कबीर ऐसी जाति में उत्पन्न हुए थे, जो जुलाहा और कोरी दोनों ही मानी जाती थी, जिसका परम्परागत उद्यम सूत कातना तथा वस्र बुनना था. कुछ विद्वानों का कहना हैं की वे जुलाहा तो थे, (परशुराम चतुर्वेदी, डॉ. त्रिगुणायत, डॉ. रामकुमार वर्मा आदि) किन्तु मुसलमानी जुलाहा थे, इस बात की पुष्टि गुरु अमरदास, आनन्तदास, रज्जबजी, तुकाराम आदि ने की हैं और यही बात खजीनतुल असफिया, दबिस्ताने मजहिब, अनुरागसागर, कबीर कसौटी, डॉ. भन्डारकर, वेस्टकॉट आदि ने भी कही हैं. (कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ १७३) सन्त रैदास और धन्ना ने भी कबीर को ऐसा जुलाहा बतलाया हैं की जिनकी कुल में ईद और बकरीद मनाई जाती थी और गाय का वध होता था तथा शेख एवं पीर का सम्मान होता था. (जाकै इदि बकरिदी कुल गऊ रे बधु करही, मानीअही सेख सहीद पीरा। जाकै बाप वैसी करी पूत ऐसी करी, तिहूरे लोग परसिध कबीरा।। --- गुरुग्रंथ साहिब, राग आ. ३६)
कुछ विद्वानों ने (हिन्दी काव्य में निर्गुण सम्प्रदाय, पृष्ठ ४५) यह माना हैं कि कबीर जुलाहा होते हुए भी हिंदू थे, क्योंकि उनके संस्कार हिंदू सदृश्य ही थे, राम राम की रट, नित्य नई कोरी गगरी में भोजन बनाना, चौका पोतवाना, उनकी इन सब बातों से उनकी अम्मा तंग आ गई थी. (नित उठि कोरी गगरी आनै लिपत जीउ गयो। ताना बाना कछू न सुझै हरि रसि उपट्यो।। हमरे कुल कउने रामु कह्यो) कुछ विद्वानों ने उन्हें आश्रम-भ्रष्ट जुगी जाति का रत्न बतलाया हैं और यह कहा हैं कि जुलाहा शब्द संस्कृत के 'जोला' से बना हैं... (डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी, कबीर, पृष्ठ १) इस प्रकार हम देखते हैं की कुछ लोगो ने कबीर को हिन्दू कुल में उत्पन्न होकर मुसलमान दम्पति द्वारा पौष्य पुत्र माना हैं, तो कुछ ने मुसलमान दम्पति का ही औरस पुत्र माना हैं, इसीलिए कबीर के जन्म के सम्बन्ध में विभिन्न कथाएँ प्रचलित हैं. कबीरपन्थी परम्परा मानती हैं की वे साधारण योनिशरीरी मानव न होकर शुध्द ज्योति शरीरी थे. ज्योति के रुप में ही वे काशी के लहर तालाब में प्रगट हुए थे. अली नामक जुलाहा जिसका उपनाम नीरु था, उधर से ही अपनी नव-विवाहिता पत्नी के साथ जा रहा था, बालक कबीर को देख उठा लिया और किसी कुमारी या विधवा की फेकी सन्तान मानकर घर ले जा प्रेमपूर्वक पालन-पोषण किया. दूसरा मत यह हैं की स्वामी रामानन्द ने एक विधवा ब्राह्मणी को 'पुत्रवती' होने का आशीर्वाद दिया था, उसी के गर्भ से कबीर का जन्म हुआ था, जिन्हें वह लोकलज्जा के भय से लहर तालाब में फेक आई थी, जहा से नीरु और नीमा ने उन्हें पाया था. (कबीर कसौटी तथा कबीरचरित्र बोध) हमारा अपना मत हैं की कबीर साहब एक अद्भुत व्यक्तित्व थे. उनका आविर्भाव लोक के