Thursday, November 28, 2019

कबीर का हठयोग बौध्दयोग से प्राप्त

कबीर का हठयोग बौध्दयोग से प्राप्त :

हठयोग का मूलबीज यद्यपि बुध्द-वचन में मिलता हैं, किन्तु इसका विकास सिध्दों के काल में हुआ और नाथ-परम्परा में यह एक पन्थ का रुप धारण कर हठ़योग-पध्दति नाम से प्रचलित हो गया. राहूलजी का कथन हैं की सन्तो की साधना में सूर्य-चन्द्र या इडा-पिंगला की जो साधना आती हैं, उसका वर्णन सिध्द सरहपा (सरहपाद) से पहले नहीं मिलता, यह सम्भवतः सरहपा की ही सूझ और अभ्यास का परिणाम हैं (दोहाकोश, भूमिका, पृष्ठ 32), किन्तु हम देखते हैं की हठयोग नाम प्राचीन होते हुए भी इसकी मूलभूत क्रियाएँ एवं साधनाएँ बुध्द काल में भी थी और भगवान् बुध्द ने इस साधना की भूरि-भूरी प्रशंसा की हैं. यह साधना 'आनापानसति ' की भावना में आती हैं, जिसके सम्बन्ध में तथागत ने कहा हैं ---- "भिक्षुओं! आनापान-स्मृति-समाधि-भावना करने पर, बढ़ाने पर शान्त, उत्तम, असेचनक सुख विहार हैं, वह उत्पन्न हुए बुरे अकुशल धर्मों को बिलकुल अन्तर्ध्यान कर देती हैं." (विशुध्दीमार्ग, भाग 1, पृष्ठ 240 तथा संयुत्तनिकाय, 52, 1, 1) इस भावना को करने वाला साधक एकान्त स्थान, अरण्य या वृक्ष के नीचे जा पालथी मारकर काया को सीधा करके स्मृति को सामने कर बैठता हैं. वह स्मृति के साथ ही श्वास लेता तथा छोडता हैं, छोटे, बड़े, लम्बे आदि श्वासों की स्मृति बनाए रखता हैं. वह सम्पूर्ण काया का प्रतिसंवेदन करते हुए श्वास लेता और छोडता हैं. ऐसे ही काय-संस्कार, प्रिति, सुख, चित्त, अनित्य, विराग, निरोध, प्रतिनि:सर्ग की भावना करते हुए श्वास लेता और छोडता हैं. इस प्रकार करते हुए वह अपने चित्त को नासिका के अग्रभाग में लगाता हैं और स्मृति को वही बनाये रहता हैं, वह काया में काया को ही देखता हुआ विहार करता हैं. भगवान् ने अश्वास-प्रश्वास को ही काया में दूसरी काया कहा हैं. फिर क्रमश: वेदना, चित्त और धर्म का मनन करता हुआ विहार करता हैं. ऐसे भावना करते हुए उसके बोध्यंग पूर्ण होते हैं और विद्या तथा मुक्तिसुख का अनुभव इसी काय और इसी जीवन में कर लेता हैं. जो इसकी भावना करते हैं, वे अमृत का उपभोग करते हैं, और जो इसकी भावना नही करते, वे अमृत का उपभोग नही करते. इसी आना-पान-सति भावना का सिध्दों ने अपने ढंग से वर्णन किया और इसकी साधना को भी रुपको में बतलाया.  आश्वास (साँस लेना) और प्रश्वास (साँस छोडना) को दक्षिण-वाम अथवा इडा व पिंगला कहा. इन्हे ही गंगा-यमुना नाम से भी पुकारा और सूषुम्ना की भी कल्पना कर गंगा-यमुना-सरस्वती की स्थापना इस शरीर में ही करके त्रिवेणी संगम का भी निर्माण किया. नाद, बिंदु, अनाहतनाद आदि की कल्पना की और इस शरीर में ही अमृत-लाभ का उपदेश दिया. सिध्द-साहित्य में इसका विस्तारपूर्वक वर्णन उपलब्ध हैं. नाथ पन्थ ने तो इस हठ़योग को दृढता से ग्रहण किया और इसका प्रबल प्रचार किया. हठ़योग कहते ही हैं अंगो और श्वास पर अधिकार प्राप्त कर मन में एकाग्रता ला उसे परमपद (निर्वाण) में लीन कर देने को, जिसे कबीर ने राम में लवलीन कर देना माना हैं. स्थविरवादी बौध्दधर्म में आश्वास-प्रश्वास का मनन करना और उसे चित्त की एकाग्रता का निमित्त बना कर विमुक्ति प्राप्त करना ही ध्येय हैं, आश्वास-प्रश्वास को रोककर अथवा उलटा पवन चलाकर षटचक्र द्वारा उपर चढाना नही. कबीर ने घट-घट में व्याप्त राम को घट में ही खोजना उत्तम समझा हैं और इस शरीर के भीतर ही हठयोग-साधना से आत्म-प्रकाश का वर्णन किया हैं -----

