नवम सर्ग, अभिमान की निन्दा:
अथैवमुक्तोऽपि स तेन भिक्षुणा जगाम नैवोपशमं प्रियां प्रति । तथा हि तामेव तदा स चिन्तयश्न तस्य शुश्राव विसंज्ञवद्धचः ॥१॥
उस भिक्षु के द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर भी अपनी प्रिया के विषय में उसे (नन्द को) शांन्ति नहीं मिली । उस समय वह अपनी प्रिया की ही चिन्ता करता रहा और बेहोश व्यक्ति के समान उसका वचन नहीं सुना ।।१॥
यथा हि वैद्यस्य चिकीर्षत: शिवं वचो न गृह्धाति मुमूषुरातुरः । तथैव मत्तो बलरूपयौवनैहितं न जग्राह स तस्य तद्वचः ॥२॥
जिस प्रकार मरणासन्न रोगी हितैषी वैद्य की बात नहीं सुनता है, उसी प्रकार बल रूप और यौवन से मत्त होने के कारण उसने उसके उस हितकारी वचन को ग्रहण नहीं किया ॥२॥
न चात्र चित्रं यदि रागपाप्मना मनोऽभिभूयेत तमोवृतात्मनः । नरस्य पाप्मा हि तदा निवर्तते यदा भवत्यन्तगतं तमस्तनु ॥३॥
इसमें कुछ आश्चर्य नहीं कि तमोवृत (अज्ञानी) का मन रागरूपी दोष से अभिभूत होता है। मनुष्य का यह दोष उस समय निवृत्त होता हैं जब कि उसका तम (अज्ञान) क्षीण हो जाता है ॥३॥
ततस्तथाक्षिप्तमवेक्ष्य तं तदा बलेन रूपेण च यौवनेन च । गृहप्रयाणं प्रति च व्यवस्थितं शशास नन्दं श्रमणः स शान्तये ॥४॥
तब उस समय उसको बल रूप और यौवन से मत्त तथा घर जाने के लिए स्थिर (कृतनिश्रय) देखकर उस भिक्षु ने उसकी शान्ति के लिए कहाः-।।४।।
बलं च रूपं च नवं च यौवनं तथावगच्छामि यथावगच्छसि । अहं त्विदं ते त्रयमव्यवस्थितं यथावबुद्धो न तथावबुध्यसे ॥५॥
"बल रूप और नवयौवन को जिस प्रकार तुम समझ रहे हो वह मैं समझता हूं; किंतु मैं तुम्हारे इन तीनों को जिस प्रकार अस्थिर समझ रहा हूँ वह तुम नहीं समझते हो ।।५॥
इदं हि रोगायतनं जरावशं नदीतटानोकहवचलाचलें । न वेत्सि देहं जलफेनदुबलं बलस्थतामात्मनि येन मन्यसे ।।६॥
यह शरीर रोगों का घर, जरा के वशीभूत, नदी-तीर-वर्ती वृक्ष के समान चलाचल और जल के फेन के समान दुर्बल है, यह तुम नहीं जानते हो और इसीलिए अपने बल को स्थायी समझ रहे हो ॥६॥
यदान्नपानासनयानकर्मणामसेवनादप्यतिसेवनादप ।शरीरमासन्नत्ति हृश्यते बलेऽभिमानस्तव केन हेतुना ॥७॥
जब कि खाना, पीना, बैठना, चलना इन कर्मों का सेवन नहीं करने से या अतिसेवन करने से शरीर का विपत्ति-ग्रस्त होना देखा जाता है, तब क्यों तुम बल का अभिमान करते हो ? ॥७॥
हिमातपव्याधिजराक्षुदादिभिर्यदाष्यनथैरुपमीयते जगत् ।जलं शुचौ मास इवार्करश्मिभि: क्षयं त्रजन् कि बलद्दप्त मन्यसे ॥८॥
जब सर्दी गर्मी रोग बुढ़ापा भूख आदि अनर्थों से यह जगत् पीढ़ित हो रहा है, तब जेठ मास में सूर्य की किरणों से जल के समान क्षीण होते हुए, हे बलाभिमानी, क्या सोच रहे हो ? ।।८॥
