Friday, December 11, 2020

सौन्दरनन्द : स्वर्ग की निन्दा

अश्वघोष कृत 'सौन्दरनन्द' महाकाव्य 
(सर्ग ११, स्वर्ग की निन्दा)

आर्जवाभिहितं वाक्यं न च गन्तव्यमन्यथा । रूक्षमप्याशये शुद्धे रूक्षतो नैति सज्जन: ॥१५॥ 

सरलता (साधुता) पूर्वक कहे गये वचन को अन्यथा नहीं समझना चाहिए । आशय शुद्ध होने पर रूखे वचन को भी सज्जन रूखा नहीं समझता है ॥१५॥

अप्रियं हि हितं स्निग्धमस्निग्धमहितं प्रियं । दुर्लभं तु प्रियहितं स्वादु पथ्यमिवौषधं ॥१६॥

क्योंकि हितकारी अप्रिय वचन स्नेह से परिपूर्ण (मित्र का) होता है और अहितकारी प्रिय वचन स्नेह से रहित (अमित्र का) होता है, प्रिय भी हो और हितकर भी हो ऐसा वचन दुर्लभ है, वैसे ही जैसे कि औषधि जो स्वादिष्ठ भी हो और रोग-निवारक (स्वास्थ्य-प्रद) भी हो ॥१६॥

विश्वासश्चार्थचर्या च सामान्यं सुखदुःखयोः । मर्षणं प्रणयश्चैव मित्रवृत्तिरियं सतां ॥१७॥

विश्वास, उपकार, सुख-दुःख में समान भाव, क्षमा और प्रेम-यही तो सज्जनो की मित्रता हैं ॥१७॥

तदिदं त्वा विवक्षामि प्रणयान्न जिघांसया । त्वच्छे यो हि विवक्षा मे यतो नार्हाम्युप्पेक्षतुं ॥१८॥

इसीलिए प्रेम के वशीभूत होकर, न कि तुम्हारी हिंसा करने की इच्छा से मैं (आनन्द) तुम्हें कुछ कहना चाहता हूँ; मैं तुम्हें तुम्हारा श्रय कहना चाहता हूँ; क्योंकि इसकी उपेक्षा करना मेरे लिए उचित नहीं है ॥१८॥

अप्सरोभृतको धर्म चरसीत्यभिधीयसे । किमिदं भूतमाहोस्वित्परिहासोऽयमीद्दशः ॥१९॥

अप्सराओं को प्राप्त करने के लिए धर्माचरण करते हो, ऐसा लोग कहते हैं। क्या यह सत्य है ? या यह परिहास है ? ॥१९॥

यदि तावदिदं सत्यं वक्ष्याम्यत्र यदौषधं । औद्धत्यमथ वक्तृणामभिधास्यामि तद्रजः ॥२०॥

यदि वास्तव में यह सत्य है तो मैं इसकी औषधि बतलाऊँगा या यदि कहने वालों की ढिठाई हैं तो मैं इसे उनका रजस् (दोष) कहूँगा" ॥२०॥

श्लक्ष्णपूर्वमथो तेन हृदि सोऽभिहतस्तदा । ध्यात्वा दीर्घं निशश्वास किंचिश्चावाङ् मुखोऽभवत् ॥२१॥

तब उसके द्वारा अपने हृदय में कोमलता पूर्वक आहत होकर उसने ध्यान (चिन्तन) किया और लम्बी साँस लेकर अपने मुखको कुछ नीचे कर लिया ॥२१।।

ततस्तस्येङ्गितं ज्ञात्वा मनःसंकल्पसूचकं । बभाषे वाक्यमानन्दो मधुरोदर्कमप्रियं ॥२२॥

तब उसके मानसिक-सङ्कल्प-सूचक सन्केत को जानकर आनन्द ने मधुर-फल-दायक यह अप्रिय वचन कहा:-॥२२।।

आकारेणावगच्छामि तव धर्मप्रयोजनं । यज्ज्ञात्वा त्वयि जातं मे हास्यं कारुण्यमेव च ॥२३॥

"तुम्हारी आकृति से ही तुम्हारे धर्माचरण का प्रयोजन जान लिया, जिसे जानकर तुम्हारे प्रति मुझे हंसी आती हैं और दया होती है ॥२३॥

यथासनार्थं स्कन्धेन कश्चिद्गुर्वी शिलां वहेत् । तद्वत्त्वमपि कामार्थ नियमं वोढुमुद्यतः ॥२४॥

बैठने के लिए जैसे कोई आदमी अपने कन्धे पर भारी पत्थर को ढोये, वैसे ही तुम भी कामोपभोग के लिए नियम को ढोने (पालन-करने) में उद्यत हुए हो ॥२४।।

