Thursday, November 28, 2019

बौध्द धर्म के भित्ति पर

भगवान बुध्द के मूल शिक्षाओं में भक्ति के लिए स्थान न होकर ज्ञान-प्रधान चिन्तन को ही प्रश्रय प्राप्त था, किन्तु वक्कलि जैसे श्रध्दालू भिक्षु को उपदेश देते हुए तथागत ने कहा था---"वक्कलि, जो धर्म को देखता हैं, वह मुझे देखता हैं और जो मुझे देखता हैं, वह धर्म को देखता हैं." (यो खो वक्कलि, धम्म पस्सति सो मं पस्सति, यो मं पस्सति सो धम्मं पस्सति। धम्मं हि वक्कलि, पस्सन्तो मं पस्सति, मं पस्सन्तो धम्मं पस्सति -- संयुत्त निकाय, ३, २१, २, ४, ५, हिन्दी अनुवाद भिक्खूं धर्मरक्षित, दूसरा भाग, पृष्ठ ३७४) साथ ही छ अनुस्मृति कर्मस्थानों में बुध्दानुस्मृति भी एक थी, जिसकी भावना में केवल बुध्द गुणों का ही अनुस्मरण करना था. (विशुध्दी मार्ग, भाग एक, पृष्ठ १७६) यही भावना आगे चलकर भक्ति का स्वरूप ग्रहण की. महायान ने इसे और भी सँवारा. उसने भगवान बुध्द को लोकोत्तर मानकर निर्मित काय द्वारा धर्मचक्र-प्रवर्तन आदि का प्रचार किया. इस विचार-पध्दति में बुध्द के दो रुप हो गये--- एक बुध्दरुप वह जो नि:स्वभाव, धर्म-शून्य, धर्मतास्वरुप, निराकार और निरंजन हैं, वह कभी इस लोक में नहीं आता, न जन्म लेता न उपदेश देता अथवा परिनिर्वाण को प्राप्त होता हैं. दूसरा बुध्द रुप उसी की माया-निर्मित स्वरुप हैं, उसकी लिला हैं, जो महामाया की कुक्षि से उत्पन्न हुआ, महाभिनिष्क्रमण कर तप किया, ज्ञान प्राप्त कर धर्मचक्र-प्रवर्तन किया और फिर बहुजन हिताय बहुजन सुखाय धर्मोपदेश कर के महापरिनिर्वाण को प्राप्त किया. तात्पर्य यह कि एक ही बुध्द का एक निर्गुण, निराकार रुप था तो दूसरा सगुण और साकार रुप था. डॉ. भरतसिंह उपाध्याय का यह कथन समीचीन (उचित) हैं कि यह वैष्णव भक्ति के निर्गुण-सगुण रुपों के आविर्भाव शताब्दीयों पूर्व महायान ने कर दिये थे. (बौध्द-दर्शन तथा अन्य भारतीय दर्शन, द्वितीय भाग, पृष्ठ १०५२) पीछे की सगुण और निर्गुण दोनों शाखायें बौध्दधर्म की इसी भक्ति-भावना की देन हैं. राम और कृष्ण की सगुणोपासना के रुप में दूसरे प्रकार के बुध्दस्वरुप का विकास हुआ और निर्गुण उपासना के रुप में पहले प्रकार के बुध्दस्वरुप का विकास हुआ. इस प्रकार हम देखते हैं की वैष्णवधर्म की निर्गुण-सगुण दोनों ही भक्ति के स्वरुप का आविर्भाव शताब्दीयों पूर्व महायान से हो चुका था. एक स्वरुप में राम "एक, अनीह, अरुप, अनामा, अज, सच्चिदानन्द, परमधामा, अगुण, अखण्ड, अनन्त, अनादी, परमार्थरुप, अविगत, अलख, अनुप हैं तो दूसरे में दशरथसुत, लोक-मर्यादा की स्थापना करने वाले. (बौध्द-दर्शन तथा अन्य भारतीय दर्शन, वही पृष्ठ १०५२) इस प्रकार भक्ति की दोनों कल्पनायें वैष्णव भक्ति-साधना से पूर्व ही तथागत बुध्द के दो स्वरुपों में प्रगट हो चुकी थी, जो आगे चलकर मध्य-युग में पूर्ण विकास को प्राप्त हुई. इनका प्रभाव सिध्दों, नाथों, सन्तो, सुफियों आदि सब पर पड़ा था. शैव, शाक्त भी इस प्रभाव से वंचित न थे. नाथ तो शैव मतावलम्बी ही थे.

सम्प्रति इस विचार से सभी विद्वान सहमत हैं कि निर्गुणवादी सन्तो की विचार-धारा पूर्ण-रुप से बौध्द धर्म से प्रभावित थी और यह विचारधारा सिध्दों से होकर नाथो तक पहुँची थी और सन्तो ने नाथो से उसको ग्रहण किया था. यद्यपि प्रमुख सन्त कबीर ने नाथो का खण्डन किया हैं, किन्तु उनकी विचारधारा हठयोग तथा तांत्रिक साधना को जो स्थान प्राप्त हैं और नाथो जैसी भाषा का प्रयोग हुआ हैं, इसके लिए नाथसम्प्रदाय के ही वे ऋणी हैं. (बौध्द दर्शन तथा अन्य भारतीय दर्शन, द्वितीय भाग, पृष्ठ १०५४) कबीर के समय तक यद्यपि बौध्दधर्म का प्रगट रुप शेष नहीं था, किन्तु शताब्दीयों से जीर्ण-शीर्ण पड़ी उसकी भित्ति अब भी सिध्दो और नाथो से होती हुई जनता के विचारो में व्याप्त थी. साथ ही वैष्णव, सूफी आदि सम्प्रदाय भी उसकी नैतिक शिक्षा, भक्ति-साधना, परमतत्व से किसी न किसी रुप से प्रभावित थे, उसी की निर्गुण साधना ने सन्तमत को जन्म दिया अर्थात जो बौध्दधर्म का निर्गुण (शून्य) विचारधारा सिध्दो और नाथो से होकर प्रवाहित हुई थी उसी से सन्तमत का उदय हुआ था. हम आगे देखेगे की सन्तो की वाणी में बौध्दधर्म का प्रभाव किस प्रकार व्याप्त हैं.

हिन्दी सन्त साहित्य पर बौध्द धर्म का प्रभाव...
लेखिका- विद्यावती मालविका
एम. ए. पी. एच. डी. साहित्य रत्न...

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