Saturday, December 12, 2020

सौन्दरनन्द, विवेक, सर्ग १२

सौन्दरनन्द महाकाव्य-द्वादश सर्ग, विवेक:

अप्सरोभृतको धर्म चरसीत्यथ चोदितः । आनन्देन तदा नन्दः परं व्रिडमुपागमत् ॥१॥

'अप्सराओं को प्राप्त करने के लिए धर्माचरण कर रहे हो' आनन्द के द्वारा इस प्रकार कहा जाने पर नन्द अत्यंत लज्जित हुआ ॥१॥

तम्य व्रिडेन महता प्रमोदो हृदि नाभवत् । अप्रामोद्यन विमुखं नावतस्थे व्रते मनः ॥२॥

उसके अत्यंत लज्जित होने के कारण उसके हृदय में आनन्द नहीं हुआ । आनन्द नहीं होने के कारण उसका उदास मन व्रत में नहीं लगा ।।२॥

कामरागप्रधानोऽपि परिहाससमोऽपि सन् । परिपाकगते हेतौ न स तन्ममृषे वचः ॥३॥

यद्यपि उसमें काम-राग की प्रधानता थी और यद्यपि वह परिहास की पर्वाह नहीं करता था, तो भी हेतु का परिपाक होने के कारण वह उस वचन को नहीं सह सका ॥३॥

अपरीक्षकभावाश्च पूर्वे मत्वा दिवं ध्रुवं । तस्मात्क्षेष्णुं परिश्रुत्य भृशं संवेगमेयिवान् ॥४॥

ठीक ठीक नहीं देख सकने के कारण उसने पूर्व में स्वर्ग (के भोगों) को ध्रुव (नित्य) समझा था, किंतु अब आनन्द से उस की अनित्यता के बारे में सुनकर उसको अत्यन्त संवेग (भय, वैराग्य) हुआ ॥४॥

तस्य स्वर्गाविनववृते संकल्पाश्वी मनोरथः । महारथ इवोन्मार्गादप्रमत्तस्य सारथे: ॥५॥

उसका मनोरथ, सङ्कल्प ही जिसके घोड़े हैं, स्वर्ग की ओर से लौट गया, जैसे सावधान रहने वाले सारथि का महारथ कुमार्ग से लौट आता हैं ॥५॥

स्वर्गतर्षान्निवृत्तश्च सद्यः स्वस्थ इवाभवत् ।मृष्टादपथ्याद्विरतो जिजीविषुरिवातुरः ॥६॥

स्वर्ग की तृष्णा के नष्ट होने पर वह तुरन्त स्वस्थ-जैसा हो गया, जैसे कि जीवित रहने की इच्छा करनेवाला रोगी स्वादिष्ठ अपथ्य से विरत होकर स्वस्थ हो जाता हैं ॥६॥

विसस्मार प्रियां भार्यामप्सरोदर्शनाद्यथा ।तथानित्यतयोद्विग्नस्तत्याजाप्सरसोऽपि स: ॥७॥

जैसे अप्सराओं को देखकर वह अपनी प्यारी भार्या (पत्नि) को भूल गया था, वैसे ही (स्वर्ग के भोगों की) अनित्यता से उद्विग्न होकर उसने अप्सराओं (को प्राप्त करने की इच्छा) को भी छोड़ दिया ॥७॥

महतामपि भूतानामावृत्तिरिति चिन्तयन् । संवेगाच्च सरागोऽपि वीतराग इवाभवत् ॥८॥

बड़े बड़े प्राणियों (महापुरुषों) को भी (इस लोक में) लौटना पड़ता हैं, इस प्रकार वह चिंता करने लगा और संवेग (भय, वैराग्य) होने के कारण वह रागी (कामी) भी वीतराग-जैसा हो गया ॥८॥

बभूव स हि संवेग: श्रयसस्तस्य वृद्धये ।धातुरेधिरिवाख्याते पठितोऽक्षरचिन्तकैः ॥९॥

यह संवेग उसके कल्याण की वृद्धि के लिए हुआ, जैसे शब्द-शास्त्रियों (वैयाकरणों) के अनुसार एघि धातु की धातु-रूप में वृद्धि होती हैं।॥९॥

