Thursday, November 28, 2019

सिध्द

गुप्त-काल से ही बौध्द धर्म का ह्रास प्रारम्भ हो गया था और वैदीक परम्परागत धर्मो का पुन: नये शिरे से उदय होने लगा था, जो कई शताब्दीयों से बौध्द धर्म के व्यापक प्रभाव से दबा पड़ा था. वैष्णव तथा शैव धर्मों ने विशेष रूप से जनता पर अपना प्रभाव डालना शुरु कर दिया था, क्योंकि जन-समाज भी सिध्दो के आचार एवं धर्म से ऊब चुका था. इसी काल में भगवान बुध्द, बोधिसत्व, तारा आदी (आज के) हिन्दू धर्म के देवी-देवता बन गये, केवल नाममात्र का अन्तर रह गया. भगवान बुध्द तो वैष्णवो के अवतारो में स्थान पा गये, इसके बारे में हम आगे बात करेंगे. सिध्दों ने जो निर्गुण-निरंजन शून्य का उपदेश दिया था और बुध्द को निरन्तर, सर्वत्र माना था तथा यह भी कहा था की बुध्द लोकोत्तर हैं, उनकी माया से ही निर्मित बुध्द उत्पन्न होते, तप करते, उपदेश देते और परिनिर्वाण को प्राप्त होते हैं. वास्तविक बुध्द धरती पर तो कभी आते ही नहीं, वे करुणा एवं दया के मूल हैं, सभी सत्वों (जीवों) के उध्दार की भावना से ही बोधिसत्व जगदुध्दारक में लगे रहते हैं, सहज-भावना से निरंजन अवस्था को प्राप्त किया जा सकता हैं आदि सिध्दों के उपदेशो से प्रभावित होकर सगुण एवं निर्गुण भक्ति की दो धारायें फुट चली. ये भक्ति की धारायें आठवी से बारहवी शताब्दीयों के बीच प्रगट हुई, इनका बिज (महायान की शाखायें) माध्यमिक एवं योगाचार की उत्पत्ति के साथ ही अंकुरित हो चुका था. इसी भावना के प्रभावित होकर बुध्द-भक्ति की भावना ने जोर पकड़ा और शैव तथा वैष्णव धर्म बौध्दधर्म से प्रभावित होकर आगे बढ़ने लगे. हम कह सकते हैं की बौध्द धर्म कही गया नहीं, प्रत्युत सिध्दों की समाप्ति के साथ ही इन धर्मों में घुलमिल गया. हम देखते हैं की बौध्द धर्म को मानने वाला राजा हर्षवर्धन सूर्य एवं शिव की पूजा करता था. ऐसे ही हिंदु देवी-देवताओं के सिर पर बुध्दमूर्ती, स्तूप आदि को निर्मित कर उन्हें बुध्दोपासक बना लिया गया था. गणेश के सिर पर स्तूप का निर्माण, नीलकंठ बोधिसत्व की मूर्तियों के निर्माण आदि इसके ज्वलन्त प्रमाण है. यही कारण हैं की बौध्द स्थानों के उत्खनन में शीव, अग्नि, कार्तिकेय आदि की मूर्तियाँ पाई गई हैं. (इससे यही साबित होता हैं) अब बौध्द तथा हिंदू परस्पर मिल कर रहने लगे थे. एक ही परिवार में हिंदू-बौध्द दोनों विचारों के लोग रह सकते थे. (गुप्त राजाओं में हिंदू-बौध्द दोनों विचारो के राजा थे) ऐतिहासिक दृष्टि से विचार करने पर स्पष्ट ज्ञात होता हैं की सिध्दों के कारण बौध्द धर्म के गुह्याचार, तंत्र-मंत्र, सहज-भावना के अभिचार एवं घृणित रुप तथा अन्धविश्वासो से ऊब कर जनता धीरे-धीरे वैष्णव तथा शैव धर्मों की ओर बढ़ती गयी. फलत: बौध्द धर्म का लय हुआ और ये धर्म उन्नति करने लगे. बारहवी शताब्दी के यवन आक्रमणो ने बौध्द धर्म की रही-सही मर्यादा भी समाप्त कर दी. बारहवी शताब्दी तक ही हम भारत में बुध्द विहारों का निर्माण होता हुए पाते हैं, उसके पश्चात बहुत कम प्रमाण ऐसे मिलते हैं कि बुध्द विहारों के निर्माण हुए हो. कुछ लोगो ने अपनी श्रध्दा-भक्ति व्यक्त करने के लिए पीछे भी छोटे-मोटे कुछ निर्माण कार्य किये थे, किन्तु वे नगण्य हैं.

उधर अनेक सिध्दों की विचारधाराओं में नाथ और सन्त मतो की मूलभावनाएँ अंकुरित हो चली थी और वे ही पीछे पूर्ण विकसित होकर नाथ और उससे सन्त परंपरा बन गई. इन पर हम आगे विचार करेंगे. फल यह हुआ की बारहवी शताब्दी में सिध्दों का बौध्द-जन समाज पर ऐसा बुरा प्रभाव पड़ा की वह बौध्द धर्म को त्यागकर नाथ, सन्त, भागवत आदि धर्मों में अन्तर्भुक्त हो गया. वह जहां गया बौध्दधर्म की विचारधारा रही ही. यवन काल में जब बौध्द भिक्षुओं का अपने भिक्षुवेष में रहना कठिन हो गया और अधिकांश भिक्षु जब मार डाले गए, बचे नेपाल, तिब्बत आदि देशो की ओर चले गए तब साधारण जनता अपने ही रक्त सम्बन्धी भाईयों में मिल गयी और उसने अपना नाम परिवर्तन कर लिया. (बुध्द-चर्य्या की भूमिका, पृष्ठ १३) इस प्रकार सिध्द-काल के अन्त की कहानी मध्ययुगीन भारत में शैव और वैष्णव सम्प्रदायों के उदय एवं विकास का इतिहास हैं. इनमे भी विशेष रूप से शैव मतावलम्बी नाथ सम्प्रदाय तो सिध्दों से ही प्रादुर्भूत हैं. इसके प्रवक्ता एवं उपदेष्टा चौरासी सिध्दों में से ही थे.

