कबीर के समय में (इसवी सन १३९८-१५१८)भारत में बौध्द धर्म की अवस्था : कबीर के समय में भारत में बौध्द धर्म की अवस्था का विस्तृत वर्णन उपलब्ध नहीं हैं, फिर भी हम प्रामाणिक ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर जानते हैं की उत्तर भारत में बौध्द धर्म अपने नाम से अब जीवित न था, किन्तु उसका प्रभाव जन-मानस पर पूर्ण रूप से था. सिध्दों और नाथों का समय बीते बहुत दिन नहीं हुए थे, उनकी धार्मिक भावनाएँ किसी-न-किसी रुप में विद्यमान थी. संवत् १२७६ में (धर्मदूत, वर्ष २१, अंक ५, पृष्ठ १५६) गाधिपुर के एक कायस्थ ब्राह्मण द्वारा श्रावस्ती में बुध्दविहार का निर्माण किया गया था, सन १३३१ में बर्मा के राजा ने बुध्द गया के मंदिर का जीर्णोध्दार करवाया था, और १५ शताब्दी के प्रारम्भिक काल सन १४३६ में बंगाल में बौध्दभिक्षु तथा बौध्द गृहस्थ थे. (भक्तिमार्गी बौध्दधर्म, भूमिका, पृष्ठ ५) ऐसे ही महाराष्ट्र में भी उस समय बौध्दो के होने के प्रमाण मिलते हैं. कन्हेरी (बोरीवली, मुंबई) की बौध्द गुहाओं में सन् १५३४ तक बौध्द थे, जिन पर पुर्तगाली लोगो द्वारा अनेक अत्याचार किये गये थे. (धर्मदूत, वर्ष २४, अंक ८-९, पृष्ठ २२५) मधेस, नेपाल, चटगॉव, आसाम, उड़िसा आदि में बौध्द पर्याप्त संख्या में थे और जिनकी परम्परा अभी भी चली आ रही हैं. विद्वानों ने सिध्द किया हैं की मधेस के थारु (पुरातत्वनिबंधावली, पृष्ठ ११५) उड़िसा और बंगाल के 'धर्म मंगल', धर्म ठाकुर, धर्मसम्प्रदाय, आदि बौध्द ही हैं. (भक्तिमार्गी बौध्दधर्म, नयी भूमिका, पृष्ठ ६-९) जहॉ तक उत्तर भारत के मध्यदेश की बात हैं, वहा प्रत्यक्षत: कबीर के समय में बौध्दधर्म नहीं रह गया था, यही कारण हैं की कबीर की विचारधारा बौध्दधर्म से प्रभावित होते हुए भी उन्हें बौध्दधर्म का वास्तविक स्वरुप विदित न था, इसकी चर्चा हम आगे करेगे. यवन-शासको ने अनेक प्रकार से हिन्दू और बौध्दो को सताया था, फलत: जैसे कि हमने देखा हैं बौध्दो का सर्वथा लोप-सा हो गया. बौध्दधर्म कि यह दयनीय दशा न केवल भारत में ही हुई, प्रत्युत इससे पूर्व अरब, इराण, अफगाणिस्तान आदि में हो चुकी थी, वहा केवल बौध्द नष्टावशेष मात्र बौध्दों के परिचायक बच रहे थे. भारत में बौध्द धर्म का स्वरूप बदलता गया और वह कई रुपो में होकर सन्त नामदेव, रामानन्द, कबीर आदि भक्तो के समय में निर्गुण भक्ति का स्वरूप ग्रहण कर लिया. उसका प्रभाव सगुण भक्ति पर भी पड़ा था और प्राय भारत की सभी धार्मिक विचारधारायें इससे किसी-न-किसी रुप में प्रभावित हुई थी. बौध्दधर्म भारतीय धर्म था. यही की धरती पर और यही की अनुकुल वातावरण में उसका जन्म हुआ था, वह विकसित तथा दृढमूल बनकर एक दीर्घकाल तक अहिंसा, शांति, सदाचार आदि की धारा प्रवाहित करते हुए पुन: यही अपने प्रतिरुपो में समा गया था, किन्तु उसकी विस्तृत शाखाएँ भारत के ही प्रत्यान्त प्रदेशो में, समुद्री तथा पर्वतीय क्षेत्रों एवं निकटवर्ती देशों से आगे बढ़कर सम्पूर्ण पूर्व एशिया में छा गई थी. जिस समय कबीर अपनी निर्गुण भक्ति का सन्देश दे रहे थे, उस समय लंका, बर्मा, चीन, जापान, तिब्बत, नेपाल, श्याम, कम्बोडिया, व्हियतनाम आदि देशो में बौध्दधर्म अपने जिवंत रुप में विद्यमान था, किन्तु कबीर के देश में वह केवल पाखण्डी माना जा रहा था. (कबीरग्रन्थावली, पृष्ठ २४०) बुध्द असुर संहारक बन गये थे. (बीजक, पृष्ठ ६३) उसके विचार-पोषक तथा प्रचारक सिध्द और नाथ माया में रत माने जाने लगे थे. (गुरुग्रंथ साहिब, राग भैरउ १३, पृष्ठ ११६१)
हिन्दी सन्त साहित्य पर बौध्दधर्म का प्रभाव ..
लेखिका- विद्यावती मालविका ..
एम ए पी एच डी साहित्यरत्न
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