न तु कामान्मनस्तस्य केनचिज्जगृहे धृति: । त्रिषु कालेषु सर्वषु निपातोऽस्तिरिव स्मृतः ॥१०॥

काम के कारण उसके मन में किसी भी प्रकार से किसी भी समय में धैर्य नहीं हुआ (अर्थात् उसकी मानसिक चंचलता सदा बनी ही रही), जिस प्रकार 'अस्ति' निपात का प्रयोग (भूत, भविष्य, वर्तमान) तीनों ही काल में बताया जाता हैं ।।१०॥

खेलगामी महाबाहुगजेन्द्र इव निर्मदः । सोऽभ्यगच्छद्गुरुं काले विवक्षुर्भावमात्मनः ॥११॥

मंदगामी गजेन्द्र के समान वह महाबाहु मद-मुक्त होकर समय पर गुरु के समीप अपना अभिप्राय बतलाने की इच्छा से गया।।११॥

प्रणम्य च गुरौ मूध्रा बाष्पव्याकुलनोचन: ।कृत्वाञ्जलिमुवाचेद ह्रिया किंचिदवाङ्मुखः ॥१२॥

उसने शिर नवाकर गुरु को प्रणाम् किया । उसकी आँखों में आँसू आ गये और हाथ जोडकर, लज्जावश कुछ अधोमुख होकर यों कहाः-।।१२।।

अप्सरः प्राप्तये यन्मे भगवन्प्रतिभूरसि ।नाप्सरोभिर्ममार्थोऽस्ति प्रतिभूत्वं त्यजाम्यहं ॥१३॥।

"हे भगवन्, अप्सराओं की प्राप्ति के लिए आप मेरा प्रतिभू (जमानतदार) हैं, मुझे अब अप्सराओं से प्रयोजन नहीं है, इसलिए मैं प्रतिभुत्व (जमानत) का परित्याग करता हूँ ।।१३।।

श्रुत्वा ह्यावर्तकं स्वर्ग संसारस्य च चित्रतां । न मर्ते्यषु न देवेषु प्रवृत्तिर्मम रोचते ॥१४॥

स्वर्ग से लौटना पड़ता हैं और संसार (की गति) विचित्र हैं, ऐसा सुनकर मर्त्य-लोक या देव-लोक में, कहीं भी रहना (जन्म लेना, रमण करना) मुझे पसन्द नहीं हैं ।।१४॥ 

यदि प्राप्य दिवं यत्नाभ्नियमेन दमेन च । अवितृप्ता: पतन्त्यन्ते स्वर्गाय त्यागिने नमः ॥१५।।

यदि प्रयत्नपूर्वक सयंम व इन्द्रिय-दमन के द्वारा स्वर्ग को प्राप्त कर लोग वहाँ से अतृप्त ही गिरते हैं तो मैं उस क्षण-भङ्गुर स्वर्ग को (दूर से) प्रणाम करता हूँ ॥१५॥

अतश्च निखिलं लोकं विदित्वा सचराचरं । सर्वेदुःखक्षयकरे त्वद्धर्मे परमे रमे ॥१६॥

अतः चराचर-सहित सम्पूर्ण लोक का ज्ञान प्राप्त कर मैं सब दु:खों का अन्त करने वाले आपके ही परम धर्म में आनन्द पाता हूँ ॥१६॥

तस्मादृध्याससमासाभ्यां तम्मे व्याख्यातुमर्हसि । यच्छुत्वा श्रृण्वतां श्रेष्ठ परमं प्राप्नुयां पदं ॥१७॥

इसलिए विस्तार और संक्षेप से कृपया मुझे वह बतलावें, जिसे सुनकर, हे श्रोता-श्रेष्ठ, मैं परम पद (निर्वाण) प्राप्त करुं" ।।१७॥