उलटि पवन षटचक्र निवासी, तीरथराज गंगतट बासी।
गगन मंडल रवि ससि दोड तारा, उलटि कूँची लागि किवारा। कहै कबीर भई उजियारी, पंच मारि एक रसो निनारी।

जिस प्रकार बौध्दयोग चित्त को राग, द्वेष मोह आदि कलुष (चित्तमल) से निर्मल एवं स्वच्छ कर परमसुख निर्वाण को प्राप्त करने का साधन हैं, ऐसे ही कबीर का हठयोग मन को विकार-रहित कर राम से मिलाने का उपाय हैं, इसीलिए कबीर ने कहा हैं ----

जे मन नहिं तजै विकारा, तो क्युं तिरिये भौ पारा।
जब मन छाडै़ कुटिलाई, तब आइ मिले राम राई।
ससिहर सूर मिलावा, तब अनहद बेन बजावा।
जब अनहद बाजा बाजै, तब साई संगि बिराजै।
चित्त चंचल निहचल कीजै, तब राम रसाइन पीजै।
जब राम रसाइन पीया, तब काल मिटया जन जोया।

इस प्रकार स्पष्ट हैं की बौध्दयोग से आयी आनापान-स्मृति-भावना की आश्वास-प्रश्वास की साधना पीछे हठयोग का रुप ले ली और उसे सिध्दो और नाथो ने अपनी शैली एवं साधना-पध्दति का रुप प्रदान किया. उन्होने कल्पित नामो से तत्व का निरुपण कर हठयोग की साधना प्रचारित की. कबीर ने भी उसी परम्परा से प्रभावित होकर उसी हठयोग को परमपद की प्राप्ति का एक उत्तम साधन माना. अंत: कबीर का हठयोग बौध्दयोग की ही देन हैं.

अनित्य दु:ख अनात्म

बुध्द के दर्शन के तीन महावाक्य हैं -- अनित्य, दु:ख, अनात्मा उसी तरह जैसे वेदान्त के सत्-चित्-आनन्द... यह दोनों दर्शन एक दूसरे के पूर्ण विरोधी हैं, यह उनके इन तीन वाक्यों की तुलना करने ही से मालूम पड़ेगा. अनित्यवाद पर बुध्द का बहुत ही जोर हैं, और एक तरह हम कह सकते हैं, की बौध्द दर्शन की यही आधारशीला हैं. इसको ठिक तरह से समझने पर बौध्द दर्शन को समझा जा सकता हैं, और इसे भी समझा जा सकता हैं, की अपने भारत से लुप्त होने के समय (१२ वीं सदी) तक क्यों बौध्द-दर्शन बराबर आगे बढ़ता रहा. बुध्द के प्रादुर्भाव से पहले ही उपनिषद् के विचारकों के रुप में हमारे देश में दार्शनिकों का महत्त्व बढ़ चूका था. उपनिषद् बाहरी दुनिया को अनित्य (परिवर्तनशील) मानने को तैयार था, लेकिन वह उसके भीतर से एक नित्य सत्ता खोज़ निकालना चाहता था. असीम परिवर्तन की दुनियां सचमुच ही शांति की दुनियां नहीं हो सकती, इसलिए वास्तविक हो या काल्पनिक, एक सनातन अपरिवर्तनशील तत्त्व को ढूंढने की तरफ वेदकाल के बाद के विचारकों की पीढ़ीयां दिन-रात एक करने लगी और उन्होने आत्मा (ब्रह्म) के रुप में उस तत्त्व को ढूढ़ निकाला. यद्यापि इस सफ़लता का यह परिणाम नहीं हुआ कि अब नई-नई जिज्ञासायें उत्पन्न न हो सके. यह तो इसी से मालूम होता हैं, कि बुध्द-काल में बुध्द को लेकर सात बड़े-बड़े आचार्य अपने-अपने दर्शन के अविष्कार और प्रतिपादन के लिए विख्यात थे, और ये सभी उपनिषद् या वेदों के अनुयायी नहीं थे, बल्की ब्राह्मणों के धर्म के मुकाबले में उन्होने नये तिर्थ (धार्मिक संप्रदाय) स्थापित किये. सभी में अपनी-अपनी विशेषतायें थी. ये किसी न किसी धर्म के प्रवर्तक माने गये थे, और उनके धर्म में भौतिकवाद और अनिश्वरवाद तक सम्मिलित थे. बुध्द का मुख्य प्रहार उपनिषद दर्शन पर था, यह तो इसी से मालूम हैं, की उपनिषद् के आत्मतत्त्व कि जगह उन्होने अपने दर्शन में अनात्मा का प्रतिपादन किया. अनात्मा से मतलब आत्मा का अभाव मात्र नहीं था, बल्की वह इस शब्द से यह बतलाना चाहते थे, की चाहे भितरी-बाहरी किसी संसार या पदार्थ को देखा जाये तो कही पर भी उपनिषद् प्रतिपादीत आत्मा जैसे सनातन तत्त्व का अस्तित्व नहीं मिलता. सभी पदार्थ बहार से भीतर तक सतत परिवर्तनशील हैं, और यह परिवर्तन केवल उपरी नही होता, बल्की जड़-मूल से एक वस्तु का नाश कर क्षण भर के लिए दूसरी वस्तु को ला रखता हैं. इस तरह देश और काल में यह परिवर्तन सदा से होता आ रहा हैं और सदा होता रहेगा. ' सब अनित्य हैं ' (सब्बं अनिच्चं), ' सब अनात्म हैं ' (सब्बं अनत्ता) इन वाक्यों को बुध्द ने पूरे अर्थ में इस्तेमाल किया, और विश्व में इसे अटल सिध्दान्त बतलाया. अनित्यता के नियम का कोई अपवाद नहीं हैं, यह कह लिजिए, अपवाद सिर्फ यही सर्वव्यापी अनित्यता हैं.