नाथ सम्प्रदाय का जन्म : नाथ सम्प्रदाय के उद्भव के सम्बन्ध में विद्वानों के विभिन्न मत हैं. कुछ लोगो का मत हैं की सिध्द प्रच्छन्न नाथपंथी थे, क्योंकि कतपिय सिध्द शिव तथा उनके गण हेरुक के भक्त थे. (सिध्दसाहित्य, पृष्ठ ३१२-३२३) कुछ विद्वानों का कथन हैं की नाथसम्प्रदाय चौरासी सिध्दों से निकला हुआ एक क्रांतिकारी पन्थ हैं. (पुरातत्वनिबंधावलि, पृष्ठ ३६२) इसी प्रकार कुछ विद्वान यह मानते हैं की सिध्दों में से अधिकांश साम्प्रदायिक रुप से ही बौध्द थे, किन्तु विचारधारा के अनुसार नाथपन्थी थे. (डॉ. पिताम्बरदत्त बड.थ्वाल, योगप्रवाह, पृष्ठ २१७) इन विचारों का ऐतिहासिक तथा धार्मिक दृष्ट से पर्यवेक्षण करने से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं की वास्तव में नाथ सम्प्रदाय में सिध्दों की योग-पध्दति और सहजसमाधी प्रधान रुप से विद्यमान हैं. महापण्डित राहुल सांकृत्यायन का यह कथन बिल्कुल ठिक हैं -- "विचारों में यद्यपि अब नाथ पन्थ अनिश्वरवाद को छोड़कर ईश्वरवादी हो गया हैं, तथापि अभी उसकी वाणियों में छान-बीन करने पर निर्वाण, शून्यवाद और वज्रायन का बिज मिलेगा." (पुरातत्वनिबंधावली, पृष्ठ १६३) हम देखते हैं की पालि साहित्य में 'नाथ' शब्द का प्रयोग दो अर्थो में हुआ हैं -- तथागत और ज्ञान प्राप्त भिक्षु (अर्हत्).... बुध्दो दसबलो सत्था, सब्बञ्ञू दीपदुत्तमो। मुनिन्दो भगवा नाथो, चक्खूमा अङ्गीरसो मुनि ।।१।। लोकनाथो नधिवरो, महेसि च विनायको। समन्तचक्खू सुगतो, भूरीपञ्ञो मारजी ।।२।। -- अभिधानप्पदीपिका।

दस नाथकरण धर्मों में ऐसे ही भिक्षु के दस गुण बतलाये गए हैं. (दीघनिकाय, हिन्दी अनुवाद, पृष्ठ ३०० और ३१२) सिध्दों की वाणीयों में उसे नाथस्वरुप कहा गया हैं, जिस का चित्त विस्फुरीत हो जाय. (जत वि चित्तहि विफ्फुरइ तत्त विणाह सरुअ--दोहाकोष, बागची, पृष्ठ १३), अथवा जिसका मन निश्चल हो जाय. (जो गत्थु णिच्चल किअउ मण सो पास -दोहाकोष, बागची, पृष्ठ ४४), वही अनश्वर स्वभाव निर्वाण के समीप पहुँचा हुआ हैं. सिध्द कण्हपा ने साधक को वज्रधरनाथ कहा हैं. (दोहाकोष, पृष्ठ ४६) इससे स्पष्ट हैं की सिध्दों ने 'नाथ' शब्द को तथागतवाची न ग्रहण कर स्थिर-चित्त-सिध्दीप्राप्त योगी का पर्यायवाची माना. तात्पर्य यह की हीनयान (स्थविरवाद) में अर्हत् की जो स्थिति थी, वही स्थिति सिध्दों में 'नाथ' की मानी गयी और इस प्रकार सिध्दी-प्राप्त सभी सिध्द 'नाथ' थे. यही कारण हैं की इस सिध्दों में कुछ ने अपने नाम के साथ 'नाथ' शब्द का प्रयोग किया. उन नाथ शब्दधारी सिध्दों को भी 'पा' या 'पाद' के साथ भी बहुधा स्मरण किया जाता हैं. (पुरातत्वनिबंधावली, पृष्ठ १४८ में 'गोरक्षपा'), यह दोनों शब्द गौरवार्थ प्रयुक्त होते थे) इसी प्रकार उस काल में 'नाथ' शब्द का भी प्रयोग पूजार्ह के अर्थ में ही होता था, जो पीछे साम्प्रदायिक रुप धारण किया और नाथसम्प्रदाय का विकास हुआ. .... क्रमश:

हिन्दी सन्त-साहित्य पर बौध्द धर्म का प्रभाव,
लेखक- डॉ. विद्यावती मालविका, एम. ए. पि. एच. डी., साहित्यरत्न.

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