Monday, December 28, 2020

राजतरंगिणी, कल्हण का धर्म

रजतऱंगिणी से:

कल्हण का धर्म : काश्मिर का कल्हण शैव ब्राह्मण था । किन्तु वह बौद्ध धर्म का भी प्रशंसक था। बुद्ध-दर्शन का उस पर प्रभाव था। शिव भक्ति तथा मत का अत्याधिक वर्णन कल्हण ने किया हैं । उसके पश्चात् उसने बौद्ध धर्म को ही स्थान दिया हैं । उसके पिता चम्पक प्रतिवर्ष नन्दीक्षेत्र की तीर्थ यात्रा के लिए जाते थे । कल्हण भी पिता के साथ जाता था । यहाँ नन्दि पुराण भक्ति के साथ सुनता था । भूतेश्वर के पवित्र वातावरण में, मन्दिरों की सुन्दर श्रृंखलाओं के मध्य, सोदर तीर्थ का जल सेवन करते, प्रकृति के दान्त गम्भीर, सुरम्य, हरित वातावरण में वह शिवदर्शन एवं शिव सम्बन्धी कथादि सुनता था । इस वातावरण का संस्कार बाल्यकाल से ही उस पर पड़ा था । उसने शैवदर्शन के आचार्य भट्ट कल्लट का नाम आदर एवं श्रद्धा के साथ लिया हैं । कल्लट ने काश्मीर में शैव शास्त्र का प्रचार किया था (राजतरंगिणी, पृ. ५ : ६६)

शिवभक्त राजाओ का जहां भी कहीं कल्हण ने वर्णन किया हैं उसकी लेखनी से उनके लिए श्रद्धा-भक्ति प्रकट हुई हैं । जलौक (रा० त०: ३३५-३३८) विजय (रा.त. २ : १) सन्धि मति (रा० २ :६५) इसके ज्वलन्त उदाहरण हैं । उन्होने शैव मत का प्रसार किया था। वे शिव-पूजक थे । कल्हण ने स्वर्ग प्राप्ति किंवा किसी पुण्य-लोक में जाने की अपेक्षा शिव सायुज्यता को प्राथमिकता दी हैं। (रा० १:९५२) शिव मन्दिरो में शिव के सम्मुख नृत्य-गान का वर्णन ललित पदों में किया हैं । (रा० : १ : १५१, १५४, २७९, २८०)

कल्हण ने सम्पूर्ण राजतरंगिणी में भगवान् बुद्ध के प्रति अनुपम आदर एवं श्रद्धा प्रदर्शित की हैैं । अशोक से लेकर उसके काल तक जिन राजाओं ने बुद्ध विहार, स्तूप तथा चैत्यादि निर्माण कराया था उनका नाम एवं स्मरण श्रद्धा-भक्ति के साथ कल्हण ने किया हैं। उसने उक्त निर्माणों को कश्मीर मण्डल में खोज-खोजकर, शिव मन्दिरों के समान लिखा हैैं । राजाओं के अतिरिक्त यदि किसी अन्य व्यक्ति ने भी विहार, चैत्य, स्तूपादि का निर्माण कार्य किया था तो उसका भी सादर उल्लेख किया हैं । उन पर चढ़़ाये अग्रहारों एवं दान कर्मों की मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की हैैं ।

धर्म विश्वास में कल्हण ने कट्टरता कहीं नहीं प्रदर्शित की हैं । उसने शैव एवं बौद्ध धर्म को परस्पर विरोधी नही माना हैं । दोनों का उपासक होने के कारण उन्हें एक दूसरे का पूरक माना हैं, सहायक माना हैं । बौद्धों के प्राबल्य को रोककर जलौक ने शैव धर्म के पुनर्स्थापना के लिए प्रयास करते हुए विहारों तथा बौद्ध धर्म-स्थानों को क्षति पहुँचाने का प्रयास किया तो जलौक का विचार नाटकीय ढंग से कल्हण बदल देता हैं । राजा में उसने शिव के साथ बोधि-सत्व के प्रति रुचि भी उत्पन्न होने की कथा कही हैं । जलौक से विहार-निर्माण भी करा देता हैं ।

धार्मिक रुचि कल्हण की इसमे प्रकट होती है कि वह मेघवाहन को आदर्श किंवा अनुकरणीय राजा मानता हैं। मेघवाहन विश्वविजय द्वारा अहिंसा (प्रेम और मैत्री) का प्रचार करना चाहता था। उसने दूर दक्षिण भारत तक विजय कर राजाओं से अहिंसक (प्रेम और मैत्री बढ़ाने) की प्रतिज्ञा करायी थी । दिग्विजय के स्थान पर (अशोक की तरह) मेघवाहन ने धर्म-विजय किया था। मेघवाहन पशुबलि के स्थान पर, पशु की रक्षा के लिए स्वयं (बुद्ध की तरह) अपनी बलि चढ़ाने के लिए बारंबार उद्यत हो गया था। 

कल्हण ने अहिंसा व्रत का ओजमयी भाषा में वर्णन किया हैं । कल्हण प्रतीत होता हैं, शाकाहारी था । उसने प्याज तथा लहसुन भोजी ब्राह्मणों की निन्दा की हैं । अहिंसा व्रत एवं अहिंसक भावना का अवसर मिलते ही सबल भाषा में उल्लेख करता हैं । राजा हर्ष जिस समय परिहासपुर में भगवान बुद्ध की प्रतिमा खण्डित करना चाहता था तो उसके चाचा कनक ने राजा को इस अनुचित कार्य से विरत किया था । बौद्धमतानुयायी दूसरों के द्वारा मारा मांस निःसंकोच खाते हैं । परन्तु कल्हण इसको उचित नही मानता । वह एक शुद्ध ब्राह्मण के समान शाकाहारी था । यद्यपि काश्मीर में आमिष भोजियों की संख्या सर्वाधिक सर्वदा से रही हैं ।कल्हण ने बौद्ध घर्म सम्बन्धी अनेक पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग किया हैं । इससे प्रकट होता है कि उसने त्रिपिटको का अध्ययन किया था । कल्हण ने बौद्ध दर्शन, परम्परा, शासन तथा उसकी पध्दतियों का पूर्णतया अध्ययन किया था । अन्यथा वह साधिकार विश्वास के साथ लिखने में सफल न होता ।

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