बौध्दधर्म का शून्यवाद ही कबीर के निर्गुणवाद का आधार :
भगवान बुध्द ने अनित्य, दु:ख और अनात्म का उपदेश देते हुए बतलाया हैं की विमुक्ति के तीन द्वार हैं, शून्यता, अनिमित्त (अकारण) और अप्रणिहित (तृष्णारहित) जिन्हें विमोक्ष-मुख कहते हैं. इनकी समाधि भी शून्यता-समाधि, अनिमित्त-समाधि तथा अप्रणिहित-समाधि ही कही जाती हैं और इनकी भावना भी शून्यतानुपश्यना, अनिमित्तानुपश्यना तथा अप्रणिहितानुपश्यना कहलाती हैं. (दीघनिकाय, 3,10 और 3,11) पटिसम्भिदामग्ग-2 में कहा गया हैं --- "अनित्य के तौर पर मनस्कार करते हुए अधिमोक्ष बहुल अनिमित्त-विमोक्ष को प्राप्त होता हैं. अनात्म के तौर पर मनस्कार करते हुए ज्ञान-बहुल शून्यता-विमोक्ष को प्राप्त होता हैं." शून्यता की व्याख्या में कहा गया हैं --- "अनित्य की अनुपश्यना का ज्ञान नित्य के तौर पर अभिनिवेश (दृढ़ग्राह/जिद) को छोडता हैं, इसलिए शून्यता विमोक्ष हैं, दु:ख की अनुपश्यना का ज्ञान सुख के तौर पर अभिनिवेश को छोडता हैं, अनात्म की अनुपश्यना का ज्ञान आत्मा के तौर पर अभिनिवेश को छोडता हैं, इसलिए शून्यता विमोक्ष हैं." (पटिसम्भिदामग्ग, भाग-2, पृष्ठ 250) यह भी कहा गया हैं की परमार्थ से सभी सत्यो का अनुभव करने वाले, कर्ता, शान्त होने वाले और शान्ति को जानेवाले के अभाव से ही शून्य कहा जाता हैं ---
दुक्खमेव हि कोचि दुक्खितो,
कारको न किरिया व विज्जति।
अत्थि निब्बुति न निब्बुतो पुमा,
मग्गमत्थि गमको न विज्जति।।
अर्थात् दु:ख ही हैं, कोई दु:ख भोगने वाला व्यक्ति (आत्मा) नहीं हैं. कर्ता नहीं हैं, क्रिया ही हैं. निर्वाण हैं, निर्वाण को प्राप्त व्यक्ति नहीं हैं. मार्ग हैं, जाने वाला पथिक नहीं हैं. यह नैरात्म्य की भावना ही शून्यता की भावना हैं. आगे चलकर नागार्जुन के समय में इस भावना का विकास हुआ और नागार्जुन ने इसकी व्याख्या अपने ढंग से की. शून्यता की इसी भावना ने सिध्दो के समय में शून्य एवं निरंजन का रुप धारण किया. सिध्द सरहपा ने शून्यवाद का पर्याप्त प्रचार किया, जिसका प्रभाव नाथो और सन्तो पर परम्परानुसार पड़ा. सिध्द सरहपा (सरहपाद/the One who has shot The arrow) ने कहा कि परमपद (निर्वाण) शून्य और निरञ्जन हैं ----
सुण्ण णिरंजण परमपउ, सुइणो अ माअ सहाव।
भावहु चित्त-सहावता, णउ णासिज्जइ जाव।।
(दोहाकोश, भूमिका, पृष्ठ 36)
कबीर ने भी शून्य को ग्रहण किया और उसे अलख, निरञ्जन तथा शून्यतत्व माना. उन्होने शून्य में समाधि लगाई और कहा कि शून्य में जल, पृथ्वी, आकाश आदि नहीं हैं और तन, मन, आत्मीयता भी नहीं हैं, वह तो शून्य ही हैं ---
नहिं तहै नीर नाव नहिं खेवट, ना गुन खैचनहारा।
धरनी गगन कल्प कछु नाही, ना कछु वार न पारा।।
नहिं तन नहिं मन नहिं अपन पौ सुन्न मे सुध्द न पैहौ।
(कबीर, पृष्ठ 251)
बौध्द विद्वान नागार्जुन ने परमार्थ को शून्य, अशून्य से रहित बतलाया था (शून्यमिति न वक्तव्यम् अशून्यमिति वा भवेत् । उभयं नोभयं चेति, प्रज्ञप्त्यर्य तु कथ्यते।।) और सिध्द गोरखनाथ ने भी वही बात कही हैं. (बसती न सुन्यं न बसती अगम अगोचर ऐसा। गगन सिषर महि बालक बोलै ताका नॉव धरहुगे कैसा ।। ..... गोरखबाणी) इसका ही प्रभाव कबीर पर भी पड़ा और उन्होने ने कहा की परमतत्व शून्य हैं (सत से सत्त सुन्न कहलाई, सत्त भंडार याही के मॉही। नि:तत रचना ताही रचाई, जो सबहिन ते न्यारा हैं... कबीर, पृष्ठ 277), किन्तु वह रुप-स्वरूप से रहित हैं (रुप सरुप कछु वह नाही, ठौर ठाँव कछु दीसै नाही। अजर तूल कछु दृष्टि न आई, कैसे कहुँ सुभारा हैं ।। .... कबीर, पृष्ठ 277), वह निर्गुण सगुण से परे हैं (निर्गुण सर्गुण के परे, तहै हमारा ध्यान हैं..... कबीर, पृष्ठ 317), वह गगन-मण्डल में रुप-रेख हैं (रेख रुप जहि हैं नहीं, अधर धरो नहिं देह। गगन मँडल के मध्ये, रहता पुरुष विदेह।। .... कबीर, पृष्ठ 317), वह ऊपर, नीचे, बाहर, भीतर नहीं बतलाया जा सकता (धर नहीं अधर न बाहर भीतर पींड ब्रह्मंड कछु नाही. .....कबीर, पृष्ठ 355), अर्थात् नागार्जुन के शब्दों में वह शून्य-अशून्य न होता हुआ भी उसे प्रज्ञप्ति (सुचित करने की क्रिया या भाव) के लिए शून्य कहा जाता हैं.
