बौध्द दर्शन साफ़ कहता हैं, की हरेक अच्छा या बुरा काम हाथ से छूटा हुआ तीर हैं. करने के साथ ही वह जीवन को अपनी रुप में बदल देता हैं. हरके जीवन अपने अतीत के अनन्त काल के कर्मों के प्रभावों का योग हैं. इस योग को करने के लिए किसी बाहरी देवता या साधन की अवश्यकता नहीं. जीस तरह बहती हुई जल-प्रणाली में लगातार पड़ते हुए रंग उसे तत्काल अपने रुप में रंगते जाते हैं, वही स्थिति जीवन की हैं.
Thursday, November 28, 2019
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सौन्दरनन्द-महाकाव्य, आज्ञा-व्याकरण, सर्ग १८
सौन्दरानन्द महाकाव्य, अष्टादश (१८ वां) सर्ग, आज्ञा-व्याकरण (उपदेश): अथ द्विजो बाल इवाप्तवेदः क्षिप्रं वणिक् प्राप्त इवाप्तलाभः । जित्वा च रा...
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राजा मिलिंद: "भंते, जो ज्ञानी असतो तो प्रज्ञावान देखील असतो काय?" स्थविर नागसेन: "होय महाराज, तो प्रज्ञावान सुध्दा असतो....
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सौन्दरनन्द-महाकाव्य, सप्तदश सर्ग, अमृत की प्राप्ति: अथैवमादेशिततत्त्वमार्गो नन्दस्तदा प्राप्तविमोक्षमार्ग:।सर्वेण भावेन गुरौ प्रणम्य क्लेश...
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