Thursday, November 28, 2019

कर्म

बौध्द दर्शन साफ़ कहता हैं, की हरेक अच्छा या बुरा काम हाथ से छूटा हुआ तीर हैं. करने के साथ ही वह जीवन को अपनी रुप में बदल देता हैं. हरके जीवन अपने अतीत के अनन्त काल के कर्मों के प्रभावों का योग हैं. इस योग को करने के लिए किसी बाहरी देवता या साधन की अवश्यकता नहीं. जीस तरह बहती हुई जल-प्रणाली में लगातार पड़ते हुए रंग उसे तत्काल अपने रुप में रंगते जाते हैं, वही स्थिति जीवन की हैं.

No comments:

Post a Comment

सौन्दरनन्द-महाकाव्य, आज्ञा-व्याकरण, सर्ग १८

सौन्दरानन्द महाकाव्य, अष्टादश (१८ वां) सर्ग, आज्ञा-व्याकरण (उपदेश): अथ द्विजो बाल इवाप्तवेदः क्षिप्रं वणिक् प्राप्त इवाप्तलाभः । जित्वा च रा...