नोट: वेदान्तवादी सत् (सत्य) सिर्फ नित्य वस्तु को मानते हैं, सत्-चित् का अर्थ हैं नित्य आत्मा, और आनन्द का अर्थ हैं दु:ख का अभाव... बुध्द ने सत् (सत्य) को अनित्य (परिवर्तनशील) कहा, नित्य आत्मा के विरुद्ध उन्होने अनात्मा का सिद्धांत रक्खा, और जो अनित्य (परिवर्तनशील) हैं वह दु:ख हैं, ऐसा बतलाया. मतलब आनन्द के विरुद्ध दु:ख को रक्खा. फिर उस दु:ख के कारण और निवारण के मार्ग को प्रतिपादित कर, उस मार्ग से दु:ख मुक्ति (निर्वाण) साध्य करने को कहा....!

सिध्द

गुप्त-काल से ही बौध्द धर्म का ह्रास प्रारम्भ हो गया था और वैदीक परम्परागत धर्मो का पुन: नये शिरे से उदय होने लगा था, जो कई शताब्दीयों से बौध्द धर्म के व्यापक प्रभाव से दबा पड़ा था. वैष्णव तथा शैव धर्मों ने विशेष रूप से जनता पर अपना प्रभाव डालना शुरु कर दिया था, क्योंकि जन-समाज भी सिध्दो के आचार एवं धर्म से ऊब चुका था. इसी काल में भगवान बुध्द, बोधिसत्व, तारा आदी (आज के) हिन्दू धर्म के देवी-देवता बन गये, केवल नाममात्र का अन्तर रह गया. भगवान बुध्द तो वैष्णवो के अवतारो में स्थान पा गये, इसके बारे में हम आगे बात करेंगे. सिध्दों ने जो निर्गुण-निरंजन शून्य का उपदेश दिया था और बुध्द को निरन्तर, सर्वत्र माना था तथा यह भी कहा था की बुध्द लोकोत्तर हैं, उनकी माया से ही निर्मित बुध्द उत्पन्न होते, तप करते, उपदेश देते और परिनिर्वाण को प्राप्त होते हैं. वास्तविक बुध्द धरती पर तो कभी आते ही नहीं, वे करुणा एवं दया के मूल हैं, सभी सत्वों (जीवों) के उध्दार की भावना से ही बोधिसत्व जगदुध्दारक में लगे रहते हैं, सहज-भावना से निरंजन अवस्था को प्राप्त किया जा सकता हैं आदि सिध्दों के उपदेशो से प्रभावित होकर सगुण एवं निर्गुण भक्ति की दो धारायें फुट चली. ये भक्ति की धारायें आठवी से बारहवी शताब्दीयों के बीच प्रगट हुई, इनका बिज (महायान की शाखायें) माध्यमिक एवं योगाचार की उत्पत्ति के साथ ही अंकुरित हो चुका था. इसी भावना के प्रभावित होकर बुध्द-भक्ति की भावना ने जोर पकड़ा और शैव तथा वैष्णव धर्म बौध्दधर्म से प्रभावित होकर आगे बढ़ने लगे. हम कह सकते हैं की बौध्द धर्म कही गया नहीं, प्रत्युत सिध्दों की समाप्ति के साथ ही इन धर्मों में घुलमिल गया. हम देखते हैं की बौध्द धर्म को मानने वाला राजा हर्षवर्धन सूर्य एवं शिव की पूजा करता था. ऐसे ही हिंदु देवी-देवताओं के सिर पर बुध्दमूर्ती, स्तूप आदि को निर्मित कर उन्हें बुध्दोपासक बना लिया गया था. गणेश के सिर पर स्तूप का निर्माण, नीलकंठ बोधिसत्व की मूर्तियों के निर्माण आदि इसके ज्वलन्त प्रमाण है. यही कारण हैं की बौध्द स्थानों के उत्खनन में शीव, अग्नि, कार्तिकेय आदि की मूर्तियाँ पाई गई हैं. (इससे यही साबित होता हैं) अब बौध्द तथा हिंदू परस्पर मिल कर रहने लगे थे. एक ही परिवार में हिंदू-बौध्द दोनों विचारों के लोग रह सकते थे. (गुप्त राजाओं में हिंदू-बौध्द दोनों विचारो के राजा थे) ऐतिहासिक दृष्टि से विचार करने पर स्पष्ट ज्ञात होता हैं की सिध्दों के कारण बौध्द धर्म के गुह्याचार, तंत्र-मंत्र, सहज-भावना के अभिचार एवं घृणित रुप तथा अन्धविश्वासो से ऊब कर जनता धीरे-धीरे वैष्णव तथा शैव धर्मों की ओर बढ़ती गयी. फलत: बौध्द धर्म का लय हुआ और ये धर्म उन्नति करने लगे. बारहवी शताब्दी के यवन आक्रमणो ने बौध्द धर्म की रही-सही मर्यादा भी समाप्त कर दी. बारहवी शताब्दी तक ही हम भारत में बुध्द विहारों का निर्माण होता हुए पाते हैं, उसके पश्चात बहुत कम प्रमाण ऐसे मिलते हैं कि बुध्द विहारों के निर्माण हुए हो. कुछ लोगो ने अपनी श्रध्दा-भक्ति व्यक्त करने के लिए पीछे भी छोटे-मोटे कुछ निर्माण कार्य किये थे, किन्तु वे नगण्य हैं.

