Thursday, December 24, 2020

शील और इंद्रिय-संयम, सौन्दरनन्द

सौन्दरनन्द-महाकाव्य, त्रयोदश सर्ग
शील और इन्द्रिय-संयम

अथ संराधितो नन्दः श्रद्धां प्रति महर्षिणा ।परिषिक्तोऽमृतेनेव युयुजे परया मुदा ॥१॥

तब महर्षि के द्वारा श्रद्धा (को सबल एवं स्थिर बनाने) के प्रति प्रेरित (प्रोत्साहित) होकर नन्द को बढ़ा आनन्द हुआ, जैसे वह अमृत से नहवाया गया हो ॥१॥

कृतार्थमिव तं मेने सबुद्धः श्रद्धया तया । मेने प्राप्तमिव श्रेयः स च बुद्धेन संस्कृतः ॥२॥

बुद्ध ने उस श्रद्धा के कारण नन्द को कृतार्थ-सा समझा और बुद्ध से दीक्षित होकर नन्द ने श्रेय (अपने चरम लक्ष) को उपस्थित-सा समझा ॥२॥

श्लक्ष्णेन वचसषा कांश्चित्कांश्चित्परुषया गिरा।कांश्चिदाभ्यामुपायाभ्यां स विनिन्ये विनायक: ॥३॥

कतिपयों को कोमल वचन से, कतिपयों को कठोर वचन से और कतिपयों को दोनों ही उपायों से विनायक (बुद्ध) ने विनीत (दीक्षित) किया ॥३॥

पांसुभ्यः काञ्चनं जातं विशुद्धं निर्मलं शुचि । स्थितं पांसुष्वपि यथा पांसुदोषैर्न लिप्यते ॥४॥

जैसे धूल से पैदा होने वाला सोना विशुद्ध निर्मल और पवित्र होता है और धूल में रहकर भी वह धूल के दोषों से लिप्त नहीं होता है, ॥४॥

पद्मपर्ण यथा चैव जले जातं जले स्थितं ।उपरिष्टादधस्ताद्वा न जलेनोपलिप्यते ॥५॥

और जैसे जल में उत्पन्न होकर जल में ही रहने वाला कमल का पत्ता ऊपर या नीचे जल से लिप्त नहीं होता है, ॥५॥

तद्वल्लोके मुनिरजातो लोकस्यानुग्रहं चरन् । कृतित्वान्निर्मलत्वाच्च लोकधर्मैर्न लिप्यते ॥६॥

वैस ही संसार में उत्पन्न होकर, संसार के ऊपर अनुग्रह करते हुए, मुनि अपनी पवित्रता एवं निर्मलता के कारण सांसारिक धर्मों से लिप्त नहीं होते हैं ॥६॥

श्लेषं त्यागं प्रियं रूक्षं कथां च ध्यानमेव च । मन्तुकाले चिकित्सार्थं चक्रे नात्मानुवृत्तये ॥७॥

उपदेश-काल में उन्होंने, चिकित्सा के लिए न कि अपनी अनुकूलता के लिए, आलिङ्गन और परित्याग, प्यार और रूखापन, कथा और ध्यान का सहारा लिया ॥७॥

अतश्च संदधे कार्य महाकरुण्या तया । मोचयेयं कथं दुःखात्सत्त्वानीत्यनुकम्पकः ॥८॥

और इसलिए 'जीवों को दुःख से कैसे छुड़ाऊँ इस प्रकार अनुकम्पा करते हुए उन्होंने महाकरुणा के वशीभूत होकर शरीर धारण किया ॥८॥

अथ संहर्षणान्नन्दं विदित्वा भाजनीकृतं । अब्रवीद् ब्रुवतां श्रेष्ठः क्रमज्ञः श्रेयसां क्रमं ॥९॥