त्वगस्थिमांसक्षतजात्मकं यदा शरीरमाहारवशेन तिष्ठति ।अजस्रमार्तं सततप्रतिक्रियं बलान्वितोऽस्मीति कथं विहन्यसे ॥९॥
जब त्वचा हड्डी मांस और रक्त का बना हुआ शरीर आहार के वशीभूत, निरन्तर पीड़ित और सदा (भूख रोग आदि के) प्रतिकार में लगा हुआ है, तब 'मैं बलवान हूँ' ऐसी कल्पना क्यों कर रहे हो ? ॥९॥
यथा घटं मृन्मयमाममाश्रितो नरस्तितीर्षेत्क्षभितं महार्णवं । समुच्छ्रयं तद्वदसारमुद्द्न्बलं व्यवस्येद्विषयार्थमुद्यतः ॥ १०॥
जब मिट्टी के कच्चे घड़े का सहारा लेकर मनुष्य क्षुब्ध महासागर को पार करना चाहे, तब उसी प्रकार असार शरीर (धातुओं के समवाय) को धारण करता हुआ, विषय-भोग के लिए उद्यत मनुष्य अ्पने को बलवान् (समर्थ) समझे ॥१०॥
शरीरमामादपि सृन्मयाद्घटा-दिदं तु नि:सारतमं मतं मम । चिरं हि तिष्ठेद्विधिवद्धृतो घट:समुच्छ्रयोऽयं सुधृतोऽप भिद्यते ॥११॥
यह शरीर मिट्टी के कच्चे घड़े से भी असार है, ऐसा मैं समझता हूँ; क्योंकि विधिपुर्वक रखा जाने पर घड़ा चिर काल तक रहता है किन्तु यह शरीर अच्छी तरह रखा जाने पर भी नष्ट हो जाता है ॥११॥
यदाम्बुभूवाय्वनलाश्च धातवः सदा विरुद्धा विषमा इवोरगाः । भवन्त्यनर्थाय शरीरमाश्रिता: कथं बलं रोगविधो व्यवस्यसि ॥१२॥
जब पृथ्वी, जल, अनल, अनिल ये धातु शरीर में आश्रय पाकर विषम सर्पो के समान सदा एक-दूसरे के विरोधी होते हैं और अनर्थ उत्पन्न करते हैं तब व्याधिधर्मा होने पर क्यों अपने को बलवान् समझ रहे हो ? ॥१२॥
प्रयान्ति मन्त्रैः प्रशमं भुरजंगमा न मन्त्रसाध्यास्तु भवन्ति धातवः । कचिश्च कंचिच्च दशन्ति पन्नगा: सदा च सर्व च तुदन्ति धातव ॥१३॥
मंत्रों से सर्प' शान्त हो जाते हैं, किंतु मंत्रों से (शरीर के) धातुओं को वश में नहीं कर सकते । कहीं कहीं और किसी किसी को ही सर्प"डंसते हैं, किंतु ये धातु सदा सब को पीड़ित करते रहते हैं ।।१३॥
इदं हि शय्यासनपानभोजनैर्गुणे: शरीर चिरमप्यवेक्षितं । न मर्षेयत्येक्रमपि व्यतिक्रमं यतो महाशीविषवत्प्रकुप्यति ॥१४॥
सोना, बैठना, खाना, पीना इन कार्यों से चिरकाल तक पोषित होने पर भी यह शरीर एक भी व्यतिक्रम (गड़बड़ी) को नहीं सहता हैं जिसके होने पर (पाँव से रौंदे गये) विषधर सर्प के समान यह कुपित हो जाता हैं ॥१४॥
यदा हिमार्तो ज्वलनं निषेवते हिमं निदाघाभिहतोऽभिकाङ्क्षति । क्षुधान्वितोऽन्नं सलिलं तृषान्तवितोबल कुत: किं च कथं च कस्य च ॥१५॥
जब कि हिम से पीड़ित व्यक्ति अग्नि का सेवन करता है, गर्मी से पीड़ित व्यक्ति हिम (शीतलता) की आकांक्षा करता है, भूखा भोजन चाहता है और प्यासा पानी, तब बल कहाँ है, क्या है, कैस है और किसका है ? ॥१५॥
