नहीं है: आत्मा के प्रति
प्रेम के कारण संतान प्रिय है। ... वेदों के प्रति
स्नेह के कारण वेद प्रिय नहीं हैं . यह आत्मा
है जिसे देखा, सुना व सोचा तथा ध्यान किया
जाना चाहिए, मैत्रेयी; जब आत्मा को देखा,
सुना व सोचा तथा ध्यान किया जाता है, तो यह
सब ज्ञात होता है।

आत्मन् या आत्मा को निराकार, नित्य व सभी जीवों में एक सी माना गया; यह ब्राह्मण के समान थी। ‘सोल' शब्द से इसका अधूरा अनुवाद सामने आता है। उप्रेती ने बौद्ध धर्म का विश्लेषण करते हुए कहा कि इसने नए वाणिज्यिक युग के उपयुक्त व्यक्तिवाद के सृजन में सहायता प्रदान की, परंतु वे उपनिषद की शिक्षाओं को ऐसे व्यक्तिवाद के विकास की दिशा में एक प्रमुख व उल्लेखनीय कदम के रूप में देखते हैं (Upreti 1997: 89- 98) । यदि ऐसा था, तो यह एक अमूर्त व्यक्तिवाद था। ऐसा व्यक्तिवाद जिसमें सच्चे अर्थों में एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के बीच कोई नैतिक अथवा आचार से जुड़ा
संबंध नहीं रहता। याज्ञवल्क्य की शिक्षा के अनुसार, दूसरे व्यक्ति को अनुभवजन्य व्यक्ति के रूप में प्रेम करने के लिए कोई दार्शनिक औचित्य नहीं दिया जा सकता।चेतना के विषय, व्यक्तिगत 'मैं अथवा अहं' को सार्वभौमिक इष्ट, 'तत् त्वम असि', माना जाता था या कहते थे कि आत्मा ही ब्राह्मण है। इस संसार की लीला, इसकी ऋतुएँ व परिवर्तन, इसके दु:ख व आनंद अंतत: एक खेल थे, एक नाटक, उस अनंत आत्मा की एक माया। कर्म व पुनर्जन्म की अवधारणा को इसके एक अंश के रूप में स्वीकारा गया; वास्तव में उन्हें वर्ण तंत्र के लिए प्रमुख कारण के रूप में प्रयुक्त किया गया। हालांकि वेदों के लिए गुप्त रूप में निंदा थी परंतु उन्हें प्रत्यक्ष तौर पर कभी नहीं नकारा गया। ठीक इसी प्रकार, उपनिषद दर्शाते थे कि वास्तव में अनेक गैर-ब्राह्मण गैर-ब्राह्मणों ने इसके दार्शनिक विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, परंतु इसे कभी खुलेआम स्वीकार कर, ब्राह्मणों की श्रेष्ठता को चुनौती नहीं दी गई। अंत में, कई बार कहा जाता था कि पहली सदी ई.पू. में उपनिषद की शिक्षाएँ
हाशिए पर थीं। आगे चल कर शंकराचार्य जैसे चिंतकों ने उनके आधारभूत विषयों का विस्तार किया और उन्हें 'वेदांत' का नाम दिया गया ताकि वेदों के साथ उनकी निरंतरता पर बल दिया जा सके।

इस अनंत ब्राह्मण, जिसे व्यक्तिगत 'मैं' भी कहा जाता था, इसे किसी भी वैदिक देव अथवा लोकप्रिय स्थानीय संप्रदाय के देवताओं के साथ पहचाना जा सकता था। ब्राह्मणों द्वारा, मौजूदा संप्रदायों को उपयुक्त बनाने की योग्यता ही उनकी संभावित ऐतिहासिक सफलता के प्रमुख कारकों में से एक रही। शैववाद तथा वैष्णववाद नामक दो प्रमुख संप्रदाय सम्मुख आए जो कि शिव/शक्ति अथवा ‘पशुपति' व कृष्ण का भागवत संप्रदाय थे,
और इन्हें एक प्रकार के वैदिक ढाँचे में उपयुक्त बिठाया गया। वे वास्तव में परस्पर इतने अलग थे कि दो सदी बाद भी, वे दो विभिन्न धार्मिक परंपराओ की पहचान बने रहे।