तिताडीयषया दृप्तो यथा मेषोऽपसर्पति । तद्वदब्रह्मचर्याय ब्रह्मचर्यमिदं तव ॥२५॥

जैसे गर्वित भेड़ा चोट करने की इच्छा से पीछे हट जाता है, वैसे ही तुम्हारा यह ब्रह्मचर्य-पालन अब्रह्मचर्य (कामोपभोग) के लिए हैं ॥२५॥

चिक्रीषन्ति यथा पण्यं वणिजो लाभलिप्सया । धर्मचर्या तव तथा पण्यभूता नं शान्तये ॥२६।।

जिस प्रकार व्यापारी लाभ उठाने के लिए सौदा (पण्य=विक्रेय वस्तु) खरीदना चाहते हैं, उसी प्रकार तुम्हारा यह धर्माचरण पण्यं-स्वरूप (सौदा के समान) है, इससे शान्ति नहीं होगी ॥२६॥

यथाफलविशेषार्थ बीजं वरपति कार्षकः ।नद्वद्विषयकार्पण्याद्विषयांस्त्यक्तवानसि ॥२७॥

जिस प्रकार कृषक विशेष फल पाने के लिए बीज बोता है, उसी प्रकार विषयों के लोभ से ही तुमने विषयों का परित्याग किया हैं ।।२७॥

आकाङ्क्षच्च यथा रोगं प्रतीकारसुखेप्सया ।दुःखमन्विच्छति भवांस्तथा विषयतृष्णया ॥२८॥

जिस प्रकार (रोग के) प्रतीकार में होने वाला सुख प्राप्त करने की इच्छा से कोई आदमी रोग की अभिलाष करे, उसी प्रकार तुम विषयों की तृष्णा से दुःख की खोज करते हो ।।२८॥

यथा पश्यति मध्वेव न प्रपातमवेक्षते ।पश्यस्यप्सरसस्तद्वद्भ्रशमन्तं न पश्यसि ॥२९॥

जिस प्रकार (मनुष्य वृक्ष पर) मधु (शहद) को ही देखता है और (वृक्षसे) गिरने के खतरे को नहीं, उसी प्रकार तुम अप्सराओं को तो देखते हो, किंतु अन्त में होने वाले पतन को नहीं ॥२९॥

हृद कामाग्निना दीप्ते कारयन वहतो व्रतं । किमिदं ब्रह्मचर्य ते मनसाब्रह्मचारिणः ॥३०॥

कामाग्नि से तुम्हारा हृदय जल रहा हैं और शरीर से व्रत को ढो रहे हो। मन से अबह्मचारी रहते हुए तुम्हारा यह ब्रह्मचर्य कैसा ? ।।३०।।

संसारे वर्तमानेन यदा चाप्सरसस्त्वया । प्राप्तास्त्यक्ताश्च शतशस्ताभ्यः किमिति ते स्पृहा ॥३१॥

संसार में रहते हुए (जन्म-चक्र में भटकते हुए) जब कि तुमने सैकड़ों बार अप्सराओं को पाया और खोया, तब फिर क्यों तुम्हें उनकी अभिलाषा होती है ? ॥३१॥

तृप्तिर्नास्तीन्धनैरग्नेर्नाम्भसा लवणाम्भसः । नापि कामैः सतृष्णस्य तस्मात्कामा न तृप्तये ॥३२॥

जलावन से अग्नि की, जल से समुद्र की और कामोपभोग से तृष्णावान् की तृप्ति नहीं हैं; इसलिए कामोपभोग तृप्तिदायक नहीं ॥३२॥

अतृप्तौ च कुतः शान्तिरशान्तौ च कुतः सुखं । असुखे च कुतः प्रीतिरप्रीतौ च कुतो रतिः ॥३३॥

तृप्ति नहीं होने पर शान्ति कहाँ, शान्ति नहीं होने पर सुख कहाँ, सुख नहीं होने पर प्रीति कहाँ और प्रीति नहीं होने पर रति (आनन्द) कहाँ ? ॥३३।।

रिरंसा यदि ते तस्मादध्यात्मे धीयतां मनः । प्रशान्ता चानवद्या च नास्त्यध्यात्मसमा रतिः ॥३४॥

इसलिए यदि तुम आनन्द चाहते हो तो अ्पने मन को अध्यात्म में लगाओ। शान्त एव निर्दोष अध्यात्म-आनंद के समान दूसरा कोई आनन्द नहीं हैं ।।३४।।

न तत्र कार्य तूर्येरते न स्त्रीभिर्नं विभृषणै: । एकस्त्वं यत्रस्थस्तया रत्याभिरंस्यसे ॥३५॥

उस (अध्यात्म-रति) में तुम्हें संगीत (तूर्य=वाद्य-विशेष) स्त्रियों, अभूषणों का काम नहीं होगा । जहाँ-तहाँ रहकर अकेले ही तुम उस (अध्यात्म-) आनन्द में रमोगे ॥३५॥

मानसं बलवद्दुःखं तर्षे निष्ठति तिष्ठति । तं तर्षं छिन्धि दुःखं हि तृष्णा चास्ति च नास्ति च ॥३६॥