तदेवमाज्ञाय शरीरमातुरं बलान्वितोऽस्मोति न मन्तुमर्हसि । असारमस्वन्तमनिश्चितं जगज्जगत्यनित्ये बलमव्यवस्थितं ॥१६॥
इसलिए शरीर को पीड़ित जानकर "मैं बलवान् हूँ" ऐसा तुम्हें नहीं समझना चाहिए। जगत् असार, अनिश्चित और बुरा परिणाम-वाला है; अनित्य जगत् में बल अस्थिर है ॥१६॥
क्व कार्तवीर्यस्य बलाभिमानिनः सहस्रबाहोर्बलमर्जुनस्य तत् । चकर्त बाहून्युधि यस्य भार्गवो महान्ति शृङ्गाण्यशनिर्गिरेरिव ॥१७॥
बल का अभिमान करने वाले सहस्र भुजाओं वाले कार्तवीर्य अर्जुन का वह बल कहां है ? परशुराम ने युद्ध में उसकी बाहुओं को वैस ही काट डाला, जैसे कि वज्र पर्वत की बड़ी बढ़ी चोटियों को काटता हैं ॥१७॥
क्व तद्वलं कंसविकर्षिणो हरेस्तुरङ्गराजस्य पुटावभेदिनः ।यमेकबाणेन निजघ्निवान् जराः क्रमागता रूपमिवोत्तमं जरा ॥ १८॥
कंस की हत्या करनेवाले तथा अश्व-राज (केशी) के मुख को विदीर्ण करनेवाले कृष्ण का वह बल कहाँ है ? जरा (नामक व्याध) ने एक ही बाण से उसे मार डाला, जैसे क्रम से आई हुई वृद्धावस्था उत्तमरूप की हत्या करती है ॥१८॥
दितेः सुतस्यामररोषकारिणश्चमूरुचेर्वा नमुचे: क तद्बलं ।यमाहवे क्रुद्धामवान्तकं स्थितं जघान फेनावयवेन वासवः ॥१९॥
देवों को क्रुद्ध करनेवाले युद्ध-प्रिय नमुचि दैत्य का वह बल कहाँ है ? युद्ध में वह क्रुध्द यम के समान खड़ा था और इन्द्र ने (पानी के) फेन से उसे मार डाला ॥१९॥
बलं कुरूणां क च तत्तदाभवद्युधि ज्वलित्वा तरसौजसा च ये। समित्समिद्धा ज्वलना इवाध्वरेहतासवो भस्मनि पर्यवस्थिताः ॥२०॥
कौरवों का वह बल उस समय कहाँ चला गया जब कि वे युद्ध में पराक्रम एवं वीरतापूर्वक प्रज्वलित होकर, यज्ञ में लकड़ियों से प्रज्वलित अग्नि के समान, निष्प्राण होकर भस्मसात् हो गये ? ॥ २०॥
अतो विदित्वा बलीर्यमानिनां बलान्वितानामवमदितं बलं । जगज्जरामृत्युवशं विचारयन्बलेऽभिमानं न विधातुमर्हसि ॥२१॥
अतः बल एवं वीर्य का अभिमान करनेवाले बलवानों के बल को चूर्ण हुआ जानकर और जगत् को जरा एवं मृत्यु के वशीभूत समझ कर तुम्हें बल का अभिमान नहीं करना चाहिए ॥२१॥
बलं महद्वा यदि वा न मन्यसे कुरुष्व युद्धं सह तावदिन्द्रियैः । जयश्च ते ऽत्रास्ति महच्च ते बलं पराजयश्चेद्वितथं च ते बलं ॥२२॥
यदि तुम अपने बल को महान् समझते हो या अन्यथा, तो (इसकी परीक्षा के लिए) अपने इन्द्रियों से युद्ध करो, यदि इसमें तुम्हारी जीत होती है तो तुम्हारा बल महान् है, यदि पराजय होता है तो तुम्हारा बल व्यर्थ है ॥२२॥
तथा हि वीराः पुरुषा न ते मताजयन्ति ये साश्वरथद्विपानरीयथा मता वीरतरा मनोषिणोजयन्ति लोलानि षडिन्द्रियाणि ये ॥२३॥
