Thursday, November 28, 2019

बौध्दधर्म में ईश्वरवाद, अवतारवाद को अवकाश नहीं

बौध्दधर्म में ईश्वरवाद तथा अवतारवाद के लिए कोई अवकाश नहीं हैं. कबीर ने भी निराकार ईश्वर को मानते हुए अवतारवाद को नहीं माना हैं और स्पष्ट शब्दों में कहा हैं कि अपने ही निर्मित देवों की लोग पूजा करते हैं, किन्तु पूर्ण अखण्डित ब्रह्म को नहीं जानते हैं, दस अवतार अपने नहीं हैं, क्योंकि दस अवतारो को भी अपने कर्म का फल भोगना पडता हैं. "दस औतार निरंजन कहिये, सो अपना ना होई। यह तो अपनी करनी भोगै, कर्ता औरहि कोई ।। (कबीर, पृष्ठ 240) उस ब्रह्म ने न तो दशरथ के घर अवतार लिया, न लंका के रावण को सताया. ईश्वर कभी कुक्षि (कोख) में अवतरित नहीं होता, न तो यशोदा ने उसे गोद में लेकर खेलाया, न वह ग्वालो के साथ घूमा, न गोवर्धन को हाथ से धारण किया, न वामन होकर बलि को छला, न पृथ्वी और वेदो का उध्दार किया, वह न गण्डक शालिग्राम और मत्स्य, कच्छप, कूर्म होकर जल में ही रहा, वह इनसे अगम्य हैं. अवतारवाद तो काल्पनिक व्यवहार मात्र हैं, जिसमे की संसार फँसा हैं, किन्तु वह वास्तविक ब्रह्म को नहीं जानता. (कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ 243) कबीर अवतारवाद को न मानते हुए ईश्वर को अपना पिता माना हैं और अपने को पुत्र कहा हैं. (सन्तबानी संग्रह, भाग 1, पृष्ठ 24)

ज्ञानी भिक्षु भी बुध्द-पुत्र कहलाते हैं और सिर्फ भिक्षु ही नहीं भिक्षुणियॉ भी, ज्ञानी पुरुष और महिलाये भी...  भगवान् बुध्द ने स्वयं सारीपुत्र को अपना औरस-पुत्र कहा था, उन्हें अपने मुख से उत्पन्न बतलाया था ---- 'भिक्षुओं! जिसको ठिक से कहते हुए कहना होता हैं, कि यह मुख से उत्पन्न, धर्म से उत्पन्न, धर्म-निर्मित, धर्म-दायाद, निरामिष-दायाद, भगवान् का औरस पुत्र हैं, तो ठिक से कहते हुए सारिपुत्र के लिए ही कहना होगा. (मज्झिमनिकाय, पृष्ठ 3, 2, 1; हिन्दी अनुवाद पृष्ठ 467-468) सुन्दरी नामक भिक्षुणी ने भी सिंहनाद करते हुए कहा था ---- "मै भगवान के मुख से उत्पन्न औरस-पुत्री हूं, मैं कृतकृत्य और चित्त-मल रहित (अर्हत) हूं." (ओरसा मुखतो जाता कतकिच्चा अनासवा। --- थेरीगाथा, गाथा, 336) इस प्रकार ज्ञानी बौध्द प्रव्रजित तथा गृहस्थ श्रावक-श्राविकाओ के पिता भगवान बुध्द हैं. हमने पहले देखा हैं की सत्यनाम वाले बुध्द ही कबीर के सत्तनामधारी सतगुरु हो गये हैं और बौध्द-परम्परा में पिता संज्ञाक बुध्द ही कबीर के अवतारवाद से मुक्त पूर्ण ब्रह्म स्वरुप पिता भी बन गये हैं, किन्तु सिता-पती राम या दसो अवतारो में से कोई भी जगत् का कर्ता अथवा ईश्वर नहीं हैं ---

समुँद पाटि लंका गयो, सीता को भरतार।
ताहि अगस्त अचै गयो, इनमे को करतार।।
(सन्तबानी संग्रह, भाग 1, पृष्ठ 23)

जो लोग 'सोहं सोहं' कहकर जप करते हैं और वास्तविक सत्य को नहीं जानते हैं, वे मिथ्या-दृष्टी में ही पडकर अपना जीवन व्यर्थ में ही व्यतित कर देते हैं.