स्थविरवाद शून्य-समाधि अथवा शून्य-भावना को मानता हुआ भी परमपद निर्वाण को एक 'आयतन' मानता हैं, जहा उत्पति, लय, स्थिति, गति, अगति, नहीं हैं (उदान, हिन्दी अनुवाद, पृष्ठ 109), और महायान का शून्यवाद प्रतीत्य-समुत्पाद की भावना हैं जो शून्यता को देखता हैं वही चारो आर्यसत्यो को देखता हैं (माध्यमिक कारिका, 24, 39-40) तथा आर्यसत्यो का अनुभव या साक्षात्कार ही निर्वाण हैं, तात्पर्य यह कि निर्वाण को शून्यता की भावना से ही प्राप्त किया जा सकता हैं. इसे कबीर ने निरंजन, राम आदि नामो से पुकारा हैं. वह निरंजन घट-घट में व्याप्त हैं (सब घटि अन्तरि तुं ही व्यापकु धरै सरुपै सोई।... कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ 105, नाति सरुप बरण नही जाकै, घटि घटि रह्यौ समाई कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ 149) महायान सुत्रालंकार में भी तथागत को सर्वव्यापी कहा गया हैं. (तद्गर्भासर्वदेहिन:। ....महायान सुत्रालंकार - 9, 37) सिध्द सरहपा ने "सअलु णिरन्तर बोहि ठिअ" (दोहाकोश, भूमिका, पृष्ठ 27) कहकर इसी को प्रगट किया हैं. गोरखनाथ ने इसी अवस्था को स्पष्ट करते हुए कहा हैं ---
उदै न अस्त राति न दिन, सरबे सचराचर भाव न भिन।
सोई निरंजन डाल न मूल, सब व्यापीक सुषम न अस्थूल। (गोरखबानी, पृष्ठ 39)
इस प्रकार स्पष्ट है कि विमोक्ष-मुख शून्य ने क्रमश: विकसित होकर अलख, निरंजन, शून्य आदि नामो से व्यवहृत होकर ब्रह्म का रुप धारण कर लिया और कबीर ने "कह कबीर जँह बसहु निरंजन तँह किछु आह की सुन्न" कहकर दोनों को मिला दिया, फिर भी शून्य अनिर्वचनीय बना रहा. कबीर ने इसे सहजशून्य भी कहा और तरुवर (उत्तम पेड़) का रुपक देकर समझाया, जैसा की सिध्दों ने समझाया हैं. (दोहाकोश, भूमिका, पृष्ठ 35-36) कबीर ने कहा हैं कि सहजशून्य एक वृक्ष की भाँति हैं, जो उसे देख पाते हैं, उन्ही का मै सेवक हूं ---
सहज सुंनि इकु बिरवा उपजि धरती जलहरु सोखिआ।
कहि कबीर हउ ताका सेवक जिनि यहु बिरवा देखिआ।। (सन्त कबीर, पृष्ठ 181)
कबीर ने समुद्र के रुपक से भी इसे समझाया ----
उदक समुंद सलिल की सोखिआ नदी तरंग समावहिगे।
सुंनहि सुंनु मिलिआ समदरसी पवन रुप होई जावहिगे।। (सन्त कबीर, पृष्ठ 192)
बौध्दधर्म अनिश्वरवादी था. पीछे बुध्द को निरन्तर विद्यमान माना गया और जैसा की ऊपर कहा गया हैं, वे घट-घट में व्याप्त मान लिये गये. (महायान सुत्रालंकार, पृष्ठ 131) इस भावना ने ही नाथो को प्रभावित किया और सन्तो ने इसे अपने ढंग से ग्रहण किया. राहुल सांकृत्यायन जी का यह कथन समीचीन (उचित) हैं की पीछे के सन्त शून्यवाद से परिचित नहीं थे, तो भी वे उसके प्रवाह में बहे बिना न रहे. (दोहाकोश, भूमिका, पृष्ठ 36) उन पर सिध्दों का प्रभाव पड़ा क्योकी सिध्दों ने शून्य का पर्याप्त प्रचार किया था. अब अनीश्वरवादी शून्यवाद ब्रह्मतत्व से समन्वित होकर कबीर का निर्गुणवाद बन गया, जिसका मूल आधार बौध्दधर्म का शून्यवाद ही था.
हिन्दी सन्त साहित्य पर बौध्दधर्म का प्रभाव
लेखिका- विद्यावती मालविका
एम ए पी एच डी साहित्यरत्न.....
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