सब अपनी प्रेरणा (प्रोत्साहन) के फलस्वरूप नन्द को पात्र (योग्य) हुआ समझकर, क्रम को जानने वाले वक्ता-श्रेष्ठ ने श्रेय का क्रम बतलाया ॥९॥

अतः प्रभृति भूयस्त्वं श्रद्धेन्द्रियपुरः सरः । अमृतस्याप्तये सौम्य वृत्तं रक्षितुमर्हसि ॥१०॥

"अब से तुम श्रद्धारूपी साधन से सुसज्जित होकर, हे सौम्य, अमृत की प्राप्ति के लिए अपने आचार (शील) की रक्षा करो ॥१०॥

प्रयोगः कायवचसो: शुद्धो भवति ते यथा । उत्तानो विवृतो गुप्तोऽनवच्छिद्रस्तथा कुरु ॥११॥

ऐसा करो जिससे तुम्हारे शरीर और वचन का व्यापार (कर्म) होकर प्रकट (स्पष्ट), आवरण-रहित (खुला हुआ), सुरक्षित और निर्दोष हो जाय; ॥११॥

उत्तानो भावकरणाद्विवृतश्चाध्यगूहनात् । गुप्तो रक्षणतात्पर्यादच्छिद्रश्चानवद्यतः ॥१२॥

अपने भावों को स्पष्ट करने से प्रकट, कुछ भी नहीं छिपाने से आवरण-रहित, रक्षण (इन्द्रिय संवर) में तत्परता दिखलाने से सुरक्षित और दोष-रहित होने से निर्दोष हो जाय ॥१२॥

शरीरवचसोः शुद्धौ सप्तांगे चापि कर्मणि ।आजीवसमुदाचारं शौचात्संस्कर्तुमर्हसि ॥१३॥

शरीर और वचन की शुद्धि में तथा (उनके) सात कर्मों की शुद्धि में अपनी आजीविका के सम्पर्क को शुद्ध करो, ॥१३॥

दोषानां कुहनादीनां पन्चानामनिषवणात् । त्यागाच्च ज्योतिषादीनां चतुर्णों वृत्तिघातिना ॥१४॥

कपट आदि पाँच दोषों को छोड़कर तथा सद्वृत्ति की हत्या करने वाले ज्योतिष आदि चार (व्यवसायों) का परित्याग कर ॥१४॥

प्राणिधान्यधनादीनां वर्ज्यानामप्रतिग्रहात् । भैक्षाङ्गानां निसृष्टानां नियतानां प्रति्रहात् ॥१५॥

जीवन, अन्न, धन आदि वर्जित वस्तुओं को ग्रहण नहीं करके तथा भिक्षा-वृत्ति के निश्चित नियमों का पालन करके (अपनी आजीविका को शुद्ध करो) ॥१५॥

परितुष्टः शुचिर्मञ्जुश्चौक्षया जीवसंपदा । कुर्या दुःखप्रतीकारं यावदेव विमुक्तये ॥१६॥

संतुष्ट पवित्र मधुर-भाषी और शुद्ध आजीविका वाला होकर तब तक दुःख का प्रतिकार करते रहो जब तक (दुःख से) मुक्ति न हो जाय ॥१६।।

कर्मणो हि यथादृष्टात्कायवाक्प्रभवादपि । आजीव: पृथगेवोक्तो दुःशोधत्वादयं मया ॥१७॥

शरीर और वचन का जो कर्म देखा जाता है उससे आजीविका को अलग ही कहा गया हैं, इसलिए कि आजीविका को शुद्ध करना दुष्कर हैं ॥१७॥

गृहस्थेन हि दुःशोधा दृष्टिविविधदृष्टिना । आजीवो भिक्षुणा चैव परेष्टायत्तवृत्तिना ॥१८॥

विविध दृष्टियों वाले गृहस्थ के लिए दृष्टि को शुद्ध करना दुष्कर और भिक्षु की वृत्ति दूसरों के अधीन होने के कारण उसके लिए आजीविका शुद्ध करना कठिन हैं ।।१८॥