क्योंकि वे पुरुष, जो घोड़ों, रथों और हाथियों से युक्त शत्रुओं पर विजय प्राप्त करते हैं, उतने वीर नहीं समझे जाते हैं जितने वीर कि वे मनीषी समझे जाते हैं, जो अपने छ: चंचल इन्द्रियों को जीत लेते हैं ॥२३॥
अहं वपुष्मानिति यन्च मन्यसे विचक्षणं नैतदिद्दं च गृह्यतां । क्व तद्वपुः सा च वपुष्मती तनुर्गदस्य शाम्बस्य च सारणस्य च ।।२४।।
"मैं रूपवान् हूँ" तुम्हारी यह समझ ठीक नाहीं है, यह तुम मानलो । गद, शाम्ब और सारण का वह रूप और रूपवान् शरीर कहाँ है ? ॥२४॥
यथा मयूरश्चनचित्रचन्द्रको बिर्भति रूपं गुणवत्स्वभावतः । शरीरसंस्कारगुणाद्दते तथा बिभर्षि रूपं यदि रूपवानसि ।।२५॥
जिस प्रकार चञ्चल चित्र-विचित्र चन्द्रक (नेत्राकार चिह्न) वाला मयूर स्वभाव से ही उस्कृष्ट रूप धारण करता है, उसी प्रकार शरीर का संस्कार किये बिना ही यदि तुम (उत्कृष्ट, स्वाभाविक) रूप धारण करते हो तो तुम रूपवान् हो ॥२५॥
यदि प्रतीपं वृणुयान्न वाससा न शौचकाले यदि संस्पृशेदप: । मृजाविशेषं यदि नाददीत वा वपुर्वपुष्मन्वद कीद्दशं भवेत् ॥२६॥
यदि प्रतिकूल (वीभत्स स्थान) को वस्त्र से न ढके, यदि शौचकाल में जल का स्पर्श न करे, या यदि सफाई-सजावट न करे तो हे रूपवान्, कहो, वह रूप कैसा हो जायेगा ? ॥२६।।
नवं वयश्चात्मगतं निशाम्य यद्गृहोन्मुखं ते विषयाप्तये मनः । नियच्छ तच्छैलनदीरयोपमं द्रुतं हि गच्छत्यनिवर्ति यौवनं ॥२७॥
अपनी नई वयस को देखकर तुम्हारा मन विषय-भोगों की प्राप्ति के लिए घर की ओर लगा हुआ है, सो पहाड़ी नदी के समान वेगवान् उस मन को रोको; क्योंकि कभी नहीं लौटने वाला यौवन तेजी से जा रहा हैं ॥२७॥॥
ऋतुव्यंतीत: परिवर्तते पुनः क्षयं प्रयात: पुनरेति चन्द्रमाः ।गतं गतं नैव तु संनिवर्तते जलं नदीनां च नृणां च यौवनं ॥२८॥
बीता हुआ ऋतु पलटता है, क्षय को प्राप्त हुआ चन्द्रमा फिर आता हैं, किंतु नदियों का जल और मनुष्यों का यौवन जाकर चला ही जाता हैं, लौटता नहीं हैं ॥२८॥
विवर्णितश्मश्चु वलीविकुङ्चितं विशीर्णदन्तं शिथिलभ्रु, निष्प्र्भं । यदा मुखं द्रक्षसि जर्जरं तदा जराभिभूतो विमदो भविष्यसि ॥२९॥
जब तुम देखोगे कि तुम्हारे मुख की मूछ-दाढ़ी विवर्ण (सफेद) हो गई हैं, मुख पर झुरियाँ पड़ गई हैं, दाँत टूट गए हैं, भौहें शिथिल हो गई हैं, मुख निष्प्रभ और जर्जर हो गया है, तब जरा से अभिभूत होकर तुम मद-रहित हो जाओगे ।।२९॥
निषेव्य पानं मदनीयमुत्तमं निशाविवासेषु चिराद्विमाद्यति । नरस्तु मत्तो बलरूपयौवनैने कश्चिदप्राप्य जरां दिमाद्यति ॥३०॥
आदमी उत्तम मादक पान-द्रव्य का सेवन करके रात्रि के बीतने पर बहुत देर के बाद मद से मुक्त हो जाता है; किंतु बल रूप और यौवन से मत्त कोई भी मनुष्य बुढ़ापे को प्राप्त हुए बिना मद से मुक्त नहीं होता हैं ॥३०॥