ततस्तस्याशयं ज्ञात्वा विपक्षाणीन्द्रियाणि च ।श्रेयश्चैवामुखीभूतं निजगाद तथागतः ॥१८॥

तब उसका आशय जानकर, उसके इन्द्रियों को वशीभूत और श्रेय को समीपवर्ती समझकर तथागत (बुद्ध) ने कहा--।।१८।।

अहो प्रत्यवमर्शोशयं श्रेयसस्ते पुरोजवः । अरण्या मध्यमानायामग्नेर्धुम इवोत्थितः ॥१९॥

"अहो, तुम्हारा विवेक तुम्हारे श्रेय का पुरोगामी हैं, जैसे अरणियों को रगड़ने से उठा हुआ धुवां अग्नि का अग्रदूत होता हैं ।।१९॥

चिरमुन्मार्गविहृतो लोलैरिन्द्रियवाजिभिः । अवतीर्णोऽसि पन्थानं दिष्ट्या दृष्ट्याविमूढया ॥२०॥

चन्चल इन्द्रिय रूपी घोडों द्वारा तुम चिरकाल तक कुमार्ग पर चले हो, किंतु अब सौभाग्य से सम्यक दृष्टि द्वारा सन्मार्ग पर उतरे हो ।।२०॥

अद्य ते सफल जन्म लाभोऽद्य सुमहांस्तव । यस्य कामरसज्ञस्य नेष्क्रम्यायोत्सुकं मनः ॥२१॥

आज तुम्हारा जन्म सफल हैं और अब तुम्हारा महान् लाभ हैं, जो काम-रस का आस्वाद कर के तुम्हारा मन वैराग्य के लिए उत्सुक हैं ॥२१॥

लोकेऽस्मिन्नालयारामे निवृत्तौ दुर्लभा रतिः । व्यथन्ते ह्यपुनर्भावात्प्रपातादिव बालिशा: ॥२२॥

भोगों में आनन्द पानेवाले इस लोक में निवृत्ति में रति होना दुर्लभ हैं, क्योंकि मूर्ख जन्म-विनाश (मोक्ष) से ऐसे डरते हैं जैसे प्रपात (ऊंची चट्टान, जहां से अपराधियों को दण्ड दिया जाता था) से ॥२२॥

दुःखं न स्यात्सुखं मे स्यादिति प्रथतते जनः ।अत्यन्तदुःखोपरमं सुखं तञ्च न बुध्यते ॥२३॥

'मुझे दुःख न हो, मुझे सुख हो इसके लिए मनुष्य प्रयत्न करता है; किंतु वह यह नहीं जानता हैं कि दुःख का अत्यन्त निरोध ही सुख हैं ॥२३॥

अरिभूतेष्वनित्येषु सततं दुःखहेतुषु । कामादिषु जगत्सक्तं न वेत्ति सुखमव्ययं ॥२४॥

शत्रु-स्वरूप, अनित्य और दुःख-जनक काम-आदि (विषय, भोग) में जगत् निरन्तर आसक्त रहता हैं और वह अविनाशी सुख को नहीं जानता हैं ॥२४॥

सर्वदुःखापहं तत्तु हस्तस्थममृतं तथ । विषं पीत्वा यदगढं समये पातुमिच्छशि ॥२५॥

विष-पान करके, समय पर जिस विष-नाशक औषध को पीना चाहते हो वह सर्व-दुःख-विनाशक अमृत (निर्वाण) तुम्हारे हाथ में हैं ॥२५॥

अनर्हसंसारभयं मानार्ह ते चिकीर्षितं । रागाग्निस्तादृशो यस्य धर्मोन्मुख पराङ्मुखः ॥२६॥

तुम्हारा अभिप्राय सम्मान के योग्य है, क्योंकि इसमें संसार के भय के लिए स्थान नहीं है । हे धर्म की ओर अग्रसर होनेवाले, तुम्हारी वह वैसी रागाग्नि अब विमुख हो गई ॥२६॥