एतावच्छीलमित्युक्तमाचारोऽयं समासतः अस्य नाशेन नेव स्यात्प्रव्रज्या न गृहस्थता ॥१९॥

यही इतना शील हैं । संक्षेप में यही आचार हैं, जिसका नाश होने पर न प्रव्रज्या रहेगी और न गृहस्थता ॥१९॥

तस्माच्चारित्रसंपन्नो ब्रह्मचर्यमिदं चर । अणुमात्रेष्ववद्यषु भयदर्शी दृढ़ब्रतः ॥२०॥

इसलिए सदाचार से युक्त होकर इस ब्रह्मचर्य (श्रेष्ठ जीवन) का आचरण करो; अत्यन्त सूक्ष्म दोषों में भी भय देखते हुए अपना ब्रत दृढ रखो ॥२०॥

शीलमास्थाय वर्तन्ते सर्वों हि श्रेयसि क्रियाः ।स्थानाद्यानीव कार्याणि प्रतिष्ठाय वसुन्धरां ॥२१॥

शील का सहारा लेकर सभी श्रेयस्कर कार्य सम्पन्न होते हैं, जैसे पृथ्वी के आश्रय से खड़ा होना आदि कार्य होते हैं ॥२१॥

मोक्षस्योपनिषत्सौम्य वैराग्यमिति गृह्यतां । वैराग्यस्यापि संवेदः संविदो ज्ञानदर्शनं ॥२२॥

मोक्ष का उपनिषद् (आधार, समीप ले जाने वाला), हे सौम्य, वैराग्य हैं, ऐसा समझो । वैराग्य का भी उपनिषद् सम्यक ज्ञान हैं और सम्यक् ज्ञान का उपनिषद, ज्ञान का दर्शन हैं ॥२२॥

ज्ञानस्योपनिष्चैव समाधिरुपधार्यतां ।समाधेरप्युपनिषत्सुखं शारीरमानसं ॥२३॥

ज्ञान का उपनिषद् समाधि समझो, समाधि का भी उपनिषद् शारीरिक और मानसिक सुख समझो ॥२३॥

प्रश्रब्धि: कायमनसः सुखस्योपनिषत्परा । प्रश्नब्धेरष्युपनिषत्प्रीतिरप्यवगम्यतां ॥२४॥

शारीरिक और मानसिक सुख का उपनिषद् हैं परम शान्ति और शान्ति का भी उपनिषद् प्रीति जानो ॥२४॥

तथा प्रीतेरुपनिषत्प्रामोद्यं परमं मतं ।प्रामोद्यस्याप्यहृल्लेखः कुकृतेष्वकृतेषु वा ॥२५॥

प्रीति का उपनिषद् परम आनन्द माना गया हैं और आनन्द का भी उपनिषद् है कुकार्यों और अकार्यों से मन में पीड़ा का न होना ॥२५॥

अहृल्लेखस्य मनस: शीलं तूपनिषच्छुचि । अतः शीलं नयस्यग्रयमिति शीलं विशोधय ॥२६॥

मानसिक पीड़ा का अभाव का उपनिषद् हैं पवित्र शील । इस प्रकार शील ही प्रधान हैं और (श्रेष्ठता की ओर) ले जाने वाला (नेता हैं), इसलिए शील को शुद्ध करो ॥ २६॥

शीलनाच्छिलमित्युक्त शीलनं सेवनादपि । सेवनं तन्निदेशाच्च निदेशश्च तदाश्रयात् ॥२७॥

शीलन से शील कहा गया हैं, शीलन सेवन (अर्थात बार बार के अभ्यास) से होता हैं, सेवन किसी चीज के लिए उत्कट इच्छा होने से होता हैं और इच्छा उसके ही आश्रय से होती हैं ॥२७॥