जब तक तृष्णा रहेगी तब तक चित्त को अत्यन्त दुःख होगा । (इसलिए) उस तृष्णा को काटो; क्योंकि दुःख और तृष्णा एक साथ आतें हैं और एक साथ जातें हैं ।।३६॥

संपत्तौ वा विपत्तौ वा दिवा वा नक्तमेव वा । कामेषु हि सतृष्णस्य न शान्तिरुपपद्यते ॥३७॥

समृद्धि में या विपत्ति में, दिन को या रात को, विषयों की तृष्णा रखने वाले को (कभी) शान्ति नहीं होती है ॥३७॥

कामानां प्रार्थना दुःखा प्राप्तौ तृप्तिने विद्यते ।वियोगान्नियतः शोको वियोगश्च ध्रुवो दिवि ॥३८॥

विषयों की खोज में दुःख हैं, उनकी प्राप्ति होने पर तृप्ति नहीं होती हैं। वियोग होने पर शोक नियत हैं और स्वर्ग में उनका वियोग निश्चित हैं ।।३८॥

कृत्वापि दुष्करं कर्म स्वर्ग लब्ध्वापि दुर्लभं । नृलोकं पुनरेवैति प्रवासास्त्वगृहं यथा ॥३९॥

मनुष्य दुष्कर कर्म करके स्वर्ग प्राप्त करता हैं और फिर मनुष्य-लोक को ही लौट आता हैं, जैसे प्रवास के बाद अपने घर को लौटता हो ॥३९॥

यदा भ्रष्टस्य कुशलं शिष्टं किंचिन्न विद्यते । तिर्यक्षु पितृलोके वा नरके चोपपद्यते ॥४०॥

(स्वर्ग से) गिरे हुए का थोड़ा सा भी कुशल (पुण्य) शेष नहीं रहता हैं, इसलिए वह पशु-पक्षियों की योनि में प्रेत-लोक में या नरक में उत्पन्न होता है ।।४०।।

तस्य भुक्तवतः स्वर्गे विषयानुत्तमानपि। भ्रष्टस्यार्तस्य दुःखेन किमाश्वाद: करोति सः ॥४१॥

स्वर्ग में उत्तम विषयों को भोगने के बाद वहाँ से गिरकर वह अत्यत दुःखी हो जाता है, उस समय (उन विषयों का) वह आस्वाद उसका क्या (उपकार) करता हैं ? ।।४१।।

श्येनाय प्राणिवात्सल्यात्स्वमांसान्यपि दत्तवान् । शिबिः स्वर्गात्परिभ्रष्टस्ताद्दक्कृत्वापि दुष्करं ॥४२।।

प्राणियों के प्रति (अतिशय) स्नेह होने के कारण शिबि ने वाज (पक्षी) को अपने शरीर का मांस भी दे दिया, ऐसा दुष्कर कर्म करके भी वह (पुण्य क्षीण होने पर) स्वर्ग से च्युत हुआ ।।४२॥

शक्रस्यार्धासनं गत्वा पूर्वपार्थिव एव यः । स देवत्वं गतः काले मान्धाताधः पुनर्ययो ॥४३।।

जिस प्राचीन राजा मान्धाता ने इन्द्र का आधा आसन प्राप्त किया वह देवत्व को प्राप्त होकर भी समय होने पर नीचे (पृथ्वी पर ही) लौट आया ॥४३।।

राज्यं कृत्वापि देवानां पपात नहुषो भुवि । प्राप्तः किल भुजंगत्वं नाद्यापि परिमुच्यते ॥४४॥

नहुष ने देवताओं के ऊपर राज्य किया, तो भी वह (स्वर्ग से) पृथ्वी पर गिर कर सर्प हो गया और अब तक (उस योनि से) मुक्त नहीं हुआ ॥४४॥

तथैवेलिविलो राजा राजवृत्तेन संस्कृतः । स्वर्ग गतवा पुनर्भ्रष्टः कूर्मीभूतः किलार्णवे ॥४५॥

उसी प्रकार राजा इलिविल, जो राजोचित आचरण से शुद्ध (पवित्र) हो गया था, स्वर्ग चला गया और फिर (वहाँ से) गिरकर समुद्र में कछुआ हो गया ॥४५॥

भूरिद्युम्नो ययातिश्च ते चान्ये च नृपर्षभाः ।कर्मभिद्यामभिक्रीय तत्क्षयात्पुनरत्यजन् ॥४६॥

भूरिद्युम्न, ययाति और दूसरे राजर्षियों ने अपने कर्मों से स्वर्ग को खरीदा और उन (कर्मों) के क्षीण होने पर फिर उस (स्वर्ग) का परित्याग किया ॥४६॥