रागोद्दामेन मनसा सर्वथा दुष्करा धृति: । सदोषं सलिल' दृष्ट्वा पथिनेव पिपासुना ॥२७॥

राग के कारण उच्छुङ्खल चित्त के लिए धैर्य धारण करना सब प्रकार से दुष्कर हैं, जैसे दूषित जल को (भी) देखकर प्यासे पथिक के लिए धैर्य रखना कठिन हैं ।।२७॥

ईदृशी नाम बुद्धिस्ते निरुद्धा रजसाभवत् । रजसा चण्डवातेन विवस्वत इव प्रभा ॥२८॥

तुम्हारी यह ऐसी बुद्धि रजोगुण से ढकी (अवरूद्ध) थी, जैसे आंधी की धूल से सूर्य की प्रभा छिपी रहती हैं ॥२८॥

सा जिघांसुस्तमो हार्दं या संप्रति विज़ृम्भते । तमो नैशं प्रभा सौरी विनिर्गीर्णेव मेरुणा ॥२९।।

तुम्हारी यह बुद्धि, जो अभी विकसित हो रही हैं, तुम्हारे हृदय का अज्ञान नष्ट करना चाहती हैं, जैसे मेरु-पर्वत से निकली सूर्य की प्रभा (चारों ओर) फैलकर रात्रि के अन्धकार को दूर करती हैं ॥२९॥

युक्तरूपमिदं चैव शुद्ध सत्वस्य चेतसः । यत्ते स्यान्नैष्ठिके सूक्ष्मे श्रेयसि श्रद्दधानता ॥३०॥

यह तुझ पवित्रतात्म के चित्त के ही अनुरूप हैं कि सूक्ष्म एवं नैष्ठिक श्रेय में तुम्हारी श्रद्धा उत्पन्न हुई हैं ॥३०॥

धर्मच्छन्दमिमं तस्माद्विवर्धयितुमर्हसि । सर्वधर्माहि धर्मज्ञ नियमाच्छन्दहेतवः ॥३१॥

इसलिए तुम्हें धर्म की इस इच्छा को बढ़ाना चाहिए; क्योंकि सब धर्मों (तत्वों) का कारण, हे धर्मज्ञ, इच्छा ही हैं ॥३१॥

सत्यां गमनबुद्धौ हि गमनाय प्रवर्तते । शय्याबुद्धौ च शयनं स्थानबुद्धौ तथा स्थितिः ॥३२॥

क्योंकि चलने की बुद्धि (इच्छा) होने पर मनुष्य चलने में प्रवृत्त होता हैं, सोने की बुद्धि होने पर सोता हैं और खड़ा होने की बुद्धि होने पर खड़ा होता हैं ॥३२॥

अन्तर्भूमिगतं ह्यम्भः श्रद्दधाति नरो यदा । अर्थित्वे सति यत्नेन तदा खनति गामिमां ॥३३।।

पृथ्वी के भीतर जल हैं, यह श्रद्धा (विश्वास) जब मनुष्य को होता हैं, तब प्रयोजन होने पर वह प्रयत्नपूर्वक पृथ्वी को खनता हैं ॥३३॥

नार्थी यद्यग्निना वा स्याच्छद्धध्यात्तं न वारणौ ।मथनीयात्नारणिं कश्चित्तद्भावे सति मथ्यते ॥३४॥

यदि अग्नि से प्रयोजन न हो, या यदि अरणि (काष्ठ) में अग्नि हैं यह श्रद्धा (विश्वास) न हो तो कोई भी मनुष्य अरणि को न रगड़ेगा; किंतु उस (श्रद्धा और प्रयोजन) के होने पर उसे रगड़ते हैं ॥३४॥

सस्योत्पत्तिं यदि न वा श्रद्दध्यात्कार्षकः क्षितौ । अर्थी सस्येन वा न स्याद् वीजानि न वपेद् भुवि ॥३५॥

भूमि से अन्न की उत्पत्ति होती हैं, यदि यह श्रद्धा कृषक (किसान) को न हो या यदि अन्न से उसे प्रयोजन न हो, तो वह भूमि में बीज न बोयेगा ॥३५॥