शीलं हि शरणं सौम्य कान्तार इव दैशिक: । मित्रं बन्धुश्च रक्षा च धनं च वलमेव च ॥२८॥

शील, हे सौम्य, शरण है, जंगल में पथ-प्रदर्शक के समान हैं, मित्र, बन्धु, रक्षक, धन और बल हैं ।।२८।।

यतः शीलमतः सौम्य शीलं संस्कर्तुमर्हसि ।एतत्स्थानमथान्ये च मोक्षारम्भेषु योगिनां ॥२९॥

क्योंकि शील ऐसा हैं, इसलिए शील को तुम्हें शुद्ध करना चाहिये, मोक्ष के लिए आरम्भ करने वाले योगियों के लिए यह अनन्य (एकमात्र) सहारा हैं ॥२९॥

ततः स्मृतिमधिष्ठाय चपलानि स्वभावतः ।इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यो निवारयितुमर्हसि ॥३०॥

तब स्मृति को स्थिर करके तुम्हें स्वभाव से चन्चल इन्द्रियों को विषयों से हटाना चाहिये ॥३०॥

भेतव्यं न तथा शत्रोर्नाग्नेर्नाहेर्न चाशने:। इन्द्रियेभ्यो यथा स्वेभ्यस्तैरजस्र हि हन्यते ॥३१।।

शत्रु, अग्नि, सर्प और वज्र से उतना नहीं डरना चाहिये जितना कि अपने ही इन्द्रियों से, जो निरन्तर चोट करते रहते हैं ॥३१॥

द्विषद्भि शत्रुभिः कश्चित्कदाचित्पीड्यते न वा ।इन्द्रियैर्बाध्यते सर्वः सर्वत्र च स्दैव च ॥३२॥

द्वेष करनेवाले शत्रुओं से कोई कभी पीड़ित होता हैं या नहीं भी, किंतु इन्द्रियों से सभी सर्वत्र और सदा ही पीडित होते रहते हैं ॥३२॥

न च प्रयाति नरकं शत्रुप्रभृतिभिर्हेतः कृष्यते तत्र निघ्नस्तु चपलैरिन्द्रियैर्हत: ॥३३॥

शत्रु आदि से मारा जाकर मनुष्य नरक नहीं जाता हैं, किंतु चपल इन्द्रियों से मारा जाकर बेचारा वहाँ घसीट कर ले गया जाता हैं ॥३३॥

हन्यमानस्य तैर्दु:खं हार्दं भवाति वा न वा ।इम्द्रियैर्बाध्यमानस्य हार्दं शारीरमेव च ॥३४॥

उन (शत्रुओं) के द्वारा मारे जाते हुए को हार्दिक (मानसिक, आध्यात्मिक) दुखः होता हैं या नहीं भी, किंतु इन्द्रियों से पीड़ित होने वाले को हार्दिक और शारीरिक दोनों ही दुःख होते हैं ॥३४॥

संकल्पविषदिग्धा हि पचेन्द्रियमयाः शराः । चिन्तापुङ्खा रतिफला विषयाकाशगोचरा: ॥३५॥

सङ्कल्परूपी विष से लिप्त पन्च इन्द्रिय रूपी तीर, चिन्ताएँ ही जिनके पुङ्ग (तीर का त्रिकोनी भाग) हैं और रति (आनन्द, भोग) ही जिनका लक्ष्य हैं, विषयरूपी आकाश में चलते हैं ॥३५॥

मनुष्यहरिणान् घ्नन्ति कामव्याधेरिता हृदि । विहन्यन्ते यदि न ते ततः पतन्ति ते: क्षुता: ।।३६॥

कामरूपी व्याध (शिकारी) से सञ्चालित होकर वे मनुष्य रूपी हरिणों के हृदय में चोट करते हैं; यदि वे रोके न जाये तो उनसे घायल होकर मनुष्य गिर पढ़ते हैं ।।३६॥