लिए ज्योतिस्वरुप ही था. ऐसी ज्योति कभी-कभी ही प्रकट होती हैं, किन्तु ये अपने माँ-बाप के ही सन्तान थे. विधवा ब्राह्मणी की सन्तान अथवा मुसलमान दम्पति का पोष्यपुत्र मात्र होना केवल श्रध्दावश माना गया हैं और ऐसे महापुरुष के प्रति व्यक्त यह श्रध्दा कोई अस्वाभाविक नहीं हैं. हम देखते हैं की कबीर के कुल में एक ओर मुसलमानी रिती-रीवाज माने जाते थे, तो दूसरी ओर हिंदू प्रथाये भी प्रचलित थी. उनके राम-राम रटने तथा कुलधर्म त्यागने से उनकी माँ प्राय उनसे रुष्ट रहा करती थी व्याकुल होकर रोया भी करती थी. (मुसि मुसि रोवै कबीर की माई, ए वारीक कैसे जीवहि रघुराई। तनना बुनना सभु तजिओ कबीर हरि का नामु लिखी लिओ सरीर।। ....गुरु ग्रन्थ साहिब, राग गूखरी २)
डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इस सम्बन्ध में अपना विचार प्रकट करते हुए लिखा हैं --- 'कबीरदास जिस जुलाहा वंश के पालित हुए थे, वह उस वयनजीवी नाथमतावलम्बी गृहस्थ-योगीयों की जाति का मुसलमानी रुप था, जो सचमुच ही "हिन्दू ना मुसलमान" थी. (कबीर, पृष्ठ ९) तथा "कबीरदास जिस जुलाहा जाति में पालित हुए थे वह एकाध पुश्त पहले से योगी-जैसी किसी आश्रम-भ्रष्ट जाति से मुसलमान हुई थी या अभी होने की राह में थी." परशुराम चतुर्वेदी ने कबीर को "केवल जुलाहा और सम्भवतः इस्लामी धर्म के अनुयायी जुलाहे कुल का बालक" मानते हुए भी कहा हैं कि "हम तो यहा तक कहेगे की काशी एवं मगहर के साथ विशेष सम्बन्ध रखने वाले कबीर साहब का कुल यदि क्रमश: सारनाथ एवं कुशीनगर जैसे बौध्द-तीर्थो के आसपास निवास करने वाले बौध्दों या उनके द्वारा प्रभावित हिन्दूओं मे से ही किसी मुसलमानी रुप रहा होगा तो इसमे कोई अश्चर्य की बात नहीं. हो सकता हैं की उनके सूत कातने व बुनने की जिविका भी पूर्व समय से वैसे ही चली आ रही हो और उसका नाम भी इसी कारण कोरी अथवा किसी अन्य ऐसी वयनजीवी जाति का ही रहा हो." (उत्तरी भारत की सन्त परम्परा, पृष्ठ १५०) कबीर के वचनो तथा विद्वानों द्वारा व्यक्त विभिन्न मतो के अनुशीलन के पश्चात हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं की कबीर के पूर्वज कोलिय जाति-परम्परा के थे, इसीलिए कबीर ने अपने को कोरी अथवा कोली कहा हैं. ये दोन्ही शब्द 'कोलिय' के ही विकृत रुप हैं. जनपद युग में कोलियों का अपना एक जनपद था, जिस की राजधानी देवदह थी और वहा गणतंत्र शासन प्रणाली से संपूर्ण शासकीय कार्य सम्पादित होते थे. इसी कोलिय राजवंश की पुत्री महामाया थी, जिनसे सिध्दार्थ गोतम का जन्म हुआ था. पालिग्रंथो में इस कोलिय जाति का विस्तृत परिचय आया हुआ हैं. (बुध्दचर्या, पृष्ठ २३४/२३५) कोलियों का मुख्य उद्यम खेती करना और वस्र बुनना था. हम देखते हैं