Thursday, November 28, 2019

काश्यप मातंग

चीनी भाष में भारतीय साहित्य का अनुवाद-कार्य इसा की प्रथम शताब्दी में क्या-ये मो-थङ् (काश्यप मातंग) के द्वारा आरंभ हुआ और काश्यप ६७ इ. में भारत से चीन पहुँचें थे. उस समय से जो अनुवाद का कार्य आरम्भ हुआ वह १३ शताब्दी के अन्त (मंगोल सम्राट कुबिले खान) तक चलता रहा. ६७-१३०० ईसा तक जिन ग्रन्थों का अनुवाद हुआ था उनमें से बहुत से अब प्राप्य नहीं हैं, लेकिन अब भी साढ़े चौदह सौ ग्रन्थ मौजूद हैं, जिनको बत्तीस अक्षर के श्लोकों में गीनने पर उनकी संख्या साढ़े तैतीस लाख श्लोक या तीस-बत्तीस महाभारत ग्रन्थ के बराबर हैं. इन ग्रन्थों को सूत्र, विनय और अभिधर्म पिटक के तीन भागो में विभक्त किया गया हैं, यद्यपि पिटक के भीतर "बुध्द चरित" जैसे काव्यों को भी शामिल कर लिया गया हैं.

सभी ग्रन्थों की संख्या १४४० हैं जो की ५५८६ भाणवारों (फैसकुली) में समाप्त हुए हैं. यह भाणवार कहीं एक हजार श्लोकों की भी मिलती हैं और कहीं पांच सौ की भी मिलती हैं. औसतन छ सौ ले लेने पर ग्रन्थ संख्या साढ़े तैतीस लाख श्लोकों के बराबर होती हैं.

बुध्दयश अफगाणिस्तान काबुल (कुभा) के भिक्षु विद्वान थे, उस समय काबुल सांस्कृतिक और धार्मिक तौर से भारत का अभिन्न अंग था. बुध्दयश का जन्म ३३८ इसा में हुआ था, ४०० इसा के आस पास वह चीन में जा ४००-४१३ इसा के बिच राजधानी छाङ-आन में रहकर उन्होने निम्न चार ग्रन्थों का संस्कृत से चीनी में अनुवाद किया-- १) अकाशगर्भ २) दीर्घागम ३) धर्मगुप्त-विनय ४) धर्मगुप्त-प्रातिमोक्ष

बुध्दयश द्वारा अनुवादित दीर्घागम प्राय: तेरह हजार श्लोकों के बराबर हैं. उसी का दूसरा सुत्र यह 'महापरिनिर्वाण-सुत्र' हैं. इस सुत्र के एक से अधिक अनुवाद हुए थे. यह महापरिनिर्वाण सुत्र जहा हीनयान त्रिपिटक के दीर्घागम (दीघनिकाय) का एक सुत्र हैं, वहां महायान का अपना अलग और बहुत विशाल महापरिनिर्वाण सुत्र भी मौजूद हैं. जीस निकाय का भारत में एक समय बहुत प्रचार था, उसका नाम और पिटक दोनों ही आज विस्मृत हो चुके हैं. लेकिन सौभाग्य से चीनी अनुवाद में विस्मृत हीनयान 'मध्यमागम' (५४२), 'एकोत्तरागम' (५४७), 'संयुक्तागम' (५४४) और 'दीर्घागम' (५४५) चीनी अनुवाद में मौजूद हैं. इनके अतिरिक्त विनय पिटक और त्रिपिटक के बृहत्भाष्य (विभाषाये) भी मौजूद हैं, इन ग्रन्थों से हमारे सांस्कृतिक इतिहास पर बहुत प्रकाश पडता हैं, इसे कहने की अवश्यकता नहीं.

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