नियमाजिरसंस्थेन धैर्यकार्मुकधारिणा । निपतन्तो निवार्यास्ते महता स्मृतिवर्मणा ॥३७॥

नियम रूपी आङ्गन में खड़ा होकर, धेर्यरूपी धनुष धारण कर, महान्स्मृतिरूपी कवच पहनकर, उन गिरते हुए तीरों को रोकना चाहिए ॥३७॥

इन्द्रियाणामुपशमादरीणां निग्रहादिव । सुखं स्वपिति वास्ते वा यत्र तत्र गतोद्धवः ॥३८॥

इन्द्रियों के शान्त होने पर, जैसे शत्रुओं का निग्रह होने पर, मनुष्य जहाँ तहाँ सुखपूर्वक सोता हैं या निश्चिन्त होकर बैठता हैं ॥३८॥

तेषां हि सततं लोके विषयानभिकांक्षतां । संविन्नैवास्ति कार्पणयाच्छुनामाशावतामिव ॥३९॥

तृष्णावान् कुत्तों की तरह संसार में सदा विषयों की आकाङक्षा करने वालों का ज्ञान नष्ट हो जाता हैं ॥ ३९॥

विषयैरिन्द्रियग्रामो न तृप्तिमधिगच्छति । अजस्रं पूर्यमाणोऽपि समुद्रः सलिलैरिव ।।४०।।

विषयों से इन्द्रिय-समूह को तृप्ति नहीं होती हैं, जैसे जल-राशि से निरन्तर पूर्ण होते रहने पर भी समुद्र को तृप्ति नहीं होती हैं ॥४०॥

अवश्यं गोचरे स्वे स्वे वर्तितव्यमिहेन्द्रियैः निमित्तं तत्र न ग्राह्यमनुव्यञ्जनमेव च ।।४१॥

इन्द्रिय तो अपने अपने क्षेत्र (विषय) में रहेंगे ही; किंतु उसमें निमित्त (लिङ्ग, आकृति आदि) और अनुव्यञ्जन को ग्रहण नहीं करना चाहिए ॥४१।।

आलोक्य चक्षु षा रूपं धातुमात्रे व्यवस्थितः। स्री वेति पुरुषो वेति न कल्पयितुमर्हसि ॥४२॥

नेत्र से रूप को देखकर (उसके आधारभूत पृथ्वी आदि ) घातुओं में ही अपना ध्यान स्थिर करना चाहिए; स्त्री हैं या पुरुष ऐसी कल्पना नहीं करनी चाहिए ॥४२॥

सचेत्त्स्रीपुरुषग्राहः क्वचिद्विद्येत कश्चन । शुभतः केशदन्तादीन्नानुप्रस्थातुमर्हसि ।।४३।।

स्त्री हैं या पुरुष, ऐसी कोई समझ यदि कहीं हो भी जाय, तो केश और दाँत आदि में तुम्हें सौन्दर्य नहीं देखना चाहिए ॥४३॥

नापनेयं ततः किंचित्प्रक्षेप्यं नापि किंचन । द्रष्टव्यं भूततो भूतं यादृशं च यथा च यत् ॥४४॥

उस (रूप) से न कुछ हटाना चाहिए और न उसमें कुछ जोडना ही चाहिए। रूप को ठीक ठीक देखना चाहिए कि वह कैसा, कैसे और क्या हैं ।।४४।।

एवं ते पश्यतस्तत्त्वं शश्वदिन्द्रियगोचरे । भविष्यति पदस्थानं नाभिध्यादौमनस्ययोः ॥४५॥

जब तुम इन्द्रियों के क्षेत्र (विषयों) में इस प्रकार तत्व को निरन्तर देखते रहोगे तो अभिध्या (लोभ) और दौर्मनस्य (संताप अरुचि), (तुम्हारे चित्त में) पाँव न जमा सकेंगे ।॥४५॥

