Thursday, November 28, 2019

सर्वानित्यवाद

सर्वानित्यवाद : बौध्द-दर्शन के सर्वानित्यवाद, क्षणिकवाद ने विश्व को एक दूसरी ही दृष्टि से देखने की प्रेरणा दी. बाहरी जगत को आत्मवादी (नित्यतावादी) भी परिवर्तनशील मानने को तैयार थे, लेकिन वह उसके भीतर नित्य सत्ता का प्रतिपादन करते थे और उसको आत्मा या ब्रह्म का नाम देते थे. बौध्द दर्शन ने बतलाया, की जैसे केले के स्तम्भ को भीतर से देखा जाये तो, परत के बाद परत, छिलके के बाद छिलके निकलते आयेंगे, वहां (अन्त तक) कोई सार नहीं मिलेगा. उसी तरह विश्व के भीतर और बाहर के सारे पदार्थ किसी नित्य सार आत्मा, ब्रह्म वाले नहीं हैं, वह ऐसे सार से शून्य हैं. बौध्द शून्यवाद की भावना यही से पैदा हुई. अपने सर्वानित्यवाद को समझाने के लिए वह बादल या दीपक की लौ का उदाहरण देते हैं. बादल जीस तरह क्षण-क्षण परिवर्तनशील हैं, वही हालत विश्व की हैं. ठोस से ठोस हिरा या लोहा भी क्षण-क्षण परिवर्तित होता रहता हैं. उन में पूर्व और पर रुप में सदृश्यता, समानता क्यों दिखलाई पडती हैं? इसका उत्तर बौध्द देते हैं -- इसका कारण हैं सदृश उत्पत्ति, कारण से कार्य की... उत्पन्न होने वाली चीज़ अपनी पूर्वगामी वस्तू के समान होती हैं, इसलिए हमे एकता का भ्रम होता हैं. दीपक की लौ क्षण-क्षण बदल रही हैं, लेकिन पुराऩी लौ की जगह उत्पन्न होने वाली नई लौ पहले के सदृश होती हैं, इसलिए हम कह बैठ़ते हैं, ' यह वही लौ हैं'.

बिना अपवाद के सारे भीतरी और बाहरी जगत को अनित्य (परिवर्तनशील) मानने पर कारण-कार्य के सिध्दान्त और उसकी व्याख्या को भी भीन्न मानना जरुरी था. परमाणु या द्रव्य को ठोस नित्य ईंटें मानने वाले कह सकते थे, की ये एक दूसरे से मिल कर नई चीज़ो को बनाती हैं. इनका संघटन और विघटन वस्तुओं की उत्पत्ति और विनाश हैं. लेकिन बौध्द-दर्शन में ऐसी कोई कूटस्थ, नित्य ईंट नहीं थी. सभी वस्तुएं नित्य सार से शून्य हैं-- अर्थात, वह वस्तू नहीं, बल्कि घटनाएं मात्र हैं. यह नहीं कहा जा सकता की जैसे सोना मूल तत्त्व हैं, सोना ही भीन्न-भीन्न रुप लेकर कंगण, कुंडल बनता हैं. कार्य-कारण के नियम को समझने के लिए एक विशेष पारिभाषिक शब्द का बुध्द ने इस्तेमाल किया, जो हैं प्रतीत्य-समुत्पाद... इसकी व्याख्या करते हुए बुध्द कहते हैं, अस्मिन् सति इदं भवति (यह होने पर यह होता हैं) इसके समाप्त होने पर यह उत्पन्न होता हैं-- जो अभी-अभी समाप्त हुआ हैं, वही कारण हैं, और जो उसके समाप्त होने के बाद में उत्पन्न हुआ वह कार्य हैं. (जैसे बीज नष्ट होकर वृक्ष उत्पन्न होता हैं) कारण (बीज) के अस्तित्व के समय कार्य (वृक्ष) का नितान्त अभाव था और कार्य (वृक्ष) के अस्तित्व में आने के समय कारण (बीज) का सर्वथा अभाव हो चूका था. कारण के भीतर छीपी कोई ऐसी नित्य (न बदलने वाली) सारभूत वस्तू नहीं थी, जो की कार्य के भीतर निहित हैं. दोनों वस्तुतः एक दूसरे से इसके सिवा और कोई सम्बन्ध नहीं रखती की वह एक दूसरे से पहले या पीछे हुई.

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