असुराः पूर्वेदेवास्तु सुरैरपहृश्रियः । श्रियं समनुशोचन्तः पातालं शरणं ययुः ॥४७॥

असुरगण पूर्व काल में देवता थे, जब सुरों ने उनकी राज्य-लक्ष्मी का हरण किया तो वे लक्ष्मी के लिए शोक करते हुए पाताल की शरण में चले गये ! ॥४७॥

किं च राजर्षिभिस्तावदसुरैर्वा सुरादिभिः । महेन्द्राः शतशः पेतुर्माहात्म्यमपि न स्थिरं ॥४८॥

राजर्षियों, असुरों, सुरों और दूसरों का क्या कहना ? शत शत महेन्द्र (इन्द्र-लोक से) च्युत हुए, जो महान् से महान् है वे भी चिर-स्थायी नही हैं ॥४८॥

संसदं शोयित्वैन्द्रीमुपेद्रश्चेन्द्रविक्रमः । क्षीणकर्मा पपातोर्वी मध्यादप्सरसां रसन् ॥४९॥

इन्द्र के समान पराक्रमी उपेन्द्र, जिसने इन्द्र की सभा को सुशोभित किया था, अपने कर्मों के क्षीण होने पर अप्सराओं के बीच से रोता हुआ पृथ्वी पर गिरा ॥४९॥

हा चैत्रररथ हा वापि हा मन्दाकिनि हा प्रिये । इत्यार्ता विलपन्तोऽपि गां पतन्ति दिवौकसः ॥५०॥

हा चैत्ररथ (बन) ! हा वापी (सरोवर) हा मन्दाकिनी ! हा प्रिये! इस प्रकार आर्त होकर विलाप करते हुए स्वर्ग के रहने वाले पृथ्वी पर गिरते हैं ।।५०॥

तीव्रं ह्युत्पद्यते दुःखमिह तावन्मुमूर्षतां । किं पुन: पततां स्वर्गादेवान्ते सुखसेविनां ॥५१॥

यहाँ (इस पृथ्वी पर) मरण-काल में मनुष्यों को तीव्र दुःख होता हैं, फिर अन्त में स्वर्ग से गिरते हुए (स्वर्ग-) सुख-सेवियों के दुःख का क्या कहना ? ॥५१॥

रजो गृह्णन्ति वासांसि म्लायन्ति परमा: स्रज: । गात्रेभ्यो जायते स्वेदो रतिर्भवति नासने ॥५२॥

उनके कपड़े धूल से मलिन हो जाते हैं, उनकी उत्तम मालाए मुरझा जाती हैं, शरीर से पसीना निकलता है और वहा रहने में (या सुख भोगने) में उन्हे आनन्द नहीं मिलता है ॥५२॥

एताम्यादौ निमित्तानि च्युतौ स्वर्गाद्दिवौकसां । अनिष्टानीव मर्त्यानामरिष्टानि मुमूर्षतां ॥५३॥

स्वर्ग से गिरते समय स्वर्ग-वासियों के ये पूर्व लक्षण देख पडते हैं, जैसे कि मृत्यु-काल में मनुष्यों के अनिष्ट लक्षण देखे जाते हैं ॥५३॥

सुखमुत्पद्यते यश्च दिवि कामानुपाश्रतां । यश्च दुःखं निपततां दुःखमेव विशिष्यते ॥५४॥

स्वर्ग में कामोपभोग करते समय जो सुख होता है और वहाँ से गिरते समय जो दुःख होता है, सो (सुख से) दुःख ही अधिक है ॥५४॥

तस्मादस्वण्तमत्राणमविश्वास्यमतर्पकं । विज्ञाय क्षयिणं स्वर्गमपवर्गे मरतिं कुरु ॥५५॥

इसलिए, स्वर्ग परिणाम में अच्छा नहीं है, वह रक्षा नहीं करता, वह विश्वसनीय और तृप्ति-दायक नहीं है, वह नाशवान् (क्षणिक, अनित्य) हैं, ऐसा जानकर मोक्ष में अपने मन को जगाओ ॥५५॥

अशरीरं भवाग्रं हि गत्वापि मुनिरुद्रकः । कर्मोणोऽन्ते च्युतस्तस्मात् तिर्यग्योनिं प्रपत्यते ॥५६॥

शरीर-रहित उत्तम जन्म (अरूप लोक) को प्राप्त होकर भी उद्रक मुनि अपने कर्मों का अन्त होने पर वहा से गिरकर पशु-पक्षियों की योनि में गिरेगा ।।५६।। 

मैत्रया सप्तवार्षिक्या ब्रह्मलोकमितो गतः । सुनेत्रः पुनरावृत्ती गर्भवासमुपेयिवान् ॥५७॥

सात वर्षों तक मैत्री-भावना करके सुनेत्र यहाँ से ब्रह्मलोक को गया और फिर लौट कर उसने गर्भ में निवास किया है, उसी प्रकार अज्ञान-सूत्र से बँधा हुआ मनुष्य दूर जाकर भी लौट आता है ।।५७॥