उधर अनेक सिध्दों की विचारधाराओं में नाथ और सन्त मतो की मूलभावनाएँ अंकुरित हो चली थी और वे ही पीछे पूर्ण विकसित होकर नाथ और उससे सन्त परंपरा बन गई. इन पर हम आगे विचार करेंगे. फल यह हुआ की बारहवी शताब्दी में सिध्दों का बौध्द-जन समाज पर ऐसा बुरा प्रभाव पड़ा की वह बौध्द धर्म को त्यागकर नाथ, सन्त, भागवत आदि धर्मों में अन्तर्भुक्त हो गया. वह जहां गया बौध्दधर्म की विचारधारा रही ही. यवन काल में जब बौध्द भिक्षुओं का अपने भिक्षुवेष में रहना कठिन हो गया और अधिकांश भिक्षु जब मार डाले गए, बचे नेपाल, तिब्बत आदि देशो की ओर चले गए तब साधारण जनता अपने ही रक्त सम्बन्धी भाईयों में मिल गयी और उसने अपना नाम परिवर्तन कर लिया. (बुध्द-चर्य्या की भूमिका, पृष्ठ १३) इस प्रकार सिध्द-काल के अन्त की कहानी मध्ययुगीन भारत में शैव और वैष्णव सम्प्रदायों के उदय एवं विकास का इतिहास हैं. इनमे भी विशेष रूप से शैव मतावलम्बी नाथ सम्प्रदाय तो सिध्दों से ही प्रादुर्भूत हैं. इसके प्रवक्ता एवं उपदेष्टा चौरासी सिध्दों में से ही थे.