अभिध्या प्रियरूपेण हन्ति कामात्मकं जगत् ।अरिर्मित्रमुखेनेव प्रियवाक्कलुषाशयः ।॥४६॥

अभिध्या आकर्षक रूप द्वारा कामासक्त जगत् की हत्या करती हैं, जैसे पाप आशय वाला शत्रु मित्र की तरह मुख से प्रिय वचन कहता हुआ (बुराई करता हैं) ॥४६॥

दौर्मनश्याभिधानस्तु प्रतिघो विषयाश्रितः । मोहाद्ये नानुवृत्त न परत्रेह च हन्यते ॥४७॥

विषयाश्रित प्रतिघ (अरुचि, विद्वेष) का ही नाम दौर्मनस्य है; मोह से मनुष्य इसके वशीभूत होकर इहलोक और परलोक में नष्ट होता हैं ॥४७॥

अनुरोधविरोधाभ्यां शीतोष्णाभ्यामिवार्दितः । शर्मं नाप्नोति न श्रेयश्चलेन्द्रियमतो जगत् ॥४८॥

सर्दी और गर्मी की तरह अनुकूलता और प्रतिकूलता से पीड़ित होकर जीव-लोक न शान्ति प्राप्त करता है और न श्रेय; अतः उसके इन्द्रिय चन्चल हैं ॥४८।।

नेन्द्रियं विषये तावत्प्रवृत्तमपि सज्जते । यावन्न मनसस्तत्र परिकल्प: प्रवर्तते ॥४९॥

विषय (के सम्पर्क) में रहकर भी इन्द्रिय तब तक उसमें आसक्त नहीं होता है, जब तक तत्सम्बन्धी मानसिक सङ्कल्प (कल्पना, विचार) नहीं होता है ॥४९॥

इन्धने सति वायौ च यथा ज्वलति पावक: ।विषयात्परिकल्पाच्च क्लेशाग्निर्जायते तथा ॥५०॥

जैसे जलावन (कचरा, कागज़ जैसी जलने वाली चीज) और हवा दोनों के रहने पर अग्नि प्रज्वलित होती हैं, वैसे ही विषय और कल्पना दोनों के होने से क्लेशाग्नि की उत्पत्ति होती है॥५०॥

अभूषपरिकल्पेन विषयस्य हि बध्यते । समेव विषयं पश्यन् भूततः परिमूच्यते ॥५१॥

विषय की अयथार्थ कल्पना से मनुष्य बाँधा जाता है और उसी विषय को ठीक ठीक देखता हुआ मुक्त होता हैं ।।५१ ।।

दृष्ट्वैक रूपमन्यो हि रज्यतेऽम्यः प्रदुष्यति । कश्चिद्भवति मध्यस्थस्तत्रेवान्य' घृणायते ॥५२॥

एक ही रूप को देखकर कोई अनुराग करता हैं, कोई दोष देखता है, कोई मध्यस्थ (उदासीन) रहता हैं और कोई घृणा करता हैं ॥५२॥

(५३' ५४, ५५ श्लोको का एक पन्ना गुम हैं)

तस्मादेषामकुशलकराणामरीणां चक्षुर्घ्रानश्र वणरसनस्पर्शनानां ।  सर्वावस्थं भव विनियमादप्रमत्तोमास्मिन्नर्थे क्षणमपि कृथास्त्वं प्रमादं ॥५६॥

इसलिए सभी अवस्थाओं में दृष्टि घ्राण श्रवण अस्वाद और स्पर्श-इन बुराई करनेवाले शत्रुओं का नियन्त्रण करने में सावधान रहो । इस विषय में तुम क्षण भर भी प्रमाद मत करो ॥५६॥

सौन्दरनन्दे महाकाव्ये शीलेन्द्रियजयो नाम त्रयोदशः सर्ग:  

सौदरनन्द महाकाव्य में शील और इन्द्रिय संयम नामक त्रयोदश सर्ग समाप्त ।

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