अतश्च हस्त इत्युक्ता मया श्रद्धा विशेषत: । यस्माद्गृहृति सद्धर्मं दायं हस्त इवाक्षत: ॥३६॥

जैसे हाथ दान ग्रहण करता हैं, वैसे ही श्रद्धा सद्धर्म को ग्रहण करती हैं; इसलिए मैंने श्रद्धा को विशेष रूप से हाथ कहा हैं ॥३६॥

प्राधान्यादिन्द्रियामति स्थिरत्वाद्बलमित्यतः ।गुणदारिद्र्यशमनाद्धनमिस्यभिवर्णिता ॥३७॥

प्रधान होने के कारण इसे (श्रद्धा को) इन्द्रिय, स्थिर होने के कारण इसे बल और गुणों की दरिद्रता दूर करने के कारण इसे धन बतलाया गया हैं ॥३७॥

रक्षणार्थेन धर्मस्य तथेषीकेत्युदाहृता ।लोकेऽस्मिन्दुर्लभत्वाच्च रत्नामत्यभिभाषिता ॥३८॥

उसी प्रकार धर्म की रक्षा कर सकने के कारण इसे ईषिका (नामक अस्त्र-विशेष), और इस लोक में दुर्लभ होने के कारण इसे रत्न कहा गया हैं॥३८॥

पुन्श्च बीजमित्युक्ता निमित्तं श्रेयसो यदा । पावनार्थेन पापस्य नदीत्यभिहिता पुनः ॥३९॥

फिर श्रेय का निमित्त होने के कारण बीज और पाप को पवित्र कर सकने के कारण नदी (तीर्थ) कहा गया हैं ॥३९॥

यस्माद्धर्मस्य चोत्पत्तौ श्रद्धा कारणमुक्तमं । मयोक्ता कार्यतस्तस्मात्तत्र तत्र तथा तथा ॥४०॥

क्योंकि धर्म की उत्पत्ति में श्रद्धा उत्तम कारण हैं, इसलिए मैंने इसके कार्य के अनुसार इसे ये (उपर्युक्त ) नाम दिये हैं ॥४०॥

श्रध्दाङ्कुरमिमं तस्मात्संवर्धेयितुमर्हसि । तदवृध्दौ वर्धते धर्मो मूलवृद्धौ यथा द्रुमः ॥४१॥

इसलिए इस श्रद्धा-अङ्कुर को तुम्हें बढ़ाना चाहिये, क्योंकि इसके बढ़ने से धर्म वैसे ही बढ़ता हैं जैसे जड़ के बढ़ने से वृक्ष ॥४१॥

व्याकुलं दर्शनं यस्य दुर्बलो यस्य निश्चयः। तस्य पारिष्लवा श्रद्धा न हि कृत्याय वर्तते ॥४२॥

जिसकी विचार (दृष्टि) आकुल (बेचैन) हैं, जिसका निश्चय दुर्बल हैं उसकी चन्चल श्रद्धा सफलता के लिये नहीं हैं ॥४२॥

यावत्तत्त्वं न भवति हि दृष्टं श्रुतं वा तावच्छद्धा न भवति बलस्था स्थिरा वा । दृष्टे तत्त्वे नियमपरिभूतेन्द्रियस्य श्रद्धावृक्षो भवति सफलश्चाश्रयश्च ॥४३।।

सौन्दरनन्दे महाकाव्ये प्रत्यवमर्शो नाम द्वादशः सर्गः ।

जब तक मनुष्य तत्त्व को देख या सुन नहीं लेता हैं, तब तक उसकी श्रद्धा बलवती या स्थिर नहीं होती हैं । संयम के द्वारा इन्द्रियों को जीतकर जिसको तत्व का दर्शन होता है उसका श्रद्धा-रूपी वृक्ष फल और आश्रय देता हैं ।।४३॥

सौन्दरनन्द महाकाव में "विवेक" नामक द्वादश सर्ग समाप्त ।

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