यदा चेश्वर्यवन्तोऽपि क्षयिणः स्वर्गवासिनः । को नाम स्वर्गवासाय क्षष्णवे स्पृहयेद्बुधः ॥५८॥

जब कि ऐश्वर्यशाली स्वर्ग-निवासी भी स्थायी नहीं हैं, तब कौन बुध्दिमान् मनुष्य क्षणिक स्वर्ग-निवास की अभिलाषा करे ? ॥५८॥

सुत्रेण बद्धो हि यथा विहंगो व्यावर्तते दूरगतोऽपि भूय: ।अज्ञानसूत्रेण तथावबद्धो गतोऽपि दूरं पुनरेति लोकः ॥ ५९॥

जिस प्रकार सूते से बँधा हुआ पक्षी दूर जाकर भी फिर लौट आता है, उसी प्रकार अज्ञान-सुत्र से बंधा हुआ मनुष्य दूर जाकर भी लौट आता हैं ।।५९।।

कृत्वा कालविलक्षणं प्रतिभुवा मुक्तो यथा बन्धनाद्भुक्त्वा वंश्मसुखान्यतीत्य समयं भूयो विशंद्धन्धनं । तद्भदुद्यां प्रतिभूवदात्मनियमैर्ध्यानादिभिः प्राप्तवान । काले कर्मसु तेषु भुक्तविषयेष्वाकृष्यते गां पुनः ॥६०॥

जिस प्रकार निश्चित समय के लिए मनुष्य प्रतिभू (जमानतदार) के द्वारा बन्धन (जेल) से मुक्त होता है और घर के सुखों को भोगकर, समय बीतने के बाद, पुनः बंधन में प्रवेश करता है, उसी प्रकार मनुष्य आत्मनियम एवं ध्यान आदि के द्वारा, जैसे प्रतिभू के द्वारा, स्वर्ग प्राप्त करता है और उन कर्मों का फल भोगने के बाद समय होने पर वह फिर पृथ्वी पर घसीट लाया जाता हैं ॥१०॥

अन्तर्जालगताः प्रमत्तमनसो मीनास्तढागे यथाजानग्ति व्यसनं न रोधजनितं स्वस्थाश्चरन्त्यम्भसि । अन्तर्लोकगताः कृतार्थमतयस्तद्वद्दिवि ध्यायिनोमन्यन्ते शिवमच्युतं ध्रुवर्मति स्वं स्थानमावर्तकं ॥६१॥

पोखर में जाल के भीतर असावधान मछलियाँ घेरे से उत्पन्न हुए खतरे को नहीं जानती हैं और प्रसन्नता पूर्वक जल में विचरण करती हैं, उसी प्रकार इस लोक में रहकर स्वर्ग का ध्यान करने वाले (स्वर्ग में प्राप्त होने वाले) अपने विनाशवान् स्थान को ही मङ्गलमय, अविनाशी और स्थिर मानते हैं और अपने को कृतार्थ समझते हैं ।।११॥

तज्जन्मव्याधिमृत्युव्यसनपरिगतं मत्वा जगदिदं संसारे भ्राम्यमाणं दिवि नृषु नरके तिर्यकपितृषु च । यत्त्राणं निर्भयं यच्छिवममरजरं निःशोकममृतं तद्धेतोब्रह्मचर्यं चर जहि हि चलं स्वर्ग प्रति रुचि || ६२।।

इसलिए यह जानकर कि जन्म-मरण और रोग से घिरा हुआ यह जगत् जन्म-चक्र में-स्वर्ग नरक पशु-पक्षिर्यों की योनि, मनुष्य-लोक और पितृ-लोक में-भटक रहा है। जो जरा मरण शोक और भय से रहित है, जो त्राण (रक्षा ) करने वाला, कल्याण-कारी और अमृत हैं उसी के लिए ब्रह्मचर्य का आचरण करो और अस्थायी स्वर्ग के प्रति अपनी इच्छा को छोड़ो ॥६२॥

सौन्दरनन्द महाकाव्ये स्वर्गापवादो नामैकादशः सगेः ।

सौन्दरनन्द महाकाव्य में "स्वर्ग की निन्दा" नामक एकादश सर्ग समाप्त ।

(विस्तार भय के कारण क्रमांक १ से लेकर १४ तक के श्लोकों को कम किया गया हैं)

स्वर्गाची निंदा:सौन्दरनन्द महाकाव्य-

मानसं बलवद्दुःखं तर्षे निष्ठति तिष्ठति । तं तर्षं छिन्धि दुःखं हि तृष्णा चास्ति च नास्ति च ॥३६॥

जोवर तृष्णा राहील तोवर चित्ताला अत्यन्त दुःख होत राहील.(यासाठी) त्या तृष्णेला कापून टाका; कारण दुःख आणि तृष्णा एकत्र येतात व एकत्र जातात. ।।३६॥