नाथ सम्प्रदाय का जन्म : नाथ सम्प्रदाय के उद्भव के सम्बन्ध में विद्वानों के विभिन्न मत हैं. कुछ लोगो का मत हैं की सिध्द प्रच्छन्न नाथपंथी थे, क्योंकि कतपिय सिध्द शिव तथा उनके गण हेरुक के भक्त थे. (सिध्दसाहित्य, पृष्ठ ३१२-३२३) कुछ विद्वानों का कथन हैं की नाथसम्प्रदाय चौरासी सिध्दों से निकला हुआ एक क्रांतिकारी पन्थ हैं. (पुरातत्वनिबंधावलि, पृष्ठ ३६२) इसी प्रकार कुछ विद्वान यह मानते हैं की सिध्दों में से अधिकांश साम्प्रदायिक रुप से ही बौध्द थे, किन्तु विचारधारा के अनुसार नाथपन्थी थे. (डॉ. पिताम्बरदत्त बड.थ्वाल, योगप्रवाह, पृष्ठ २१७) इन विचारों का ऐतिहासिक तथा धार्मिक दृष्ट से पर्यवेक्षण करने से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं की वास्तव में नाथ सम्प्रदाय में सिध्दों की योग-पध्दति और सहजसमाधी प्रधान रुप से विद्यमान हैं. महापण्डित राहुल सांकृत्यायन का यह कथन बिल्कुल ठिक हैं -- "विचारों में यद्यपि अब नाथ पन्थ अनिश्वरवाद को छोड़कर ईश्वरवादी हो गया हैं, तथापि अभी उसकी वाणियों में छान-बीन करने पर निर्वाण, शून्यवाद और वज्रायन का बिज मिलेगा." (पुरातत्वनिबंधावली, पृष्ठ १६३) हम देखते हैं की पालि साहित्य में 'नाथ' शब्द का प्रयोग दो अर्थो में हुआ हैं -- तथागत और ज्ञान प्राप्त भिक्षु (अर्हत्).... बुध्दो दसबलो सत्था, सब्बञ्ञू दीपदुत्तमो। मुनिन्दो भगवा नाथो, चक्खूमा अङ्गीरसो मुनि ।।१।। लोकनाथो नधिवरो, महेसि च विनायको। समन्तचक्खू सुगतो, भूरीपञ्ञो मारजी ।।२।। -- अभिधानप्पदीपिका।

दस नाथकरण धर्मों में ऐसे ही भिक्षु के दस गुण बतलाये गए हैं. (दीघनिकाय, हिन्दी अनुवाद, पृष्ठ ३०० और ३१२) सिध्दों की वाणीयों में उसे नाथस्वरुप कहा गया हैं, जिस का चित्त विस्फुरीत हो जाय. (जत वि चित्तहि विफ्फुरइ तत्त विणाह सरुअ--दोहाकोष, बागची, पृष्ठ १३), अथवा जिसका मन निश्चल हो जाय. (जो गत्थु णिच्चल किअउ मण सो पास -दोहाकोष, बागची, पृष्ठ ४४), वही अनश्वर स्वभाव निर्वाण के समीप पहुँचा हुआ हैं. सिध्द कण्हपा ने साधक को वज्रधरनाथ कहा हैं. (दोहाकोष, पृष्ठ ४६) इससे स्पष्ट हैं की सिध्दों ने 'नाथ' शब्द को तथागतवाची न ग्रहण कर स्थिर-चित्त-सिध्दीप्राप्त योगी का पर्यायवाची माना. तात्पर्य यह की हीनयान (स्थविरवाद) में अर्हत् की जो स्थिति थी, वही स्थिति सिध्दों में 'नाथ' की मानी गयी और इस प्रकार सिध्दी-प्राप्त सभी सिध्द 'नाथ' थे. यही कारण हैं की इस सिध्दों में कुछ ने अपने नाम के साथ 'नाथ' शब्द का प्रयोग किया. उन नाथ शब्दधारी सिध्दों को भी 'पा' या 'पाद' के साथ भी बहुधा स्मरण किया जाता हैं. (पुरातत्वनिबंधावली, पृष्ठ १४८ में 'गोरक्षपा'), यह दोनों शब्द गौरवार्थ प्रयुक्त होते थे) इसी प्रकार उस काल में 'नाथ' शब्द का भी प्रयोग पूजार्ह के अर्थ में ही होता था, जो पीछे साम्प्रदायिक रुप धारण किया और नाथसम्प्रदाय का विकास हुआ. .... क्रमश:

हिन्दी सन्त-साहित्य पर बौध्द धर्म का प्रभाव,
लेखक- डॉ. विद्यावती मालविका, एम. ए. पि. एच. डी., साहित्यरत्न.

Monday, November 25, 2019

बौध्द पर्व

बौध्दधर्माबद्दल गैरसमज :