देवों की ब्राह्मण संबंधी विकसित 'त्रिमूर्ति' में दूसरे, 'विष्णु' के संबंध में मान्यता थी कि उनके अनेक अवतार हुए और उनमें से कृष्ण का अवतार सबसे मनमोहक था। कृष्ण के आसपास अनेक प्रसंग गुंथे हैं, यादवों के शासक तथा महाकाव्य महाभारत के चचेरे भाईयों पांडवों के साथी (वास्तव में, समाज में बहुत सारी कथाएँ कही जाती थीं, उनमें से अनेक को जातक कथाओं में
दिखाया गया, जिन्होंने राम व महाभारत की आरंभिक संस्करणों को भी जन्म दिया।) सर्वाधिक विख्यात ब्राह्मणवादी धार्मिक ग्रंथ में अर्जुन के इस सारथी का संबंध सर्वोच्च देवता से जोड़ा गया, भगवद् गीता, को महाभारत में ही शामिल किया गया।

भगवद् गीता, केवल संभ्रांत वर्ग के लिए नहीं बल्कि जनसाधारण के लिए रची गई, यह नए वर्णाश्रम धर्म समाज का सर्वव्यापी ब्रह्माण्ड संबंधी-दार्शनिक प्रामाणिकता थी। गीता में, कुरुक्षेत्र के मैदान में, युद्ध आरंभ होने से पूर्व, पांडवों के नायक अर्जुन की दुविधा का चित्रण है: उसे अपने ही सगे-संबंधियों के संहार का माध्यम क्यों बनना चाहिए? उसे प्रत्युत्तर देते हुए, कृष्ण न केवल अपनी दिव्यता का दावा प्रकट करते हैं तथा इस नर-संहार को अवास्तविक बताते हुए, जाति के आदर्श स्थापित करते हैं व स्वधर्म की घोषणा करते हैं। इसके अनुसार, अपनी जाति के अनुसार कर्तव्य का निर्वाह करना ही, व्यक्ति का सर्वोच्च उत्तरदायित्व है। गीता के आरंभ व अंत में यही प्रतिबिंबित होता है, 'किसी दूसरे के काम को श्रेष्ठ रूप में करने से उचित है कि व्यक्ति अपने ही कर्तव्य का बुरा प्रदर्शन करे।' आत्म-नियंत्रण, अनासक्त कर्म, मोह से मुक्ति आदि की घोषणा, वर्ण के ढाँचे के भीतर की गई:

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यों व शूद्रों तथा शत्रुओं पर
प्रहार करने वालों के लिए कर्मों में अंतर है।
अपनी सहज वृत्ति से उत्पन्न तंतुओं के
अनुसार, प्रशांति, आत्म-नियंत्रण, तपश्चर्या,
शुद्धता, धैर्य व सत्यनिष्ठा, सैद्धांतिक व
व्यावहारिक ज्ञान व धार्मिक आस्था, ब्राह्मणों
के सहज प्राकृतिक कर्म हैं।

नायकत्व, प्रताप, दृढता, कौशल तथा रण से
पीठ न दिखाना, क्षत्रियों के सहज प्राकृतिक
कर्म हैं।

कृषि, पशु-पालन तथा वाणिज्य वैश्यों के सहज प्राकृतिक कर्म हैं; ऐसे कर्म, जिनमें सेवा शामिल है, वह शूद्रों के सहज प्राकृतिक कर्म हैं। (Edgerton 1944: 87) द्वारा अनूदित यहाँ हम देख सकते हैं कि किस प्रकार सर्वव्यापी ब्रह्म के 'सार' को मानवता तथा वर्ण-जाति के विशिष्टीकरण को अंशों में बाँट दिया गया। उदाहरण के लिए, अपनी जाति के अनुसार किया गया प्रदर्शन, योद्धा के मामले में लड़ने के कर्तव्य का निर्वाह, वैदिक बलिदान, सच्चे यज्ञ के प्रदर्शन का प्रतिनिधित्व करता है। इस प्रकार क्षत्रियों की नर-संहार भूमि, वास्तव में धार्मिक कर्तव्य का क्षेत्र अर्थात 'धर्मक्षेत्र' है।

गीता के साथ, यह स्पष्ट हो गया कि जब तक आत्मा उस सर्वव्यापी तत्त्व के साथ विलीन नहीं होती, तब तक आत्मा का सार यही प्राप्त करना है कि वह ब्रह्माण्ड का स्थिर-चक्रीय दृष्टिकोण तथा इसमें मानवता का स्थान बनाए रखे। जीवन, सामाजिक चक्र, युद्ध, संभोग, धनार्जन आदि सभी पवित्र कर्तव्य के अंश हैं और सामाजिक उत्तरदायित्व से परे, कोई व्यक्तिगत मोक्ष नहीं है।