संपत्तौ वा विपत्तौ वा दिवा वा नक्तमेव वा । कामेषु हि सतृष्णस्य न शान्तिरुपपद्यते ॥३७॥

समृद्धित किंवा विपत्तीत, दिवसा किंवा रात्री, विषयांची तृष्णा बाळगणाऱ्यांना (कधी) शान्तीची प्राप्ति होत नाही. ॥३७॥

कामानां प्रार्थना दुःखा प्राप्तौ तृप्तिने विद्यते ।वियोगान्नियतः शोको वियोगश्च ध्रुवो दिवि ॥३८॥

विषयांच्या चिंतनात दुःख आहे, त्यांची प्राप्ती झाल्यावर तृप्ती मिळत नाही. वियोग झाल्यावर शोक ठरलेला आहे आणि स्वर्गात त्यांचा वियोग निश्चित आहे. ।।३८॥

कृत्वापि दुष्करं कर्म स्वर्ग लब्ध्वापि दुर्लभं । नृलोकं पुनरेवैति प्रवासास्त्वगृहं यथा ॥३९॥

मनुष्य दुष्कर कर्म करुन स्वर्ग (सुगति) प्राप्त करतो आणि मग मनुष्य-लोकातच परत येतो, जसा काही प्रवासानंतर आपल्या घरी परत येतो. ॥३९॥

यदा भ्रष्टस्य कुशलं शिष्टं किंचिन्न विद्यते । तिर्यक्षु पितृलोके वा नरके चोपपद्यते ॥४०॥

(स्वर्गातून) च्युत होणारांचे थोडे सुध्दा कुशल (पुण्य) शेष राहत नाही, त्यामुळे ते पशु-पक्ष्यांच्या योनित, प्रेत-लोकात किंवा अपायगतित उत्पन्न होतात. ।।४०।।

तस्य भुक्तवतः स्वर्गे विषयानुत्तमानपि। भ्रष्टस्यार्तस्य दुःखेन किमाश्वाद: करोति सः ॥४१॥

स्वर्गात उत्तम विषयांना भोगल्यानंतर तेथून च्युत होऊन ते अत्यत दुःखी होतात, त्या समयी (त्या विषयांचे) ते आस्वाद त्यांचे काय (उपकार) करतात? ।।४१।।

श्येनाय प्राणिवात्सल्यात्स्वमांसान्यपि दत्तवान् । शिबिः स्वर्गात्परिभ्रष्टस्ताद्दक्कृत्वापि दुष्करं ॥४२।।

प्राण्यांच्या प्रति (अतिशय) स्नेह झाल्या कारणाने शिबि ने वाज (पक्ष्या) ला आपल्या शरीराचे मांसही दिले होते, असे दुष्कर कर्म करुन देखील तो (पुण्य क्षीण झाल्यावर) स्वर्गातून च्युत झाला. ।।४२॥

शक्रस्यार्धासनं गत्वा पूर्वपार्थिव एव यः । स देवत्वं गतः काले मान्धाताधः पुनर्ययो ॥४३।।

ज्या प्राचीन राजा मान्धाताने इन्द्राचे अर्धे आसन प्राप्त केले तो देवत्वाला प्राप्त होऊन सुध्दा कालोपरांत खाली (पृथ्वीवरच) परतला॥४३।।

राज्यं कृत्वापि देवानां पपात नहुषो भुवि । प्राप्तः किल भुजंगत्वं नाद्यापि परिमुच्यते ॥४४॥

नहुषाने देवतांवर राज्य केले, तरीही तो (स्वर्गातुन) पृथ्वीवर पडून सर्प झाला आणि आतापर्यंत (त्या योनितुन) मुक्त झाला नाही. ॥४४॥

तथैवेलिविलो राजा राजवृत्तेन संस्कृतः । स्वर्ग गतवा पुनर्भ्रष्टः कूर्मीभूतः किलार्णवे ॥४५॥

त्याच प्रकारे राजा इलिविल, जो राजोचित आचरणाने शुद्ध (पवित्र) झाला होता, स्वर्गाला गेला व नंतर (तेथून) च्युत होऊन समुद्रात कासव बनला.॥४५॥

भूरिद्युम्नो ययातिश्च ते चान्ये च नृपर्षभाः ।कर्मभिद्यामभिक्रीय तत्क्षयात्पुनरत्यजन् ॥४६॥

भूरिद्युम्न, ययाति व दूसरे राजर्षि यांनी आपल्या कर्माने स्वर्गाला विकत घेतले आणि त्यांचे (कर्म) क्षीण झाल्यावर त्या (स्वर्गाचा) परित्याग केला.॥४६॥

असुराः पूर्वेदेवास्तु सुरैरपहृश्रियः । श्रियं समनुशोचन्तः पातालं शरणं ययुः ॥४७॥

असुरगण पूर्व काळी देवता होते, जेव्हा सुरांनी त्यांच्या राज्य-लक्ष्मीचे हरण केले तेव्हा ते तिच्यासाठी शोक करीत पाताळाच्या शरणात गेले ! ॥४७॥