सोहं सोहं जपि मुआ, मिथ्या जनम गँवाय।
(सन्तबानी संग्रह, भाग 1, पृष्ठ 4)

कबीर के समय में बौध्दधर्म की अवस्था

कबीर के समय में (इसवी सन १३९८-१५१८)भारत में बौध्द धर्म की अवस्था : कबीर के समय में भारत में बौध्द धर्म की अवस्था का विस्तृत वर्णन उपलब्ध नहीं हैं, फिर भी हम प्रामाणिक ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर जानते हैं की उत्तर भारत में बौध्द धर्म अपने नाम से अब जीवित न था, किन्तु उसका प्रभाव जन-मानस पर पूर्ण रूप से था. सिध्दों और नाथों का समय बीते बहुत दिन नहीं हुए थे, उनकी धार्मिक भावनाएँ किसी-न-किसी रुप में विद्यमान थी. संवत् १२७६ में (धर्मदूत, वर्ष २१, अंक ५, पृष्ठ १५६) गाधिपुर के एक कायस्थ ब्राह्मण द्वारा श्रावस्ती में बुध्दविहार का निर्माण किया गया था, सन १३३१ में बर्मा के राजा ने बुध्द गया के मंदिर का जीर्णोध्दार करवाया था, और १५ शताब्दी के प्रारम्भिक काल सन १४३६ में बंगाल में बौध्दभिक्षु तथा बौध्द गृहस्थ थे. (भक्तिमार्गी बौध्दधर्म, भूमिका, पृष्ठ ५) ऐसे ही महाराष्ट्र में भी उस समय बौध्दो के होने के प्रमाण मिलते हैं. कन्हेरी (बोरीवली, मुंबई) की बौध्द गुहाओं में सन् १५३४ तक बौध्द थे, जिन पर पुर्तगाली लोगो द्वारा अनेक अत्याचार किये गये थे. (धर्मदूत, वर्ष २४, अंक ८-९, पृष्ठ २२५) मधेस, नेपाल, चटगॉव, आसाम, उड़िसा आदि में बौध्द पर्याप्त संख्या में थे और जिनकी परम्परा अभी भी चली आ रही हैं. विद्वानों ने सिध्द किया हैं की मधेस के थारु (पुरातत्वनिबंधावली, पृष्ठ ११५) उड़िसा और बंगाल के 'धर्म मंगल', धर्म ठाकुर, धर्मसम्प्रदाय, आदि बौध्द ही हैं. (भक्तिमार्गी बौध्दधर्म, नयी भूमिका, पृष्ठ ६-९) जहॉ तक उत्तर भारत के मध्यदेश की बात हैं, वहा प्रत्यक्षत: कबीर के समय में बौध्दधर्म नहीं रह गया था, यही कारण हैं की कबीर की विचारधारा बौध्दधर्म से प्रभावित होते हुए भी उन्हें बौध्दधर्म का वास्तविक स्वरुप विदित न था, इसकी चर्चा हम आगे करेगे. यवन-शासको ने अनेक प्रकार से हिन्दू और बौध्दो को सताया था, फलत: जैसे कि हमने देखा हैं बौध्दो का सर्वथा लोप-सा हो गया. बौध्दधर्म कि यह दयनीय दशा न केवल भारत में ही हुई, प्रत्युत इससे पूर्व अरब, इराण, अफगाणिस्तान आदि में हो चुकी थी, वहा केवल बौध्द नष्टावशेष मात्र बौध्दों के परिचायक बच रहे थे. भारत में बौध्द धर्म का स्वरूप बदलता गया और वह कई रुपो में होकर सन्त नामदेव, रामानन्द, कबीर आदि भक्तो के समय में निर्गुण भक्ति का स्वरूप ग्रहण कर लिया. उसका प्रभाव सगुण भक्ति पर भी पड़ा था और प्राय भारत की सभी धार्मिक विचारधारायें इससे किसी-न-किसी रुप में प्रभावित हुई थी. बौध्दधर्म भारतीय धर्म था. यही की धरती पर और यही की अनुकुल वातावरण में उसका जन्म हुआ था, वह विकसित तथा दृढमूल बनकर एक दीर्घकाल तक अहिंसा, शांति, सदाचार आदि की धारा प्रवाहित करते हुए पुन: यही अपने प्रतिरुपो में समा गया था, किन्तु उसकी विस्तृत शाखाएँ भारत के ही प्रत्यान्त प्रदेशो में, समुद्री तथा पर्वतीय क्षेत्रों एवं निकटवर्ती देशों से आगे बढ़कर सम्पूर्ण पूर्व एशिया में छा गई थी. जिस समय कबीर अपनी निर्गुण भक्ति का सन्देश दे रहे थे, उस समय लंका, बर्मा, चीन, जापान, तिब्बत, नेपाल, श्याम, कम्बोडिया, व्हियतनाम आदि देशो में बौध्दधर्म अपने जिवंत रुप में विद्यमान था, किन्तु कबीर के देश में वह केवल पाखण्डी माना जा रहा था. (कबीरग्रन्थावली, पृष्ठ २४०) बुध्द असुर संहारक बन गये थे. (बीजक, पृष्ठ ६३) उसके विचार-पोषक तथा प्रचारक सिध्द और नाथ माया में रत माने जाने लगे थे. (गुरुग्रंथ साहिब, राग भैरउ १३, पृष्ठ ११६१)

