बौध्दधर्म में ईश्वरवाद तथा अवतारवाद के लिए कोई अवकाश नहीं हैं. कबीर ने भी निराकार ईश्वर को मानते हुए अवतारवाद को नहीं माना हैं और स्पष्ट शब्दों में कहा हैं कि अपने ही निर्मित देवों की लोग पूजा करते हैं, किन्तु पूर्ण अखण्डित ब्रह्म को नहीं जानते हैं, दस अवतार अपने नहीं हैं, क्योंकि दस अवतारो को भी अपने कर्म का फल भोगना पडता हैं. "दस औतार निरंजन कहिये, सो अपना ना होई। यह तो अपनी करनी भोगै, कर्ता औरहि कोई ।। (कबीर, पृष्ठ 240) उस ब्रह्म ने न तो दशरथ के घर अवतार लिया, न लंका के रावण को सताया. ईश्वर कभी कुक्षि (कोख) में अवतरित नहीं होता, न तो यशोदा ने उसे गोद में लेकर खेलाया, न वह ग्वालो के साथ घूमा, न गोवर्धन को हाथ से धारण किया, न वामन होकर बलि को छला, न पृथ्वी और वेदो का उध्दार किया, वह न गण्डक शालिग्राम और मत्स्य, कच्छप, कूर्म होकर जल में ही रहा, वह इनसे अगम्य हैं. अवतारवाद तो काल्पनिक व्यवहार मात्र हैं, जिसमे की संसार फँसा हैं, किन्तु वह वास्तविक ब्रह्म को नहीं जानता. (कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ 243) कबीर अवतारवाद को न मानते हुए ईश्वर को अपना पिता माना हैं और अपने को पुत्र कहा हैं. (सन्तबानी संग्रह, भाग 1, पृष्ठ 24)
ज्ञानी भिक्षु भी बुध्द-पुत्र कहलाते हैं और सिर्फ भिक्षु ही नहीं भिक्षुणियॉ भी, ज्ञानी पुरुष और महिलाये भी... भगवान् बुध्द ने स्वयं सारीपुत्र को अपना औरस-पुत्र कहा था, उन्हें अपने मुख से उत्पन्न बतलाया था ---- 'भिक्षुओं! जिसको ठिक से कहते हुए कहना होता हैं, कि यह मुख से उत्पन्न, धर्म से उत्पन्न, धर्म-निर्मित, धर्म-दायाद, निरामिष-दायाद, भगवान् का औरस पुत्र हैं, तो ठिक से कहते हुए सारिपुत्र के लिए ही कहना होगा. (मज्झिमनिकाय, पृष्ठ 3, 2, 1; हिन्दी अनुवाद पृष्ठ 467-468) सुन्दरी नामक भिक्षुणी ने भी सिंहनाद करते हुए कहा था ---- "मै भगवान के मुख से उत्पन्न औरस-पुत्री हूं, मैं कृतकृत्य और चित्त-मल रहित (अर्हत) हूं." (ओरसा मुखतो जाता कतकिच्चा अनासवा। --- थेरीगाथा, गाथा, 336) इस प्रकार ज्ञानी बौध्द प्रव्रजित तथा गृहस्थ श्रावक-श्राविकाओ के पिता भगवान बुध्द हैं. हमने पहले देखा हैं की सत्यनाम वाले बुध्द ही कबीर के सत्तनामधारी सतगुरु हो गये हैं और बौध्द-परम्परा में पिता संज्ञाक बुध्द ही कबीर के अवतारवाद से मुक्त पूर्ण ब्रह्म स्वरुप पिता भी बन गये हैं, किन्तु सिता-पती राम या दसो अवतारो में से कोई भी जगत् का कर्ता अथवा ईश्वर नहीं हैं ---
समुँद पाटि लंका गयो, सीता को भरतार।
ताहि अगस्त अचै गयो, इनमे को करतार।।
(सन्तबानी संग्रह, भाग 1, पृष्ठ 23)
जो लोग 'सोहं सोहं' कहकर जप करते हैं और वास्तविक सत्य को नहीं जानते हैं, वे मिथ्या-दृष्टी में ही पडकर अपना जीवन व्यर्थ में ही व्यतित कर देते हैं.
सोहं सोहं जपि मुआ, मिथ्या जनम गँवाय।
(सन्तबानी संग्रह, भाग 1, पृष्ठ 4)
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