Thursday, November 28, 2019

कबीर का हठयोग बौध्दयोग से प्राप्त

कबीर का हठयोग बौध्दयोग से प्राप्त :

हठयोग का मूलबीज यद्यपि बुध्द-वचन में मिलता हैं, किन्तु इसका विकास सिध्दों के काल में हुआ और नाथ-परम्परा में यह एक पन्थ का रुप धारण कर हठ़योग-पध्दति नाम से प्रचलित हो गया. राहूलजी का कथन हैं की सन्तो की साधना में सूर्य-चन्द्र या इडा-पिंगला की जो साधना आती हैं, उसका वर्णन सिध्द सरहपा (सरहपाद) से पहले नहीं मिलता, यह सम्भवतः सरहपा की ही सूझ और अभ्यास का परिणाम हैं (दोहाकोश, भूमिका, पृष्ठ 32), किन्तु हम देखते हैं की हठयोग नाम प्राचीन होते हुए भी इसकी मूलभूत क्रियाएँ एवं साधनाएँ बुध्द काल में भी थी और भगवान् बुध्द ने इस साधना की भूरि-भूरी प्रशंसा की हैं. यह साधना 'आनापानसति ' की भावना में आती हैं, जिसके सम्बन्ध में तथागत ने कहा हैं ---- "भिक्षुओं! आनापान-स्मृति-समाधि-भावना करने पर, बढ़ाने पर शान्त, उत्तम, असेचनक सुख विहार हैं, वह उत्पन्न हुए बुरे अकुशल धर्मों को बिलकुल अन्तर्ध्यान कर देती हैं." (विशुध्दीमार्ग, भाग 1, पृष्ठ 240 तथा संयुत्तनिकाय, 52, 1, 1) इस भावना को करने वाला साधक एकान्त स्थान, अरण्य या वृक्ष के नीचे जा पालथी मारकर काया को सीधा करके स्मृति को सामने कर बैठता हैं. वह स्मृति के साथ ही श्वास लेता तथा छोडता हैं, छोटे, बड़े, लम्बे आदि श्वासों की स्मृति बनाए रखता हैं. वह सम्पूर्ण काया का प्रतिसंवेदन करते हुए श्वास लेता और छोडता हैं. ऐसे ही काय-संस्कार, प्रिति, सुख, चित्त, अनित्य, विराग, निरोध, प्रतिनि:सर्ग की भावना करते हुए श्वास लेता और छोडता हैं. इस प्रकार करते हुए वह अपने चित्त को नासिका के अग्रभाग में लगाता हैं और स्मृति को वही बनाये रहता हैं, वह काया में काया को ही देखता हुआ विहार करता हैं. भगवान् ने अश्वास-प्रश्वास को ही काया में दूसरी काया कहा हैं. फिर क्रमश: वेदना, चित्त और धर्म का मनन करता हुआ विहार करता हैं. ऐसे भावना करते हुए उसके बोध्यंग पूर्ण होते हैं और विद्या तथा मुक्तिसुख का अनुभव इसी काय और इसी जीवन में कर लेता हैं. जो इसकी भावना करते हैं, वे अमृत का उपभोग करते हैं, और जो इसकी भावना नही करते, वे अमृत का उपभोग नही करते. इसी आना-पान-सति भावना का सिध्दों ने अपने ढंग से वर्णन किया और इसकी साधना को भी रुपको में बतलाया.  आश्वास (साँस लेना) और प्रश्वास (साँस छोडना) को दक्षिण-वाम अथवा इडा व पिंगला कहा. इन्हे ही गंगा-यमुना नाम से भी पुकारा और सूषुम्ना की भी कल्पना कर गंगा-यमुना-सरस्वती की स्थापना इस शरीर में ही करके त्रिवेणी संगम का भी निर्माण किया. नाद, बिंदु, अनाहतनाद आदि की कल्पना की और इस शरीर में ही अमृत-लाभ का उपदेश दिया. सिध्द-साहित्य में इसका विस्तारपूर्वक वर्णन उपलब्ध हैं. नाथ पन्थ ने तो इस हठ़योग को दृढता से ग्रहण किया और इसका प्रबल प्रचार किया. हठ़योग कहते ही हैं अंगो और श्वास पर अधिकार प्राप्त कर मन में एकाग्रता ला उसे परमपद (निर्वाण) में लीन कर देने को, जिसे कबीर ने राम में लवलीन कर देना माना हैं. स्थविरवादी बौध्दधर्म में आश्वास-प्रश्वास का मनन करना और उसे चित्त की एकाग्रता का निमित्त बना कर विमुक्ति प्राप्त करना ही ध्येय हैं, आश्वास-प्रश्वास को रोककर अथवा उलटा पवन चलाकर षटचक्र द्वारा उपर चढाना नही. कबीर ने घट-घट में व्याप्त राम को घट में ही खोजना उत्तम समझा हैं और इस शरीर के भीतर ही हठयोग-साधना से आत्म-प्रकाश का वर्णन किया हैं -----

उलटि पवन षटचक्र निवासी, तीरथराज गंगतट बासी।
गगन मंडल रवि ससि दोड तारा, उलटि कूँची लागि किवारा। कहै कबीर भई उजियारी, पंच मारि एक रसो निनारी।

जिस प्रकार बौध्दयोग चित्त को राग, द्वेष मोह आदि कलुष (चित्तमल) से निर्मल एवं स्वच्छ कर परमसुख निर्वाण को प्राप्त करने का साधन हैं, ऐसे ही कबीर का हठयोग मन को विकार-रहित कर राम से मिलाने का उपाय हैं, इसीलिए कबीर ने कहा हैं ----

जे मन नहिं तजै विकारा, तो क्युं तिरिये भौ पारा।
जब मन छाडै़ कुटिलाई, तब आइ मिले राम राई।
ससिहर सूर मिलावा, तब अनहद बेन बजावा।
जब अनहद बाजा बाजै, तब साई संगि बिराजै।
चित्त चंचल निहचल कीजै, तब राम रसाइन पीजै।
जब राम रसाइन पीया, तब काल मिटया जन जोया।

इस प्रकार स्पष्ट हैं की बौध्दयोग से आयी आनापान-स्मृति-भावना की आश्वास-प्रश्वास की साधना पीछे हठयोग का रुप ले ली और उसे सिध्दो और नाथो ने अपनी शैली एवं साधना-पध्दति का रुप प्रदान किया. उन्होने कल्पित नामो से तत्व का निरुपण कर हठयोग की साधना प्रचारित की. कबीर ने भी उसी परम्परा से प्रभावित होकर उसी हठयोग को परमपद की प्राप्ति का एक उत्तम साधन माना. अंत: कबीर का हठयोग बौध्दयोग की ही देन हैं.

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