हिन्दी सन्त साहित्य पर बौध्दधर्म का प्रभाव ..
लेखिका- विद्यावती मालविका ..
एम ए पी एच डी साहित्यरत्न

सन्त कबीर

कबीर ऐसी जाति में उत्पन्न हुए थे, जो जुलाहा और कोरी दोनों ही मानी जाती थी, जिसका परम्परागत उद्यम सूत कातना तथा वस्र बुनना था. कुछ विद्वानों का कहना हैं की वे जुलाहा तो थे, (परशुराम चतुर्वेदी, डॉ. त्रिगुणायत, डॉ. रामकुमार वर्मा आदि) किन्तु मुसलमानी जुलाहा थे, इस बात की पुष्टि गुरु अमरदास, आनन्तदास, रज्जबजी, तुकाराम आदि ने की हैं और यही बात खजीनतुल असफिया, दबिस्ताने मजहिब, अनुरागसागर, कबीर कसौटी, डॉ. भन्डारकर, वेस्टकॉट आदि ने भी कही हैं. (कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ १७३) सन्त रैदास और धन्ना ने भी कबीर को ऐसा जुलाहा बतलाया हैं की जिनकी कुल में ईद और बकरीद मनाई जाती थी और गाय का वध होता था तथा शेख एवं पीर का सम्मान होता था. (जाकै इदि बकरिदी कुल गऊ रे बधु करही, मानीअही सेख सहीद पीरा। जाकै बाप वैसी करी पूत ऐसी करी, तिहूरे लोग परसिध कबीरा।। --- गुरुग्रंथ साहिब, राग आ. ३६)

कुछ विद्वानों ने (हिन्दी काव्य में निर्गुण सम्प्रदाय, पृष्ठ ४५) यह माना हैं कि कबीर जुलाहा होते हुए भी हिंदू थे, क्योंकि उनके संस्कार हिंदू सदृश्य ही थे, राम राम की रट, नित्य नई कोरी गगरी में भोजन बनाना, चौका पोतवाना, उनकी इन सब बातों से उनकी अम्मा तंग आ गई थी. (नित उठि कोरी गगरी आनै लिपत जीउ गयो। ताना बाना कछू न सुझै हरि रसि उपट्यो।। हमरे कुल कउने रामु कह्यो) कुछ विद्वानों ने उन्हें आश्रम-भ्रष्ट जुगी जाति का रत्न बतलाया हैं और यह कहा हैं कि जुलाहा शब्द संस्कृत के 'जोला' से बना हैं... (डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी, कबीर, पृष्ठ १) इस प्रकार हम देखते हैं की कुछ लोगो ने कबीर को हिन्दू कुल में उत्पन्न होकर मुसलमान दम्पति द्वारा पौष्य पुत्र माना हैं, तो कुछ ने मुसलमान दम्पति का ही औरस पुत्र माना हैं, इसीलिए कबीर के जन्म के सम्बन्ध में विभिन्न कथाएँ प्रचलित हैं. कबीरपन्थी परम्परा मानती हैं की वे साधारण योनिशरीरी मानव न होकर शुध्द ज्योति शरीरी थे. ज्योति के रुप में ही वे काशी के लहर तालाब में प्रगट हुए थे. अली नामक जुलाहा जिसका उपनाम नीरु था, उधर से ही अपनी नव-विवाहिता पत्नी के साथ जा रहा था, बालक कबीर को देख उठा लिया और किसी कुमारी या विधवा की फेकी सन्तान मानकर घर ले जा प्रेमपूर्वक पालन-पोषण किया. दूसरा मत यह हैं की स्वामी रामानन्द ने एक विधवा ब्राह्मणी को 'पुत्रवती' होने का आशीर्वाद दिया था, उसी के गर्भ से कबीर का जन्म हुआ था, जिन्हें वह लोकलज्जा के भय से लहर तालाब में फेक आई थी, जहा से नीरु और नीमा ने उन्हें पाया था. (कबीर कसौटी तथा कबीरचरित्र बोध) हमारा अपना मत हैं की कबीर साहब एक अद्भुत व्यक्तित्व थे. उनका आविर्भाव लोक के लिए ज्योतिस्वरुप ही था. ऐसी ज्योति कभी-कभी ही प्रकट होती हैं, किन्तु ये अपने माँ-बाप के ही सन्तान थे. विधवा ब्राह्मणी की सन्तान अथवा मुसलमान दम्पति का पोष्यपुत्र मात्र होना केवल श्रध्दावश माना गया हैं और ऐसे महापुरुष के प्रति व्यक्त यह श्रध्दा कोई अस्वाभाविक नहीं हैं. हम देखते हैं की कबीर के कुल में एक ओर मुसलमानी रिती-रीवाज माने जाते थे, तो दूसरी ओर हिंदू प्रथाये भी प्रचलित थी. उनके राम-राम रटने तथा कुलधर्म त्यागने से उनकी माँ प्राय उनसे रुष्ट रहा करती थी व्याकुल होकर रोया भी करती थी. (मुसि मुसि रोवै कबीर की माई, ए वारीक कैसे जीवहि रघुराई। तनना बुनना सभु तजिओ कबीर हरि का नामु लिखी लिओ सरीर।। ....गुरु ग्रन्थ साहिब, राग गूखरी २)

डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इस सम्बन्ध में अपना विचार प्रकट करते हुए लिखा हैं --- 'कबीरदास जिस जुलाहा वंश के पालित हुए थे, वह उस वयनजीवी नाथमतावलम्बी गृहस्थ-योगीयों की जाति का मुसलमानी रुप था, जो सचमुच ही "हिन्दू ना मुसलमान" थी. (कबीर, पृष्ठ ९) तथा "कबीरदास जिस जुलाहा जाति में पालित हुए थे वह एकाध पुश्त पहले से योगी-जैसी किसी आश्रम-भ्रष्ट जाति से मुसलमान हुई थी या अभी होने की राह में थी." परशुराम चतुर्वेदी ने कबीर को "केवल जुलाहा और सम्भवतः इस्लामी धर्म के अनुयायी जुलाहे कुल का बालक" मानते हुए भी कहा हैं कि "हम तो यहा तक कहेगे की काशी एवं मगहर के साथ विशेष सम्बन्ध रखने वाले कबीर साहब का कुल यदि क्रमश: सारनाथ एवं कुशीनगर जैसे बौध्द-तीर्थो के आसपास निवास करने वाले बौध्दों या उनके द्वारा प्रभावित हिन्दूओं मे से ही किसी मुसलमानी रुप रहा होगा तो इसमे कोई अश्चर्य की बात नहीं. हो सकता हैं की उनके सूत कातने व बुनने की जिविका भी पूर्व समय से वैसे ही चली आ रही हो और उसका नाम भी इसी कारण कोरी अथवा किसी अन्य ऐसी वयनजीवी जाति का ही रहा हो." (उत्तरी भारत की सन्त परम्परा, पृष्ठ १५०) कबीर के वचनो तथा विद्वानों द्वारा व्यक्त विभिन्न मतो के अनुशीलन के पश्चात हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं की कबीर के पूर्वज कोलिय जाति-परम्परा के थे, इसीलिए कबीर ने अपने को कोरी अथवा कोली कहा हैं. ये दोन्ही शब्द 'कोलिय' के ही विकृत रुप हैं. जनपद युग में कोलियों का अपना एक जनपद था, जिस की राजधानी देवदह थी और वहा गणतंत्र शासन प्रणाली से संपूर्ण शासकीय कार्य सम्पादित होते थे. इसी कोलिय राजवंश की पुत्री महामाया थी, जिनसे सिध्दार्थ गोतम का जन्म हुआ था. पालिग्रंथो में इस कोलिय जाति का विस्तृत परिचय आया हुआ हैं. (बुध्दचर्या, पृष्ठ २३४/२३५) कोलियों का मुख्य उद्यम खेती करना और वस्र बुनना था. हम देखते हैं की महारानियाँ तक सूत कातती तथा वस्र बुनती थी. दक्षिणविभंगसुत्त में आया हैं की भगवान बुध्द की मौसी महाप्रजापती गोतमी ने अपने काते-बुने वस्र को भगवान को अर्पित करते हुए इस प्रकार कहा था --- "भन्ते, यह अपना ही काता, अपना ही बुना, मेरा यह नया धुस्सा जोठा भगवान को अर्पण हैं. भन्ते, भगवान् अनुकम्पा कर इसे स्वीकार करे." (बुध्दचर्या, पृष्ठ ७१) कालान्तर में यह कोलिय जाति सम्पूर्ण देश में फैल गई थी और आज भी सम्पूर्ण भारत में इस जाति के लोग विद्यमान हैं जो अपने को बुध्द का वंशज बतलाते हैं और 'कोरी' नाम से प्रसिद्ध हैं. यद्यपि वे अछूत न होते हुए अछूत माने जाते हैं. बौध्द धर्म के प्रकाण्ड विद्वान पूज्य भिक्षु धर्मरक्षितजी ने भी वर्तमान कोरी जाति को प्राचीन कोलियों की ही परम्परा माना हैं. (कोलिराजपुत, वर्ष ६, अंक ११ में प्रकाशित भिक्षूजी का अभिभाषण - सन् १९४७ अजमेर) हम पहले कह आये हैं कि मध्य-युग में यवन-आक्रमण से बौध्दों को बहुत कष्ट भोगना पड़ा और वे या तो इस देश से पलायन कर गये या यही हिन्दू-धर्म में घुल-मिल गये अथवा मुसलमान हो गये. बौध्द विद्वानों ने भी इसे माना हैं. (सारनाथ का इतिहास, पृष्ठ ९६) इन तथ्यों पर विचार करने पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं की कबीर के पूर्वज कोलिय थे, जो मुसलमानी शासको के प्रभाव में आकर मुसलमान हो गए थे. यही कारण हैं की कबीर की वाणियों में बौध्द, हिन्दू और इस्लाम धर्मों के प्रभाव दिखते हैं. उनके माता-पिता की परंपरा से आया हुआ वही भावना-स्रोत अब अपना मार्ग मोड़ लिया था अथवा मोड़ रहा था, जो की सिध्दो-नाथो से होता हुआ पहुंचा था और अब मुसलमानी प्रभाव से भयभीत होकर अपना रुप परिवर्तन करने के लिए बाध्य था. सिकन्दर लोदी द्वारा कबीर को दंड देना इसका ज्वलंत दृष्टान्त हैं. कारण कबीर तथा उनके परिवार वाले मुसलमान नामधारी होते हुए भी 'राम-राम की रट' लगानेवाले तथा हिन्दू-मुसलमान दोनों की अनेक धार्मिक भावनाओं पर प्रहार करने वाले थे, जिससे उन्हें ठेस पहुँचती थी और इसलिए कबीर की शिकायत सिकन्दर लोदी तक पहुँची थी. कबीर कोरी तो थे, किन्तु उनकी जाति जुलाहा नाम से भी प्रसिद्ध थी और बुनकर जाति को ही जुलाहा कहा जाता था तथा इस समय भी इसका यही भाव हैं. इसीलिए कबीर ने अपने को जुलाहा और कोरी कहा हैं तथा इनमे भेद नहीं माना हैं.