कित्येक असे म्हणतात की बौध्दधर्म हा धर्मच नव्हे, तर केवळ तत्त्वज्ञान आहे. बौध्दधर्माला 'धर्म' म्हणावे की नुसते 'तत्त्वज्ञान' म्हणावे हा प्रश्न मुळ पाश्चात्य पंडितानी उपस्थित केला व आमच्यातल्या जुण्या पिढीतील विद्वानांनी त्यांच्या ग्रन्थांवरच सगळी भिस्त ठेवून त्यांच्या मताचा अनुवाद केला. वस्तुतः बौध्दधर्म जितका तत्त्वज्ञानमय आहे, तितकाच तो धर्म या संज्ञेलाही पात्र आहे. किंबहुना धर्म, नीति आणि तत्त्वज्ञान ही तिन्ही त्याच्या ठिकाणी एकवटलेली आहेत असे म्हणने अधिक योग्य होईल. या विश्वाचे स्वरुप व त्याला चलन देणार्या शक्ति यांचे ज्ञान बौध्दधर्म करुन देतो; मनुष्याला त्याच्या अंतरात्म्याचे खरे स्वरुप व्यक्त करुन दाखवितो; त्याच्या उन्नतीची पराकाष्ठा कोणती आहे ती सांगतो; मनुष्याच्या अंत:करणातल्या गूढ नैतिक वृत्तिंवर प्रकाश पाडतो, व त्यांना जागृत करुन सन्मार्गाकडे प्रवृत्त करतो; मनुष्याचे 'दैव' म्हणतात ते त्याच्याच स्वत:च्या हातात असते, हि गोष्ट त्याच्या मनावर बिंबवून स्वत:च्या प्रयत्नाच्या हिम्मतीवर मनुष्याच्या अक्षय्य शांततामुख-चिरकालीन निर्वाण-पद प्राप्त करुन घेता येते, हेही तो धर्म सांगतो. सारांश, विश्वाचे सत्य स्वरुप, त्याला हालविणार्या शक्ति, त्यात वागणारांचे परस्परांशी सम्बन्ध, उत्तम गतीचा मार्ग, त्या मार्गाने जाणारे साधन व अंतिम साध्य, इतक्या सगळ्या गोष्टी दाखवणार्या बौध्द धर्माला जर 'धर्म' म्हणावयाचे नाही तर मग म्हणावयाचे तरी कोणाला?

'धर्म' शब्दाचा सामान्यत: जो अर्थ लोक घेतात, तो याहून किंचित निराळा असल्यामुळे समजूतीचा घोटाळा झालेला आहे. आपल्या ज्ञानेन्द्रियाच्या अकलनशक्तिच्या मर्यादेच्या बाहेर अज्ञेय असे जे काही आहे, त्याची प्राप्ति करुन घेण्याची हाव आमच्या धर्मकल्पनेच्या मुळाशी बहुधा असते. तेव्हा ईश्वराविषीच्या आपल्या कल्पना, त्याविषयीचे भय, अलौकिक चमत्कार, ईश्वरी कृपा इ. गोष्टी ज्यात नाहीत, त्याला धर्म ही संज्ञा देण्यास आमचे मन कचरावे हे साहजिक आहे. बौध्दधर्माचा पायाच मुळी निराळा आहे. तो अज्ञेयावरील श्रध्देसारखा संशयीत गोष्टींवर बसविलेला नाही; तर प्रत्येक्ष प्रमाणावर दु:खाचे अस्तित्व या जगात आहे; तोवर शाश्वत शांती प्राप्त होणार नाही या गोष्टींवर बसविलेला आहे. त्यांत संदिग्धता, अंधश्रध्दा किंवा गूढ मुळीच नाही. तथापि मनुष्याच्या जीविताचा सद्विनियोग कसा करता येईल, हे बौध्दधर्माने जितके उत्कृष्ट प्रकारे दाखवले आहे, तितके अन्यत्र क्वचितच दाखविलेले असेल. बौध्द धर्माची 'धर्म' या दृष्टीने महती आहे ती याच गोष्टीत आहे.

बौध्दधर्मात धर्मतत्त्वे तर समाविष्टि आहेतच पण त्यांत नीतितत्वांचाही प्रकर्ष झालेला दिसतो. अंधश्रध्दा ठेवण्यास तो धर्म कधी सांगत नाही. स्वत: विचार करा, प्रतीती पहा, खात्री करुन घ्या, आणि मग खरे माना असे तो सांगतो. अज्ञेय अशा ईश्वराने ही गोष्ट सांगितलेली आहे, आणि म्हणून ती खरी मानली पाहिजे अशा तत्त्वावर त्याच्या इमारतीची उभारणी झालेली नाही. तर जग व माणवी जिवित यांची अंगेउपांगे काय आहेत त्याची मीमांसा करुन, मनुष्य व मनुष्ये व मनुष्य व मनुष्येत्तर प्राणी यांच्यांतला संबंध ठरवून, त्या स्वाभाविक संबंधाच्या पायावर त्याने आपले नियम रचिले. मनाला (आत्मपरहिताची) जी गोष्ट पटेल तिचाच स्वीकार विहीत, त्यांत दुराग्रहाचा भाग नसावा, असे तो सांगतो. दुराचरण करणाराला चिरकालीन शासनाचा बागुलबोवा किंवा अंधश्रध्दा ठेवणाराला पापमुक्ततेचे आमिष दाखविण्याचा यत्न करण्याचे त्याने मनांत सुध्दा आणिले नाही; पण प्रत्येक माणसाला त्याच्या बर्या-वाईट कर्माप्रमाणे फळ मिळावयाचेच, चुकावयाचे नाही, असे लोकांच्या मनावर बिंबवल्याने सदाचरणाविषयी स्फुर्ति व दुराचाराला प्रतिबंध व्हावा, पापाचरणाविषयीच्या मोहाचे पटल गळून पडावे, सत्याच्या प्रकाशाने दिव्य दृष्टि प्राप्त व्हावी व सर्वांची क्षणिक-नश्वर-सुखाची दृष्टि निघून ती चिरकालीन व शाश्वत सुखाकडे वळावी व माणसाचे हातून सदाचरण, परोपकार, धर्मकृत्ये, समाजसेवा इ. व्हावीत, अशी योजना बौध्दधर्माने करुन ठेविली आहे. अशा रीतीन धर्म आणि नीति यांचा मिलाप करुन ज्या बौध्दधर्माने त्याला व्यावहारीक स्वरुप दिले, त्याला एकांगी म्हणने ही निखालस चूक हाटली पाहिजे.

बौध्द पर्व
लेखक- वासुदेव गोविंद आपटे

Saturday, November 23, 2019

बौध्द पर्व

शाक्यमुनि गौतम बुद्ध तसेच पुराणातील भगवान बुध्द एकच की वेगवेगळे? :

गौतम बुध्दाचा जन्मकाळ व दशावतारातील बुध्दाचा जन्मकाळ, गौतम बुध्दाची जन्मभूमी व वंश आणि पुराणातील बुध्दावताराची जन्मभूमी व वंश, गौतम बुध्दाची मते व दशावतारातील बुध्दाची अवतार-कृत्य यांच्यांत खरोखर कांही साम्य आहे की काय हे पाहिल्यानंतर या प्रश्नाचा आपोआप निकाल लागेल, असे मला वाटते.

'कृष्णावतार सरल्यावरि बौध्द होतो।
संप्राप्तकाळ कलिच्या खर वत्सरीं तो।।
आश्विन शुक्ल दशमी रविवार देखा।
तैं शुक्लयोग असतां घटि षड् विशाखा।।१।।

कवी वामण पंडित यांनी या श्लोकांत बुध्द हा विष्णुचाच अवतार असे सांगुन तो अवतार केव्हा झाला त्याविषयीचा काळही दिला आहे, तो हिंदुपुराणांच्या आधाराने दिलेला आहे. हा जन्मकाळ जैनग्रंथात दिलेलेल्या बुध्दकाळाशी जुळतो.

'द्वे ऋषीनंदसंखायां गतायां तद्दिने शुभे।
खर-वर्ष दशम्यां च शुक्ले मासे तथा अश्विने।।
...योगवित् परमो जातो महाख्यातो हि बुध्दराट्।।

कित्येक बौध्द ग्रंथकार गौतम बुध्दाचा जन्म वैशाख शु.१५ ला झाला असे समजतात, आणि कित्येक म्हणतात की प्रत्येक्ष जन्म जरी अश्वीन महिण्यात झाला असला, तरी त्यांचा गर्भसंचार वैशाख शुध्द १५ हाच असल्यामुळे व बौध्द ग्रंथकार बुध्दत्वप्राप्तीला (ज्ञान-प्राप्तिला) त्यांच्या जन्मकाळापेक्षा फार अधिक महत्त्व देत असल्यामुळे, गौतमाचा बुध्दत्व-प्राप्तिचा जो दिवस तोच त्यांचा खरा जन्मदिवस असे मानतात. सारांश, गौतम बुध्दाच्या जन्मकाळापासून या प्रश्नाचा समाधानकारक निकाल जरा लागला नाही तरी बुध्दावताराशी गौतम बुध्दाचे जन्मकाळापुरते साम्य दिसते.

आता बुध्दाची जन्मभूमी व वंश यांचा विचार करु. श्रीमद्भागवतात 'बुध्दोनामां~जनसुत: कीकटेषु भविष्यति' असे म्हटले आहे. (प्रथम स्कंध, अध्याय ४, श्लोक २४) म्हणजे पुराणकारांच्या मते बुध्दावतार कीकटदेशांत अंजनाच्या पोटी झाला. भागवतावरील टीकाकार श्रीधरस्वामी 'कीकटेषु' म्हणजे 'मध्ये गया प्रदेशे' असे स्पष्ट सांगतात. बौध्दग्रंथकाराच्या मते गौतम बुध्दाचा जन्म नेपाळ प्रदेशात लुंबिनी येथे झाला, तथापि गौतमाला बुध्दत्व प्राप्त झाले ते गयेजवळ... म्हणजे शाक्य गौतम या दृष्टीने त्यांचा स्वाभाविक जन्म लुंबिनी येथे, आणि बुध्द या दृष्टीने लौकिक जन्म गया येथे झाला. लुंबिनी येथे जन्मलेल्या गौतमाचाच पुढे ३३ व्या वर्षी गया येथे बुध्दत्व प्राप्तिमुळे बुध्द झाला. त्याचप्रमाणे अवतारबुध्दाचा जन्म अंजनाच्या पोटी झाला असे पुराणग्रंथात म्हटले आहे. बौध्दग्रंथकाराच्या मते गौतमाची आई मायादेवी ही अंजनाची मुलगी म्हणुन तिला अंजना म्हणत असत. (पहा महावंश नामक सुप्रसिद्ध ग्रंथ) तेव्हा अंजन हे गौतमाच्या आजाचे नाव होते, आणि आजाचे नाव नातवाला ठेवण्याची चाल हल्लीप्रमाणे प्राचीन काळीही होती. यावरुन पुराणातील बुध्द अवतार व बौध्दधर्म प्रवर्तक गौतम हे एक असावेत असे म्हणण्यास पुष्टि मिळते.

