सत्तनाम पालिभाषा के सच्चनाम का रुपान्तर :
कबीर ने सत्तनाम को परमपद प्राप्ति का साधन माना हैं और इसे औषधि कहा हैं. जो व्यक्ति इस औषधि का सेवन करता हैं तथा कुपथ्य का परहेज़ करता हैं, उसकी सारी वेदनाएँ नष्ट हो जाती हैं. कबीर का यह भी कथन हैं की इस सत्तनाम को सतगुरु ने बतलाया हैं ----
सत्त नाम निज औषधि, सतगुरु देई बताय।
औषधि खाय सपथ रहि, ता की वेदन जाय।
(सन्तबानी संग्रह, भाग 1, पृष्ठ 5)
यह सत्तनाम सबसे 'न्यारा' हैं (सत्तनाम हैं सब तै न्यारा-- कबीर, पृष्ठ 279), जो इस पर विश्वास करता हैं, वही परमतत्व को प्राप्त कर सकता हैं (सत्त गहे सतगुरु को चीन्हे, सतनाम विस्वासा। कहै कबीर साधन हितकारी, हम साधन के दासा।।... कबीर, पृष्ठ 232), यह सतनाम ह्रदय में रहता हैं (सतनाम के पटतरे, देवे को कछु नाहि।......सन्तबानी संग्रह, भाग 1, पृष्ठ 2), वह उसी मृग के समान उसमे लवलीन हो जाता हैं, जैसे की मृग व्याधा के गीत सुनने में लवलीन होकर अपना तन-मन भी उसे सौप देता हैं (ऐसा कोई ना मिला, सत्तनाम का मीत। तन-मन सौैपैे मिरग ज्यों, सुनै बधिक का गीत। ...... सन्तबानी संग्रह, भाग 1, पृष्ठ 3), इसलिए सत्तनाम का स्मरण करो ('तहाँ सुमिर सतनाम'... सन्तबानी संग्रह, भाग 1, पृष्ठ 5). सत्तनाम की लूट मची हैं, उसे लूटना चाहिए अन्यथा मृत्यु के पश्चात पश्चाताप करना पड़ेगा ------
लूटि सकै तो लूटि ले, सत्तनाम की लूटि।
पाछे फिरि पछताहुगे, प्रान जाहिं जब छूटि।।
(सन्तबानी संग्रह, भाग 1, पृष्ठ 6)
कबीर ने जिसे सत्तनाम कहा हैं और सतगुरु से प्राप्त महौषधि माना हैं, जिसका स्मरण करना परमावश्यक हैं क्योंकि उसी के स्मरण से परमपद की प्राप्ति होगी, वह सत्तनाम पालिभाषा के 'सच्चनाम' का रुपान्तर हैं. पालिभाषा के सच्चनाम का प्रयोग भगवान् बुध्द के लिए हुआ हैं. अंगुत्तरनिकाय के चार सूत्रों की गाथाओं में बार-बार सच्चनाम को दुहराया गया हैं और कहा गया हैं -----
"इच्चेते अट्ठपम्मा सध्दस्स वरसेसिनो। अक्खाता सच्चनामेन उभयत्थ नुसाहवा।। ".....अंगुत्तरनिकाय, 8, 6, 4, 8, 6, 5; 8, 8, 4 तथा 8, 8, 5)
अर्थात् सच्चनाम (सत्यनाम) ने इन्हें दोनों लोक (नाम-रुप के क्षेत्र में बने रहने को लोक कहते हैं) के लिए सुखदायक कहा हैं. ऐसे ही बुध्द के लिए पालिग्रन्थों में 'सच्चनिक्कमो' (सीतिभूतो दमप्पत्तो धितिमा सच्चनिक्कमो। ... सुत्तनिपात, सभियसुत्त), सच्चसह्वयो (सत्तनाम वाले).....सुत्तनिपात, परायणसुत्त, गाथा- 10), सच्चवादि (सत्यवादी) .... थेरीगाथा, अम्बपालि, गाथा- 252-270) आदि अनेक शब्दों का व्यवहार हुआ हैं. मज्झिमनिकाय के इसिगिल सुत्त में 'सत्यनाम' से एक प्रत्येक-बुध्द का भी उल्लेख मिलता हैं (उपोसथो सुन्दरो सच्चनामो। ..... मज्झिमनिकाय, 3, 2, 6). इससे स्पष्ट है कि 'सच्चनाम' वाले भगवान बुध्द ही कबीर के सत्तनाम हो गये हैं. शान्तिभिक्षु का यह कथन समीचीन (उचित) हैं कि "निर्गुण मत के राम को यदि तथागत (बुध्द) के कार्यों के रूप से मिलाये तो बात कुछ अधिक समझ में आती हैं. ह्रदय के भीतर छिपे राम वस्तुतः धनुषधारी और रावणसंहारी राम नहीं हैं, बल्कि वे तथागत बुध्द हैं. जिसके बारे में कहा गया हैं की उनके तीन काय हैं, वे घट-घट में हैं (महायान सुत्रालंकार, पृष्ठ 131). डॉ. भरतसिंह उपाध्याय का भी यही मत हैं की "सन्त साधना का सत्तनाम पालि का सच्चनाम ही है, जो तथागत का एक नाम हैं "(बौध्द दर्शन तथा अन्य भारतीय दर्शन, भाग 2 पृष्ठ 1061). कबीर का सत्तनाम सतगुरु से प्राप्त परमपद का साधक हैं, जो इसमे लवलीन होता हैं, वह सारी पीडा़ओ सै छूट जाता हैं. यही बात सुत्तनिपात में पिंगिय ने कही हैं -----"बुध्द सर्वदर्शी हैं, सारे संसार के ज्ञाता हैं, मैने उन्हीं सत्यनाम (सच्चनाम) की उपासना की हैं." ("सच्चह्वयो ब्रह्मे उपासितो मे।" .... सुत्तनिपात, हिन्दी अनुवाद, पृष्ठ 239) सिध्द सरहपा (सरहपाद) ने बुध्द के संयोग से ही परमपद की प्राप्ति बतलाई हैं (बुध्द संयोग परमपउ एहु से मोक्ख सहाव। ..... दोहाकोशगीति, पृष्ठ 153) और यह कहा हैं कि बुध्द सदा इस शरीर में ही निवास करते हैं. (पण्डिअ सअल सत्थ बक्खानइ। देहहिं बुध्द वसन्त ण जाणइ।। .... हिन्दी काव्यधारा, पृष्ठ 10) सिध्द तिलोपा (तिलोपाद) ने उसी बुध्द को निरंजन बतलाया हैं. (हँउ जग हँउ बुध्द हँउ णिरंजण।.... हिन्दी काव्यधारा, पृष्ठ 174) आगे चलकर कबीर ने उसी बुध्द को अनेक नामो से पुकारा हैं, उन्हें राम भी कहा हैं (लूटि सकै तौ लूटियौ, राम नाम हैं लूटि। ... कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ 7), सतनाम भी कहा हैं, निरंजन भी कहा हैं, सर्वव्यापी भी माना हैं और उसे ही त्राता भी कहा हैं. (रामनाम संसार मै सारा, रामनाम भौ तारनहारा। .... कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ 228) इस प्रकार हम देखते हैं की सच्चनाम वाले बुध्द ही कबीर के सत्तनाम हैं और यह सच्चनाम पालि-साहीत्य से ही कबीर तक पहुंचा हैं.
हिन्दी साहित्य पर बौध्दधर्म का प्रभाव
लेखिका- विद्यावती मालविका
एम ए पी एच डी साहित्यरत्न....
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