यथेक्षुरत्यन्तरसप्रपीडितो भुवि प्रविद्धो दहनाय शुष्यते ।तथा जरान्त्रनिपीडिता तनुर्निपीतसारा मरणाय तिष्ठति ॥३१।।
जिस प्रकार सब रस निचोड़ लिये जाने पर ऊँख पृथ्वी पर फेंक दिया जाता है और जलावन के लिये सूखता रहता है उसी प्रकार जरा-रूपी यन्त्र में दुबकर शरीर सार-रहित हो जाता है और मृत्यु की प्रतीक्षा में रहता है ॥३१॥
यथा हि नृभ्यां करपत्रमोरितं समुच्छितं दारु भिनत्त्यनेकधा । तथोच्छितां पातयति प्रजामिमामहर्निशाभ्यामुपसंहिता जरा ॥३२॥
जिस प्रकार दो मनुष्यों द्वारा संचालित आरा (करवत) ऊँचे वृक्ष को अनेक खण्डों में काट देता है, उसी प्रकार दिवस और रात्रि के द्वारा समीप लाया गया बुढ़ापा इस उन्नत (अभिमानी, मत्त) जगत् का पतन उपस्थित करता है ॥३२॥
स्मृतेः प्रभोषो वपुषः पराभवोरते: क्षयो वाच्छु तिचक्षुषां ग्रह: । श्रमस्य योनिर्बलवीर्ययोर्वधोजरासमो नास्ति शरीरिणां रिपु: ॥३३॥
यह (बुढ़ापा) स्मरण-शक्ति का हरण करनेवाला, रूप का तिरस्कार करनेवाला, आनन्द का विनाशक, आंख, कान और वाणी का ग्रहण पैदा करनेवाला, थकावट उत्पन्न करनेवाला तथा बल एवं वीर्य की हत्या करनेवाला है; शरीर-धारियों के लिए बुढ़ापे के समान कोई दूसरा शत्रु नहीं हैं ॥३३॥
इदं विदित्वा निधनस्य दैशिकं जराभिधानं जगतो महद्भयं । अहं वपुष्मान्वलवान्युवेति वा न मानमारोढुमनार्यमर्हसि ॥३४॥
जरा नामक संसार के इस महाभय को मृत्यु (-मार्ग) का उपदेशक (निर्देशक) जानकर मैं रूपवान् , बलवान् वा युवा हूँ, इस अनार्य अभिमान के वश में तुम्हें न होना चाहिए ॥३४॥
अहं ममेत्येव च रक्तचेतसां शरीरसंज्ञा तव यः कलौ प्रहः । तमुत्सृजैवं यदि शाम्यता भवेद्भयं ह्यहं चेति ममेति चार्छति ॥३५॥
अपने आसक्त चित्त के कारण शरीर को "मैं" और 'मेरा' ही समझना, यह जो तुम्हारा दूषित विचार है, इसको छोड़ो, ऐसा करने पर ही शान्ति होगी; क्योंकि 'मैं' और "मेरा" का भाव भय उत्पन्न करता हैं ।।३५।।
यदा शरीरे न वशोऽस्ति कस्यचिश्निरस्यमाने विविधैरुपल्पवैः । कथं क्षमं वत्तु महंममेति वा शरीरसंज्ञं गृहमापदामिदं ॥३६॥
विविध उपद्रवों से पीढ़ित रहने वाले शरीर पर जब किसी का वश चलता ही नहीं है तब शरीर नामक आपत्तियों के घर को "मै" या "मेरा" समझना कैसे उचित हो सकता है ? ॥३६॥
सपन्नगे यः कुगृहे सदाशुचौ रमेत नित्यं प्रतिसंस्कृतेऽबले । स दुष्टधातावशुचौ चलाचले रमेत काये विपरीतदर्शनः ॥३७॥
जो सर्प-युक्त सदा मैले-कुचैले जीर्ण-शीर्ण व कमजोर कुगृह में बराबर रमण करेगा वही विपरीत दृष्टिवाला मनुष्य दुष्ट (परस्पर-विरोधी) धातुओं से युक्त अपवित्र और क्षणभंगुर शरीर में रमण करेगा ॥३७॥