1) हरि को नाम अम पद दाता कहै कबीरा कोरी
2) पाड़ बुनै कोलि मैं बैठी म षु टा मै गाड़ी
3) कहहि कबीर करम से जोरी, सूत कुसूत बुनै भल कोरी
4) सूतै सूत मिलाये कोरी
5) जाति जुलाहा मती कौ धीर
6) कहै कबीर जुलाहा
7) तु बांभन मैं काशी का जुलाहा
8) दास जुलाहा नाम कबीरा
9) जाति जुलाहा नाम कबीरा
10) कहै जुलाहा कबीरा

बौध्द धर्म के भित्ति पर

भगवान बुध्द के मूल शिक्षाओं में भक्ति के लिए स्थान न होकर ज्ञान-प्रधान चिन्तन को ही प्रश्रय प्राप्त था, किन्तु वक्कलि जैसे श्रध्दालू भिक्षु को उपदेश देते हुए तथागत ने कहा था---"वक्कलि, जो धर्म को देखता हैं, वह मुझे देखता हैं और जो मुझे देखता हैं, वह धर्म को देखता हैं." (यो खो वक्कलि, धम्म पस्सति सो मं पस्सति, यो मं पस्सति सो धम्मं पस्सति। धम्मं हि वक्कलि, पस्सन्तो मं पस्सति, मं पस्सन्तो धम्मं पस्सति -- संयुत्त निकाय, ३, २१, २, ४, ५, हिन्दी अनुवाद भिक्खूं धर्मरक्षित, दूसरा भाग, पृष्ठ ३७४) साथ ही छ अनुस्मृति कर्मस्थानों में बुध्दानुस्मृति भी एक थी, जिसकी भावना में केवल बुध्द गुणों का ही अनुस्मरण करना था. (विशुध्दी मार्ग, भाग एक, पृष्ठ १७६) यही भावना आगे चलकर भक्ति का स्वरूप ग्रहण की. महायान ने इसे और भी सँवारा. उसने भगवान बुध्द को लोकोत्तर मानकर निर्मित काय द्वारा धर्मचक्र-प्रवर्तन आदि का प्रचार किया. इस विचार-पध्दति में बुध्द के दो रुप हो गये--- एक बुध्दरुप वह जो नि:स्वभाव, धर्म-शून्य, धर्मतास्वरुप, निराकार और निरंजन हैं, वह कभी इस लोक में नहीं आता, न जन्म लेता न उपदेश देता अथवा परिनिर्वाण को प्राप्त होता हैं. दूसरा बुध्द रुप उसी की माया-निर्मित स्वरुप हैं, उसकी लिला हैं, जो महामाया की कुक्षि से उत्पन्न हुआ, महाभिनिष्क्रमण कर तप किया, ज्ञान प्राप्त कर धर्मचक्र-प्रवर्तन किया और फिर बहुजन हिताय बहुजन सुखाय धर्मोपदेश कर के महापरिनिर्वाण को प्राप्त किया. तात्पर्य यह कि एक ही बुध्द का एक निर्गुण, निराकार रुप था तो दूसरा सगुण और साकार रुप था. डॉ. भरतसिंह उपाध्याय का यह कथन समीचीन (उचित) हैं कि यह वैष्णव भक्ति के निर्गुण-सगुण रुपों के आविर्भाव शताब्दीयों पूर्व महायान ने कर दिये थे. (बौध्द-दर्शन तथा अन्य भारतीय दर्शन, द्वितीय भाग, पृष्ठ १०५२) पीछे की सगुण और निर्गुण दोनों शाखायें बौध्दधर्म की इसी भक्ति-भावना की देन हैं. राम और कृष्ण की सगुणोपासना के रुप में दूसरे प्रकार के बुध्दस्वरुप का विकास हुआ और निर्गुण उपासना के रुप में पहले प्रकार के बुध्दस्वरुप का विकास हुआ. इस प्रकार हम देखते हैं की वैष्णवधर्म की निर्गुण-सगुण दोनों ही भक्ति के स्वरुप का आविर्भाव शताब्दीयों पूर्व महायान से हो चुका था. एक स्वरुप में राम "एक, अनीह, अरुप, अनामा, अज, सच्चिदानन्द, परमधामा, अगुण, अखण्ड, अनन्त, अनादी, परमार्थरुप, अविगत, अलख, अनुप हैं तो दूसरे में दशरथसुत, लोक-मर्यादा की स्थापना करने वाले. (बौध्द-दर्शन तथा अन्य भारतीय दर्शन, वही पृष्ठ १०५२) इस प्रकार भक्ति की दोनों कल्पनायें वैष्णव भक्ति-साधना से पूर्व ही तथागत बुध्द के दो स्वरुपों में प्रगट हो चुकी थी, जो आगे चलकर मध्य-युग में पूर्ण विकास को प्राप्त हुई. इनका प्रभाव सिध्दों, नाथों, सन्तो, सुफियों आदि सब पर पड़ा था. शैव, शाक्त भी इस प्रभाव से वंचित न थे. नाथ तो शैव मतावलम्बी ही थे.

सम्प्रति इस विचार से सभी विद्वान सहमत हैं कि निर्गुणवादी सन्तो की विचार-धारा पूर्ण-रुप से बौध्द धर्म से प्रभावित थी और यह विचारधारा सिध्दों से होकर नाथो तक पहुँची थी और सन्तो ने नाथो से उसको ग्रहण किया था. यद्यपि प्रमुख सन्त कबीर ने नाथो का खण्डन किया हैं, किन्तु उनकी विचारधारा हठयोग तथा तांत्रिक साधना को जो स्थान प्राप्त हैं और नाथो जैसी भाषा का प्रयोग हुआ हैं, इसके लिए नाथसम्प्रदाय के ही वे ऋणी हैं. (बौध्द दर्शन तथा अन्य भारतीय दर्शन, द्वितीय भाग, पृष्ठ १०५४) कबीर के समय तक यद्यपि बौध्दधर्म का प्रगट रुप शेष नहीं था, किन्तु शताब्दीयों से जीर्ण-शीर्ण पड़ी उसकी भित्ति अब भी सिध्दो और नाथो से होती हुई जनता के विचारो में व्याप्त थी. साथ ही वैष्णव, सूफी आदि सम्प्रदाय भी उसकी नैतिक शिक्षा, भक्ति-साधना, परमतत्व से किसी न किसी रुप से प्रभावित थे, उसी की निर्गुण साधना ने सन्तमत को जन्म दिया अर्थात जो बौध्दधर्म का निर्गुण (शून्य) विचारधारा सिध्दो और नाथो से होकर प्रवाहित हुई थी उसी से सन्तमत का उदय हुआ था. हम आगे देखेगे की सन्तो की वाणी में बौध्दधर्म का प्रभाव किस प्रकार व्याप्त हैं.