किं च राजर्षिभिस्तावदसुरैर्वा सुरादिभिः । महेन्द्राः शतशः पेतुर्माहात्म्यमपि न स्थिरं ॥४८॥

राजर्षी, असुर, सुर आणि दूसऱ्यांचे काय सांगावे ? शत शत महेन्द्र (इन्द्र-लोकातुन) च्युत झाला, जो महानापेक्षा महान् आहेत तेही चिर-स्थायी नाही. ॥४८॥

संसदं शोयित्वैन्द्रीमुपेद्रश्चेन्द्रविक्रमः । क्षीणकर्मा पपातोर्वी मध्यादप्सरसां रसन् ॥४९॥

इन्द्रा समान पराक्रमी उपेन्द्र, ज्याने इन्द्राच्या सभेला सुशोभित केले होते, आपले कर्म क्षीण झाल्यावर अप्सरांच्या मधून रडत-रडत पृथ्वीवर पडला. ॥४९॥

हा चैत्ररथ हो वापि हा मन्दाकिनि हा प्रिये । इत्यार्ता विलपन्तोऽपि गां पतन्ति दिवौकसः ॥५०॥

हे चैत्ररथ (वन) ! हे वापी (सरोवर) हे मन्दाकिनी ! हे प्रिये! याप्रमाणे आर्त होऊन विलाप करीत स्वर्गात राहणारे पृथ्वीवर पडतात.।।५०॥

तीव्रं ह्युत्पद्यते दुःखमिह तावन्मुमूर्षतां । किं पुन: पततां स्वर्गादेवान्ते सुखसेविनां ॥५१॥

येथे (पृथ्वीवर) मरण-काळात मनुष्यांना तीव्र दुःख होते, मग अंततः स्वर्गातून पडणाऱ्या (स्वर्ग-) सुख-सेवींच्या दुःखाचे काय बोलावे ? ॥५१॥

रजो गृह्णन्ति वासांसि म्लायन्ति परमा: स्रज: । गात्रेभ्यो जायते स्वेदो रतिर्भवति नासने ॥५२॥

त्यांचे कपड़े धुळीने मलिन होतात, त्यांच्या उत्तम फुलमाळा कोमेजून जातात, शरीरातून घामाच्या धारा निघतात आणि तेथे राहण्यात (किंवा सुख भोगण्यात) त्यांना आनन्द मिळत नाही. ॥५२॥

एताम्यादौ निमित्तानि च्युतौ स्वर्गाद्दिवौकसां । अनिष्टानीव मर्त्यानामरिष्टानि मुमूर्षतां ॥५३॥

स्वर्गातून पडताना स्वर्ग-वासियांचे हे पूर्व लक्षण दिसून येतात, ज्याप्रमाणे मृत्यु-समयी मनुष्यांचे अनिष्ट लक्षण दिसून येतात. ॥५३॥

सुखमुत्पद्यते यश्च दिवि कामानुपाश्रतां । यश्च दुःखं निपततां दुःखमेव विशिष्यते ॥५४॥

स्वर्गात कामोपभोग भोगताना जे सुख होते व तेथून च्युत होताना जे दुःख होते, त्या (सुखा पेक्षा) दुःखच अधिक आहे. ॥५४॥

तस्मादस्वण्तमत्राणमविश्वास्यमतर्पकं । विज्ञाय क्षयिणं स्वर्गमपवर्गे मरतिं कुरु ॥५५॥

म्हणून, स्वर्ग परिणामत: उत्तम नाही, रक्षा नाही करीत, तो विश्वसनीय आणि तृप्ति-दायक नाही, तो नाशवान् (क्षणिक, अनित्य) आहे, असे जाणून मोक्ष प्राप्तीसाठी आपल्या मनाला जागवावे ॥५५॥

अशरीरं भवाग्रं हि गत्वापि मुनिरुद्रकः । कर्मोणोऽन्ते च्युतस्तस्मात् तिर्यग्योनिं प्रपत्यते ॥५६॥

शरीर-रहित उत्तम जन्म (अरूप लोकाला=नामक्षेत्राला) प्राप्त होऊन देखील उद्रक मुनि, आपल्या कर्मांचा अन्त झाल्याने, तेथून च्युत होऊन पशु-पक्ष्यांच्या योनित पडला. ।।५६।। 

मैत्रया सप्तवार्षिक्या ब्रह्मलोकमितो गतः । सुनेत्रः पुनरावृत्ती गर्भवासमुपेयिवान् ॥५७॥

सात वर्षे पर्यंत मैत्री-भावना करुन सुनेत्र येथून ब्रह्मलोकाला गेला आणि तेथून परतून त्याने गर्भ निवास केला आहे, त्याच प्रकारे अज्ञान-सूत्राने बांधलेला मनुष्य दूर जाऊन देखील परत येतो. ।।५७॥