आता तिसरे प्रमाण मतांचे साम्य, हे कितपत जुळते हे पाहू. बुध्दावताराचे कृत्य पुराणांतरी जे वर्णिले आहे, ते इतर अवतारकृत्यांवरुन अगदी निराळ्याप्रकारचे आहे. इतर अवतार हे पृथ्वीवरील पापाचा भार हलका करुन गोब्राह्मणांना छळणार्या दुष्ट राक्षसांचा उच्छेद करण्यासाठी झाले. परंतु बुध्दावतारासंबंधाने लिहिताना श्रीमद्भागवतकार लिहितात की, बुध्दावतार हा देवांच्या शत्रूंना मोह पाडण्यासाठी झाला. 'तत: कलौ संप्रयुत्ते संमोहाय सुरद्विषाम्। बुध्दो नामां~जनसुत: कीकटेषु भविष्यति' 'आर्यविद्यासुधारक' नामक ग्रंथात बुध्दावतारासंबंधाने म्हटले आहे ----

नीचानामसता विमोहजननं श्रोताध्वनिंदामीषात्।
भूताहिंसनमुख्यधर्ममतनोत्सर्वज्ञ एष प्रभु:।।

म्हणजे नीच व असज्जन यांच्या बुध्दीस मोह (भ्रांति) उत्पन्न करण्यासाठी श्रृतिमार्गाच्या निंदामिषाने याने (बुध्दावताराने) मुख्यत्वे करुन अहिंसाधर्माचा प्रसार केला. विष्णुपुराणात (तृतीय अंश, १७/१८ अध्याय) बुध्दावताराला 'मायामोह' असे नाव दिले आहे, आणि त्याने विष्णुच्या शरीरापासून निर्माण झाल्यामुळे नंतर नर्मदेच्या तीरी जाऊन तेथे तपश्चर्या करीत असलेल्या दैत्यांना संदेहजनक वाक्यानी श्रुतुक्तधर्मापासून पराग्मुख करुन अर्हत धर्माचा उपदेश केला आणि तुम्हाला निर्वाण पाहिजे तर, पशुयज्ञाचा त्याग करा, आणि हे जग विज्ञानमय करुन सोडा, या जगाला कोणाचा आधार नाही हे निश्चये करुन जाणा, वगैरे सांगितले, अशा प्रकारे बुध्दावताराचे कृत्य वर्णिले आहे.

वरील सर्व उल्लेखांचा, विशेषत: विष्णुपुराणात सांगितलेल्या दैत्यांना केलेल्या उपदेशात 'अर्हत' 'निर्वाण' 'विज्ञान' आणि जगाचा कोणी आधार किंवा नियंता नसने इ. गोष्टींचा उल्लेख व त्यांची गौतम बुध्दाच्या मताशी तुलना करुन पाहिले तर, बुध्दावतार म्हणजे गौतम बुध्दच की अन्य कोणी याविषयी संदेह राहण्याचे वस्तुतः काही कारण दिसत नाही.

यावरुन ऐतिहासिक गौतम बुद्ध व अवतारधारी पुराणातील बुध्द दोन्ही एकच आहेत, हे सिध्द होते. पण येथे हे अवश्य सांगितले पाहिजे की, ज्याप्रमाणे येशू ख्रिस्ताने स्वत:ला son of god, मुहम्मद पैगम्बराने स्वत:ला देवाचा दूत, कृष्णाने स्वत:ला देवाचा देव म्हटले त्याप्रमाणे गौतम बुध्दाने स्वत:ला विष्णूचा अवतार किंवा देवाचा अंश असे कुठेही म्हटलेले नाही.

सौन्दरनन्द-महाकाव्य, आज्ञा-व्याकरण, सर्ग १८

सौन्दरानन्द महाकाव्य, अष्टादश (१८ वां) सर्ग, आज्ञा-व्याकरण (उपदेश): अथ द्विजो बाल इवाप्तवेदः क्षिप्रं वणिक् प्राप्त इवाप्तलाभः । जित्वा च रा...