सार्वभौमिक व्यक्तिगत अधिकारों व कर्तव्यों के विचारों के साथ उस उत्तरदायित्व में संशोधन की भी आवश्यकता नहीं है (भले ही कोई राजा हो या योद्धा, जमींदार हो या कृषक अथवा कोई दास)। लोगों से आग्रह किया जाता था कि वे अपने वचन का पालन करें, जिस में चारों वर्गों का संसार तथा उनके अनुष्ठानों का जीवन भी सम्मिलित था। गीता में कृष्ण का सबसे प्रमुख वचन यही है कि वे अधर्म का नाश करने के लिए बार-बार अवतार लेते रहेंगे, और ब्राह्मणवादी सांसारिक दृष्टिकोण में, न केवल बढ़ते हुए अपराध व हिंसा, बल्कि पत्नियों द्वारा पतियों के त्याग व वर्गों के आपसी मिश्रण को भी शामिल किया गया है। एक नए वर्गीय समाज के
उभरने के साथ ही, ब्राह्मणवाद ने सामाजिक व्यवस्था के लिए यह प्राथमिक समाधान प्रस्तुत किया। जाति पर आधारित इस समाधान में, व्यक्तियों के कर्म, मनोवांछित रूप से अवसरवादी हो सकते थे, परंतु उनके लिए वर्ण व्यवस्था के ढाँचे में रहना अनिवार्य था।

शिव का संप्रदाय भी ब्राह्मणवादी हुआ। शिव का संबंध वैदिक देव रुद्र से जोड़ा गया, और उन्हें त्रिमूर्ति में विनाशक या संहारक देव के रूप में जाना गया। यह भी प्राचीन संप्रदाय था और प्रायः इसे मातृ-देवी, शिव-शक्ति संप्रदाय के साथ जोड़ा जाता था। बौद्ध धर्म के एक विद्वान रिचर्ड गोंब्रिच का तर्क है कि आंगुलिमाल, दुष्ट दस्यु व हत्यारा, जिसे बुद्ध ने दीक्षा प्रदान की, उसकी प्रसिद्ध कथा इसी परंपरा की ओर संकेत करती है। अन्य सूचकों के अतिरिक्त, वह दस्यु अपने गले में उन सभी लोगों की कटी अंगुलियों की माला धारण करता था, जिन्हें वह जान से मार देता था। गोंब्रिच का तर्क है कि यह माला, संहारक शिव के कंठ में पड़ी मुंडमाल के समान थी (Gombrich 1997:133-63) यह सत्य हो अथवा न हो, यह तो सुनिश्चित है कि वह संप्रदाय बुद्ध तथा अन्य के समय में भी उपस्थित था और इसे ब्राह्मणवादी परंपरा द्वारा अवशोषित किया गया।

बैरागियों के रूप में, शिव के अनुयायी, स्वयं को बौद्ध, जैन तथा अन्य जटाधारियों से अलग मानते थे और उन्हें
जटिल (जटाधारी) कहा जाता था। दो प्रकार के साधुओं का एक साथ वर्णन मिलता है, वे थे मुंडकजटिल (मुंडित और जटाधारी)। ब्राह्मणवाद संप्रदायों ने तपश्चर्या पर बल दिया जिसके माध्यम से जादुई शक्तियों को अर्जित कर सकते थे और कहते हैं कि स्वयं शिव भी महायोगी व शक्तिशाली थे। शक्ति की अवधारणा को, ऊर्जा व सृजन के रूप में देखा जाता था और उसका संबंध देवी की
उपासना से जोड़ा गया (Bhattacharya 1996)

हालांकि ब्राह्मणवाद ने त्याग व संन्यास को स्वीकारा परंतु इसने अनिच्छा से ही ऐसा किया। ब्राह्मवाद में गृहस्थ जीवन को प्रश्रय (आधार) दिया जाता था; पुरोहित का गृहस्थी होना आवश्यक था; समाज की अंतिम अवस्था में ही संन्यास को स्वीकार किया जाता था। इससे पूर्व, संभ्रांत अथवा कुलीनवर्ग के लिए, ब्रह्मचर्य का पालन करना अनिवार्य था - एक युवक को समाज का उचित ज्ञान प्रदान किया जाता, इसके बाद गृहस्थ जीवन और फिर वानप्रस्थ की बारी आती। परिणामवश, पूर्ण रूप से कट्टर ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था सामने आई - वर्णाश्रम धर्म, अर्थात चार वर्णों का धर्म व जीवन की चार अवस्थाओं का पथ। गृहस्थ के रूप में कर्तव्य का निर्वाह किए बिना, संन्यास धारण करने को पूरी तरह से निरुत्साहित किया जाता था।

By Gail Omvedt 

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