यदा चेश्वर्यवन्तोऽपि क्षयिणः स्वर्गवासिनः । को नाम स्वर्गवासाय क्षष्णवे स्पृहयेद्बुधः ॥५८॥

जेव्हा ऐश्वर्यशाली स्वर्ग-निवासी सुध्दा अस्थायी आहे, तेव्हा कोण बुध्दिमान मनुष्य क्षणिक स्वर्ग-निवासाची अभिलाषा बाळगणार ? ॥५८॥

सुत्रेण बद्धो हि यथा विहंगो व्यावर्तते दूरगतोऽपि भूय: ।अज्ञानसूत्रेण तथावबद्धो गतोऽपि दूरं पुनरेति लोकः ॥ ५९॥

ज्या प्रकारे सुताने बांधलेला पक्षी दूर जाऊन ही परत फिरुन येतो, त्या प्रकारे अज्ञान-सुत्राने बांधलेला मनुष्य दूर जाऊन परत फिरुन येतो. ।।५९।।

कृत्वा कालविलक्षणं प्रतिभुवा मुक्तो यथा बन्धनाद्भुक्त्वा वंश्मसुखान्यतीत्य समयं भूयो विशंद्धन्धनं । तद्भदुद्यां प्रतिभूवदात्मनियमैर्ध्यानादिभिः प्राप्तवान । काले कर्मसु तेषु भुक्तविषयेष्वाकृष्यते गां पुनः ॥६०॥

ज्या प्रकारे एक निश्चित वेळेसाठी मनुष्य प्रतिभूचे (जमानतदारचे) द्वारे बन्धनातुन (कारागृहातुन) मुक्त होतो आणि घरच्या सुखांना भोगून, वेळ निघून गेल्यावर, पुनः बंधनात प्रवेश करतो, त्याच प्रकारे मनुष्य आत्मनियम तसेच ध्यान इत्यादी  द्वारे, जसे प्रतिभूच्या द्वारे, स्वर्ग प्राप्त करतो आणि त्या कर्मांचे फळ भोगल्यानंतर वेळ आल्यावर तो परत फिरुन पृथ्वीवर ओढून आणला जातो. ॥६०॥

अन्तर्जालगताः प्रमत्तमनसो मीनास्तढागे यथाजानग्ति व्यसनं न रोधजनितं स्वस्थाश्चरन्त्यम्भसि । अन्तर्लोकगताः कृतार्थमतयस्तद्वद्दिवि ध्यायिनोमन्यन्ते शिवमच्युतं ध्रुवर्मति स्वं स्थानमावर्तकं ॥६१॥

डबक्यात जाळ्याच्या आत असावधान मासोळ्या वेढ्याने उत्पन्न झालेल्या धोक्याला समजत नाही आणि प्रसन्न पूर्वक पाण्यात विचरण करतात, त्याच प्रकारे इहलोकात राहून स्वर्गाचे ध्यान करणारे (स्वर्गात प्राप्त होणाऱ्या) आपल्या विनाशवान् स्थानालाच, मङ्गलमय, अविनाशी, स्थिर मानतात आणि आपल्याला कृतार्थ समजतात.।।६१॥

तज्जन्मव्याधिमृत्युव्यसनपरिगतं मत्वा जगदिदं संसारे भ्राम्यमाणं दिवि नृषु नरके तिर्यकपितृषु च । यत्त्राणं निर्भयं यच्छिवममरजरं निःशोकममृतं तद्धेतोब्रह्मचर्यं चर जहि हि चलं स्वर्ग प्रति रुचि || ६२।।

यासाठी हे जाणून कि जन्म-मरण व रोगाने वेढलेले हे जग जन्म-चक्रात-स्वर्ग-नर्क, पशु-पक्ष्यांची योनि, मनुष्य-लोक आणि पितृ-लोक यांत-भटकत आहे. पण जे जरा मरण शोक व भयापासून रहित आहे, त्राण (रक्षा) करणारे, कल्याण-कारी आणि अमृत आहे त्याचसाठी ब्रह्मचर्याचे आचरण करावे आणि अस्थायी स्वर्गा प्रति आपल्या इच्छेला सोडावे. ॥६२॥

सौन्दरनन्द महाकाव्ये स्वर्गापवादो नामैकादशः सगेः ।

सौन्दरनन्द महाकाव्यात "स्वर्गाची निन्दा" नावाने आकरावे सर्ग समाप्त ।

हिंदी ते मराठी भाषांतर, देव भिवसने....

No comments:

Post a Comment

सौन्दरनन्द-महाकाव्य, आज्ञा-व्याकरण, सर्ग १८

सौन्दरानन्द महाकाव्य, अष्टादश (१८ वां) सर्ग, आज्ञा-व्याकरण (उपदेश): अथ द्विजो बाल इवाप्तवेदः क्षिप्रं वणिक् प्राप्त इवाप्तलाभः । जित्वा च रा...