की महारानियाँ तक सूत कातती तथा वस्र बुनती थी. दक्षिणविभंगसुत्त में आया हैं की भगवान बुध्द की मौसी महाप्रजापती गोतमी ने अपने काते-बुने वस्र को भगवान को अर्पित करते हुए इस प्रकार कहा था --- "भन्ते, यह अपना ही काता, अपना ही बुना, मेरा यह नया धुस्सा जोठा भगवान को अर्पण हैं. भन्ते, भगवान् अनुकम्पा कर इसे स्वीकार करे." (बुध्दचर्या, पृष्ठ ७१) कालान्तर में यह कोलिय जाति सम्पूर्ण देश में फैल गई थी और आज भी सम्पूर्ण भारत में इस जाति के लोग विद्यमान हैं जो अपने को बुध्द का वंशज बतलाते हैं और 'कोरी' नाम से प्रसिद्ध हैं. यद्यपि वे अछूत न होते हुए अछूत माने जाते हैं. बौध्द धर्म के प्रकाण्ड विद्वान पूज्य भिक्षु धर्मरक्षितजी ने भी वर्तमान कोरी जाति को प्राचीन कोलियों की ही परम्परा माना हैं. (कोलिराजपुत, वर्ष ६, अंक ११ में प्रकाशित भिक्षूजी का अभिभाषण - सन् १९४७ अजमेर) हम पहले कह आये हैं कि मध्य-युग में यवन-आक्रमण से बौध्दों को बहुत कष्ट भोगना पड़ा और वे या तो इस देश से पलायन कर गये या यही हिन्दू-धर्म में घुल-मिल गये अथवा मुसलमान हो गये. बौध्द विद्वानों ने भी इसे माना हैं. (सारनाथ का इतिहास, पृष्ठ ९६) इन तथ्यों पर विचार करने पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं की कबीर के पूर्वज कोलिय थे, जो मुसलमानी शासको के प्रभाव में आकर मुसलमान हो गए थे. यही कारण हैं की कबीर की वाणियों में बौध्द, हिन्दू और इस्लाम धर्मों के प्रभाव दिखते हैं. उनके माता-पिता की परंपरा से आया हुआ वही भावना-स्रोत अब अपना मार्ग मोड़ लिया था अथवा मोड़ रहा था, जो की सिध्दो-नाथो से होता हुआ पहुंचा था और अब मुसलमानी प्रभाव से भयभीत होकर अपना रुप परिवर्तन करने के लिए बाध्य था. सिकन्दर लोदी द्वारा कबीर को दंड देना इसका ज्वलंत दृष्टान्त हैं. कारण कबीर तथा उनके परिवार वाले मुसलमान नामधारी होते हुए भी 'राम-राम की रट' लगानेवाले तथा हिन्दू-मुसलमान दोनों की अनेक धार्मिक भावनाओं पर प्रहार करने वाले थे, जिससे उन्हें ठेस पहुँचती थी और इसलिए कबीर की शिकायत सिकन्दर लोदी तक पहुँची थी. कबीर कोरी तो थे, किन्तु उनकी जाति जुलाहा नाम से भी प्रसिद्ध थी और बुनकर जाति को ही जुलाहा कहा जाता था तथा इस समय भी इसका यही भाव हैं. इसीलिए कबीर ने अपने को जुलाहा और कोरी कहा हैं तथा इनमे भेद नहीं माना हैं.
1) हरि को नाम अम पद दाता कहै कबीरा कोरी
2) पाड़ बुनै कोलि मैं बैठी म षु टा मै गाड़ी
3) कहहि कबीर करम से जोरी, सूत कुसूत बुनै भल कोरी
4) सूतै सूत मिलाये कोरी
5) जाति जुलाहा मती कौ धीर
6) कहै कबीर जुलाहा
7) तु बांभन मैं काशी का जुलाहा
8) दास जुलाहा नाम कबीरा
9) जाति जुलाहा नाम कबीरा
10) कहै जुलाहा कबीरा