यथा प्रजाभ्यः कुनृपो बलाद्वलीन्हरत्यशेषं च न चाभिरक्षति । तथैव कायो वसनादिसाधनं हरत्यशेषं च न चानुवर्तते ॥३८॥
जिस प्रकार कुराजा प्रजाओं से बलात् अशेष कर लेता है और उनकी रक्षा नहीं करता है उसी प्रकार शरीर अशेष वस्त्र-आदि साधन हरण करता है और अनुकूल नहीं रहता है ॥३८॥
यथा प्ररोहन्ति तृणान्ययत्नतः क्षितौ प्रयत्नात्तु भवन्ति शालयः। तथैव दुःखानि भवन्त्ययत्नतः सुखानि यत्नेन भवन्ति वा न वा ॥३९।।
जिस प्रकार पृथ्वी पर तृण अनायास (बिना प्रयत्न) ही अंकुरित होते हैं और धान (अनाज) प्रयत्न करने पर उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार दुःख बिना प्रयत्न के ही होते हैं किंतु सुख प्रयत्न करने पर होते हैं या नहीं भी होते हैं ॥३९॥
शरीरमार्तं परिकर्षतश्चलं न चास्ति किंचित्परमार्थत: सुखं । सुखं हि दुःखप्रतिकार सेवया स्थिते च दुःखे तनुनि व्यवस्यति ।।४०॥
आर्त एवं क्षणभङ्गुर शरीर को घसीटने में वास्तव में कुछ भी सुख नहीं है। दुःख का प्रतिकार करके थोड़ा-सा दुःख रहने पर ही आदमी सुख की कल्पना कर लेता है ॥४०॥
यथानपेक्ष्याम्र्यमपीप्सितं सुखं प्रबाधते दुःखमुपेतमण्वपि । तथानपेक्ष्यात्मान दुःखमागतं न विद्यते किंचन कस्याचत्सुखं ॥४१॥
जिस प्रकार अभिलषित महासुख की अपेक्षा करने पर भी उपस्थित दुःख, चाहे अत्यल्प ही क्यों न हो, कष्ट देता ही है उसी प्रकार आये हुए दुःख की अवहेलना करके किसी को कोई सुख नहीं हो सकता हैं ।।४१।।
शरीरमीद्दग्बहुदुःखमध्रुवंफलानुरोधादथ नावगच्छसि । द्रवत्फलेभ्यो धृतिरश्मिभिर्मनोनिगृह्यतां गौरिव शस्यलालसा ॥४२॥
शरीर दुःख-पूर्ण और क्षणभङ्गुर है, यदि फल की आसक्ति के कारण इसे नहीं समझ रहे हो तो भी चन्चल (नाशवान्) फलों की ओर से अपने मन को धैर्यरूपी रस्सी से रोको, जैसे कि फसल (चरने) के लिये लालायित गौ को रोकते हैं ।।४२॥
न कामभोगा हि भवन्ति तृप्तये हर्वीषि दीप्तस्य विभावसोरिव । यथा यथा कामसुखेषु वर्तते तथा तथेच्छा विषयेषु वर्धते ॥४३॥
काम-भोगों से तृष्ति नहीं होती हैं, जैसे कि जलती आग को आहुतियों से तृप्ति नहीं होती हैं । जैसे जैसे काम- सुखों में प्रवृत्ति होती जाती हैं वैसे वैसे विषय-भोगों की इच्छा बढ़ती जाती हैं ॥४३॥
यथा च कुष्ठव्यसनेन दुःखितः प्रतापनान्नैव शमं निगच्छति । तथेन्द्रियार्थेष्वजितेन्द्रियश्चरन्न कामभोगैरुपशान्तिमृच्छति ॥४४॥
जिस प्रकार कुष्ठ रोग से पीड़ित व्यक्ति अपने (शरीर) को तपा कर शान्ति नहीं प्राप्त करता है, उसी प्रकार विषयों के बीच अजितेन्द्रिय होकर रहनेवाला मनुष्य काम-भोगों से शान्ति नहीं पाता है ।।४४॥