हिन्दी सन्त साहित्य पर बौध्द धर्म का प्रभाव...
लेखिका- विद्यावती मालविका
एम. ए. पी. एच. डी. साहित्य रत्न...

सर्वानित्यवाद

सर्वानित्यवाद : बौध्द-दर्शन के सर्वानित्यवाद, क्षणिकवाद ने विश्व को एक दूसरी ही दृष्टि से देखने की प्रेरणा दी. बाहरी जगत को आत्मवादी (नित्यतावादी) भी परिवर्तनशील मानने को तैयार थे, लेकिन वह उसके भीतर नित्य सत्ता का प्रतिपादन करते थे और उसको आत्मा या ब्रह्म का नाम देते थे. बौध्द दर्शन ने बतलाया, की जैसे केले के स्तम्भ को भीतर से देखा जाये तो, परत के बाद परत, छिलके के बाद छिलके निकलते आयेंगे, वहां (अन्त तक) कोई सार नहीं मिलेगा. उसी तरह विश्व के भीतर और बाहर के सारे पदार्थ किसी नित्य सार आत्मा, ब्रह्म वाले नहीं हैं, वह ऐसे सार से शून्य हैं. बौध्द शून्यवाद की भावना यही से पैदा हुई. अपने सर्वानित्यवाद को समझाने के लिए वह बादल या दीपक की लौ का उदाहरण देते हैं. बादल जीस तरह क्षण-क्षण परिवर्तनशील हैं, वही हालत विश्व की हैं. ठोस से ठोस हिरा या लोहा भी क्षण-क्षण परिवर्तित होता रहता हैं. उन में पूर्व और पर रुप में सदृश्यता, समानता क्यों दिखलाई पडती हैं? इसका उत्तर बौध्द देते हैं -- इसका कारण हैं सदृश उत्पत्ति, कारण से कार्य की... उत्पन्न होने वाली चीज़ अपनी पूर्वगामी वस्तू के समान होती हैं, इसलिए हमे एकता का भ्रम होता हैं. दीपक की लौ क्षण-क्षण बदल रही हैं, लेकिन पुराऩी लौ की जगह उत्पन्न होने वाली नई लौ पहले के सदृश होती हैं, इसलिए हम कह बैठ़ते हैं, ' यह वही लौ हैं'.

बिना अपवाद के सारे भीतरी और बाहरी जगत को अनित्य (परिवर्तनशील) मानने पर कारण-कार्य के सिध्दान्त और उसकी व्याख्या को भी भीन्न मानना जरुरी था. परमाणु या द्रव्य को ठोस नित्य ईंटें मानने वाले कह सकते थे, की ये एक दूसरे से मिल कर नई चीज़ो को बनाती हैं. इनका संघटन और विघटन वस्तुओं की उत्पत्ति और विनाश हैं. लेकिन बौध्द-दर्शन में ऐसी कोई कूटस्थ, नित्य ईंट नहीं थी. सभी वस्तुएं नित्य सार से शून्य हैं-- अर्थात, वह वस्तू नहीं, बल्कि घटनाएं मात्र हैं. यह नहीं कहा जा सकता की जैसे सोना मूल तत्त्व हैं, सोना ही भीन्न-भीन्न रुप लेकर कंगण, कुंडल बनता हैं. कार्य-कारण के नियम को समझने के लिए एक विशेष पारिभाषिक शब्द का बुध्द ने इस्तेमाल किया, जो हैं प्रतीत्य-समुत्पाद... इसकी व्याख्या करते हुए बुध्द कहते हैं, अस्मिन् सति इदं भवति (यह होने पर यह होता हैं) इसके समाप्त होने पर यह उत्पन्न होता हैं-- जो अभी-अभी समाप्त हुआ हैं, वही कारण हैं, और जो उसके समाप्त होने के बाद में उत्पन्न हुआ वह कार्य हैं. (जैसे बीज नष्ट होकर वृक्ष उत्पन्न होता हैं) कारण (बीज) के अस्तित्व के समय कार्य (वृक्ष) का नितान्त अभाव था और कार्य (वृक्ष) के अस्तित्व में आने के समय कारण (बीज) का सर्वथा अभाव हो चूका था. कारण के भीतर छीपी कोई ऐसी नित्य (न बदलने वाली) सारभूत वस्तू नहीं थी, जो की कार्य के भीतर निहित हैं. दोनों वस्तुतः एक दूसरे से इसके सिवा और कोई सम्बन्ध नहीं रखती की वह एक दूसरे से पहले या पीछे हुई.

