बुध्द के दर्शन के तीन महावाक्य हैं -- अनित्य, दु:ख, अनात्मा उसी तरह जैसे वेदान्त के सत्-चित्-आनन्द... यह दोनों दर्शन एक दूसरे के पूर्ण विरोधी हैं, यह उनके इन तीन वाक्यों की तुलना करने ही से मालूम पड़ेगा. अनित्यवाद पर बुध्द का बहुत ही जोर हैं, और एक तरह हम कह सकते हैं, की बौध्द दर्शन की यही आधारशीला हैं. इसको ठिक तरह से समझने पर बौध्द दर्शन को समझा जा सकता हैं, और इसे भी समझा जा सकता हैं, की अपने भारत से लुप्त होने के समय (१२ वीं सदी) तक क्यों बौध्द-दर्शन बराबर आगे बढ़ता रहा. बुध्द के प्रादुर्भाव से पहले ही उपनिषद् के विचारकों के रुप में हमारे देश में दार्शनिकों का महत्त्व बढ़ चूका था. उपनिषद् बाहरी दुनिया को अनित्य (परिवर्तनशील) मानने को तैयार था, लेकिन वह उसके भीतर से एक नित्य सत्ता खोज़ निकालना चाहता था. असीम परिवर्तन की दुनियां सचमुच ही शांति की दुनियां नहीं हो सकती, इसलिए वास्तविक हो या काल्पनिक, एक सनातन अपरिवर्तनशील तत्त्व को ढूंढने की तरफ वेदकाल के बाद के विचारकों की पीढ़ीयां दिन-रात एक करने लगी और उन्होने आत्मा (ब्रह्म) के रुप में उस तत्त्व को ढूढ़ निकाला. यद्यापि इस सफ़लता का यह परिणाम नहीं हुआ कि अब नई-नई जिज्ञासायें उत्पन्न न हो सके. यह तो इसी से मालूम होता हैं, कि बुध्द-काल में बुध्द को लेकर सात बड़े-बड़े आचार्य अपने-अपने दर्शन के अविष्कार और प्रतिपादन के लिए विख्यात थे, और ये सभी उपनिषद् या वेदों के अनुयायी नहीं थे, बल्की ब्राह्मणों के धर्म के मुकाबले में उन्होने नये तिर्थ (धार्मिक संप्रदाय) स्थापित किये. सभी में अपनी-अपनी विशेषतायें थी. ये किसी न किसी धर्म के प्रवर्तक माने गये थे, और उनके धर्म में भौतिकवाद और अनिश्वरवाद तक सम्मिलित थे. बुध्द का मुख्य प्रहार उपनिषद दर्शन पर था, यह तो इसी से मालूम हैं, की उपनिषद् के आत्मतत्त्व कि जगह उन्होने अपने दर्शन में अनात्मा का प्रतिपादन किया. अनात्मा से मतलब आत्मा का अभाव मात्र नहीं था, बल्की वह इस शब्द से यह बतलाना चाहते थे, की चाहे भितरी-बाहरी किसी संसार या पदार्थ को देखा जाये तो कही पर भी उपनिषद् प्रतिपादीत आत्मा जैसे सनातन तत्त्व का अस्तित्व नहीं मिलता. सभी पदार्थ बहार से भीतर तक सतत परिवर्तनशील हैं, और यह परिवर्तन केवल उपरी नही होता, बल्की जड़-मूल से एक वस्तु का नाश कर क्षण भर के लिए दूसरी वस्तु को ला रखता हैं. इस तरह देश और काल में यह परिवर्तन सदा से होता आ रहा हैं और सदा होता रहेगा. ' सब अनित्य हैं ' (सब्बं अनिच्चं), ' सब अनात्म हैं ' (सब्बं अनत्ता) इन वाक्यों को बुध्द ने पूरे अर्थ में इस्तेमाल किया, और विश्व में इसे अटल सिध्दान्त बतलाया. अनित्यता के नियम का कोई अपवाद नहीं हैं, यह कह लिजिए, अपवाद सिर्फ यही सर्वव्यापी अनित्यता हैं.
नोट: वेदान्तवादी सत् (सत्य) सिर्फ नित्य वस्तु को मानते हैं, सत्-चित् का अर्थ हैं नित्य आत्मा, और आनन्द का अर्थ हैं दु:ख का अभाव... बुध्द ने सत् (सत्य) को अनित्य (परिवर्तनशील) कहा, नित्य आत्मा के विरुद्ध उन्होने अनात्मा का सिद्धांत रक्खा, और जो अनित्य (परिवर्तनशील) हैं वह दु:ख हैं, ऐसा बतलाया. मतलब आनन्द के विरुद्ध दु:ख को रक्खा. फिर उस दु:ख के कारण और निवारण के मार्ग को प्रतिपादित कर, उस मार्ग से दु:ख मुक्ति (निर्वाण) साध्य करने को कहा....!
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