यथा हि भैषज्यसुखाभिकाङ्क्षया भजेत रोगान्न भजेत तत्क्षमं । तथा शरीरे बहुदुःखभाजने रमेत मोहाद्विषयाभिकाङ्क्षया ॥४५॥
जिस प्रकार (स्वादिष्ठ) औषधि के सुख की आकांक्षा से रोगों का सेवन करे और उनके (कटु) प्रतिकार का सेवन न करे, उसी प्रकार मोहवश विषयों की आकांक्षा से दुःखपूर्ण शरीर में रमण करे ॥४५॥
अनर्थकामः पुरुषस्य यो जनः स तस्य शत्रुः किल तेन कर्मणा। अनर्थमूला विषयाश्च केवला ननु प्रहेया विषमा यथारयः ॥४६॥
जो मनुष्य किसी दूसरे के अनर्थ की कामना करता हैं वह अपने उस कर्म के कारण उसका शत्रु है; विषय केवल अनर्थ के मू्ल हैं; विषम शत्रुओं के समान उनका परित्याग करना चाहिए ॥४६॥
इहैव भूत्वा रिपवो वधात्मकाः प्रयान्ति काले पुरुषस्य मित्रतां । परत्र चैवेह च दुःखहेतवो भवन्ति कामा न तु कस्यचिच्छिवाः ।॥४७॥
इस संसार में जो शत्रु होकर हत्या करना चाहते हैं; वे समय पर मनुष्य के मित्र हो जाते हैं; किंतु काम (विषय) इहलोक और परलोक में दुःख के हेतुस्वरूप हैं, उनसे किसी का कल्याण नहीं होता है ॥४७॥
यथोपयुक्त' रसवर्णगन्धवद्वधाय किपाकफलं न पुष्टये।निषंव्यमाणा विषयाश्चलात्मनो भवन्त्यनर्थाय तथा न भूतये ॥४८॥
जिस प्रकार (सुन्दर) रस, वर्ण व गन्ध से युक्त किम्पाक फल का उपयोग करने से मृत्यु होती है, पुष्टि नहीं, उसी प्रकार विषयों का सेवन करने से चन्चलात्म व्यक्ति का अनर्थ (अनिष्ट) ही होता है, कल्याण नहीं ॥४८।।
तबेतदाज्ञाय विपाप्मनात्मना विमोक्षधर्माद्युपसंहितं हितं ।जुषस्व मे सज्जनसंमतं मतं प्रचक्ष्व वा निश्चयमुद्गिरन् गिरं ॥४९॥
इसलिए पाप-रहित आत्मा (चित्त) से मोक्ष-धर्म के आरम्भ से युक्त इस हित को पहचानो और सज्जन-सम्मत मेरे मत का सेवन करो या वचन बोलकर अपना निश्चय कहो" ॥४९॥
इति हितमपि बह्वपीदमुक्तः श्रुतमहता श्रमणेन तेन नन्द: । न धृतिमुपययौ न शर्म लेभे द्विरद इवातिमदो मदान्धचेता: ॥५०॥
उस महाविद्वान् भिक्षु के द्वारा इस प्रकार बहुत कुछ हित कहे जाने पर भी नन्द को न धैर्य हुआ न शान्ति; क्योंकि मत्त हाथी के समान उसका चित्त मदान्ध था ॥५०॥
नन्दस्य भावमवगम्य ततः स भिक्षु: पारिप्लवं गृहसुखाभिमुखं न धर्मे ।सत्त्वाशयानुशयभावपरीक्षकायबुद्धाय तत्त्वविदुषे कथयांचकार ॥५१॥
सौन्दरनन्दे महाकाव्ये मदापवादो नाम नवमः सर्ग: ।
तब नन्द के चित्त को चन्चल, घर के सुखों की ओर उन्मुख और धर्म से विमुख जानकर, उस भिक्षु ने प्राणियों के आशय अनुशय और भाव के परीक्षक तत्वज्ञ बुद्ध से (उसका अभिप्राय) निवेदन किया ॥५१॥
सौन्दरनन्द महाकाव्य में "अभिमान की निन्दा" नामक नवम सर्ग समाप्त ।
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