काश्यप मातंग

चीनी भाष में भारतीय साहित्य का अनुवाद-कार्य इसा की प्रथम शताब्दी में क्या-ये मो-थङ् (काश्यप मातंग) के द्वारा आरंभ हुआ और काश्यप ६७ इ. में भारत से चीन पहुँचें थे. उस समय से जो अनुवाद का कार्य आरम्भ हुआ वह १३ शताब्दी के अन्त (मंगोल सम्राट कुबिले खान) तक चलता रहा. ६७-१३०० ईसा तक जिन ग्रन्थों का अनुवाद हुआ था उनमें से बहुत से अब प्राप्य नहीं हैं, लेकिन अब भी साढ़े चौदह सौ ग्रन्थ मौजूद हैं, जिनको बत्तीस अक्षर के श्लोकों में गीनने पर उनकी संख्या साढ़े तैतीस लाख श्लोक या तीस-बत्तीस महाभारत ग्रन्थ के बराबर हैं. इन ग्रन्थों को सूत्र, विनय और अभिधर्म पिटक के तीन भागो में विभक्त किया गया हैं, यद्यपि पिटक के भीतर "बुध्द चरित" जैसे काव्यों को भी शामिल कर लिया गया हैं.

सभी ग्रन्थों की संख्या १४४० हैं जो की ५५८६ भाणवारों (फैसकुली) में समाप्त हुए हैं. यह भाणवार कहीं एक हजार श्लोकों की भी मिलती हैं और कहीं पांच सौ की भी मिलती हैं. औसतन छ सौ ले लेने पर ग्रन्थ संख्या साढ़े तैतीस लाख श्लोकों के बराबर होती हैं.

बुध्दयश अफगाणिस्तान काबुल (कुभा) के भिक्षु विद्वान थे, उस समय काबुल सांस्कृतिक और धार्मिक तौर से भारत का अभिन्न अंग था. बुध्दयश का जन्म ३३८ इसा में हुआ था, ४०० इसा के आस पास वह चीन में जा ४००-४१३ इसा के बिच राजधानी छाङ-आन में रहकर उन्होने निम्न चार ग्रन्थों का संस्कृत से चीनी में अनुवाद किया-- १) अकाशगर्भ २) दीर्घागम ३) धर्मगुप्त-विनय ४) धर्मगुप्त-प्रातिमोक्ष

बुध्दयश द्वारा अनुवादित दीर्घागम प्राय: तेरह हजार श्लोकों के बराबर हैं. उसी का दूसरा सुत्र यह 'महापरिनिर्वाण-सुत्र' हैं. इस सुत्र के एक से अधिक अनुवाद हुए थे. यह महापरिनिर्वाण सुत्र जहा हीनयान त्रिपिटक के दीर्घागम (दीघनिकाय) का एक सुत्र हैं, वहां महायान का अपना अलग और बहुत विशाल महापरिनिर्वाण सुत्र भी मौजूद हैं. जीस निकाय का भारत में एक समय बहुत प्रचार था, उसका नाम और पिटक दोनों ही आज विस्मृत हो चुके हैं. लेकिन सौभाग्य से चीनी अनुवाद में विस्मृत हीनयान 'मध्यमागम' (५४२), 'एकोत्तरागम' (५४७), 'संयुक्तागम' (५४४) और 'दीर्घागम' (५४५) चीनी अनुवाद में मौजूद हैं. इनके अतिरिक्त विनय पिटक और त्रिपिटक के बृहत्भाष्य (विभाषाये) भी मौजूद हैं, इन ग्रन्थों से हमारे सांस्कृतिक इतिहास पर बहुत प्रकाश पडता हैं, इसे कहने की अवश्यकता नहीं.

कर्म

बौध्द दर्शन साफ़ कहता हैं, की हरेक अच्छा या बुरा काम हाथ से छूटा हुआ तीर हैं. करने के साथ ही वह जीवन को अपनी रुप में बदल देता हैं. हरके जीवन अपने अतीत के अनन्त काल के कर्मों के प्रभावों का योग हैं. इस योग को करने के लिए किसी बाहरी देवता या साधन की अवश्यकता नहीं. जीस तरह बहती हुई जल-प्रणाली में लगातार पड़ते हुए रंग उसे तत्काल अपने रुप में रंगते जाते हैं, वही स्थिति जीवन की हैं.

सौन्दरनन्द-महाकाव्य, आज्ञा-व्याकरण, सर्ग १८

सौन्दरानन्द महाकाव्य, अष्टादश (१८ वां) सर्ग, आज्ञा-व्याकरण (उपदेश): अथ द्विजो बाल इवाप्तवेदः क्षिप्रं वणिक् प्राप्त इवाप्तलाभः । जित्वा च रा...